Friday, 2 February 2024

एकता में ही बल था ...

संताल इतिहास में दो सबसे बड़ी ऐसी घटना हुई है, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता है। पहली घटना थी; जब "चाम्पा देश" में हमारा साम्राज्य था। संतालों के बारह गोत्रों के पास अलग-अलग किले थे; एवं उन सभी गोत्रों का व्यापार भी अलग-अलग था। यही कारण था कि हम दूध-दही की नदियों में नहाया करते थे। परंतु समय ने पलटा खाया। और समाज की इज्जत को बचाने हेतु “माधो सिञ” के डर से हम उस देश को सदा के लिए छोड़कर वहां से पलायन कर गए।

दूसरी घटना; आज से ठीक 168 वर्ष पूर्व, तब देश में अंग्रेजों का शासन था। हमने उनसे अत्याचार के विरुद्ध "हूल" किया और शेर के जबड़े से अपने संताल परगना को खींचकर बाहर निकाल लिया। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि तब हम एकता के सूत्र में बंधे हुए थे। उस समय संतालों के बीच न लिपि विवाद था, न धर्म की खेती होती थी और न ही तब संतालों में उत्तरी-दक्षिणी की कोई लउ़ाई थी। लेकिन आज? आज हम हजार टुकड़ों में बंट गए हैं। हमारा कोई माय-बाप नहीं। यही कारण है कि आज संताल समाज गर्त्त में जा रहा है। इसे शायद भगवान भी न बचा पाएगा।

हो सकता है संतालों के डीएनए में ही कोई खराबी हो। हो सकता है उनके खून में ही कोई खोट हो। नहीं तो क्या कारण है कि हम आपस में तो बेवजह खून के प्यासे हो जाते हैं, परंतु दुश्मनों के सामने हमारी घिग्घी बंध जाती है। उनके सामने हम शेर से चूहा बन जाते हैं।

यह शोध का विषय हो सकता है; क्यों उत्तरी-दक्षिणों के संतालों में इतना कहर बरपा है? क्यों इन दोनों के बीच लिपि के चक्कर में इतनी बड़ी दीवार खड़ी हो गई है? क्यों वे एक दूसरे के खून के प्यासे हो चले हैं? और तो और संताल समाज वर्तमान में कई समस्याओं से जूझ रहा है। पर लोग सभी समस्याओं को छोड़कर लिपि विवाद में ही उलझकर रह गए हैं। इससे अच्छी तरह समझने के लिए ब्रिटिश काल में हुए एक भाषाई सर्वेक्षण की ओर नजर दौड़ाते हैं।

तब देश में अंग्रेजों का शासन था। उसी दौरान सन् 1894 से लेकर 1928 तक भारत में जी. ए. ग्रियर्सन की अगुवाई में एक भाषाई सर्वेक्षण हुआ था। उस सर्वेक्षण में भाषाविदों ने स्पष्ट तौर पर अपनी रिपोर्ट मे लिख डाला; चूंकि संतालों के दक्षिण हिस्से में जो संताली बोली जाती है; वह मिश्रित व प्रदूषित हो चुकी है, जबकि उत्तर में बोली जाने वाली संताली अभी तक विशुद्ध है; अतएव उत्तरी संताली ही मानक (Standard) है। (Linguistic Survey of India, Vol-IV, Page No. 32).

ध्यान रहे; तब उत्तर में संताली साहित्य ने गति पकड़ ली थी। वगैर किसी रोक-टोक व बधित हुए कई पुस्तकें व पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होने लगीं। यह भी संज्ञान लेने वाली बात है कि उत्तर संतालों का गढ़ मना जाने वाला संताल परगना के संतालों ने ब्रिटिश शासक के खिलाफ सन् 1855 में एक बहुत बड़ा “हूल” कर दिया था। इस हूल ने संतालों की महानता पर एक अमिट छाप छोड़ दी है। क्योंकि उस हूल के बदौलत ही संतालों के लिए एक अलग देश (जिला) संताल परगना का गठन हुआ है।

सन् 1947 में भारत देश आजाद हुआ। तब सरकारी स्तर पर शैक्षणिक क्षेत्रों पर बगैर रोमन लिपि की अवहेलना किए देननागरी लिपि से पुस्तकों का प्रकाशन होते रहा है। खसियत यही है कि रोमन हो या देवनागरी, दोनों लिपियों से शुद्ध-शूद्ध उत्तरी संताली लिखी व पढ़ी जाती है।

फिर क्या था? दक्षिण के संताल ईर्ष्या की बीमारी से पीड़ित तो थे ही, उन्होंने आनन-फानन में एक चोरी की हुई लिपि को जन्म दिया। और उस लिपि के प्रचार में रात-दिन एक कर दिया। उनके पास और कोई चारा तो था नहीं, अतएव उन्होंने लिपि को अपनी पहचान एवं अस्मिता के रूप में ढाल की तरह उपयोग करना शुरु कर दिया। जब लोगों ने इस लिपि को सिरे से खारिज कर दिया, तो इन्होंने इसे "आबोवाक्-आबोवाक्" कहा एवं इसे धर्म के साथ जोड़ दिया। मामला यहीं नहीं रुका, कुछ दिन पूर्व झारखण्ड सरकार देवनागरी लिपि से संताली पुस्तकों का प्रकाशन कर रही थी। फिर इन बुगड़ीधारियों ने जिनकी भाषा ही बिगड़ चुकी है, इन पर टांग अड़ा दी। इसके बाद सोशल मीडिया में इन्होंने जिस असंवैधानिक भाषा का उपयोग करते हुए देवनागरी समर्थकों को गाली-गलौच दिया है, यह किसी से छुपा नहीं है।

ओल चिकी समर्थक कितना भी जोर लगा लें, कोई भी राजनीतिज्ञ कितना भी ट्वीट कर लें, लेकिन यह सच है कि “कागज के फूलों से कभी खुशबू आ नहीं सकती है।” अतएव कभी एकता थी, अब वह कहीं गुम हो गई।

Monday, 29 January 2024

 कैसी और किसकी आजादी (6)?

पिछले अंक में हमने जान लिया था कि भारत में अंग्रेज आगमन से पूर्व शूद्रों की क्या स्थिति थी। शूद्रों की धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक एवं ऐतिहासिक परिस्थिति के बारे में अच्छी तरह जान लिया। उनकी क्या ही अमानवीय व विभत्स स्थिति थी। शूद्रों की नवविवाहिता को पंडित जी को सुपुर्द करना, पहले बेटे को गंगा में दान करना, नरबलि के लिए अपने को सुपुर्द करना, उन्हें किसी तरह की कोई चल-अचल संपत्ति रखने का अधिकार नहीं, आदि। और तो और उनको कुर्सी तक में बैठने की इजाजत नहीं थी। खैर, अंग्रेजों ने शूद्रों के विरुद्ध ब्राह्मणों की ऐसी ही तमाम अमानवीय परंपराओं को तोड़ दिया था। अगर अंग्रेज न आये होते, तो अब तक शूद्रों की क्या हालत होती? इस बारे में आप सोच भी नहीं सकते। सन् 1947 को देश आजाद हुआ और एक शूद्र ने देश का संविधान लिख डाला। भारत का संविधान विश्व का सर्वश्रेष्ठ संविधान माना जाता है। फिर भी इतना बढ़िया संविधान होते हुए भी ये ब्राह्मण रोज ही इनकी आलोचना करते रहते हैं। इतना ही नहीं वाभन सरेआम इसकी प्रतियों को जलाते हैं। संविधान में प्रदत्त आरक्षण के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन करते रहते हैं। शूद्रों को सदियों से प्रताड़ित करते हुए भी अब तक इनका पेट नहीं भरा है। अब वह घड़ी फिर आ चुकी है, जिसमें शूद्रों को अंग्रेज भारत आगमन से पूर्व की भाँति प्रताड़ित किया जाएगा। शतरंज की बिसात बिछ चुकी है। अगर यही स्थिति रही, तो इस खेल में शूद्रों का पराजित होना निश्चित है।

 सुर-असुर का खेल बहुत ही पुराना खेल है। यह अनादि काल से चला आ रहा है। इस खेल को समझ पाना उतना आसान नहीं है, जितना हम समझ रहे हैं। इस खेल में दीखता कुछ है और होता कुछ है। इस खेल की विडंबना यही है कि जब शेर को एक बार मानव खून का चस्का लग जाए, तो यह छुटाये नहीं छुटता है। खासकर बरसात के दिनों में आपने किसी जलते हुए बल्ब की रोशनी को अवश्य देखा होगा। यह भी जरुर देखा होगा; किस तरह छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े उस रोशनी की तरफ अपने आप दौड़े चले आते हैं और थोड़ी देर तक उस जलते बल्ब की परिक्रमा करने के बाद भस्म हो जाते हैं। इस दृश्य में आपने नोट किया होगा कि कीड़े-मकोड़े को छोड़ कोई हाथी-घोड़े नहीं आते हैं। तत्पर्य यही है कि वे छोटे-मोटे कीड़े-मकोड़े अपने अंतःमन से ”मनुस्मृति“ को स्वीकार कर ले, तो कौन क्या कर सकता है। इसे ही कहा जाता है; मियां-बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी।

देश बदल रहा है। 2024 का चुनावी बिगुल बज चुका है। सियासी दांव-पेंच का खेल चरम पर है। कल (28.1.2024) को बिहार का तख्ता पलट चुका है। अब दो दिन के अंदर झारखण्ड में भी बड़ा खेला होने वाला है। क्योंकि कहा जाता है कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है।

Tuesday, 2 January 2024

 कैसी और किसकी आजादी (5)?

संताल संताल परगना में प्रवेश तो कर गए पर वे देश-दुनिया की खबरों से अनभिज्ञ थै। हां, उन्होंने सिर्फ किसी ”कुपनी“ (ईस्ट इण्डिया कंपनी) का नाम अवश्य सुन रखा था। पर वे उनकी कार्यशैली से कोसों दूर थे। तब संताल अपने में मस्त होकर बड़े आनंद के साथ अपना जीवनयापन कर रहे थे। ब्रिटिश काल में इनके साथ घटी घटनाओं को हम बाद में जानेंगे। इससे पहले हम भारत में अंग्रेजों द्वारा किए गए कार्यों को संक्षेप में जानने की कोशिश करते हैं। अंग्रेजों द्वारा खासकर दलितों के लिए किए गए कार्यों का विवरण कुछ इस तरह है:-

1. अंग्रेजों ने 1795 में अधिनियम 11 द्वारा शूद्रों को भी संपत्ति रखने का कानून बनाया।

2. 1773 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने रेगुलेटिंग एक्ट पास किया, जिसमें न्याय व्यवस्था समानता पर आधारित थी। 6 मई 1775 को इसी कानून के तहत बंगाल के सामंत ब्राह्मण नन्द कुमार देव को फांसी की सजा दी गई।

3. 1804 अधिनियम 3 द्वारा अंग्रेजों ने कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाई (लड़कियों के पैदा होते ही तालु में अफीम चिपका कर, मां के स्तन पर धतूरे का लेप लगाकर एवं गड्ढा बनाकर उसमें दूध भरकर डूबो कर मारा जाता था।)।

4. 1813 में ब्रिटिश सरकार ने कानून बनाकर शिक्षा ग्रहण करने का सभी जातियों और धर्मों के लोगों को अधिकार दे दिया।

5. 1813 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर दास प्रथा का अंत कर दिया।

6. 1817 में अंग्रेजों ने समान नागरिक संहिता कानून बनाया (1817 के पहले सजा का प्रावधान वर्ण के आधार पर था। ब्राह्मण को कोई सजा नहीं होती थी, बल्कि शूद्र को कठोर दण्ड दिया जाता था। अंग्रेजों ने सजा प्रावधान समान कर दिया।)।

7. 1819 में अधिनियम 7 द्वारा ब्राह्मणों द्वारा शूद्रों के शुद्धिकरण पर रोक लगाई। (शूद्रों की शादी होने पर दुल्हन को अपने दूल्हे के घर न जाकर कम से कम तीन रात ब्राह्मण के घर शारीरिक सेवा देनी पड़ती थी।)

8. 1830 नरबलि प्रथा पर रोक लगा दिया। (देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण शूद्रों, स्त्री व पुरुष दोनों को मंदिर में सिर पटक-पटक कर चढ़ा देता था।)।

9. 1833 अधिनियम 87 द्वारा सरकारी सेवा में भेदभाव पर रोक अर्थात् योग्यता ही सेवा का आधार स्वीकार किया गया तथा कंपनी के अधीन किसी भारतीय नागरिक को जन्म स्थान, धर्म, जाति या रंग के आधार पर पद से वंचित नहीं रखा जा सकता है।

10. 1834 में पहला भारतीय विधि आयोग का गठन हुआ। कानून बनाने की व्यवस्था जाति, वर्ण, धर्म और क्षेत्र की भावना से ऊपर उठकर करना आयोग का प्रमुख उद्देश्य था।

11. 1835 प्रथम पुत्र को गंगा दान पर रोक लगा दिया। (ब्राह्मणों ने नियम बनाया कि शूद्रों के घर यदि पहला बच्चा लड़का पैदा हो, तो उसे गंगा में फेंक देना चाहिए। पहला पुत्र हृष्ट-पुष्ट ब्राह्मणों से लड़ न पाए, इसलिए उसे पैदा होते ही गंगा को दान करवा देते थे।)

12. 7 मार्च 1835 को लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा नीति को राज्य का विषय बनाया और उच्च शिक्षा को अंग्रेजी भाषा का माध्यम बनाया।

13. 1835 को कानून बनाकर अंग्रेजों ने शूद्रों को कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया।

14. दिसम्बर 1829 के नियम 17 द्वारा विधवाओं को जलाना अवैध घोषित कर सती प्रथा का अंत किया।

15. देवदासी प्रथा पर रोक लगाई। ब्राह्मणों के कहने से शूद्र अपनी लड़कियों को मंदिर की सेवा के लिए दान देते थे। मंदिर के पुजारी उनका शारीरिक शोषण करते थे। बच्चा पैदा होने पर उसे फेंक देते थे और उस बच्चे को “हरिजन” नाम देते थे।

1921 को जातिवार जनगणना के आंकड़े के अनुसार अकेले मद्रास में कुल जनसंख्या 4 करोड़ 23 लाख थी, जिसमें 2 लाख देवदासियां मंदिरों में पड़ी थी। यह प्रथा अभी भी दक्षिण भारत के मंदिरों में चल रही है।

16. 1837 अधिनियम द्वारा ठगी प्रथा का अंत किया।

17. 1849 में कलकत्ता में एक बालिका विद्यालय जे. ई. डी. बेटन ने स्थापित किया।

18. 1854 में अंग्रेजों ने 3 विश्वविद्यालय कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में स्थापित किया। और 1902 में विश्वविद्यालय आयोग नियुक्त किया।

19. 6 अक्टूबर 1860 को अंग्रेजों ने इण्डियन पैनल कोड-प्च्ब् बनाया। लार्ड मैकाले ने सदियों से जकड़े शूद्रों की जंजीरों को काट दिया और भारत में जाति, वर्ण और धर्म के बिना एक समान क्रिमिनल लॉ लागू कर दिया।

20. 1863 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर चरक पूजा पर रोक लगा दिया। (आलिशान भवन एवं पुल निर्माण पर शूद्रों को पकड़कर जिन्दा चुनवा दिया जाता था। इस पूजा में मान्यता थी कि भवन और पुल ज्यादा दिनों तक टिकाऊ रहेंगे।)

21. 1867 में बहुविवाह प्रथा पर पूरे देश में प्रतिबंध लगाने के उद्देश्य से बंगाल सकार ने एक कमिटि गठित किया।

22. 1871 में अंग्रेजों ने भारत में जातिवार गणना प्रारंभ की। यह जनगण्ना 1941 तक हुई। 1948 में पण्डित नेहरु ने कानून बनाकर जातिवार गणना पर रोक लगा दी।

23. 1872 में सिविल मैरिज एक्ट द्वारा 14 वर्ष से कम आयु की कन्याओं एवं 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों का विवाह पर रोक लगाई।

24. अंग्रेजों ने महार और चमार रेजिमेंट बनाकर इन जातियों को सेना में भर्ती किया, लेकिन 1892 में ब्राह्मणों के दबाव के कारण सेना में अछूतों की भर्ती बन्द हो गई।

25. रैयत वाणी पद्धति अंग्रेजों ने बनाकर प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूमि का स्वामी स्वीकार किया।

26. 1918 में साऊथबरो कमेटी को भारत में अंग्रेजो ने भेजा। यह कमेटी भारत में सभी जातियों का विधि मण्डल (कानून बनाने की संस्था) में भागीदारी के लिए आया। शाहू जी महाराज के कहने पर पिछड़ों के नेता भाष्कर राव जाधव एवं अछूतों के नेता डॉ. अम्बेडकर ने अपने लोगों को विधि मण्डल में भागीदारी के लिए मेमोरेंडम/ज्ञापन दिया।

27. अंग्रेजों ने 1919 में भारत सरकार अधिनियम का गठन किया।

28. 1919 में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों को जज बनने पर रोक लगा दी थी और कहा था कि इनके अंदर न्यायिक चरित्र नहीं होता है।

29. 25 दिसम्बर 1927 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का दहन किया गया। मनुस्मृति में शूद्रों और महिलाओं को गुलाम तथा भोग की वस्तु समझा जाता था, एक पुरुष को अनगिनत शादियां करने का धार्मिक अधिकार है, महिला अधिकार विहीन तथा दासी की स्थिति में थी। एक-एक औरत के अनगिनत सौतनें हुआ करती थीं। औरतों-शूद्रों के लिए सिर्फ और सिर्फ गुलामी लिखा है, जिसको ब्राह्मण मनु ने धर्म का नाम दिया है।

30. 1 मार्च 1930 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा काला राम मंदिर (नासिक) प्रवेश का आंदोलन चलाया गया।

31. 1927 को अंग्रेजों ने कानून बनाकर शूद्रों के सार्वजनिक स्थानों पर जाने का अधिकार दिया।

32. 1927 में साईमन कमीशन की नियुक्ति की जो 1928 में भारत के अछूत लोगों की स्थिति का सर्वे करने और उनको अतिरिक्त अधिकार देने के लिए आया। भारत के लोगों को अंग्रेज अधिकार न दे सके, इसलिए इस कमीशन के भारत पहुंचते ही गांधी और लाला लाजपत राय ने इस कमीशन के विरोध में बहुत बड़ा आंदोलन चलाया। जिस कारण साईमन कमीशन अधूरी रिपोर्ट लेकर वापस चला गया। इस पर अंतिम फैसले के लिए अंग्रेजों ने भारतीय प्रतिनिधियों को 12 नवम्बर 1930 को लंदन गोलमेज सम्मेलन में बुलाया।

33. 24 सितम्बर 1932 को अंग्रेजों ने कम्ययुनल अवार्ड घोषित किया, जिसमें निम्न प्रमुख अधिकार दिये:-

ंद्ध वयस्क मताधिकार

इद्ध विधान मण्डलों और संघीय सरकार में जनसंख्या के अनुपात में अछूतों को आरक्षण का अधिकार

बद्ध सिक्ख, ईसाई और मुसलमानों की तरह अछूतों ;ैब्ध्ैज्द्ध को भी स्वतंत्र निर्वाचन के क्षेत्र का अधिकार मिला। जिन क्षेत्रों में अछूत प्रतिनिधि खड़े होंगे, उनका चुनाव केवल अछूत ही करेंगे।

कद्ध प्रतिनिधियों को चुनने के लिए दो बार वोट देने का अधिकार मिला, जिसमें एक बार सिर्फ अपने प्रतिनिधियों को वोट देंगे तो दूसरी बार सामान्य प्रतिनिधियों को वोट देंगे।

34. 19 मार्च 1928 को बेगारी प्रथा के विरुद्ध डॉ. अम्बेडकर ने मुम्बई विधान परिषद में आवाज उठाई, जिसके बाद अंग्रेजों ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया।

35. अंग्रेजो ने 1 जुलाई 1942 से लेकर 10 सितम्बर 1946 तक डॉ. अम्बेडकर को वायसराय की कार्य साधक कौंसिल में लेबर मेम्बर बनाया। लेबरों को डॉ. अम्बेडकर ने 8.3 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिलवाया।

36. 1937 में अंग्रेजों ने भारत में प्रोविंशियल गवर्नमेंट का चुनाव करवाया।

37. 1942 में अंग्रेजों से डॉ. अम्बेडकर ने 50 हजार हेक्टेयर भूमि को अछूतों एवं पिछड़ों में बांट देने के लिए अपील किया। अंग्रेजों ने 20 वर्षों की समय सीमा तय किया था।

38. अंग्रेजों के शासन प्रशासन में ब्राह्मण की भागीदारी को 100 से 2.5 पर लाकर खड़ा कर दिया था।

इन्हीं सब कारणों से ब्राह्मणों ने अ्रंग्रेजों के खिलाफ क्रांति शुरु कर दी। क्योंकि अंग्रेजों ने शूद्रों और महिलाओं को सारे अधिकार दे दिये थे और सब जातियों के लोगों को एक समान अधिकार देकर सबको बराबरी में लाकर खड़ा कर दिया था। 

(... अगले अंक में जारी।)

Friday, 6 October 2023

 कैसी और किसकी आजादी?

वाइरल हो रहे एक वीडियो "ईसावाद और औपनिवेशिक कानूनों के चक्रव्यूह में" को बड़े ध्यान से सुना। इस पर गहराई के साथ मनन-चिंतन किया। सार स्वरुप यही समझ में आया कि यह वीडियो संघ परिवार के थिंक टैंक द्वारा प्रायोजित है। इस रहस्य को समझने के लिए इतना ही काफी है कि एक छोटा-सा ”दीया“ जिसके बमुश्किल संसद में एकाध सांसद ही हुआ करते थे, आज सत्ता की बागडोर उनके हाथ में है। जिनकी रगों में "हिन्दी, हिन्दु, हिन्दुस्तान" का खून दौड़ रहा हो, आज उसके सपने "प्राण प्रतिष्ठा" आयोजित कर पूर्ण होता दिखाई दे रहा है।

उपरोक्त वीडियो के मनगढ़ंत कहानी के झूठे ब्यानों पर बहुत कुछ कटाक्ष किया जा सकता है। पर इस कहानी की जड़ को समझने के लिए उस कथावाचक के इन शब्दों के तह तक जाने की जरुरत है यथा - अंग्रेज, ईसाई, भारत का स्वतंत्रता आंदोलन, छोटानागपुर एवं संताल परगना काश्तकारी अधिनियम एवं वनवासी।

तथाकथित कथावाचक ने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों को बड़े ही शालीनता के साथ पिरोया है। उनकी बातों से ऐसा प्रतीत होता है; मानो, वे किसी कब्रगाह की रंगाई-पुताई कर रहे हों। उनके मुँह में राम-राम, तो बगल में एक धारदार छुरी छिपी हुई है। सच कहा जाय तो उसने एक सच को छिपाने के लिए सैकड़ों झूठ का सहारा लिया है। उनकी कथनों में दूर-दूर तक कोई सच्चाई नहीं है। इस वीडियो में कही गई बातों के रहस्य को समझने के लिए इसके पर्दे के पीछे चल रहे खेल को अच्छी तरह समझना बहुत जरुरी है।

किसी भी रहस्य को समझने के लिए हमेशा तीसरी आँख की जरुरत होती है। जब तक गहराई के साथ उस रहस्य पर अन्वेषण न किया जाए, तो ऊपरी सतह पर वह आपको सच-सा ही प्रतीत होगा। क्या आप बता सकते हो; भारतीय स्वतंत्रता का आंदोलन क्यों चलाया गया? क्यों भारतवासी इस जंग में एकजूट हो गए? निःसंदेह आपका उत्तर होगा - "क्योंकि तब भारत देश अंग्रेजों के अधीन था। हम भारत के लोग गुलाम थे। इसलिए आजादी की लड़ाई लड़ी गई।" पर आपका यह उत्तर सच्चाई से कोसों दूर है। अगर पूछा जाय, अंग्रेजों से पहले भी तो बाहर के देशों से कई मुगल, लोदी, पठान आदि आए और इस देश में सदियों तक राज किए। तब क्यों नहीं भारतीय स्वतंत्रता का आंदोलन हुआ? क्या कारण था कि सिर्फ अंग्रेजों के दौरान ही आजादी का बिगुल फूंका गया? इसका सही जवाब के लिए पहले - "आजादी, स्वतंत्रता, स्वावलंबन" के अर्थ, अभिप्राय, भावार्थ आदि को अच्छी तरह समझना होगा। कैसी आजादी? किस तरह की स्वतंत्रता? क्या एक राजा के बदले दूसरे राजा को बैठा देने मात्र से ही आपकी तमाम समस्याओं का समाधान हो गया? शायद नहीं। बल्कि हमारी समस्या और बढ़ गई। खैर, हमारे लिए तो सावन हरे न भादो सूखे। हम तो आसमान से गिरे और खजूर पर अटक गए हैं। 

Wednesday, 30 August 2023

 कैसी और किसकी आजादी (4)?

(इस लेख की शृंखला को अच्दी तरह समझ पाने के लिए निश्चित रूप से हमें 65000 वर्ष पीछे जाने की जरुरत है। इतना न भी जा पाएं, तो कम से कम इस देश में अंग्रेजों के आगमन काल के दृश्यों को तो समझना ही होगा। ब्रिटिश आगमन काल अर्थात् 1600 ई. तक देश मनुस्मृति के अनुसार चल रहा था। अंग्रेजों ने इसे धीरे-धीरे ध्वंस करना प्रारंभ किया। जब भारत देश आजाद हुआ, तब अंग्रेजों के दिखाए मार्ग पर चलते हुए बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर की आगुवाई में भारत का संविधान बना, जिसे 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। बताते चलें कि अब वर्तमान हुक्मरानों द्वारा इस संविधान को अमान्य करार देने की योजना चल रही है एवं इसके बदले फिर से देश में मनुस्मृति लागू किए जाने की संभावना ज्यादा नजर आ रही है।)

सर्वप्रथम अंग्रेजों ने तमाम मुगल शासकों के पर उखाड़ते गए। जब बादशाह बहादुरशाह जाफर के रूप में अंतिम पर उखाड़े गए तो, भारत में पूर्णरूपेण अंग्रेजी हुकुमत कायम हो गई। अंग्रेजों को मनुस्मृति की कुरीतियों को समझने में देर न लगी। उन्होंने छुआछूत, संपत्ति का अधिकार, सती प्रथा, शिक्षा, राजनीति, प्रशासन एवं तमाम तरह के दलित, पिछड़े, आदिवासियों की हकमारी को बहुत करीब से देखा। तात्पर्य यही कि भारतवर्ष में अंग्रेजी राज नहीं, अपितु देश मनु महाराज की “मनुस्मृति” के संविधान के अनुसार चल रहा था, जो मानवाधिकार की दृष्टि से अति निंदनीय एवं निहायत ही अमानवीय था। फिर क्या था; अंग्रेजों ने धीरे-धीरे लंकारूपी “मनुस्मृति” पर आग लगानी शुरु कर दी। 

 चूंकि इस लेख का लेखक महोदय मूल रूप से संताल परगना का है एवं पाठकगण भी  बड़ी संख्या में यहीं के हैं, अतएव ब्रिटिश काल के दौरान संतालों के साथ घटी घटनाओं का वर्णन करना ही उचित होगा। मालूम हो कि तब आज के संताल परगना में संतालों का आगमन ब्रिटिश काल के दौरान हुआ। हालांकि उस समय पहाड़ों के ऊपरी हिस्से में आदिम पहाड़ियों का वास जरुर था, पर वे निचले हिस्से में उतरने को कतई मंजूर नहीं थे। इतना ही नहीं आदिम पहाड़िया बड़े ही आलसी प्रवृति के थे, जहाँ संताल बहुत ही मेहनतकश प्राणी थे। यही कारण था कि अंग्रेजों ने संतालों को संताल परगना आने का आमंत्रण दे डाला। संताल आदिवासी टिड्डी की भाँति संताल परगना में प्रवेश कर गए। यहाँ संतालों ने जंगली जानवरों का सामना करते हुए अपने लिए खेती योग्य जमीन तैयार की। यहाँ बताते चलें कि शुरुआती दौर में पहाड़ियों ने संतालों के आगमन पर बेशक आपत्ति जरुर जताई थी, पर अंग्रेजों के हस्तक्षेप से सारा मामला सुलट लिया गया था। 

तब संतालों की जीवन शैली किस तरह की रही होगी, आप इसके बारे में आसानी से कल्पना कर सकते हैं। संतालों की रहन-सहन व अन्य गतिविधि ब्रिटिश काल के दौरान भी आदि मानव की तरह ही थी। संताल लोग दुनिया से एकदम कटे हुए थे।

(... अगले अंक में जारी।)

कैसी और किसकी आजादी (2)?

इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले यह जानना बहुत जारुरी है कि भारत के मूल निवासी कौन हैं? निःसंदेह भारत के मूल निवासी आदिवासी हैं। मानवशास्त्री बताते हैं कि आदिवासी आज से 65000 वर्ष पूर्व भारत आए। कल्पना करें, तब देश की क्या स्थिति रही होगी। भारत देश में तब कश्मीर से कन्याकुमारी तक किसी मानव प्राणी का कोई वास नहीं था। चूंकि वन-जंगलों में जीविका के लिए सबकुछ उपलब्ध था, अतः आदिवासियों ने अपने रहने के लिए वन-जंगलों को चुना। और वे वहीं के होकर रह गए। इस संबंध में दलित चिंतक बताते हैं कि आज से मात्र 4000 वर्ष पूर्व यूरेशिया महाद्वीप से कुछ लोग भारत आए। उन्होंने अपने ठिकाने के लिए मैदानी इलाके को चुना। ये यूरेशिया के लोग बड़े ही चालक एवं चतुर प्रवृति के प्राणी थे। उन्हें छल-कपट में महारथ हासिल था। भारत में आते ही उनका सामना आदिवासियों के साथ हुआ। आदिवासी सरल एवं मृदुल प्रवुति के थे। परंतु वे वीर और साहसी थे। स्वाभाविक था कि आदिवासी और यूरेशिया से आये हुए लोगों के बीच कई बार घमासन युद्ध हुआ। और इस भयंकर युद्ध में यूरेशिया के लोगों को हमेशा मुँह की खानी पड़ी थी। संक्षेप में यही कि फिर इन यूरेशियावासियों ने सुनियोचित तरीके से एक चाल चली। उन्होंने कपोल कल्पित ग्रंथ बेद, पुराण, उपनिषद, महाभारत, रामायण आदि की रचना कर डाली। जिनमें उन्होंने अपने आपको को देव एवं आदिवासियों को दानव के रूप में पेश किया। देव और दानव को क्रमशः सुर-असूर के नाम से भी जाना जाता है। इन्होंने भोले-भाले आदिवासियों को अपना मानसिक गुलाम बनाने हेतु कोई कसर न छोड़ी। जैसे कि आप अच्छी तरह जानते हैं कि इनके कपोल कल्पित ग्रंथ महाभारत और रामायण में तीर-धनुष की खूब बौछार हुई थी। पर सोचने वाली बात है; जिसने इन ग्रथों की रचना की, क्या उनके पास आज की तारीख में कोई छोटा-सा तीर-धनुष का टुकड़ा भी है? नहीं है। फिर यह तीर-धनुष आज किनके पास मौजूद है? इसका उत्तर आप स्वयं अच्छी तरह जानते हैं। 

दलित चिंतकों के अनुसार; डीएनए जाँच से यह सिद्ध हो चुका है कि जो लोग यूरेशिया से भारत आए, वही आज के ब्राह्मण हैं। इन ब्राह्मणों ने छल-कपट के सहारेआदिवासियों के किन्हीं राजाओं की हत्या कर दी, तो किन्हीं राजाओं को येनकेन प्रकारेण अपने कब्जे में कर लिया। ऐसा भी कहा जाता है कि जब भी ब्राह्मणों ने आदिवासी राजाओं को पराजित किया था, तब वे खुशी से झूम उठते थे। कालान्तर में यही विजय दिवस हिन्दुओं के पर्व-त्योहार के रूप में परिणत हो गया। मानवशास्त्री आगे बताते हैं कि इन ब्राह्मणों ने अपना वर्चस्व कायम करने हेतु एवं SC/ST/OBC को अपना गुलाम बनाने के लिए कई ग्रंथों की रचना कर डाली। मनु महाराज की मनुस्मृति ने तो हद ही कर दी। इन्होंने वर्ण व्यवस्था की स्थापना कर दलितों को सदा के लिए नरक की जिंदगी जीने के लिए मजबूर कर दिया।      (... अगले अंक में जारी।)

Thursday, 17 August 2023

कैसी और किसकी आजादी (3)?

पिछले अंक में हमने संक्षेप में जाना कि विगत पांच हजार वर्षों से इन ब्राह्मणों ने SC/ST/OBC का मानसिक व शारीरिक रूप से जी भरकर दोहन किया। इनके द्वारा निर्मित वर्ण व्यवस्था ने तो इन दलितों को कहीं का नहीं छोड़ा। क्या आपने कभी सोचा है; शूद्रों का मंदिर में प्रवेश क्यों वर्जित है? इसलिए वर्जित है; क्योंकि अंदर ब्राह्मण अपने राजा की मूर्ति बनाकर शूद्र के राजा जिसकी हत्या की गई, उसके साथ अपने राजा की पूजी की जाती थी। ऐसा दृश्य देखकर कहीं शूद्र न भड़क जाए, इसलिए शूद्रों का मंदिर में प्रवेश वर्जित है। इसका साक्षात उदाहरण आज भी संतालों में ”दुर्गापूजा“ (दिबी दासांय) देखने को मिलता है। जिसमें संतालों के राजा हुदुड़ दुर्गा की हत्या के जश्न में वे त्योहार मनाते हैं, तो संताल अपने बलशाली राजा की शहादत "हाय-हाय" करते हुए, उसके प्रतिरोध में "दासांय नृत्य" (war dance) करते हैं।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन ब्राह्मणों ने शूद्रों को मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित करने का सिलसिला इस देश में अंग्रेजों के आगमन तक जारी रखा हुआ था। इस देश में अंग्रेजों के आने से पहले कई विदेशियों का साम्राज्य रहा है यथा महमूद गजनबी, मुहम्मद गौरी, चंगेज खान, कुतुबुद्दिन ऐबक, गुलाम वंश, तुगलक वंश, खिलजी वंश, लोदी वंश, फिर मुसलमान (ये मुसलमान नहीं थे, मुगल एक रेस या वंश का नाम है।) आदि वंशों ने भारत पर राज किया एवं खूब अत्याचार किये। फिर भी इन ब्राह्मणों/वाभनों ने कोई क्रांति या आंदोलन नहीं चलाया। फिर अंग्रेजों के खिलाफ ही इन्होंने क्रांति क्यों कर दी? इसका स्पष्ट कारण यही था कि मुगलों ने भारत पर सदियों से चली आ रही “मनुस्मृति” के संविधान को यथावत बनाये रखा। मुगलों को इस संविधान पर कोई आपत्ति न थी। उन्होंने बीच का रास्ता अपना रखा था। पर अंग्रजों ने उस तथाकथित संविधान (मनुस्मृति) की धज्जियां उड़ाकर रख दी थी। वे मनुस्मृति के घोर विरोधी थे। उन्होंने दलित, पिछड़ों, आदिवासियों, मूलवासियों और अल्पसंख्यकों को समानाधिकार दिया। अर्थात् कानून के सामने सब बराबर हैं। महान चिंतक एवं संविधान निर्माता बाबा साहेब उपरोक्त सवाल का जवाब देते हुए लिखते हैं - “चूंकि मुसलमानों ने सदियों से चली आ रही तथाकथित वाभनों की “मनुस्मृति” पर कोई उंगली न उठाई। उन्होंने चापलूसी की राजनीति अपनाई। उनको (वाभनों को) अपने “नवरत्नों” में जगह दी। अतः स्पष्ट तौर पर कहा जाय तो, मुगल शासकों ने “मनुस्मृति” की आत्मा को जिंदा बनाए रखा। यथा दलित, पिछड़े एवं जंगली आदिवासियों की औरतों को स्तन ढकने के लिए कर देना होता था। वे गले में हांडी, कमर में झाड़ू बांधकर चलने को मजबूर थे। कारण कुछ भी रहा हो, करीब 1600 ई. के आस पास अग्रेजों का भारत में पदार्पण हुआ। 

(... अगले अंक में जारी।)

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...