Sunday, 5 May 2024

मान लो; संविधान बदल गया?

तर्क विज्ञान के कई नियमों में यह भी एक नियम है कि जहां धुआँ उठे, समझो वहां आग है। इसका मतलब अगर वहां धुआँ हो, तो वहां आग होने की पूरी-पूरी संभावना से कोई नहीं इंकार कर सकता है। धुआँ और आग में चोली-दामन का साथ है। बगैर धुआँ आग की कल्पना हो ही नहीं सकती है। इसका अर्थ यही हुआ कि भाजपा एवं उसके सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक गाहे-बगाहे यह जो संविधान बदलने की बात उठाते हैं, यह सत्य प्रतीत होता है। इसी चुनाव में भाजपा के कुछ उम्मीदवारों ने साफ तौर पर कह दिया है कि उन्हें 400 पार करा दो, वे संविधान अवश्य बदल देंगे। और तो और वे खुलेआम संविधान को जलाते हैं। उनके समर्थक एससी/एसटी/ओबीसी मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं। यह सब धुआँ क्यों उठ रहा है? इसका मतलब साफ है कि वहां आग लगी हुई। वे संविधान बदलने को उतारु हैं।

भारत देश सन् 1947 को आजाद हुआ। बाबा साहब डॉ भीमराव आम्बेडकर की अगुवाई में लिखे हुए इस संविधान को 1949 में हम भारत के लोगों ने उसे अंगीकृत किया। और इसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया। कुछ संशोधनों के साथ फिलहाल इसमें 25 भाग और 448 अनुच्छेद हैं। भारत का संविधान दुनिया के सर्वोत्तम संविधानों में से एक है। परंतु इतना उच्च कोटि का संविधान रहते हुए भी कुछेक घटनाओं को देखकर मन बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाता है। संविधान के अनुसार भारत का हर नागरिक बराबरी का हक रखता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। इस देश में छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं, उसे सदा के लिए मिटा दिया गया है। हर नागरिक को मौलिक अधिकारों से सुसज्जित किया गया है। फिर भी हमारे वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति के साथ ऐसा तुच्छ भेदभाव क्यों? इसके पूर्व में भी कई दलित नेताओं के साथ ऐसा ही भेदभाव किया गया है। ऐसा क्यों? इसके अलावे भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने पर मनाही क्यों? इस तरह के कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं।

अब सवाल उठता है मान लो; संविधान को बदल दिया गया, फिर क्या होगा? क्या होगा? ये जो चुनाव-चुनाव हमलोग खेल रहे हैं, सब खत्म। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। न तुम्हारे विधायक होंगे और न कोई सांसद। पंचायत चुनाव में भी आपकी कोई भागीदारी नहीं होगी। सरकारी आरक्षण खत्म हो जायगा। राजनैतिक हो अथवा सरकारी नौकरी, सब समाप्त। याद रखना, सदियों से दबाए गए दलित फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से वे आये थे। सभी दलित गले में हांड़ी और कमर में झाड़ू टांगते हुए नजर आएंगे। महिलाओं को स्तन ढांकने की आजादी नहीं होगी। जिस दलित को शिक्षा ग्रहण करने का भूत सवार हो, उनके कानों में पिघलते हुए शीशे डाले जाएंगे। दलित गुलामगीरी करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पक्का सबूत के तौर पर अभी देख लेना। लोकसभा सामान्य सीट से उम्मीदवारी करके देख लेना। वहां से बाहरी जीत सकता है, पर आपकी पूछ नहीं के बराबर होगी। 

सवाल यह नहीं है कि जब संविधान बदलने की घड़ी आएगी, फिर देखा जाएगा। आग लगने पर कुआँ खोदना कहां की बुद्धिमानी होगी? आदिवासी विरोधी मानसिकता वाले को कौन नहीं जानता है? 1977 से पहले वे ”दीया“ दिखाया करते थे। इसके बाद उनके हाथ में "कमल फूल" उग आया। तब से वे धीरे-धीरे सत्तासीन होते गए। और अब तो वे 10 वर्षों से हमारे सिर पर सवार हो गये हैं। उनके काले करतूतों के बारे में इतना ही काफी है कि वे आपको "वनवासी" के नाम से पुकारते हैं एवं धर्म की घूंट पिलाते हैं।

एसपीटी एक्ट इतना सख्त कानून रहते हुए भी किसने मनुवादियों को अपने इलाके में प्रवेश करने की अनुमति दी? उन्हें किसने आमंत्रण दिया? सिर्फ राजनीतिज्ञों को दोष देने मात्र से आपकी समस्या नहीं सुलझ सकती है। इसके जिम्मेवार आप स्वयं हो। यहां "मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। आपके इलाके में इतने सारे पत्थर एवं कोयला खदान के स्वामी कौन लोग हैं। सारे के सारे मालिक मनुवादी हैं। 

चालू लोकसभा चुनाव में वे किस तरह की चाल चल रहे हैं, आप पूर्णतः अनभिज्ञ मालूम पड़ते हो। पूरे देश में एक ओर संविधान बचाने वाले खड़े हैं, तो दूसरी ओर इसको बदलने वाले 400 पार का नारा दे रहे हैं। साफ शब्दों में कहा जाय, तो राजमहल की सीट किसकी झोली में जाती है, देखना बड़ा दिलचस्प होगा।  आपकी सावधानी हटी, तो दुर्घटना घट सकती है। पछताने से कोई लाभ नहीं, जब चिड़िया चुग गई खेत।

Saturday, 4 May 2024

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता

यह लेख लिखने तक लोकसभा-2024 चुनाव के चौथे चरण का मतदान हो रहा है। आपका यह मंगरु कोई चुनाव विश्लेषक नहीं। वह सिर्फ इतना जानता है कि देश में चुनाव दो दलों के बीच हो रहा है - इण्डिया गठबंधन तथा एनडीए। इन गठबंधनों से मंगरु को क्या लेना-देना? आग लग जाए ऐसे गठबंधनों को। इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? कोई राजा बने या रंक? हमें इससे क्या मतलब? देश में तानाशाही आए या प्रजाशाही? रोजगार-नौकरी मिले या पकौड़ा तलना पड़े? महंगाई आसमान भी छू ले। हमें तो बस अपने हाल ही में जीना है। संविधान मरे-जीये, आरक्षण खत्म हो जाए। हमारा क्या जाता है? जिसका जाता है, वो लड़े। हमें किसी से कोई मतलब नहीं। हमें न उधो का देना और न ही माधो का लेना। इन 75 सालों में बहुत देख लिया। देखो न, मुर्गे ने बांग दी और हम उधर हो लिए। जोड़ा पत्ता आया। हमने उसपर खूब खाना खाया। अब तीर-कमान का जमाना आ गया है। हम आदिवासी जो ठहरे। एकलव्य हमारा आईकॉन है। और हम तीर-कमान के शिकार हो गए। उजड़े वन-जंगलों में शिकार करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

चुनाव का मौसम है। सड़क किनारे गांव है। और उस गांव के सड़क किनारे मंगरु की छोटी-सी झोपड़ी है। रोज कोई न कोई किसी पार्टी के चुनाव प्रचारकों से भेंट-मुलाकात हो ही जाती है। कल की ही तो बात है। गोधूलि का बेला था। कोई नेता जी अपने लव-लश्कर के साथ आपके इस गरीब मंगरु की झोपड़ी में दर्शन दे गए। "बैठिए-बैठिए। बैठिए नेताजी।" यह सुनते ही नेताजी के सभी छोटे-बड़े चमचे अपने आंगने में घुस आए। उनलोगों को बिठाने की बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई। खैर, झोपड़ी में आदम जमाने की कुर्सी पड़ी थी। उसे नेताजी की तरफ खिस्का दी गई। बाकी लोग ईश प्रदत्त कुर्सी पर तशरीफ रख दिए। देखते ही देखते गांव के तमाम लोग इस झोपड़ी की ओर दौड़े चले आए। अच्छी-खासी भीड़ एकट्ठी हो गई। नेताजी को बिन मांगे मोती मिल गई। उम्र का लिहाज रखते हुए सभी समाज सुधारकों ने "डो़बो़क्" किया। दुआ-सलाम के बाद नेताजी ने बात बढ़ाते हुए कहा - "भाईयो तथा बहनो! इधर से गुजर रहा था। याद आई आपकी मंगरु बाबा की। इनकी उम्र बढ़ चली है। सोचा, क्यों न इनसे आशीर्वाद लिया जाय? देखिए, मैं इस राजमहल सीट से एक आजाद उम्मीदवार के रूप में आपकी खिदमत में पेश हूं। विगत दस वर्षों में आपके लिए कुछ भी नहीं हुआ है। मैं आपके लिए टेण्डेण्सी एक्ट, पेसा एक्ट, खतियान एक्ट सब लागू करके रहुंगा। मैं गुरुजी का पक्का चेला हूं। अतः आप हमें गुरुजी के नाम पर भारी से भारी मतों से विजयी बनावें ...।

यह छोटी-सी मुलाकत यहीं समाप्त हो गई। मंगरु ने मेहमानों को अंतःमन से लाल चाय पिलाई। नेताजी बहुत खुश थे। अतः जाते-जाते उसने प्रधान के हाथ में एक मोटा-सा लिफाफा थमाते हुए कहा - "मेरी तरफ से यह एक छोटी-सी भेंट है। ध्यान दीजिएगा।"

गांव वाले समझ गए थे कि नेताजी गुरुजी के चेले हैं। अतः उन्हें गुरुजी के चुनाव चिन्ह पर वोट देकर उनका हाथ मजबूत करना है। पर मंगरु यह पूछना तो भूल ही गया कि आपके पच्चीस वर्षों की विधायकी/मंत्री पद का हिसाब-किताब कौन देगा? आपकी मांगें तब क्यों नहीं पूर्ण हुई? आप अकेले इतनी बड़ी लोकसभा में कुछ कर पाओगे? या यह भी कोई जुमला ही साबित होगा? और तो और इतने मोटे-मोटे लिफाफे का स्त्रोत कहां है? कुबेर का हाथ कहां लग गया? वाह री माया!

Friday, 3 May 2024

 अब कौन होगा दलितों का तारणहार?

जिन्हें हम भगवान मानते हैं, जब वे अपने आपको बचा न पाये, तो हम किस खेत की मूली हैं। कोई मानव प्राणी इस दुनिया में सदा रहने के लिए नहीं आया है। इस धरा पर आने का कुछ पता नहीं, पर जाना निश्चित है। हम-तुम बस इस लेख पर विचार-मंथन करते रहेंगे। और एक दिन हम भी चल बसेंगे। बापू नहीं रहे, बाबा नहीं रहे, सिदो-कान्हू भी नहीं रहे। बाबा साहब जिन्होंने इतना अच्छा संविधान दिया, सब चले गए। पर उनकी कृति हमें बहुत कुछ बता रही है। 

जिन अंग्रेजों ने दलितों को जीवनदान दिया, उन अंग्रेजों को मनुवादियों द्वारा जी भरकर गाली देना कहाँ की इंसानियत है? यह समझने वाली बात है। मनुवादी अंग्रेजों को गाली क्यों दे रहे हैं? वे इसलिए गाली दे रहे हैं क्योंकि अंग्रेजों ने मनुवादियों के गुलामों को मुक्ति दिलाई है। इसके सिवा और कोई कारण ही नहीं है। इस मसले को आप इस तरह भी समझ सकते हैं। कानून की भाषा में या यों कहें उचित निर्णय देने हेतु जज को निष्पक्ष होना अति आवश्यक है। यह सौ फीसदी सच है कि निष्पक्ष हुए बगैर कहीं भी और किसी भी मामले में उचित फैसला हो ही नहीं सकता है। जिस देश में सदियों से दलितों को सताया जा रहा हो, उन्हें गुलाम बनाया जा रहा हो, उनपर बेतहाशा अत्याचार किये जा रहे हों और तो और उन्हें तमाम तरह के मानवाधिकार के अंतर्गत मिलने वाली सुविधाओं से भी वंचित किये जा रहे हों, तो इनका न्यायाधीश किसे नियुक्त किया जाय, ताकि पीड़ितों को प्राकृतिक न्याय मिल सके? इस भारत देश के साथ यही हुआ है। यहाँ मनुवादियों का साम्राज्य था। ये सदियों से शूद्रों को प्रताड़ित करते आ रहे थे। भगवान ने शूद्रों की सुनी। और उसने अपने प्रतिनिधि के रूप में अंग्रेजों को भारत भेजा। अंग्रेजी काल में भारत में क्या हुआ? इसे आप अच्छी तरह परिचित हैं। सार यही है कि अंग्रेजों ने मनुवादी साम्राज्य को ध्वंस कर दिया। जज बनकर शूद्रों को उचित निर्णय दिया। अंतोगत्वा भगवान द्वारा आवंटित काम को अंजाम देने के पश्चात् वे सन् 1947 को अपना घर वापस लौट चले। साथ ही वे अपने होनहार छात्र डॉ भीम राव अम्बेडकर को भारत का संविधान लिखने के लिए तमाम तरह के नोट्स देकर इस देश से बिदा हो लिए।

भगवान द्वारा प्रेषित निष्पक्ष जज अंग्रेज पुनः मनुवादी को भारत की सत्ता सौंपकर अपने वतन को लौट चले। अब शूद्रों का क्या होगा? शूद्रों का वही होगा जो मंजूरे खुदा। यही सच है कि भारत के हर नागरिक को संविधान के अनुसार चलना चाहिए। लेकिन बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस वक्त मनुवादियों के फन उठने लगे हैं। मनुवादियों द्वारा गाहे-बगाहे इसकी आलोचना करना एक बहुत बड़ा अशुभ संदेश है। जिस तरह संविधान की धज्जियां उड़ रही हैं, वह आपके सामने है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। अब यहाँ के सत्ताधीश किसी एक धर्म विशेष को ही बढ़ावे दे, यह कहीं से भी शोभा नहीं देता है। पूरी सरकारी मशीनरी प्राण प्रतिष्ठा में लग जाय, तो इसे क्या धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है? इसी तरह आरक्षण को समाप्त करने हेतु सभी सरकारी संस्थाओं को ही बेच देना, कहाँ तक उचित है? ईडी, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट जैसी स्वतंत्र निकाय, अब सरकार के दिशा निर्देश पर काम करे, तो दाल में कुछ काला जरुर नजर आता है। इस हालात में अब कौन होगा दलितों का तारणहार? मामला सोचनीय है।

Thursday, 2 May 2024

"अफीम" की खेती को नष्ट करो

कहा जाता है; भाजपा केन्द्र में नफराती करतूतों एवं जनता को धार्मिक "अफीम" का घूंट पिलाकर सत्ता में आई थी। शुरुआती दौर में इस पार्टी का नाम जनसंघ था। इनका चुनाव चिन्ह "दीया" था जो अब "कमल फूल" में तब्दील होकर भाजपा के रूप में विकसित हो गई है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक भाजपा की रीढ़ मानी जाती है। भाजपा ने देश में धार्मिक उन्माद फैलाया, हिन्दु-मुसलमान करते रहा और इस तरह देश को एक जलती भट्टी में झोंक दिया। सार यही है कि भाजपा ने धर्म की आड़ में देश का सत्यानाश कर रखा है। लोगों का आरोप है कि इव्हीएम ने सत्तासीन लोगों की खूब मदद की है। लोग तो इतना तक कहते सुने गए हैं कि ईव्हीएम की चोरी में दस वोट डालो तो छः वोट भाजपा की झोली में जाना तय माना जाता है। यह सिलसिला विगत दस वर्षों से चला आ रहा है। अब देश की जनता ने मन बना लिया है कि ऐसी तानाशाह सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने में ही भलाई है।

इतिहास बताता है कि जब से देश में लोकतंत्र के तहत मतदान की प्रक्रिया चली आ रही है, तब से झारखण्ड खासकर संताल परगना के आदिवासियों को चुनाव की महत्ता समझ में आई है। जनता बहुत दिनों तक "दीया" तो दूर "कमल फूल" से अनभिज्ञ थी, पर वे "मुर्गा", "जोड़ा पत्ता" हो या "तीर-धनुष" उनको अच्छी तरह पहचानती है।

थोड़ी देर के लिए इतिहास में जो घटना घटी, उसे भूल जाओ। कारण, उसे याद कर आंसू बहाने से रंचमात्र भी कोई लाभ नहीं, बल्कि वर्तमान में जो कुछ भी हो रहा है, उस पर विशेष ध्यान देने की जरुरत है। पूरे देश में चुनाव का महापर्व है। अतः क्यों न इस पर कुछ चर्चा किया जाय?

दुमका लोकसभा 2024 (अजज) की सीट का ही आंकलन किया जाय। भाजपा ने इस सीट से सीटिंग सांसद सुनील सोरेन के हाथ में टिकट देने के बाद अब उस सीट से जेएमएम की बागी सीता मैया को अपनी धुलाई मशीन में नहलाने के बाद उम्मीदवार बना दिया है। ज्ञात हो कि सीता मैया 15 वर्षों तक अपने ससूर शिबू सोरेन की पार्टी जेएमएम की बैसाखी पर सत्ता सुख भोग चुकी है। कारण कुछ भी हो, पर भाजपा वालों को जेएमएम को तोड़ने के लिए सीता मैया से कोई दूसरा अच्छा उम्मीदवार नहीं दिखाई दिया। इसीलिए सुनील सोरेन के मुंह से रोटी छिनकर सीता मैया को दी गई है। ज्ञात हो कि दुमका में भी इंडिया गठबंधन एवं भाजपा के बीच ही मुकाबला है। बाकी सभी उम्मीदवार वोट कटुवे ही साबित होंगे। 

सीता मैया को जिस तरह विधानसभा जामा की जनता से कोई लेना-देना नहीं था, उसी तरह उन्हें दुमका लोकसभा की जनता से भी कोई सरोकार नहीं होगा। वह अपने परिवार की आपसी कलह को चुनावी मुद्दा बनाकर मैदान में कूद पड़ी है। उसने घोषणा कर रखी है कि जीत जाने पर वह अपने पतिदेव की रहस्मय मौत को सीबीआई से जांच करवायेगी। दूसरा वह भाजपा के हिन्दुत्व के मुद्दा को आगे बढ़ाएगी, तभी तो उसने जय श्रीराम का उद्घोष करते हुए पार्टी में प्रवेश किया है। अगर उसकी गाड़ी ठीक चल पड़ी, तो अपनी दोनों बेटियों के लिए जामा-दुमका आरक्षित रखी हुई है। दुमका के बाकी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो जाएगी।

कमोवेश दुमका-राजमहल का वोट पैटर्न वही रहेगा। अगर दोनों जगहों के उम्मीदवारों को देखा जाय, तो दुमका के जेएमएम उम्मीदवार नलिन सोरेन शिकारीपाड़ा से सातवीं बार विधायक रहे हैं। जबकि सीता मैया भी तीसरी बार जेएमएम से जामा की विधायक रही हैं। दूसरी ओर राजमहल लोकसभा से जेएमएम के उम्मीदवार विजय हाँसदाक् हैट ट्रिक लगाने जा रहा है। वहीं भाजपा उम्मीदवार ताला मराण्डी भी एक बार बोरियो विधानसभा से भाजपा विधायक रह चुके हैं। इस क्षेत्र के जेएमएम के वर्तमान बागी विधायक लोबिन हेम्बरोम भी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने हेतु निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में होंगे। इनका घमंड भी शीघ्र ही धराशायी हो जायेगा। यहाँ भी बाकी उम्मीदवरों की जमानत जब्त होगी।

सार यही है कि दुमका-राजमहल से जिन्हें धर्मनिरपेक्ष देश पसंद है, वे सभी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवारों को जीताने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। और इस तरह "अफीम" की खेती को नष्ट कर देंगे।

Wednesday, 1 May 2024

 कथनी और करनी ...

"कोशिश करने पर भी अगर सफलता न मिलती हो, तो समझो कोशिश करने में कोई खोट अवश्य है।" यह सिद्धांत हम संतालों के विकास में अक्षरशः लागू होता है, नहीं तो क्या कारण हे कि तीन-तीन बार अलग प्रदेश मिलने के बावजूद भी मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक ही सीमित रही। संताल हूल के परिणामस्वरुप संताल परगना मिला, भारत देश गुलामी से आजाद हुआ और आज से ठीक 24 वर्ष पूर्व अलग झारखण्ड राज्य भी मिला। फिर भी खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई। इसका मतलब हमारी कोशिश में कोई न कोई खोट अवश्य रहा होगा।

चुनावी मौसम है, अतः सोशल मीडिया में राजनीति पर बरसाती मेढ़कों का टर्र-टर्र होना स्वाभाविक है। राजनीति एवं राजनीतिज्ञों पर चर्चा करना लाजिमी हो जाता है। घर बैठे सोशल मीडिया पर राजनीति के बारे सुतर्क-कुतर्क करना अंतःमन की खुजली को अवश्य मिटा देता है। लेकिन, ध्यान रहे, उन्हें इंगित करने पर तीनों उंगलियां अपनी ही ओर इशारा कर रही हैं। 

इस चुनावी मौसम में राष्ट्र के बड़े-बड़े नेता इधर से उधर पल्टी मार रहे हैं। हम झारखण्डी नेता उनके सामने किस खेत की मूली हैं? उनकी आंच हम पर भी पड़ेगी, निश्चित है। लोबिन हेम्बरो़म, सीता सोरेन सरीखे नेताओं की उनकी अपनी मजबूरी होगी। वे गये, तो कौन-सा पहाड़ टूट गया? हमारे मतदाताओं को किस श्रेणी में रखा जाय? यह एक अति विचारणीय तथ्य है। क्या वे देश-दुनिया की समस्याओं से वाकिफ हैं? क्या उन्हें आपनी खुद की समस्या के बारे में कुछ पता है? शायद नहीं। जिस एसपीटी एक्ट के बारे में हम दहाड़ मार रहे हैं, क्या हमारे मतदाताओं को उससे कोई सरोकार है? उस एक्ट के बारे में अगर उन्हें खाक भी पता न हो, पर उन्हें यह तो अच्छी तरह पता है कि संतालों की जमीन न तो वे (संताल) बेच सकते हैं और न ही कोई गैर संताल उनकी जमीन को खरीद सकता है। फिर भी संतालों ने अब तक अपनी आधी जमीन को बेच चुका है। क्यों? लैण्ड पुलिंग से मतदाता वाकिफ हैं अथवा नहीं, क्या पता।  सार यही है कि हम संताल सिर्फ एक समस्या से जूझ रहे हैं, ऐसी बात नहीं है। हमारी हजार तरह की समस्याएं हैं। सर्वप्रथम किस समस्या को सुलझाया जाय, इसकी प्राथमिकता निर्धारित करना अति कठिन कार्य है। तीर-धनुष चले या कमल फूल खिले हमारे नादान वोटर्स को क्या फर्क पड़ता है। उन्हें तो "खायेंगे-पीयेंगे और मस्तपूर्वक जीयेंगे" से फुर्सत ही कहाँ?

समय के साथ बहुत कुछ बदल चुका है। सिर्फ व्हाट्सअप पर उंगली फेर देने मात्र से कुछ नहीं होने वाला है। राजनीति पर बहस जरुरी है। पर इस पर मनमुटाव गलत है। कहने के लिए बड़ी-बड़ी बातें कही जा सकती हैं, पर उसे धरातल पर ला सकना उससे भी और कठिन कार्य है। कहा गया है कि कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क है। हेल्दी बहस जारी रहे, इससे सुदूर बैठे मंगरुओं का ज्ञानवर्धन होते रहता है।

लोकसभा चुनाव-2024
(अपना कीमती वोट किसे दें?)

(दुमका-राजमहल लोकसभा क्षेत्र। यह मात्र एक विश्लेषण है। इस विश्लेषण का उद्देश्य किसी वोटर को जबरन किसी दल विशेष को मत देने का आह्वन कतई नहीं है। यह विश्लेषण "सुनो सबकी, करो मनकी" सिद्धांत पर आधारित है।)

एनडीए गठबंधन - भाजपा इस गठबंधन के प्रमुख दलों में से एक है। भाजपा का पुराना नाम जनसंघ है। 1980 दशक में यह दल समय की मांग को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी के नाम से उभर कर सामने आया। इस पार्टी पर हमेशा संप्रदायिक होने का आरोप लगते रहा है। इसका एकमात्र कारण है कि इनके मूल सिद्धांतों में हिंदी, हिंदु, हिंदुस्तान का नारा सर्वोपरी है। 

भाजपा 10 वर्षों से केन्द्र में सत्ता पर काबिज है। इसने "सबका साथ सबका विकास" के नारा के  साथ-साथ 2 करोड़ नौकरी देने एवं सस्ते पेट्रोल-डीजल देने सहित कई तरह के वादे किए थे। यह पार्टी हमेशा हिंदु-मुस्लिम करती रही है। भाजपा ने इन दस वर्षों में विकास के नाम पर एक ढेले का काम नहीं किया है। वह अपने काम पर वोट नहीं मांग रही है। बल्कि इनके प्रमुख हिंदु-मुस्लिम, मंगलसूत्र, गाय-बैल एवं भैंस के नाम पर वोट मांग रही है।

भाजपा संविधान को खत्म करना चाहती है। भाजपा आरक्षण का घोर विरोधी है। यह आदिवासी, दलितों एवं अल्पसंख्यकों को गर्त्त में ले जाना चाहती है। सीधे तौर पर कहें, तो भाजपा एसटी/एससी/ओबीसी को अपना गुलाम बनाना चाहती है।

भाजपा की ओर से दुमका में सीता सोरेन को प्रत्याशी बनाया गया है। आप दिवंगत दुर्गा सोरेन की धर्मपत्नी है। सीता सोरेन माननीय शिबू सोरेन की बड़ी पुत्रवधू है। आप 15 वर्षों से जामा विधानसभा से विधायक रही हैं। आपने झामुमो से बगावत कर दी है एवं सीटिंग सांसद सुनील सोरेन के मुंह से भाजपा की टिकट छीनकर खुद मैदान में आ डटी हैं। आप शिबू सोरेन परिवार से बदला लेने के लिए जनता से वोट मांग रही हैं। 

निर्दलीय उम्मीदवार - राजमहल लोकसभा क्षेत्र से पंद्रह प्रत्याशी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में हैं। एक को छोड़ बाकीयों की जमानत रद्द हो जाएगी। एक निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं। आप वर्तमान में बोरियो विधानसभा से झामुमो के विधायक हैं। बोरियो में आप 25 वर्षों से विधायक एवं एक बार मंत्री भी रह चुके हैं। राजनीतिक नशा के कारण आपने राजमहल लोकसभा से झामुमो से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। पर झामुमो हाईकमान ने आपकी मांग को ठुकरा दी। आपने पार्टी की आज्ञा का उल्लंघन किया और आपको पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित कर दिया है। फिर भी आप बागी उम्मीदवार के रूप में डटे हुए हैं। आप पर भाजपा की बी टीम होने का संगीन आरोप है। आप वोट कटुआ ही साबित होंगे।

इंडिया गठबंधन - इस गठबंधन में कांग्रेस/झामुमो सहित कई अन्य कई दल शामिल हैं। इस वक्त देश इंडिया गठबंधन के साथ खड़ा है। इंडिया गठबंधन संविधान एवं आरक्षण बचाने के साथ-साथ "हिंदु, मुस्लिम, सिख, ईसाई; हम सभी हैं भाई-भाई" की बात कर रहा है। जिसकी वजह से नौकरी पेशा, व्यापारी, किसान, मजदूर सभी इसके पक्ष में आ गए हैं।

आप किसको अपना कीमती वोट देंगे? यह आप पर निर्भर करता है। 

Thursday, 4 April 2024

आओ शेरनी का दूध पीयें 

"शिक्षा शेरनी का वह दूध है, जो इसे पीयेगा वह दहाड़ेगा।" - बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर। 

बाबा साहेब का उपरोक्त कथन सौ प्रतिशत सत्य है। हूल तक संताल आदिवासी अर्द्धनग्न ही रहा करते थे। वे दुनिया से वाकिफ न थे। पर उसने जो हूल किया, वह अपवाद ही है। ऐसा इसलिए संभव हो सका, क्योंकि वे अनपढ़ जरुर थे पर ज्ञानी थे। हूल के ठीक 5 वर्ष बाद 1860 को संताल परगना में ईसाई मिशनरियों को आगमन हुआ। उन्हें अच्छी तरह समझ में आ गया था कि अगर इन भोले-भाले संतालों को शिक्षित नहीं किया गया, तो वह दिन दूर नहीं, जब वे दुबारा इन्हीं कुख्यात महाजनों के गुलाम बन जाएंगे। इसलिए मिशनरियों ने शिक्षा पर विशेष ध्यान देना उचित समझा। इसका नतीजा आज आपके सामने है कि जगह-जगह मिशन स्कूल चलाये जा रहे हैं। अगर उनकी मंशा लोगों को ईसाई बनाना ही होता, तो वे कबके सबों को ईसाई बना दिए होते। 2011 के जनगणना के अनुसार संताल परगना में ईसाईयों की जनसंख्या मात्र 5 प्रतिशत ही है। जनसंख्या छोटी है, पर घाव करे गंभीर। उसने चींटी की भाँति हाथी की नाक में दमकर रखा है। आखिर उसने शेरनी का दूध जो पीया है। अतः वह दहाड़ तो मारेगा ही। जब भी आदिवासियों के साथ अन्याय व अत्याचार हुआ है, यही वह शेरनी का दूध पीने वाला शख्स है, जिसके दहाड़ से अच्छे-अच्छों की बोलती बंद होती है। झारखण्ड आंदोलन हो या और कोई अन्य आदिवासी आंदोलन, इन शेरनी का दूध पीने वालों ने बढचढ़ कर हिस्सा लिया है। जहां कहीं भी आदिवासियों के साथ अन्याय हुआ है, ईसाई आदिवासियों ने इसका जमकर प्रतिरोध किया है। सिर्फ एक घटना ही उदाहरण के लिए काफी है। और वह है - बांझी कांड। यह घटना 19 अप्रैल, 1985 को घटित हुई, जिसमें भू.पू. सांसद फादर अन्थोनी मुर्मू सहित 19 लोग शहीद हो गए। 

रहस्य यही है कि जब भी आदिवासियों के साथ अन्याय होता है, यही ईसाई आदिवासी उसके विरोध में ढाल की तरह सामने आ खड़े होते हैं। ईसाई आदिवासी ने कभी अपने आपको आदिवासी समुदाय से अलग नहीं रखा है। बल्कि उसने हर आदिवासी सामुदायिक कार्यक्रम में बढचढ़ कर हिस्सा लिया है। यहां एक बात समझना बहुत जरुरी है। अंग्रेज आगमन से पूर्व आदिवासी/हरिजन/पिछड़ा वर्ग हिन्दुओं की जाति व्यवस्था के अंतर्गत शूद्र की श्रेणी में रखा गया है। जिन्हें तथाकथित हिन्दुओं द्वारा भयानक रूप से प्रताड़ित किया गया था। अब हिन्दुओं के ठेकेदार भाजपा/आरएसएस फिर से वही दिन लाना चाहते हैं, जिसमें शूद्रों को गुलाम बनाये व पीटे जाने की प्रथा है। हिन्दुओं के धर्म ग्रंथों में भी साफ-साफ उल्लेख है कि ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी सकल ताड़ना के अधिकारी। अब बाबा लोग इसकी व्याख्या कुछ भी करता रहे, पर इसका भावार्थ ‘पीटे जाने’ से ही संबंधित है।

ईसाई आदिवासी, आदिवासियों के ढाल हैं। यही कारण है कि मनुवादी विचारधारा के लोग अर्थात् भाजपा/आरएसएस जब तक ईसाईयों को आदिवासी (अनुसूचित जनजाति) सूची से बाहर नहीं करता है, तब तक उनकी दाल गलने वाली नहीं है। यही कारण है कि भाजपा/आरएसएस वालों ने भेद की नीति के तहत जिन आदिवासियों ने हिन्दु धर्म को अपना रखा है, उन्हें ईसाईयों के खिलाफ खड़ा कर दिया है।

यहां समझने वाली बात यह है कि इस लड़ाई में मनुवादी (भाजपा/आरएसएस) कभी सामने नहीं आते हैं, बल्कि इस काम के लिए उन्होंने अपने गुर्गे छोड़ रखे हैं। और वे सिर्फ सूत्रधार का काम करते हैं। अर्थात् वे आदिवासी के विरुद्ध आदिवासी को खड़ा करने में सफल हो गए हैं।

सबसे अश्चर्य वाली बात तो यह है कि जिस आदिवासी ने पूर्णरुपेण हिन्दु धर्म को अंगीकृत किया हुआ है, वैसे ही आदिवासी, ईसाईयों को डीलिस्ट करने की बात कर रहा है। इसका अर्थ यही हुआ, अगर डीलिस्ट करने की नौबत आ गई, तो सबसे पहले ऐसे ही आदिवासी हिन्दुओं को डीलिस्ट किया जाएगा। इसे ही कहा जाता है; जिस डाली पर बैठना, उसी को काटना। 

यह भी सच है कि किसी मनुष्य जाति के माथे पर उसकी पहचान संबंधित कोई भी चिन्ह् अंकित नहीं होता है। फिर उसे डीलिस्ट करने के लिए कौन-सा मापदंड अपनाया जाएगा एवं ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में कौन होगा उसे पहचान करने वाला अधिकारी? यह एक विकट समस्या आ खड़ी होगी। अगर संताल आदिवासी की बात की जाए, तो उनके बारह गोत्रों में कोई मुर्मू, टुडू ...वगैरह होगा, तो उसकी पहचान संतालों में तो हो ही जाएगी, पर वह किस धर्म को मानता है, यह पता लगाना बहुत ही मुश्किल काम होगा। 

थोड़ी देर के लिए माना कि डीलिस्टिंग करने का आदेश हो गया। फिर आदिवासियों का क्या होगा? आदिवासियों के उपरोक्त धार्मिक विभाजन को देख लें, तो उसके अनुसार 95 प्रतिशत (हिन्दु, ईसाई, अन्य) आदिवासी तो डीलिस्ट हो गए। फिर आरक्षण किसके लिए? घ्यान देने वाली बात है कि अगर ऐसा हुआ, तो बाबा साहेब द्वारा निर्धारित आरक्षण देने की मूल आवधारणा ही बेमानी हो जाएगी। कारण; विशेषकर आदिवासियों के मामले में आरक्षण के लिए धर्म को आधार कभी नहीं माना गया है।

जब तक संविधान जिन्दा है, तब तक आदिवासियों का डीलिस्ट होना संभव नहीं है। फिर भाजपा के गुर्गे क्योंकर डीलिस्टिंग के मुद्दे को हर पांच साल में उछालते रहा है? ऐसा इसलिए ताकि ऐसा कृत्यकर आगामी लोकसभा चुनाव में अपने पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण कर सके। 2024 के लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठता है, यह तो वक्त ही बता पाएगा। 

खैर कुछ भी हो, पर इतना सच है कि भाजपा/आरएसएस वाले आदिवासियों को गुमराह करने में सफलता पा लिया है। अगर समय रहते इस षड्यंत्र को नष्ट नहीं किया गया, तो निश्चित रूप से आदिवासियों का भविष्य अंधकारमय ही होगा। आइए सभी आदिवासी जागें एवं भाजपा/आरएसएस की चाल को बेनकाब करने की कसमें खा लें।


संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...