Tuesday, 4 August 2020

यह कैसी विडंबना?

कोई कल्पना नहीं, परंतु आँखों देखी घटना है। बचपना था। पर उस समय की याद आज भी तरोतजा है। तब हमारा समाज कैसा था और अब किस मोड़ पर है, लेखक को अपने विवेकानुसार अच्छी तरह पता है। इस पर किसी का मतभेद होना स्वाभाविक है। खैर, समाज सुधार का बागडोर तब भी राजनीतिज्ञों के हाथों था, और आज भी उन्हीं राजकुमारों के हाथों सुपुर्द है। किसी भी सामाजिक संस्थाओं को तब भी और आज भी कोई घास नहीं डालता है। तब खासकर संताल परगना में ‘जोड़ा बैल’ और ‘मुर्गा’ के बीच राजनीतिक द्वन्द था। माराङ गोमके ने आदिवासियों को पता नहीं कौन-सी घुट्ठी पिलाई थी कि लोग अलग प्रांत के लिए अत्यधिक मदहोश थे। कहीं भी माराङ गोमके का भाषण होता, लोग ‘ताबेन और सा़तु' बांधकर’ दूर-दूर से चले आते थे। इतनी भीड़ होती थी कि सभास्थल पर तिल रखने के लिए जगह नहीं होती थी। तब जनता भी सा़ेहराय नृत्य करते हुए अपना मताधिकार का प्रयोग करने हेतु पोलिंग बुथ तक जाती थी। पर कुछ ही वर्षों के बाद किसी राजनीतिक दांव-पेच के कारण उस मुर्गा को चखना कर दिया गया। झारखण्ड पार्टी दो बैलों के साथ जुड़ गई। आदिवासी जनता इस बारे में अनभिज्ञ थी। 

संताल परगना के लोगों ने तब ‘जोड़ा पत्ता’ में खूब खाना खाया। लेकिन जल्द ही ‘जोड़ा पत्ता’ भी फट गया। अब संताल परगना में एक राजनैतिक सूनापन-सा छाने लगा। तब उसकी भरपाई हेतु आंधी-तूफान की तरह एक बावंडर आ गया। यह कोई 1972 की घटना है। संताल परगना में एक ऐसा महाबलि का उदय हुआ था, जो पेड़ को हिला दे, तो उनसे रोटियों की बरसात होती थी, जल के अंदर मोटर साईकिल चलाने की कूवत थी और तो और उनपर चली गोलियां सब पानी बन जाती थीं। उनपर किसी तरह का कोई भी प्रहार असर नहीं करता था। और इस तरह धान काटो व महाजनों के विरुद्ध आंदोलन अपनी चरम स्थिति को छू गई थी। तब जनता ने भी नई आस के साथ उनका खूब साथ दिया। लोगों ने अलग प्रांत को ‘संजीवनी बूटी’ मान लिया था। जनता ने अपना सब काम छोड़कर उनका खूब साथ दिया। इस आंदोलन में न जाने कितनों की जानें चली गईं, कोई हिसाब नहीं।

और इस तरह 15 नवंबर, 2000 को झारखण्ड के आदिवासियों के लिए एक नई सुबह आई। ऐसी सुबह जिसमें एक नये अलग झारखण्ड राज्य का उदय हुआ था। नये राज्य का उदय होते ही कुछ लोग बालू फांकने के लिए अपनी बोरियां समेटने लगे थे, पर किसी ने बड़े भाई समझकर उसे अपने पास ही पनाह दे दी। 

नये राज्य का गठन किए आज 20 वर्ष भी बीत चले। पर संजीवनी बूटी भी काम न आई। खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई। आदिवासियों की आस पर पानी फिर गया। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक। जनता अब किंकर्तव्यविमूढ़ है। आइए इसका कारण ढूंढ़कर समाधान निकालने की कोशिश करते हैं।

Monday, 3 August 2020


AŃCAR DO̱TAM MẠILẠKEDAE

O̱nto̱r paṭae ńũtạtkeda.
Rạnu reak̕ sea mạṇḍi,
Digdhạ kạridaṅ ńũt,
Hataṅ, inbo̱ro̱, daṛe
Je̱re̱ť sapha, riṭhạkedae.
Jạt o̱ko̱ḍa sạbut menak̕a,
Pocra mucạť ḍhạ̃ṛkanlaṅ.
To̱be̱te̱ṛo̱ṅ bhagwa tul,
Bo̱to̱r jala hupuc̕-hupuc̕,
Hạni tora caṇḍbo̱l tul,
Ńir bạgi dea giḍi,
Kathae baro̱ dolan gaṛ,
Lilibici Campa lilạmen.
Pạtiạu bạnuk̕ saṛtam mẽ̱ť,
Jo̱l, jumi, bir-pakaṛ,
Sanam do̱kho̱l, ujạṛena.
Payo kanlaṅ aṅgo̱cme,
Ar bakhan cekate?
Madho̱ Siń siń sado̱m,
Han-han, hin-hin,
Mẽ̱ť samaṅrey ci hõ̱hõ̱e.
Nagam amak̕ siṛạgeťae,
Dạdạṛtege menam nit hõ̱,
Baha Bandelae, To̱ṛe̱ Pukhori,
Sãtbhumren hae Santal!
Nit hõ̱ menam dạdạṛtege.
Bạrin-Bạgṛi-Bo̱rdo̱man,
Namal kạmi akal-sukạl,
O̱n paro̱m Gaṅ Nạ̃i,
No̱te̱ Dilli-Mumbại, ar
Kasko̱mbir (Kạsmir),
Oka-oka baṅ re̱ṅge̱c̕ jala,
Jaṭal koṭal hae pe̱ pại tala!
Hapṛamkoak̕ miť \tho̱p,
Hińjiť ańje̱ťen alaṅre,
Dulạṛ-duplạṛ sãota tala,
Mạrkhu marao haere jala!
Miť phuṛuk̕re abo̱l jumi,
Bo̱lo̱ sambaoen bo̱to̱lre.
Guṛdak̕ bo̱lo̱en,
Kasadak̕ oḍoken.
Sui leka bo̱lo̱en,
Pal leka darena.
Paṭ gaṇḍo osaren,
Jel hõ̱ko jo̱mkeť,
Mãyãm hõ̱ko hõ̱ṅgo̱rkeť.
Unạk̕ ro̱ḍo̱c̕, unạk̕ ko̱clo̱n!
Ańcar kathayem danade.
Mãyãm pańja dukạnlenre,
Arak̕-poṇḍ be̱ṅge̱ťtam,
Siṇḍ-bhaṇḍ e̱ge̱rtam,
Tạrup̕ lekam hạṇḍrạuk̕,
Uni ṭhen do̱ sikup̕ thir, 
Ańcar do̱tam mạilạkedae!

Tuesday, 7 July 2020



CEDAŃ DO̱SE KUṚI?

Dại kan co̱m mại?
E̱nte am do̱ kuṛi ho̱po̱n.
Rit kan duniạ reak̕,
Amaṅ nana rup nana ro̱ṅ,
Ạgulemre dada-hili,
Idilemre didi-teńaṅ,
Me̱nkhan, am
Abhran kanam,
Gharõ̱ńj, so̱maj ar disạm,
Amge sirjo̱niạ Pilcu buḍhi.
Am be̱go̱r mit̕ buḍạk̕,
Gharõ̱ńj oka hõ̱ baṅ laṛaok̕,
Onate amaṅ go̱no̱ṅ,
Hirạ-muti kho̱n hõ̱ bạ̃ṛti,
Bạ̃ṛti ar bạ̃ṛti...ar bạ̃ṛti...!
Onkan bạ̃ṛti go̱no̱ṅan dho̱n,
Ińaṅ ti kho̱n uḍạu ado̱k̕,
Cedak̕ bạń rag,
Cedak̕ bạń ho̱mo̱r halaṅ?
Am khạtir, am rạkhim khạtir,
So̱maj rilạmala, disom khạtir,
Ceka do̱sledako hapṛamko?
Ceka ghạṭledako purkhạko?
Baro̱ dolan gaṛ, baro̱ jo̱ṛ sagaṛ,
Mit̕ ńindạte, mit̕ likre lagakedako,
Jạtgeko bo̱to̱rada bhạire bhại,
Gaṛ do̱ bako dayawat̕,
Bhạire bhại Madho̱ Sińak̕ bo̱to̱rte,
Bhạire bhại gaṛ do̱ko bạgiadare.
Nitoṅ hạni po̱rer culhạ,
Curạmare o̱k̕o̱ṅkan,
Saṛ tahe̱n bhorge ńe̱le̱-dumur,
Inạkate do̱ mo̱so̱t̕ ńũruk̕.
Ragạń, ho̱mo̱rạń am lạgit̕,
Daṛe katha bạnuk̕ iń ṭhen,
Amge hirạ muti, Maenomạti,
Ińaṅ katha bujlere RAN,
Ar baṅkhan do̱ SAHAN.

Tuesday, 30 June 2020

JOHAR HULGẠRIẠKO!

Johar, Johar, Johar Hul Johar!
Johar, Johar, Johar jo̱to̱ko,
Johar Subạ Ṭhạkur!
Johar sanam mãyãm gohako!
Joharak̕kanle apeak̕ dil, daṛe ar
Johar apeak̕ disom dulạṛ.
Sabad bạnuk̕ ale ṭhen,
O̱bo̱ren alaṅ aleak̕,
Ko̱lo̱m ṭhoṇṭa rạpuťen,
Sạmud kạli hõ̱ ańje̱ťen,
Apeak̕ mạhima o̱ho̱ge lạilen,
Ape dọ Boṅga lekan ho̱ṛ,
Ape do̱ sạrige so̱no̱t ho̱ṛ,
Jọi jitkạr ape mãyãm gohako!
Ghurạ phiri dhạrti ạcur ruạṛen,
Ale menak̕le baba arhõ̱ e̱ṃḍe̱ge,
Okare do̱ baba apepe thamgạḍilen,
Ape kho̱n hõ̱ aleak̃ halo̱t,
Ar ce̱ťle lạia Baba?
Serma duạra kho̱n,
Mẽ̱ť pe̱re̱c̕mape tạṅkhikange,
Haere Babale kalaṅ ḍolaṅen.
O̱kte̱ reak̕ge phãk menak̕a,
Bakhan bạnuk̕ ce̱ť hõ̱ begar.
Hẽ̱, me̱nkhan lạire lajao,
Ape do̱ ho̱k lạgiťpe dãṛẽ̱yena,
Ar ale do̱ be̱ho̱kle ho̱bo̱rakada.
Johar baba, bańcaokalepe!


Friday, 10 August 2018

संताली साहित्य का भविष्य

यह सौ प्रतिशत सच है कि संतालों में संताल हूल-1855 तक एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मौजूद नहीं था। तात्पर्य यही है कि किसी संताल को कोई आक्षरिक ज्ञान नहीं था। इतना कुछ होते हुए भी संतालों ने न सिर्फ अपनी भाषा का सृजन किया, बल्कि उसे पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से अच्छी तरह संजोकर रखा। यह तो गनीमत है उन मिशनरियों का जिन्होंने सर्वप्रथम संतालों के ऊपर न सिर्फ अनेकों प्रकार से दया दृष्टि की बल्कि उनकी भाषा की उन्नति हेतु भी कई महत्वपूर्ण कार्य किये। विदित हो कि सर्वप्रथम उड़िसा, जेलासोर में मिशनरी कार्य में जुटे जेरेमिया फिलिप्स ने ही अपनी पुस्तक An Introduction to the Santal Language (प्रकाशित 1852) में पहली बार संताली व्याकरण की पुस्तक प्रकाशित की। इसके बाद सन् 1860 में जब संताल परगना में कुछ मिशनरियों का आगमन हुआ, तब संक्षेप में यही कि उन्होंने संताली साहित्य के विकास हेतु दुमका के नजदीक बेनागाड़िया में एक मुद्राणालय की स्थापना की और संताली साहित्य के विकास के लिए अनेकों तरह के कार्य किये। यह भी विदित हो कि संताल परगना से सटे मानभूम, पोखुरिया में संताल मिशन प्रेस की स्थापना की और यहां से भी संताली साहित्य के विकास हेतु अनेकों कार्य हुए। यह भी ज्ञात हो कि बेनागाड़िया से "हो़ड़ हो़पो़नरेन पेड़ा" (बाद में "पेड़ा हो़ड़") एवं पोखुरिया से ”ढा़रवा़क्“ नामक संताली पत्रिकाओं का भी प्रकाशन होता था। इसके बाद 1946 से अभी तक ”मारसालताबोन“ नामक पत्रिका दुधानी, दुमका से अविराम प्रकाशित होती आई है।

शुरुआती दौर में मिशनरियों ने देखा कि संताली को देश में उपलब्ध किस लिपि से लिखा जाय, यह उनके लिए एक बहुत ही चुनौतिपूर्ण कार्य था। मालूम हो कि जेरेमिया फिलिप्स ने अपनी उपरोक्त पुस्तक में संताली के लिए बंगला लिपि का उपयोग किया था। लेकिन बाद में संताल परगना के मिशनरियों ने वैज्ञानिक तरीके से रोमन लिपि को संताली के लिए परिवर्धित/संशोधित किया एवं उपयोग में लाया। मिशनरियों ने न सिर्फ संताली लिखने के लिए रोमन लिपि को भाषाविज्ञान की दृष्टि से संशोधित व संतुलित किया बल्कि उन्होंने संताली साहित्य के विकास में चार चांद भी लगा दिये। इस लिपि से संताली विश्व शब्दकोश की रचना हुई एवं कई उच्च कोटि की पुस्तकों की रचना भी हुई। संताली के लिए मिशनरी युग को संताली का स्वर्ण युग कहा जाय तो यह कोई अतिश्योक्ति न होगी।

ध्यान रहे, ब्रिटिश काल के दौरान भारत में एक भाषाई सर्वेक्षण हुआ था, उस सर्वेक्षण में भाषावैज्ञानिकों ने संताली को दो वर्गों में बांट दिया - दक्षिणी संताली एवं उत्तरी संताली। उड़िसा एवं उससे सटे इलाकों में बोली जाने वाली संताली को दक्षिणी संताली का नाम दिया गया। सर्वेक्षण के दौरान भाषावैज्ञानिकों ने पाया कि उड़िसा की संताली आर्यों की भाषा के साथ मिश्रित एवं उसके साथ घुलमिल जाने के कारण अत्यधिक प्रदूषित हो गई। तात्पर्य यही है कि यहां की संताली ने अपनी गरिमा खो दी और यह एक बोली मात्र ही रह गई है। जबकि उत्तरी संताली जिसे संताल परगना, गिरिडीह, हजारीबाग एवं बिहार, असम, उत्तरी बंगाल यहां तक की पड़ोसी देश नेपाल, भूटान एवं बंग्लादेश में बोली जाती है, उसे विशुद्ध एवं निष्कलंक पाई गई। अतः भाषावैज्ञानिकों ने उत्तरी संताली अर्थात् संताल परगना की संताली को ही अपनी रिपोर्ट में मानक (standard) संताली घोषित कर डाला। (Ref. Linguistic Survey of India, Vol-IV, page No 32, Director General G. A. Grierson).

लिपि विवाद की जड़ यहीं सर्वे रिपोर्ट में ही छिपी हुई है। जब उपरोक्त सर्वे में भाषावैज्ञानिकों ने दक्षिणी संताली को भाषा मानने से ही इंकार कर दिया, तो यहां के संतालों के पास खंभा नोचने के अलावे और कोई रास्ता ही नहीं बचा। उन्हें अपनी गलती समझ ही नहीं आ रहा है। वे उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाली कहावत पर उतारु हैं। वे किसी ग्वाले की तरह अपने दही को खट्टा मानने से ही इंकार कर रहे हैं। यही कारण है कि कुछ समय तक दक्षिणी संतालों ने क्, च्, त् एवं प् के मामले में भी खूब होहल्ला मचाया था, पर प्रो. स्टेन कनो एवं बोडिंग साहब ने उनकी बखिया उधेड़कर रख दी थी। तब संताल परगना में रोमन हो या देवनागरी लिपि संताली साहित्य अपनी चरम स्थिति को छू रहा था। यह सब देखकर दक्षिणी संताल अत्यधिक जलन, ईर्ष्या एवं द्वेष से जल-भून हो उठे। (लिपि विवाद के पीछे और भी कई कारण छुपे हुए हैं।) फिर मरता क्या नहीं करता? दक्षिणी संताल भाईयों को अभी तक समझ ही नहीं आ रहा है कि किसी भी साहित्य सृजन के लिए उसकी भाषा बड़ी है ना कि उसकी लिपि। पर वे चट्टान पर दूब उगाने को डटे हुए हैं।


Saturday, 7 February 2015

पोते के नाम पत्र

मानव समाज में चिट्ठी लिखने की परंपरा बहुत पुरानी है। इस परंपरा से कोई अछूता नहीं। चिट्ठी की कई प्रजातियाँ हैं; यथा सरकारी, गैर-सरकारी एवं निजी। कई तरह से चिट्ठियाँ लिखने का प्रचलन है। बच्चों के चाचाजी ने भी अपनी पुत्री के नाम खत लिखा था। उसने यह पत्र किसी काल कोठरी से लिखा था। पर आपका परदादा फूस के नीचे खटिया पर पड़े-पड़े आपको यह अंतिम पत्र लिख रहा है, वह भी ठीक अपनी अंतिम श्वास लेने से पहले। यह कोई पत्र नहीं है, यह तो आपके परदादे के जीवन-दर्शन का अंतिम निचोड़ है। आपको यह पत्र लिखकर कोई गुनाह तो नहीं किया है? खैर, जिस काल में यह पत्र आपके नाम लिखा गया था, उस दौरान खत लिखने की परंपरा ही अपनी अंतिम साँस ले रही थी। दुनिया के वैज्ञानिकों ने द्रुतगामी से संदेश पहुँचाने के लिए तब नई विधि ईजाद कर ली थी, दूरभाष, घुमंतूभाष, एसएमएस और ई-मेल आदि। अब तो विज्ञान ने यहाँ तक प्रगति कर ली है कि बात करने वाले एक दूसरे का खोपड़ा भी आसानी से देख सकते हैं। आपका जमाना इस विधि को छोड़ वार्त्ताकार स्वयं एक दूसरे से ई-मेल से भी कम समय में मिल सकने की तरकीब निकाल लेंगे। कितनी बार मैंने आपके पिताजी को आगाह करते रहा कि सावधान! आपके गाँव-घर में आग लग चुकी है। इसे बुझाने का कोई उपाय ढूँढ़ों। पर उन्होंने मेरी सलाह को सिरे से ही खारिज कर दिया था। अब और पत्र लिखने की मेरी हिम्मत नहीं बची है। कब मैं भगवान का प्यारा बन जाऊँ, मुझे भी नहीं मालूम। अतः आपके नाम यह मेरा आखिरी पैगाम समझो। आप यह खत न समझना पर इसे तार समझना। चूँकि तार का उपयोग हमेशा दुःख की घड़ी में ही हुआ करता था। यह बहुत बड़ी विडंबना ही होगी कि इस पत्र को आप तक सुपुर्दगी होने में करीब पाँच सौ वर्ष तक का सफर तय करना होगा। आप इसे पढ़ पाओगे, मुझे संदेह है। दुनिया के किसी कोने में यह खत मिले या न मिले पर संपादक जी के पाँचवें गोदाम में यह आपके लिए सुरक्षित रखा रहेगा। रिवाजानुसार खत सिर्फ जीवित लोगों को ही लिखा जाता है। पर यह आठवाँ आश्चर्य ही होगा कि एक परदादे ने अपने भावी पोते के लिए एक दुःखभरी दास्तान लिख छोड़ी है।

यह जानकर आपको अति प्रसन्नता होगी कि मैं ही आपका एकमात्र बदनसीब परदादा हूँ; जिसने इस ममतामयी पत्र की माला को गूँथने की चेष्टा की है। दूध का दूध और पानी का पानी न्याय कर सको, अतः मैंने इस खत को लिखने का दुःसाहस किया हैै। बताते चलूँ कि पत्र लिखते वक्त यहाँ चंद्रग्रहण हो रहा है। आशा है आप लोग तब सूर्यग्रहण झेल रहे होंगे। आज मुझे मालूम नहीं क्योंकर खत लिखते समय मेरा हाथ काँप रहा है। गला सूखता जा रहा है। मस्तिष्क में अनगिनत अच्छे-बुरे विचार कौंध रहे हैं। आगे नाथ न पीछे पगहा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। फिर भी ताकि आपका शोध-पत्र तथ्य पर आधारित हो; अतएव मैंने सोचा कि इस पत्र के माध्यम से आपके लिए एक सत्य की गठरी छोड़ जाऊँ। इस खत में जो कुछ भी लिखा जा रहा है, वह सच्ची घटना पर आधारित है। मनगढ़ंत व कपोल कल्पना जैसी कोई भी चीज इस पत्र में वर्णित नहीं है। मुझे अच्छी तरह मालूम है कि आप मुझे एक बार नहीं हजारों बार दोषी ठहरा रहे होओगे। यहाँ तक कि मेरी अस्थियों को फाँसी के तख्ते पर लटकाने के लिए भी उतावले हो रहे होंगे। पर करुँ भी तो क्या करुँ? मैं भी वक्त का मारा हूँ। समय के थपेड़ों ने मुझे अधमरा कर दिया है। आपकी दशा का ख्याल आते ही मैं जी भरकर रो पड़ता था। और मेरे आँसूओं की बूँद स्याही बनकर मेरी लेखनी को ताउम्र मदद करती रही। लेकिन एक बात का ध्यान रखो। जिस दुःख से सिदो-बिरसा परेशान थे, जिन कारणों को लेकर मारांग गोमके व दिसोम गुरु ने आंदोलन किया, आज हम भी उन्हीं कारणों से पीड़ित हो रहे हैं। और आशा है आप भी उसी दुःख से ही दबे रहोगे। अर्थात् दुःख के अंतराल में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं होगा। आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए।

कहा जाता है; पुरखे हमारे शहीद होते रहे हैं। किसी को घोड़े की चंवार से बाँधकर तब तक घसीटा गया जब तक कि उनके प्राणपखेरु उड़ नहीं गए, तो किसी को अपने ही जन्मस्थल में फाँसी दी गई और तो और किसी को तो जहर का प्याला पीने के लिए भी मजबूर किया गया। जिस किसी ने भी अन्याय के विरुद्ध मुँह खोला, उसकी बोलती सदा-सदा के लिए बंद कर दी गई। पुरखों के बलिदानस्वरुप हमने कुछ दिन सीएनटी और एसपीटी एक्ट का लुत्फ उठाने का असफल प्रयास किया। पर यह वही साबित हुआ, जिसे हाथी के दाँत दिखाने के कुछ और खाने को कुछ कहते हैं। बलि का बकरा कब तक खैर मनाता? जगह-जगह उनकी बपौती जमीन पर कल-कारखाने बैठा दिए गए। बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण हुआ। वे कुशल कारीगर तो थे नहीं; अतः उन्हें चतुर्थ श्रेणी की नौकरी से भी वंचित कर दिया गया। वे बेचारे भूमिपुत्र विस्थापन के जाल में फँसते चले गए थे। वे रोजगार की तलाश में असम, अंडमान और महानगरों की ओर कूच कर गए। आरक्षण मिलने लायक आबादी न रही। सरल, सीधे और सत्यवादी भूमिपुत्र अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का सामना करने में विफल रहे। हमेशा उनके मुखवृंद से भगवान देखता है का सुवचन निकलता था। किन्तु कोई भी भगवान उसे बचाने नहीं आया। क्यों आता? यहाँ तो यह उक्ति चरितार्थ हो रही थी; भगवान भी उसी की मदद करता है, जो अपनी मदद स्वयं करता है।

मुगलों के बाद दो सौ वर्षों तक देश अंग्रेजों का गुलाम रहा। आजादी की लड़ाई छेड़ दी गई और अंततः सन् 1947 ई. में अंग्रेज देश छोड़कर चले गए। पर झाड़ जंगल में काले अंग्रेजों का साम्राज्य बढ़ता गया। उनके फन कुचलने के लिए आँधी-तूफान की तरह झाड़ जंगल में मारांग गोमके का उदय हुआ। सदियों से दबाए गए लोगों ने अपने बीच एक ऐसा गरीबों का मसीहा पाकर बहुत आनंदित हो उठे। गरीबों ने कुछ हद तक राहत की साँस ली। लोग उनसे जुड़ते गए एवं कारवां बनते गया। मारांङ गोमके जहाँ भी जाते, उन्हें सुनने के लिए ऐसी भीड़ जमा होती, जो न अब तक इकट्ठी हुई थी और न ही भविष्य में ऐसी भीड़ कभी इकट्ठा होने की उम्मीद है। उनकी सभा में शामिल होने के लिए लोग भूखे-प्यासे कई सौ मील तक का सफर पैदल ही तय करते। मुर्गे की बांग ने लोगों को गहरी नींद से जगा दिया था। लोगों में जागरुकता नाम का जीव प्रवेश कर गया था। फिर क्या था? जहाँ देखो मुर्गा छाप, वहीं लगाओ मोहर आप चरितार्थ हो गया। इस तरह मारांङ गोमके ने तैंतीस विधायकों को बिहार विधान सभा में भेज दिया। इस प्रकरण से कुछ हुआ कि नहीं यह तो ज्ञात नहीं पर यह सर्वविदित है कि लोगों के मन मंदिर में एक ऐसी ममतामयी भावना जाग उठी, जिससे लोग इस कदर ग्रसित हो गए कि यह भावना भुलाए न भूली। अपने लिए अलग झाड़ जंगल प्रदेश की माँग ने लोगों की नींद हराम कर रखी थी। उठते, बैठते, सोते आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ अलग प्रदेश ही दिखाई दे रहा था; क्योंकि अलग प्रदेश मूर्छितों की एकमात्र संजीवनी बूटी थी। मुर्गे की कुकड़ुकूं से सारी जनता अति प्रसन्नचित्त थी। पर हाय री अभागिन जनता! एक दिन उन्हें पता चला कि मारांग गोमके और उनके सहयोगियों ने उस मुर्गे को ही चखना कर दिया था। और इस तरह मारांङ गोमके देश के प्रथम प्रधानमंत्री की गोद में जा बैठे। मारांङ गोमके राजनीति छोड़ एक किसान बन गए। जिसे वह हल में जोतने हेतु जोड़ा बैल बन गए। मारांग गोमके द्वारा खरीद-फरोख्त की यह एक ऐसी बेसुरी परंपरा स्थापित की गई कि बाद के नेता भी इनके पदचिह्नों का अनुसरण करते नहीं अघाते थे।

मारांङ गोमके के अस्त होने के बाद झाड़ जंगल में एक बहुत बड़ी रिक्तता पैदा हो गई। लगा, मानो लोगों को साँप सूँघ गया हो। कहीं से कोई चूँ तक की आवाज न आई। इस रिक्तता की पूर्ति हेतु फिर आया तेज हवा का एक झोंका। एक मुट्ठी चावल और एक रुपया का कमाल देखिए कि वह कुछ ही दिनों में साढ़े तीन करोड़ में परिणत हो गया। लोगों ने उन्हें सिर आँखों पर बैठा लिया था। लोगों ने अपनी ममतामयी भावना को गिरवी रख दिया। तीस वर्षों तक उन्हें राज करने का मौका दिया गया। इस दौरान कुछ हासिल हुआ कि नहीं यह तो मालूम नहीं। लेकिन उन्हीं की सहमति से एक देश लूटा गया। हुल में शहीदों के खून से लिखा गया उपझारखण्ड नीलाम हो गया। एक के बदले अब वह छह टुकड़ों में विभाजित हो गया। प्रशासनिक दृष्टिकोण से चाहे वह सौ टुकड़ों में बाँट दिया होता पर उनका नामकरण तो अपनी संस्कृति की पहचान पर आधारित होता। पर ऐसा संभव न हो सका। इस तरह खून की नदी से सिंची गई धरती भी परायी हो गई। वह सदैव तारे तोड़ने का वादा करने वाले, लोगों की आँखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गया। मारांग गोमके और दिसोम गुरु दलितों के सर्वमान्य नेता रहे हैं। दोनों ही महान क्रांतिकारी थे; इसमें कोई दो राय नहीं। पर क्यों कांग्रेस में विलय और साढ़े तीन में बिकने की घटना घटी? इस प्रश्न का उत्तर अब तक कोई दे न सका। निश्चित तौर पर लगता है; दोनों नेताओं के पास दूरदृष्टि, स्पष्ट विचारधारा और अच्छे दर्शन की कमी थी। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रातोंरात एक झाड़ जंगल प्रदेश का सृजन भी हो गया था। इस प्रदेश सृजन के पीछे भी एक बहुत बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा हुआ। तीसरा असहाय और दरिद्र था। संक्षेप में आपको बता दूँ कि यह तो वही बात हो गई कि रातोंरात एक भिखारी को मर्सीडिज कार की भेंट दी गई। अब भिखारी कार को सुबह-शाम देखे, चाटे या सूँघे? कुछ भी करे, यह तो वो जाने और उसका काम जाने। पर भिखारी अब दूर से ही टुकुर-टुकुर उस मर्सीडिज कार को निहारने में तल्लीन है। मर्सीडिज को चलाने के लिए उस भिखारी के पास न तो तेल है और न ही तेल लेने के लिए जेब में पैसे। पानी से आखिर गाड़ी भी तो नहीं चल सकती। रखे-रखे मर्सीडिज अब सड़ने के कगार पर खड़ी है।

मेरे प्रिय पोते! कहीं धोखे में न रहना कि आपके परदादे अनपढ़ और गंवार थे। यह सच है कि देश आजाद होने तक गाँव में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या नगण्य थी। पर इसके पूर्व अंग्रेजों से लोहा लेने वाले तिलका मुर्मू, सिदो मुर्मू एवं बिरसा मुंडा ने कौन से विश्वविद्यालय से कौन-सी डिग्रियां ली थी, जिसे अंग्रेजों को लोहे का चना चबवाया था? ये महान नेता अंगूठा टेक थे। इन्होंने किसी स्कूल का दरवाजा न देखा था। फिर भी इन्होंने अंग्रेजों को छठी का दूध पिलाया था। और इनके आंदोलन के फलस्वरुप संताल परगना एवं छोटानागपुर का जन्म हुआ था। जहाँ कहीं भी समाज उन्नति की बात होती, लोगों ने सर्वसम्मति से मान लिया था कि शिक्षा ही विकास की एकमात्र कुंजी है। बगैर शिक्षा उन्नति करना कोरी कल्पना ही होगी। अतएव प्रदेश में सरकारी, गैर-सरकारी एवं अर्द्धसरकारी विद्यालयों की बाढ़ आ गई। देश आजाद होने के साठ वर्ष में कोई ऐसा गाँव न रहा, जहाँ कोई स्नातक न हुआ हो। बालक-बालिकाएँ ओले की तरह पढ़ लिखकर बादलों से बारिश के रुप में दनादन गिर रहे थे। लेकिन यह क्या? विद्यार्थियों के मस्तिष्क में मीठे फल के बीज बोए जा रहे थे, लेकिन फल आ रहे थे कड़ुवे। बच्चों को अमीर बनने की सिखावन दी जा रही थी; पर बन रहे थे रंक। स्वर्ग जाने का रास्ता बताया जा रहा था; पर जी रहे थे नरक में। ऐसा क्यों? समाज की माली हालत अब बद से बदतर होती जा रही थी। कोई ऐसी समस्या न बची; जिससे लोग पीड़ित न हों। उन्नति के बारे समाज के ठेकेदारों की अलग-अलग दलीलें थीं। राजनीतिज्ञ अपने लिए वोट को ही समाज प्रगति का एकमात्र नुस्खा बताते। धर्मगुरु इस दुनिया के बारे न बताकर परलोक की बात करते। समाज सेवक गाँव का आँकड़ा लेकर सिर्फ कागजी घोड़ा दौड़ा रहे थे। और तो और सरकारी संपत्ति, किसी की संपत्ति नहीं चरितार्थ हो रहा था। सरकारी तंत्र लूट-खसोट का अड्डा बन गया था। सरकार का मतलब मूर्खों का, मूर्खों द्वारा, मूर्खों के लिए।

किसी दार्शनिक ने बिल्कुल सही कहा है कि कोई भी शिक्षा कभी निष्क्रिय नहीं रह सकती। या तो यह मुक्त करती है अथवा दास बनाती है। दबंग समाज द्वारा शिक्षा का पाठ्यक्रम इस तरह तैयार किया जाता है कि हम दास व गुलामी खटने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

मेरे प्रिय पोते! अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि हम और आप चाहे लाख यत्न कर लें। हमें रेड इंडियन बनने से कोई रोक नहीं सकता। इसमें दोष उनका नहीं, सौ फीसदी गलती हमारी ही है। पत्र मिलने तक आप "लाल भारतीय" के रुप में परिणत हो चुके होंगे। ढेर सारे आशीर्वाद सहित पत्रांत करता हूँ।

Friday, 6 February 2015

बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?

पिछले अंक में हमने शिक्षा के प्रति मंगरु की सोच को जान लिया है। किसी भी तरह की गलतफहमी में न रहें कि वह शिक्षा का घोर विरोधी है। अपितु उसका कहने का तात्पर्य यही है कि शिक्षा के साथ-साथ किसी श्रृंगार के रुप में अच्छे विवेक का भी वह तीमारदारी है; जिसे सोने पे सुहागा कहा जाता है। वह ऐसी शिक्षा हासिल करने का पक्षधर है, जिस शिक्षा से हमें मुक्ति मिल सके। वह ऐसी शिक्षा का समर्थक है; जिस शिक्षा से हमारी सभी तरह की गरीबी मिट सके एवं हम सदा उन्नति की राह पर आगे बढ़ते रहें। ऐसी शिक्षा का क्या औचित्य? जिस शिक्षा से हम गुलाम अथवा दास बनने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बल्कि मंगरु पढ़-लिखकर मूर्ख बन जाने का घोर विरोधी है। प्रमाण देते हुए वह कहना चाहता है कि क्या आठ वर्षों से झारखंड में एक भी शिक्षित व्यक्ति का उदय नहीं हुआ है? क्या हमारे पास एक भी डिग्रीधारी उपलब्ध नहीं हैं? एक नहीं, हमारे पास हजारों डिग्रीधारी मौजूद हैं। पर उनकी शिक्षा पर हमें शक और संदेह है। यह अतिश्योक्ति नहीं कि जिस शिक्षा को उन्होंने ग्रहण किया, जिस शिक्षा ने उन्हें बड़ी-बड़ी डिग्रियों का हकदार बनाया; उस शिक्षा ने आखिरकार उन्हें अंत में पशुतुल्य बना दिया है। अच्छे और बुरे पहचानने के वे काबिल नहीं रहे। यही कारण है कि झारखण्ड गठन के बाद से आदिवासी मुख्यमंत्रियों के पदस्थापित होते रहने के बावजूद भी आज हमारी यह सुनहरी हालत हो रखी है!

मंगरु आज कब खाना खा रहा है, कब सो रहा है, उसे कुछ ध्यान ही नहीं। आज वह अपने समाज के प्रति चिंतामग्न है। लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुँच पाना, उसे टेढ़ी खीर लग रहा है। मंगरु आगे विश्लेषण कर रहा है। सामाजिक बैठकों में शिक्षा के बाद सबसे ज्यादा चर्चा होने वाला विषय है; मद्यपान। बार-बार कहा जाता है कि नशे की लत ने हमारे समाज को बर्बाद करके रख दिया है। लोग पीने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। शादी-ब्याह व पर्व-त्योहार के अवसर पर तो बात ही छोड़ दीजिए। आज रानू देवता हमारे गाँव.घर की चहार दीवारों को फाँदकर, बीच सड़क पर खड़े होकर अपना जलवा दिखा रहा है। झारखण्ड में ऐसा कोई हाट-बाजार नहीं बचा है, जहाँ खुलेआम हँड़िया-दारु की बिक्री न हो रही हो। कोई मेला, कोई सभास्थल, कोई सार्वजनिक स्थल ऐसा नहीं बचा है, जहाँ देसी शराब धड़ल्ले के साथ न बेची जाती हो। इस पर किसी तरह की कोई सरकारी रोक-टोक भी नहीं। सेल्स गर्ल के रुप में हमारी भोली-भाली बालाएँ ही इस धंधे में लिप्त दिखाई देती हैं। लगता है; मानो पूरा झारखण्ड ही ऑपेन बार में तब्दील हो गया हो। जिसमें खासकर हम आदिवासी उस बार में गोता लगाने में मशगूल हो गए हैं। बच्चे हों या बुड्ढे, सारे सोमरस का मजा लूटने में व्यस्त हो गए हैं। और इस तरह अत्यधिक नशे के फलस्वरुप हम शारीरिक व मानसिक रुप से कमजोर हो चले हैं। यहाँ तक तो बात जायज लगती है। दारु पीना कोई बुरी बात नहीं; लेकिन दारु हम सभी को पी डाले, यह कतई बर्दास्त नहीं। लेकिन सवाल उठता है; क्या आपने कभी दारुबाज के सामने यह सवाल उठाया है कि वह दारु क्यों पीता है? क्या कारण है कि वह हमेशा हँड़िया-दारु के साथ रहता है? बाँहों में बाँहें डाले वह उसके संग घुमता रहता है? शराब सिर्फ दो ही अवस्था में पी जाती है; एक खुशी और दूसरा गम को भुलाने के लिए। लेकिन हम आदिवासी किस कारण शराब को गले लगाए हुए हैं; इसका जवाब शायद सिंग बोंगा के पास भी उपलब्ध नहीं है। झारखण्ड को देखकर न तो हमें खुशी है और न ही गम। फिर भी हम शराब के इतने दीवाने क्यों हैं? इसकी जड़ तक पहुँचने के लिए मंगरु को शायद और भी वक्त की जरुरत है। लेकिन इस संबंध में मंगरु के मन में अनगिनत शंकाएँ उठ रही हैं। मंगरु को अच्छी तरह याद है; गुरु जी के आरंभिक काल में, आदिवासी समाज से नशापान को जड़ समेत उखाड़ फेंकने के लिए, उसने हँड़िया-दारु की बिक्री बंद करने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया। हुक्म हुआ कि अगर कोई पीने-पिलाने के धंधे में रंगेहाथ पकड़ा गया, तो उसे "दिल्ली रोड" दिखा दिया जाएगा। और कुदरत का करिश्मा देखिए कि उस हुक्म की जोरशोर से तामील की गई। लेकिन आम जनता पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा। कहीं जगह न मिलने पर नशेबाजों ने गुदड़ी में पनाह लेनी शुरु कर दी। लोग चोरी-छिपे पर पहले की अपेक्षा और अधिक मस्त होकर पीने में लीन हो गए। परंतु आश्चर्य तो तब हुआ, जब गुरु जी के चेले दिन के उजाले में नशेड़ियों को दिल्ली रोड दिखा रहे थे, तो रात अँधेरे में वे स्वयं ही मस्त होकर दिल्ली रोड पर सरपट भाग रहे थे। अर्थात् उनके ही चमचे-बेलचे भयंकर दारुबाज निकले। हँड़िया-दारु उर्फ गुरु जी ने बिन माँगे जगप्रसिद्धि पा ली। इस तरह मद्यपान खत्म नहीं हुआ। परंतु यह दिन दुगुनी रात चौगुनी प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता ही गया।

उदाहरण के तौर पर झारखण्ड से निकल कर एक ऐसे प्रदेश की ओर निगाह डालें, जहाँ हर गाँव में बिजली की व्यवस्था है और हर गाँव सड़क से जुड़ा हुआ है। यह एक कृषि प्रधान प्रदेश है; और यहाँ के निवासी काफी खुशहाल हैं। उस प्रदेश को आप हरियाणा के नाम से जानते हैं। कुछ वर्ष पहले की घटना है। तब हरियाणा में श्री बंसीलाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुआ करते थे। प्रदेश की खुशहाली में चार चाँद लगाने हेतु बंसीलाल की सरकार ने प्रदेश में सौ फीसदी मद्यपान निषेध की घोषणा कर दी। हरियाणा में नशामुक्ति का सरकारी आंदोलन छेड़ दिया गया। पूरे प्रदेश में एक बूँद शराब की बिक्री नहीं हो सकती थी। इसका परिणाम क्या हुआ? होना क्या था; जो उपरवर्णित घटना गुरु जी के साथ हुई, वही घटना यहाँ भी दुहरा दी गई। पहले सौ की बोतल मिलती थी, अब अवैध रुप से उस बोतल की कीमत हजारों में पहुँच गई थी। इसकी विपरीत प्रतिक्रिया हुई; पहले लोग गिलास में पीते थे, अब लोग मग्गे में पीने लग गए। दुष्परिणाम यही कि जब विधान सभा का अगला चुनाव हुआ; तो शराब ने बंसीलाल की लुटिया ही डूबो दी। उसकी सरकार तो गई ही साथ में उसकी मिट्टी ऐसी पलीद हो गई कि वह मुँह छिपाने के लायक न रहा। कहने का तात्पर्य यही कि जहाँ भी मद्यपान रोकने की कोशिश की गई है; वहाँ बुरा हाल ही हुआ है।

मंगरु को आज यह तर्क समझ में नहीं आ रहा है। वह देख रहा है कि भोले-भाले आदिवासी तो सिर्फ घरेलू और सस्ती शराब का ही पान कर रहे हैं; पर अन्य शहरी लोग तो एक से एक बढ़िया और महंगी शराब का सेवन करते हैं। कोई भी बड़े-बड़े होटल, रेस्तरां, पब का नजारा देखिए, वहाँ शराब इस तरह परोसी जाती है; जैसे उसकी बिक्री मुफ्त में हो रही हो। फिर भी उनका कुछ नहीं बिगड़ रहा है। उसे यह भी ज्ञात है कि हमारे फौजियों को शराब से नहला देने का सरकारी नियम भी है। ऐसा क्यों होता है? कारण कुछ भी हो; पर आदिवासियों के संदर्भ में इतना अवश्य है कि यह हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई प्रथा है। जबरन इस प्रथा को बंद नहीं किया जा सकता। हाँ, किसी भी चीज का अति होना हानिकारक है; इसमें कोई दो राय नहीं। जरुरत है तो सिर्फ इतनी कि हमें पीने की कला अवश्य सीखनी चाहिए। ध्यान रहे कि किसी भी कीमत पर हँड़िया हमें डकार न जाए। निचोड़ यही कि जो भी हमारे मद्यपान विरोधी मित्र हैं; उनसे आग्रह है कि वे जबरन हँड़िया-दारु की संस्कृति को बंद न कराए। क्योंकि मनोवैज्ञानिक कारण है कि जिस भी चीज को जितना भी छुपाने की कोशिश करोगे; उसे देखने के लिए मन में उतनी ही जिज्ञासा तीव्रगति से बढ़ती जाएगी। और यकीन मानो, लोग उस छिपी हुई चीज को देखने के लिए दूसरा अवैध रास्ता निकाल ही लेते हैं। लेकिन हमारे मद्यपान विरोधी मित्र, उस ग्वाले की भाँति इस तथ्य को समझने से ही इनकार करते हैं। वे तर्क देते हुए कहते हैं कि मद्यपान ही है हमारे समाज का पिछड़ने का एकमात्र कारण। अगर तत्काल शराबबंदी हो जाए तो हम क्षण भर में उन्नति की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए नजर आएंगे। लेकिन दोस्तो, अक्सर ऐसा होता नहीं है। दुनिया के ठंडे देशों में देखो, तो वहाँ पानी की तरह लोग शराब का सेवन करते हैं। और विडंबना यही कि वे हमसे कई गुना अधिक प्रगतिशील हैं। अगर शराब विनाश का कारण होता, तो वे बेचारे ठंडे देश के लोग कब के मर-खप गए होते।

दोपहर का खाना खा चुकने के बाद मंगरु फिर अपनी सोच को जारी रखे हुए है। सोचते.सोचते उसे लगा कि समाज की समस्याएँ तो अनेक हैं। किस.किसके बारे वह सोचे? कौन सी समस्या के लिए, कौन से समाधानों को वह सुझाए? काफी देर चिंतन करने के बाद मंगरु इस नतीजे पर पहुँचा कि समस्या तो सिर्फ दो प्रकार की होती है - व्यक्तिगत और सामूहिक। परिभाषा के रुप में अगर कहना चाहें तो व्यक्तिगत समस्या उसे कहा जाता है; जो निजी हो एवं उस समस्या के समाधान हेतु किसी बाहरी व्यक्ति की मदद की कोई आवश्यकता ही न हो। अर्थात् जिसका समाधान खुद को ही करना पड़े। इसके विपरीत; सामूहिक समस्या उसे कहा जाता है; जिस समस्या से पूरा समाज ही पीड़ित हो एवं जिसका समाधान एक व्यक्ति द्वारा संभव न हो। परंतु इस समस्या के समाधान के लिए पूरे समाज की जरुरत हो। फिर तो पेसा, परिसीमन ... आदि सामूहिक समस्याएँ हुईं? बिल्कुल। सामूहिक समस्याओं के समाधान के लिए आज हमारे पास कई सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएँ कार्यरत हैं। इनके अलावे छोटे-मोटे कई क्लब, संस्था, संघ, दल वगैरह भी इस शुभ कार्य में हाथ बँटा रहे हैं। इनमें कुछ पंजीकृत हैं तो कुछ अपंजीकृत। और इन सभी दलों में से जो सबसे बड़ा दल है, जो हमारे देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ है; वह राजनीतिक दल किसी भी सामूहिक समस्या के निदान के लिए अनवरत कार्यरत है। अतएव क्यों न राजनीति के बारे थोड़ी-सी चर्चा की जाए।

राजनीति अर्थात् ऐसी नीतियों का निर्धारण करना, जिन नीतियों व नियमों के तहत जनता पर शासन किया जा सके अर्थात् राज्य चलाया जा सके। राज दरबार में बैठकर ऐसी नीति बनाना जिससे जनता/प्रजा की भलाई हो सके। और इस नीति को बनाने के लिए जिसे भी उत्तरदायित्व सौंपा जाता है, उसे राजनीतिज्ञ या विशुद्ध रुप से आधुनिक भाषा में उन्हें सांसद या विधायक कहा जाता है। देश, प्रदेश व समाज की उन्नति या अवनति के लिए बहुत हद तक राजनीति को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। छोटी-मोटी कोई भी गैर-सरकारी संस्थाएँ अपनी सोच को दर्शा सकती हैं; पर नियम व कानून बनाने का हक तो सिर्फ राजनीतिज्ञों को ही है। अतः कहा जा सकता है कि राजनीति का अखाड़ा (विधान सभा/संसदद्) एक मंदिर के समान है और सांसद या विधायक उस मंदिर के पुरोहित व पुजारी होते हैं। अतः सिद्ध हो गया कि राजनीति एक धार्मिक स्थल है। यहाँ पुण्य के अलावे और किसी तरह के गलत धंधे को अंजाम देना सख्त वर्जित है। लेकिन अभी तक हमें जिस शिक्षा का घूँट पिलाया गया है; उस घूँट में राजनीति को हमेशा ही बुरी नजर से देखने की हिदायत दी गई है। राजनीति एक गंदा खेल है का कुपाठ हमें पढ़ाया गया है। राजनीति से दूर-दूर तक भी रिश्ते जोड़ने की मनाही है। मंगरु इस तर्क को समझने में आजतक सौ फीसदी विफल रहा है। जिस मंदिर में सिर्फ स्वर्ग जाने का ही रास्ता बताया जा रहा हो, उसे आजतक हमने जाने अनजाने नरक की संज्ञा दी हुई है। उस मंदिर की पूजा-अर्चना में शामिल होना तो दूर, उस ओर झाँकने तक भी मनाही है। जिस मंदिर में हमारे भाग्य और तकदीर का फैसला होता हो, उस स्थल को अभी तक हमने कूड़ेदान समझकर तिरस्कृत किया हुआ है। ऐड्स की तरह पॉलिटिक्स की पी तक को छूने नहीं दिया जाता है। कहा जाता है कि राजनीति गंदे लोगों का खेल है। इस खेल में जो अपराधी होता है, वही सफल होता है। इस तरह की भूलभुलैया के चक्कर में अच्छे और नेक इंसानों ने बुरे लोगों के लिए मंदिर जाने का रास्ता ही त्याग दिया है। यकीन मानो, इस प्रकरण में कसूरवार नेक इंसान ही हैं न कि अपराधी। थोड़ी देर के लिए कल्पना करो। मान लो, उस पवित्र मंदिर में किसी पुरोहित के बदले डाकू सुल्तान सिंह जैसे अपराधिक छवि वाले लोगों का कब्जा हो जाए, तो वहाँ का दृश्य कैसा होगा? उस भव्य मंदिर में अगर वास्तव में चोर-डकैत इकट्ठे हो जाएँ, तो यह निश्चित है कि वहाँ भजन-कीर्तन तो होने से रहा। बल्कि मारकाट और खून-खराबे की ऐसी भयावह स्थिति पैदा हो जाएगी कि आप सोच भी नहीं सकते। रोज अत्याचार, बलात्कार, भ्रष्टाचार और खूनी संघर्ष से उस मंदिर का तो सत्यानाश होगा ही, साथ ही श्रद्धालुओं का भी बेड़ा गर्क हो जाएगा। इस तरह सोचते-सोचते मंगरु की बंद आँखें खुल गईं। उसे लगा कहीं वह सपना तो नहीं देख रहा है?

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...