Wednesday, 19 August 2020
Tuesday, 4 August 2020
यह कैसी विडंबना?
कोई कल्पना नहीं, परंतु आँखों देखी घटना है। बचपना था। पर उस समय की याद आज भी तरोतजा है। तब हमारा समाज कैसा था और अब किस मोड़ पर है, लेखक को अपने विवेकानुसार अच्छी तरह पता है। इस पर किसी का मतभेद होना स्वाभाविक है। खैर, समाज सुधार का बागडोर तब भी राजनीतिज्ञों के हाथों था, और आज भी उन्हीं राजकुमारों के हाथों सुपुर्द है। किसी भी सामाजिक संस्थाओं को तब भी और आज भी कोई घास नहीं डालता है। तब खासकर संताल परगना में ‘जोड़ा बैल’ और ‘मुर्गा’ के बीच राजनीतिक द्वन्द था। माराङ गोमके ने आदिवासियों को पता नहीं कौन-सी घुट्ठी पिलाई थी कि लोग अलग प्रांत के लिए अत्यधिक मदहोश थे। कहीं भी माराङ गोमके का भाषण होता, लोग ‘ताबेन और सा़तु' बांधकर’ दूर-दूर से चले आते थे। इतनी भीड़ होती थी कि सभास्थल पर तिल रखने के लिए जगह नहीं होती थी। तब जनता भी सा़ेहराय नृत्य करते हुए अपना मताधिकार का प्रयोग करने हेतु पोलिंग बुथ तक जाती थी। पर कुछ ही वर्षों के बाद किसी राजनीतिक दांव-पेच के कारण उस मुर्गा को चखना कर दिया गया। झारखण्ड पार्टी दो बैलों के साथ जुड़ गई। आदिवासी जनता इस बारे में अनभिज्ञ थी।
संताल परगना के लोगों ने तब ‘जोड़ा पत्ता’ में खूब खाना खाया। लेकिन जल्द ही ‘जोड़ा पत्ता’ भी फट गया। अब संताल परगना में एक राजनैतिक सूनापन-सा छाने लगा। तब उसकी भरपाई हेतु आंधी-तूफान की तरह एक बावंडर आ गया। यह कोई 1972 की घटना है। संताल परगना में एक ऐसा महाबलि का उदय हुआ था, जो पेड़ को हिला दे, तो उनसे रोटियों की बरसात होती थी, जल के अंदर मोटर साईकिल चलाने की कूवत थी और तो और उनपर चली गोलियां सब पानी बन जाती थीं। उनपर किसी तरह का कोई भी प्रहार असर नहीं करता था। और इस तरह धान काटो व महाजनों के विरुद्ध आंदोलन अपनी चरम स्थिति को छू गई थी। तब जनता ने भी नई आस के साथ उनका खूब साथ दिया। लोगों ने अलग प्रांत को ‘संजीवनी बूटी’ मान लिया था। जनता ने अपना सब काम छोड़कर उनका खूब साथ दिया। इस आंदोलन में न जाने कितनों की जानें चली गईं, कोई हिसाब नहीं।
और इस तरह 15 नवंबर, 2000 को झारखण्ड के आदिवासियों के लिए एक नई सुबह आई। ऐसी सुबह जिसमें एक नये अलग झारखण्ड राज्य का उदय हुआ था। नये राज्य का उदय होते ही कुछ लोग बालू फांकने के लिए अपनी बोरियां समेटने लगे थे, पर किसी ने बड़े भाई समझकर उसे अपने पास ही पनाह दे दी।
नये राज्य का गठन किए आज 20 वर्ष भी बीत चले। पर संजीवनी बूटी भी काम न आई। खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई। आदिवासियों की आस पर पानी फिर गया। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक। जनता अब किंकर्तव्यविमूढ़ है। आइए इसका कारण ढूंढ़कर समाधान निकालने की कोशिश करते हैं।
Monday, 3 August 2020
AŃCAR DO̱TAM MẠILẠKEDAE
Tuesday, 7 July 2020
CEDAŃ DO̱SE KUṚI?
Dại kan co̱m mại?
E̱nte am do̱ kuṛi ho̱po̱n.
Rit kan duniạ reak̕,
Amaṅ nana rup nana ro̱ṅ,
Ạgulemre dada-hili,
Idilemre didi-teńaṅ,
Me̱nkhan, am
Abhran kanam,
Gharõ̱ńj, so̱maj ar disạm,
Amge sirjo̱niạ Pilcu buḍhi.
Am be̱go̱r mit̕ buḍạk̕,
Gharõ̱ńj oka hõ̱ baṅ laṛaok̕,
Onate amaṅ go̱no̱ṅ,
Hirạ-muti kho̱n hõ̱ bạ̃ṛti,
Bạ̃ṛti ar bạ̃ṛti...ar bạ̃ṛti...!
Onkan bạ̃ṛti go̱no̱ṅan dho̱n,
Ińaṅ ti kho̱n uḍạu ado̱k̕,
Cedak̕ bạń rag,
Cedak̕ bạń ho̱mo̱r halaṅ?
Am khạtir, am rạkhim khạtir,
So̱maj rilạmala, disom khạtir,
Ceka do̱sledako hapṛamko?
Ceka ghạṭledako purkhạko?
Baro̱ dolan gaṛ, baro̱ jo̱ṛ sagaṛ,
Mit̕ ńindạte, mit̕ likre lagakedako,
Jạtgeko bo̱to̱rada bhạire bhại,
Gaṛ do̱ bako dayawat̕,
Bhạire bhại Madho̱ Sińak̕ bo̱to̱rte,
Bhạire bhại gaṛ do̱ko bạgiadare.
Nitoṅ hạni po̱rer culhạ,
Curạmare o̱k̕o̱ṅkan,
Saṛ tahe̱n bhorge ńe̱le̱-dumur,
Inạkate do̱ mo̱so̱t̕ ńũruk̕.
Ragạń, ho̱mo̱rạń am lạgit̕,
Daṛe katha bạnuk̕ iń ṭhen,
Amge hirạ muti, Maenomạti,
Ińaṅ katha bujlere RAN,
Ar baṅkhan do̱ SAHAN.
Tuesday, 30 June 2020
Johar, Johar, Johar Hul Johar!
Johar, Johar, Johar jo̱to̱ko,
Johar Subạ Ṭhạkur!
Johar sanam mãyãm gohako!
Joharak̕kanle apeak̕ dil, daṛe ar
Johar apeak̕ disom dulạṛ.
Sabad bạnuk̕ ale ṭhen,
O̱bo̱ren alaṅ aleak̕,
Ko̱lo̱m ṭhoṇṭa rạpuťen,
Sạmud kạli hõ̱ ańje̱ťen,
Apeak̕ mạhima o̱ho̱ge lạilen,
Ape dọ Boṅga lekan ho̱ṛ,
Ape do̱ sạrige so̱no̱t ho̱ṛ,
Jọi jitkạr ape mãyãm gohako!
Ghurạ phiri dhạrti ạcur ruạṛen,
Ale menak̕le baba arhõ̱ e̱ṃḍe̱ge,
Okare do̱ baba apepe thamgạḍilen,
Ape kho̱n hõ̱ aleak̃ halo̱t,
Ar ce̱ťle lạia Baba?
Serma duạra kho̱n,
Mẽ̱ť pe̱re̱c̕mape tạṅkhikange,
Haere Babale kalaṅ ḍolaṅen.
O̱kte̱ reak̕ge phãk menak̕a,
Bakhan bạnuk̕ ce̱ť hõ̱ begar.
Hẽ̱, me̱nkhan lạire lajao,
Ape do̱ ho̱k lạgiťpe dãṛẽ̱yena,
Ar ale do̱ be̱ho̱kle ho̱bo̱rakada.
Johar baba, bańcaokalepe!
Friday, 10 August 2018
यह सौ प्रतिशत सच है कि संतालों में संताल हूल-1855 तक एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति मौजूद नहीं था। तात्पर्य यही है कि किसी संताल को कोई आक्षरिक ज्ञान नहीं था। इतना कुछ होते हुए भी संतालों ने न सिर्फ अपनी भाषा का सृजन किया, बल्कि उसे पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से अच्छी तरह संजोकर रखा। यह तो गनीमत है उन मिशनरियों का जिन्होंने सर्वप्रथम संतालों के ऊपर न सिर्फ अनेकों प्रकार से दया दृष्टि की बल्कि उनकी भाषा की उन्नति हेतु भी कई महत्वपूर्ण कार्य किये। विदित हो कि सर्वप्रथम उड़िसा, जेलासोर में मिशनरी कार्य में जुटे जेरेमिया फिलिप्स ने ही अपनी पुस्तक An Introduction to the Santal Language (प्रकाशित 1852) में पहली बार संताली व्याकरण की पुस्तक प्रकाशित की। इसके बाद सन् 1860 में जब संताल परगना में कुछ मिशनरियों का आगमन हुआ, तब संक्षेप में यही कि उन्होंने संताली साहित्य के विकास हेतु दुमका के नजदीक बेनागाड़िया में एक मुद्राणालय की स्थापना की और संताली साहित्य के विकास के लिए अनेकों तरह के कार्य किये। यह भी विदित हो कि संताल परगना से सटे मानभूम, पोखुरिया में संताल मिशन प्रेस की स्थापना की और यहां से भी संताली साहित्य के विकास हेतु अनेकों कार्य हुए। यह भी ज्ञात हो कि बेनागाड़िया से "हो़ड़ हो़पो़नरेन पेड़ा" (बाद में "पेड़ा हो़ड़") एवं पोखुरिया से ”ढा़रवा़क्“ नामक संताली पत्रिकाओं का भी प्रकाशन होता था। इसके बाद 1946 से अभी तक ”मारसालताबोन“ नामक पत्रिका दुधानी, दुमका से अविराम प्रकाशित होती आई है।
शुरुआती दौर में मिशनरियों ने देखा कि संताली को देश में उपलब्ध किस लिपि से लिखा जाय, यह उनके लिए एक बहुत ही चुनौतिपूर्ण कार्य था। मालूम हो कि जेरेमिया फिलिप्स ने अपनी उपरोक्त पुस्तक में संताली के लिए बंगला लिपि का उपयोग किया था। लेकिन बाद में संताल परगना के मिशनरियों ने वैज्ञानिक तरीके से रोमन लिपि को संताली के लिए परिवर्धित/संशोधित किया एवं उपयोग में लाया। मिशनरियों ने न सिर्फ संताली लिखने के लिए रोमन लिपि को भाषाविज्ञान की दृष्टि से संशोधित व संतुलित किया बल्कि उन्होंने संताली साहित्य के विकास में चार चांद भी लगा दिये। इस लिपि से संताली विश्व शब्दकोश की रचना हुई एवं कई उच्च कोटि की पुस्तकों की रचना भी हुई। संताली के लिए मिशनरी युग को संताली का स्वर्ण युग कहा जाय तो यह कोई अतिश्योक्ति न होगी।
Saturday, 7 February 2015
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