Monday, 18 August 2014

“A B O A K̕”

Oka do̱ “aboak̕” ar oka do̱ “onkoak̕”? Noa beoṛa sạri-sạrite bujhạu, unạk̕ alga katha do̱ baṅ kana. Onko do̱ ic̕ uru leka ṭhelaok̕tege menak̕koa je noa do̱ “aboak̕” kana, onate noage beohar jạruṛa. Himạl buru lekan kukli do̱ niạge je ce̱ť lekate ona do̱ “aboak̕” hoyena ar cedak̕ “aboak̕ge” beohar jạruṛa? Mẽ̱t̕te ńe̱lo̱k̕ lekate aṅga puṭạk̕ kho̱n ńindạ gitic̕ hạbic̕ sui kho̱n e̱ho̱p̕kate haḍga jahaj hạbic̕ sanamak̕ ma “onkoak̕ge” beoharok̕kan, ar tãhã no̱ṇḍe̱ do̱ “aboak̕” beohar reak̕re cedak̕ unạk̕ jo̱bo̱rjạsti do̱?

Sạriak̕tem me̱nlekhan noa “aboak̕” ar “onkoak̕” reak̕ lạpạṛhại calak̕kan reak̕ karo̱n (re̱he̱ť) do̱ ar eṭak̕re menak̕a. Ar ona karo̱n noa sadharo̱n mẽ̱t̕kinte do̱ baṅge ńe̱l oromok̕a, bicko̱m, ona do̱ ńe̱l oromok̕a sạri ạkil reak̕ mạli marsalte. Mit̕ nạmuna lạikate ona beoṛa do̱ bujhạu reak̕bon kurumuṭuia. Ar ona nạmuna do̱ noa leka - Mit̕ṭe̱n Ho̱ṛ oṛak̕ kana. Ona oṛak̕re bar boeha menak̕kinạ. Unkin boeha koṛa do̱ ạḍi jumit̕re menak̕kinạ. Onate jãhãe bạirige unkin do̱ ce̱t̕ge baṅko to̱tho̱c̕ daṛeạkinkana.

So̱mo̱e ạcurok̕ sãote unkin modre mit̕ boeha do̱ o̱lo̱k̕-paṛhaok̕e cet̕ idikeda. O̱ko̱e boeha o̱lo̱k̕ ạkile hame̱ṭkeť, uni do̱ cạkrire hõ̱e bo̱lo̱ena. Cạkri me̱nte uni do̱ oṛak̕ kho̱n oḍokok̕ hoyentaea. Ar oṛak̕re do̱ ac̕ huḍiń boehae bạgi oṭoadea. Me̱nkhan, o̱ko̱e boeha oṛak̕re menae dukre-bipo̱tre, re̱ṅge̱c̕re-tetaṅre jaogeye go̱ṛo̱ idiaekana. Unkinak̕ jibo̱n lạukạ do̱ ạḍi suk ar mulukte calao idik̕kan tahẽ̱kana.

Khan bạirikoak̕ mẽ̱t̕ do̱ unkin Ho̱ṛ boehawak̕ jumi-hasare kiṛbit̕ena. Ạḍi lekate onko bạiri do̱ unkin boeha koṛawak̕ jumi hatme reak̕ko kuṛpaṛkeda. Me̱nkhan, cạkrikan boeha mẽ̱t̕ marsale tahẽ̱kan iạte kạnun lekate ạkinak̕ jumi-hasa bạiri kho̱n rạkhi jogaore ac̕ boehae go̱ṛo̱ idiaekan tahẽ̱kana.

Bạiriko do̱ unkin boeha koṛawak̕ ranajo̱ṭ ńe̱lte ạḍi thar-thrao arko bo̱to̱rena. Bujkedako, je tin hạbic̕ nukin boeha koṛawak̕ ranajo̱ṭ baṅ rạpudok̕a, un hạbic̕ nukinak̕ jumi-hasa hatme do̱ muskil hataṛgea.

Nukin boeha koṛaren bạiri akoak̕ buddhiko lagaokeda. Buddhi me̱nte do̱ niạge je nukin boehawak̕ jumit̕te̱t̕gebon rạput̕lege. Ar ona buddhi do̱ sidhạ kathate - Divide and rule (फूट डालो और राज करो, Hạṭińem ar Rajok̕me) reak̕ phạrmulako apnarkeda.

Ona phạrmula lekate onko bạiriko do̱ o̱ko̱e oṛak̕rege menae boehawak̕ luturre ạḍi lekan ạuṛi-sạuṛi kathako lại pe̱re̱c̕adea. Uni cạkrire menae boeha birudre ạḍi lekan sea-sĩṛĩc̕ kathate uniak̕ luturko tube̱t̕ pe̱re̱c̕keda. Uniko lạiaekana je nõ̱k̕õ̱e am do̱ jumi-hasarege odoe-balbalem khaṭaok̕kana, ar uni do̱ ho̱e-batas bijli marsalreye tahe̱nkana. Uni do̱ Iṅgrạjite hõ̱e ro̱ṛ daṛeak̕kana, mõ̱ńj-mõ̱ńj kicric̕-khạṇḍuạk̕e ladeyet̕kana ar onkage oka lekate cạkri boeha cetan hirkhạ janamae, onkan kathate uni raṅgaok̕ lạgit̕ko uskur idiyedea. Nunạk̕ hạbic̕ko lạiaekana je uni mae cạkrikan, onate amak̕ jumi-hasare uniak̕ do̱ cc̱t̕ ho̱kge bạnuk̕taea. Onkage ar emanteak̕.

Oka “aboak̕” reak̕ katha ro̱ṛogo̱k̕kan, ona ma maṛaṅre Santali lipire lagao lahalen. Nit cedak̕ eṭak̕ko hõ̱ akoak̕ o̱lo̱k̕ dharakore resultant vowelre (gạhlạ ṭuḍạk̕ - akho̱r latarre ṭuḍạk̕ - .) ko lagaoet̕kana? Nạmuna - ạ, आ़ eman. ...

Mucạt̕re niạge je namjạdi Santal Hul o̱kte̱re Ho̱ṛ ho̱po̱nre oka jumit̕te̱t̕ tahẽ̱kan, ona jumit̕te̱t̕ (ranajo̱ṭ) rạput̕ giḍikak̕ lạgit̕, noko Ho̱ṛren bạiri do̱ tinạk̕ hạbic̕ko calao daṛeak̕a, unạk̕ hạbic̕ko calak̕a, je̱mo̱nko gulạm daṛeako.

Nạmuna pase̱c̕ unạk̕ do̱ baṅ jothatlen, me̱nkhan, oka “Hạṭińem ar Rajok̕me” reak̕ phạrmula kan, ona do̱ sạrigea.

Nạbi katha do̱ niạge je judi Ho̱ṛ ho̱po̱nko o̱kte̱ tahe̱nre baṅbon ạkilok̕a, to̱be̱ aboak̕ mo̱ro̱n do̱ khạṭi utạrgea.

Saturday, 19 January 2013

CETE REAK̕ TOPOT̕?

Cete reak̕ topot̕?
Cete reak̕ kạphạri?
Cete reak̕ be̱ne̱-bạiri?
Mit̕ ṭhenlaṅ kucạlena,
Mit̕ toalaṅ je̱mbe̱t̕len,
Haere hae dhạrtire do̱!
Balaṅ saho̱p̕len.
Nagam reak̕ anacurre,
Apat̕enlaṅ, begarenlaṅ;
Nagamiạko sạbit oṭokat̕,
Amaṅ ro̱ṛ, amaṅ rạṛ,
Le̱ske̱˗be̱ḍe̱r bo̱ḍe̱yen,
Deko sãote ghar˗ghạrien,
Kabra koṭha gabaoen,
At̕kedam amak̕ oprom,
Pheraoenam bardũṛũc̕re,
Dạlil noa baṅgem aṅgo̱c.
Saṅge ale boeha amren,
Taseyenle, tarseyenle,
Goṭa Nepal, Baṅglade̱s,
Mit̕getale ro̱ṛ˗landa,
Mit̕getale e̱ne̱c̕˗sereń.
Sạri noa nạthien,
Giyạrso̱nak̕ bạhire.
Sạkhi kanae nagam,
Mẽ̱t̕ marsal baṅre hõ̱,
Ńe̱ńe̱lkoak̕ ho̱ṭo̱rlet̕le mẽ̱t̕,
To̱be̱te̱ṛo̱ṅ HUL niạ,
Mit̕ judạ disom sirjạulena.
Jumi niạge HUL do̱ baṅ,
Pạrsi HUL hõ̱ salgaolena,
Ona reak̕ bijir˗bilis,
Pạrsi baganre bahaena,
Nana ro̱ṅan saṛ bahako.
Baṅ kana re̱pe̱c̕ ciki reak̕,
Baṅ kana kạphạri lipi reak̕,
Amaṅ ro̱ṛ, amaṅ landa,
Sạgunkok̕ ma amaṅ racare.
"Cupud sumuṅ jivi abinag,
Cag do abin galoceda?
Saṅgi hoṛre ladi lagid,
Abinag ona bagaṛ Santaṛi."
Dho̱ro̱m reak̕ ạphim sãote,
Cak̕ do̱m ghaṇṭaet̕ o̱l cemed?
Jumi˗jagako lilạmet̕kan,
Era˗ho̱po̱nko santaoet̕le,
Onko sãote cak̕ do̱ haere,
“Mit̕ gaṇḍo, mit̕ mạci.”
Dinạ-rate go̱so̱ṅ-go̱so̱ṅ.
Amaṅ racare amaṅ akhṛa,
Ińaṅ racare ińaṅ akhṛa,
To̱be̱rege akhṛa sohanok̕.
Bạrphại menak̕ onarege,
Suluk̕ seteńok̕ onarege,
Balaṅ topot̕ boeha kanlaṅ,
Bạiri de̱ ma oromkolaṅ,
Bạiri baṅkhan merel-merel,
Jaejug lạgit̕ bhaṇḍankalaṅ.

Sunday, 30 June 1996

मैं आ रहा हूँ : हूल 

भादो का महीना। बेला गोधूली। कभी धूप तो कभी छाँव। मौसम के मिजाज के बारे किसी को नहीं मालूम। राजमहल की पश्चिम दिशा पहाड़ियों से आच्छादित। उस पर्वतमाला के ऊपर कारे-कारे बादल मंडरा रहे थे। ठीक उसी समय चरवाहे अपने मवेशियों को घर की तरफ हाँकने के लिए तैयारी कर रहे थे। गाँव की बालाएँ पनघट से पानी लेकर लौट चुकी थी। सनसनाती हवाओं ने आँधी-तूफान का रुप ले लिया। आकाश में बिजली चमकी और उमड़ते-घुमड़ते बादल के खंड एक दूसरे से टकराने के बाद हड़ हड़ाने की आवाज के साथ ही आसमान गूँज उठा। बारिश तो नहीं पर बूँदा-बूँंदी की वजह से धरती जरुर गीली हो गई। कृषक व खेतिहार मजदूर खेत-खलिहान से घर की ओर लौट चले। पक्षी दिनभर की मेहनत के पश्चात् अपने डेरे आ चुके थे। बस्ती में फूस के छप्परों पर धुआँ ही धुआँ दिखाई देने लगा। आसमान ने चुप्पी साध ली। क्षितिज में अँधेरा छा गया। फिर घनघोर अँधियारे ने गाँव-बस्ती को अपनी आगोश में ले लिया। थोड़ी देर में पुनः बादल-बिजली की टकरोपरांत एक अनहोनी आकाशीय आवाज गूँज उठी -  मैं आ रहा हूँ ... मैं आ रहा हूँ ... मैं ...। मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कहाँ से आ रहा हूँ? मेरा परिचय देने की जरुरत नहीं। जब भी आपने मुझे याद किया है, मैं आपके दरवाजे पर हाजिर हुआ हूँ। किसी जमाने में तिलका मुर्मू, बुधू भगत, सिदो मुर्मू, बिरसा मुंडा आदि के आह्वान पर मैं अलग-अलग रुपों में उनकी सेवा में हाजिर था। पर अब मैं आपकी उपेक्षा के कारण अज्ञातवास का जीवन जी रहा हूँ। मैं मानवप्राणी नहीं, जो परलोक के बाद इस संसार पर आ नहीं सकता।

मैं आऊँगा ... और निश्चित रुप से आऊँगा। एक बार नहीं, हजार बार आऊँगा। मेरा कोई अमीर दोस्त नहीं। उनसे मेरा दूर-दूर तक कोई रिश्ता भी नहीं। मेरा उनसे साँप-नेवले का संबंध है। मैं गरीबों का मसीहा हूँ। मेरा स्मरण करो और मैं आपके सम्मुख हाजिर हूँ। इतनी जल्दी मुझे भूल जाओगे, मुझे आशा नहीं थी। मैं कौन? मस्तिष्क पर जोर दो। याद करो कुर्बानी सन् 1855 की। स्वतंत्रता संग्राम की पहली जयघोष। मुझे नहीं भाता राजकीय शानो-शौकत। मुझे नहीं चाहिए मखमल की चादर। जरुरत नहीं सोने के चम्मच की। तमसी भोज्य से है मुझे नफरत। धिक्कार है राजसी ठाट-बाट की। मैं पसंद करता हूँ पैदा होना ढिबरी तले छोटी-सी कुटिया में। सुनना चाहते हो मेरी आत्मकहानी? सुनो, बताता हूँ मैं स्वयं अपनी जुबां से।

आज से ठीक 153 वर्ष पूर्व की कहानी है। पूरा प्रदेश झाड़-जंगलों की चादर से लिपटा हुआ था। वन्य प्राणियों का साम्राज्य था उस पर। कौन से जानवर नहीं थे उस वन-जंगल में? दुनिया के तमाम जंगली जानवरों का बसेरा था। तीतर-बटेर से लेकर डायनासॉर की प्रजाति थी राजमहल की पहाड़ियों पर। बड़े.बड़े फलदार वृक्ष, कंद-मूल और सुगंधित फूलों से सजा वन-उपवन। नदी-नाले और झर-झर करते झरनों का है उद्गम। दूर-दूर तक मानवगंध उपलब्ध नहीं। लेकिन छोटी-छोटी टोलियों में आदिमानव जरुर थे। यह छोटी सी जनसंख्या राजमहल पहाड़ी के उत्तरी हिस्से में निवास कर रही थी; जो बाद में मालेर (माले/सावरिया पहाड़िया) जनजाति के रुप में पहचानी गई। यह वही प्रदेश है; जिसे आज आप संताल परगना के नाम से जानते हैं।

देश में फिरंगियों का साम्राज्य था। आश्चर्य की बात! मुट्ठी भर अंग्रेज पूरे देश के मालिक बन बैठे थे। उनके बगैर आदेश पेड़ के पत्ते भी नहीं हिलते। भारतीयों की बोलती बंद थी। कौन बाँधे बिल्ली के गले में घंटी? अठारहवीं सदी का आखिरी पड़ाव। जंगल साफ करने में निपुण संताल आदिवासी। वे कर्मयोगी, कर्मठ और कुशल थे। उनकी रग-रग में सत्य और ईमानदारी की प्रतिछवि थी। वह प्रकृति का प्रेमी और माराङ बुरु का पुजारी था। माँदर की थाप पर वह बेसुध रहनेवाला प्राणी था। अंग्रेजों की उन पर नजर पड़ी। अंग्रेजों ने इन आदिवासियों को मूलतः जंगल साफ करने के लिए ही बीरभूम, मिदनापुर, मानभूम, धालभूम और हजारीबाग आदि जगहों से आमंत्रित किया। मेहनत के धनी ये आदिवासी जंगलों को एक छोर से साफ कर रहे थे और साथ-साथ अपना ठौर भी बनाते जाते थे। बदले में जमीनदारों के मार्फत सरकार को कर अदा करते। जमीन जरुरत से ज्यादा उपजाऊ थी। अतः थोड़ी मेहनत से ही अत्यधिक फसल होती थी। हँसी-खुशी और हर्षोल्लास के साथ समय बीत रहा था। आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत हो रहा था। पर यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिक न पाई। खुशियों भरे जीवन पर जल्द ही ग्रहण लग गया था।

आदिवासियों का संताल परगना में प्रवेश करने के थोड़े ही अंतराल में मुट्ठी भर विदेशी यथा पूरब से मोईरा बंगाली और पश्चिम से भोजपुरियों (बिहारियों) का आगमन हुआ। देशी भाषा में इन विदेशियों को दिकु नाम से पुकारा जाने लगा। बंगालियों ने महाजनी व बिहारियों ने फेर-बेपारी का धंधा शुरु कर दिया। तेल-नून व कपड़े-लत्ते के चक्कर में पूरा आदिवासी समाज ऋण में फँसता चला गया। सूद इतना ज्यादा कि आदिवासी पीढ़ी दर पीढ़ी गुलामी व बेगारी खटने के लिए मजबूर हो गए। आदिवासियों को बीस तक गिनती न आती थी। ऋण के चंगुल में सोना उगलती जमीन, गाय-बैल व मासूम स्त्री-बच्चे सब बिकते चले गए। भारी भरकम मालगुजारी ने भी इनकी कमर तोड़कर रख दी। महाजन व जमीनदारों ने जी भरकर आदिवासियों को लूटा। अत्याचार की सारी सीमाएं लाँघ दी गई। चारों ओर हाहाकार मच गया। भागलपुर और जंगीपुर में स्थित कचहरी आदिवासियों की पहुँच से बाहर की बात थी। अतः वे न्याय से कोसों दूर हो गए। आदिवासी लोग अनपढ़ के साथ-साथ भाषाई समस्या से भी अत्यधिक पीड़ित थे। वे परेशान हो उठे थे, झूठ की व्यापकता, साहबों (अंग्रेज प्रशासकों) की लापरवाही, महाजनों की लूट-खसोट, आमला-पियुनों के भ्रष्टाचार एवं पुलिसों के अत्याचार से।

आदिवासी दुःख के इन पहाड़ों को देखकर चिंतित हो उठे। फिर मैंने इनकी कोख में धीरे-धीरे पनपना शुरु कर दिया। समाज के माँझी-परगना नींद से जाग उठे थे। गाँव-गाँव में कुल्ही दुड़ुप् (ग्राम सभा) करने का आयोजन शुरु हुआ। गाँव के तमाम रैयत उस सभा में शामिल होते और उस सभा में समाज की दशा और दिशा तय करते। कैसे हो समाज का उद्धार? कैसे हो अत्याचारियों से मुक्ति? कैसे हो शेरों के जबड़ों से छुटकारा? इन तमाम समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए लोग उतावले हो उठे। चारों ओर वैचारिक क्रांति की आग सुलग गई। मुक्ति का एक ही उपाय, एक ही राह बची - हमारा गाँव, हमारा राज कायम करना। इतना कुछ होने तक मैं इस धरा पर पदार्पण कर चुका था। मैं प्रत्येक आदिवासी के दिलोदिमाग में प्रवेश कर गया था। आदिवासियों ने अपना राज कायम करने की ठान ली थी।

तभी संताल परगना के पूर्वी छोर में रेल लाईन बिछाने का कार्य शुरु हुआ। ऋण से दबे आदिवासी क्या करते? वे अपना घर-बार छोड़कर टिड्डी की भाँति काम की तलाश में निकल पड़े। सपरिवार रेल बिछाने की मजदूरी में जुट गए। अनाप-शनाप मजदूरी मिली पर महाजनों की धोखाधड़ी और कपट चाल के कारण ऋण की अदायगी न हो पाई। इसके विपरीत रेलवे के इंजीनियर, ठेकेदार एवं मुंशी वगैरह आदिवासी बालाओं को बुरी नजरों से घूरने लगे। माँ-बहनों की इज्जत से कोई खिलवाड़ करे, आदिवासियों से रहा न गया। उनका खून खौल उठा और उनसे बदला लेने की कसमें खाने लगे।

माँझी-परगनाओं की बैठकों में लिए गए निर्णयानुसार; अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लिखित माँग पत्र तैयार किया गया और उनकी प्रतिलिपि सारे संबंधित मैजिस्ट्रेटों को भेज दी गई। महीनों बीत जाने के बाद भी इस पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नजर नहीं आई। फिर मौखिक रुप से शिकायत करने के लिए माँझी-परगना के प्रतिनिधि मंडल ने जंगीपुर, देवघर और भागलपुर का दौरा किया। वहाँ भी कोई सुनवाई नहीं हुई। अंत में कोई उपाय न देखकर आदिवासी लोग सब से बड़े हकीम/लाट साहब, जिसका पदस्थापन कोलकाता में था, उनसे भेंट करने हेतु पैदल मार्च करने के लिए मजबूर हो गए। लॉर्ड वायसराय के पास पहुँचकर आदिवासियों ने जी भरकर रोते हुए अपना दुःखड़ा सुनाया पर उनकी आपबीती पर उसे भी कोई दया न आई। उनके कान में जूँ तक न रेंगी। इतनी दूर से शिकायत लेकर जाने पर तो शायद भगवान भी पसीज जाते पर चुरूट की कस लेने में मशगूल लाट साहब अपने में ही मस्त रहे। बेचारे आदिवासी मुँह लटका कर खाली हाथ घर वापस आ गए।

आदिवासियों को साफ दिखाई दे गया कि अब उनके लिए कहीं से कोई न्यायोचित इंसाफ की आस नहीं। उनके लिए न्याय के सारे दरवाजे बंद हो चुके थे। अब मैं जवानी की दहलीज पर खड़ा था। अंतिम उपाय के रुप में लोग मेरी ओर आशाभरी नजरों से देखने लग गए। जैसे, मैं ही हूँ उनका एकमात्र मुक्तिदाता। अब आप जानना चाहोगे मेरा नाम? आदिवासियों ने मेरा नामकरण किया हुआ था "हूल"। हूल शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई, यह अब भी रहस्य बना हुआ है। मुंडारी भाषा समूह के भाषाविद् भी इस शब्द की परिभाषा देने में असमर्थ रहे हैं। इस शब्द का शाब्दिक व साहित्यिक अर्थ समझाने में भी वे विफल रहे हैं। दुनिया की किसी भी भाषा में इसका सटीक अर्थ उपलब्ध नहीं। संक्षेप में हुल का मतलब ऐसा भी हो सकता है - जब इंसाफ के लिए न्याय के सारे दरवाजे जानबूझ कर बंद कर दिए जाएँ; तो न्याय पाने के लिए जो कार्रवाई की जाती है; उसे हूल कहा जाता है। बताते चलें कि इस शब्द का उपयोग इतिहास में सिर्फ एक ही बार हुआ है। वह है संताल हुल - 1855। भविष्य में इस शब्द का कभी उपयोग होगा, संदेह है। हिन्दुस्तानी में हूल शब्द रिश्ते में विद्रोह, बगावत, बलवा और क्रांति के दादा जी हैं।

नादान और भोले-भाले आदिवासियो की ऐसी नाजुक हालत देखकर मारांङ बुरु (सिंग बोंगा) की आँखों में आँसू आ गए। उसने भोगनाडीह के चुनू मुर्मू के सुपुत्रों सिदो, कान्हू, चाँद और भैरो को अलग-अलग रुपों में सात बार दर्शन दिए। वरदान देते हुए उसने उन्हें अपना राज्य स्थापित करने का आदेश दे दिया। फिर क्या था? चारों दिशाओं में शाल-पत्र व नगाड़े की धुन द्वारा भोगनाडीह में 28-30 जून, 1855 को एक विराट आमसभा आयोजित होने की सूचना दी गई। 30 हजार की भारी भरकम जनसंख्या ने अपने परंपरागत हथियारों से लैस उस आमसभा में शिरकत किया। तीन दिनों तक चली आमसभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि मारांग बुरु के आदेशानुसार अब एक ही उपाय रह गया है - हूल का प्रारंभ करना। मारांङ बुरु ने यह भी आदेश दिया है कि हूल का श्रीगणेश करने के लिए वह एक संकेत देगा। इस आमसभा में भी कई प्रस्तावना पारित किए गए एवं 15 दिनों का समय देते हुए, उसे संबंधित मैजिस्ट्रेटों को माँग-पत्र के रुप में भेज दिया गया। मैं अब प्रत्येक आदिवासी के जेहन में प्रवेश कर गया था। स्त्री हो या पुरुष, बच्चे हो या बूढ़े, सब के दिमाग में मैं घर कर गया था। चारों ओर मेरी और सिर्फ मेरी ही चर्चा होने लगी थी। मैं बिल्कुल तैयार बैठा था। सिर्फ इंतजार था तो उस शुभ संकेत का, जिसे मारांङ बुरु ने बताया था। आखिरकार, वह शुभ घड़ी आ ही गई। 7 जूलाई, 1855 को अत्याचारी केनाराम भगत की मिलीभगत से कुछ बेगुनाह आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया था। कुख्यात दरोगा महेश लाल दत्ता बरहेट के रास्ते उन कैदियों को भागलपुर जेल ले जा रहे थे। पाडेरकोला के शाम (टुडू) परगना ने उन बेकसूर आदिवासियों को छुड़ाने की भरसक कोशिश की। लेकिन वे असफल रहे। हुल के चाणक्य कहे जाने वाले शाम परगना ने विवेक से काम लिया एवं तत्क्षण एक तेजधावक युवक को भोगनाडी इसलिए दौड़ा दिया ताकि वे सिदो-कान्हू को इस घटना की सूचना दे सके। यही माराङ बुरु का संकेत है; सिदो मुर्मू को समझने में कोई देर न हुई। उसने खतरा-संकेतिक नगाड़ा बजाने का आदेश दे दिया। तड़के भोर होते ही हजारों लोग बरहेट के समीप पाँचकठिया में एकत्रित हुए, क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि महेशलाल दरोगा इसी रास्ते से होकर कैदियों को भागलपुर ले जाएंगे। मुर्गे की दूसरी बाँग होते ही महेश लाल महायोद्धा की तरह खुद घोड़े पर सवार उन कैदियों को चाबुक से हाँक रहे थे। साथ में केनाराम भगत अन्य बरकंदजों के साथ चल रहे थे। महेश लाल दरोगा पाँचकठिया वट वृक्ष के नीचे हजारों की भीड़ देखकर सहम गए। उसे माजरा समझ में न आया। सरकारी रोब दिखाते हुए उसने भीड़ को चीरते हुए कैदियों को आगे ले जाने की हिम्मत जुटाई पर सामने कान्हू मुर्मू की दहाड़ सुनकर वे सिहर उठे। दरोगा को काटो तो खून नहीं।

गरमागरम बहस में कान्हू मुर्मू ने चिंघाड़ते हुए दरोगा से कहा - "यह मेरा देश है और ये मेरी प्रजा हैं। इन्होंने कोई गुनाह नहीं किया है। अतः इन्हें बाइज्जत रिहा कर दो।" पर दरोगा अपनी जिद पर अड़े रहे और सरकारी काम में बाधा डालने वाले को सख्त से सख्त सजा देने का फरमान सुना दिया। तब तक भीड़ में से किसी ने गरभू देशमाँझी जो कैदियों में से एक था की हथकड़ी खोल दी। हथकड़ी खुलते ही गरभू देशमाँझी ने भीड़ के किसी व्यक्ति से फरसा छीनते हुए आव देखा न ताव; अपने जानीदुश्मन केनाराम भगत पर वार कर दिया। गरभू देशमाँझी ने मेरा नाम अर्थात् हूल ... हूल का हुंकार भरते हुए केनाराम भगत का सिर धड़ से अलग कर दिया। एकत्रित भीड़ बाकी कैदियों को भी छुड़ाते हुए दरोगा महेश लाल और उनके सहयोगियों पर टूट पड़ी एवं उनकी हत्या कर दी। सुबा ठाकुर सिदो मुर्मू ने हुल का एलान कर दिया। उसने आदिवासी सैनिकों को आदेश दे दिया कि जो अत्याचारी हैं, उन्हें तलवार की धार दिखा दो एवं जो इन्हें बचाने आएगा, उन्हें अपने देश से बाहर खदेड़ दिया जाए। आदिवासी सैनिकों और अंग्रेज सिपाहियों के बीच घमासान युद्ध हुआ। हुल थमने का नाम नहीं ले रहा था। चारों दिशाओं में आदिवासी सैनिकों का परचम लहरा रहा था। मजबूर होकर अंग्रेज प्रशासकों को 10 नवंबर, 1855 को मार्शल लॉ लागू करना पड़ा। तब तक हुल के महानायक सिदो मुर्मू को छलपूर्वक गिरफ्तार किया गया और उन्हें अपने जन्मस्थल भोगनाडीह मेें तत्कालीन सुपरिन्टेन्डेंट जेम्स पोन्तेत द्वारा भारी भीड़ के सामने फाँसी दे दी गई। हुल में आदिवासी सैनिक बेशक हार गए पर वे अपना लक्ष्य प्राप्त करने में विजयी रहे। महानायक सिदो मुर्मू एवं 60 हजार आदिवासी सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। पर उन शहीदों के खून से आदिवासियों के लिए एक अलग प्रदेश संताल परगना का गठन 22 दिसंबर, 1855 को कर दिया गया। जहाँ आदिवासियों को स्वशासन की पूरी छूट दी गई। इस तरह मैं अपने मिशन में कामयाब हो गया।

वक्त बदलता गया। आदिवासी अपनी मस्ती में सारे होश खो बैठे। अपना मतलब पूर्ण होने पर मैं अंडे के छिलके की तरह फेंक दिया गया। कुछ ही वर्षों के बाद शनैः-शनैः आदिवासियों की हालत फिर बिगड़ती गई। कुख्यात दरोगाओं और अत्याचारी महाजनों का पुनर्जन्म होने लगा। आदिवासियों को फिर वही अंग्रेज काल की दशा झेलनी पड़ गई। मारांङ गोमके और दिशोम गुरु का उदय हुआ भी, पर आदिवासियों की हालत जस की तस बनी रही; क्योंकि बारंबार मेरी भ्रूण हत्या हो रही थी। कोई जोड़ा बैल में जुड़ रहा था तो कोई साढ़े तीन करोड़ में बिक रहा था। और तो और सिंग बोंगा द्वारा प्रदत्त झारखंड प्रदेश की रक्षा करने में आदिवासी विफल रहे। आदिवासियों की इस तरह बिगड़ती हुई हालत देखकर मुझे दया आ रही है। आदिवासियों को बचाने हेतु मैं पुनः आऊँगा। इंतजार है, तो बस उस 30 जून का, जिसमें सर्वसम्मति से हूल करने की घोषणा की जाएगी।

Wednesday, 17 August 1994

ग्वाला कभी अपने दही को खट्टा नहीं कहता है

एक जमाना था। जिनके पास घड़ी, रेडियो और साईकिल हुआ करता था; उन्हें आज के लाखपति से कम नहीं आंका जाता था। यह घटना करीब 50 वर्ष पुरानी है। आँखों देखी और भुगती हुई घटना है। लेकिन तब उतनी समझ न थी। पर आज वह दृष्टांत साफ-साफ समझ में आ गया। आखिर ऐसा क्यों हो रहा था?

संतोष रेडियो - सस्ता और टिकाऊ । यह भी तब बहुत कम लोगों के पास हुआ करता था। गाँव हो या शहर, खासकर संतालों को शाम 6.00 बजे का बड़े ही बेसब्री के साथ इंतजार रहता था। सबों के लिए यह शाम 6.00 बजे का समय बड़ा ही माफिक था। गाँव के किसान हों या शहर के बाबू, सभी अपने काम से घर को लौट आते। सभी के पास फुर्सत ही फुर्सत था। शाम 6 बजते ही बिन बुलाए गाँव के छोटे-बड़े सभी मास्टर जी के “पिण्डा़” (घर का बाहरी हिस्से में बैठने की जगह) में एकट्ठे होते थे, क्योंकि उनके पास संतोष रेडिया था। मास्टर जी भी रेडियो को टनाटन रखता थे। बैटरी खत्म होते ही उसमें नई बैटरी डाल दिया करते थे। अरे, 6 बज गया! रेडियो फुल साउंड। “... आकाशबा़नी कोलकाता। खा़ेबो़र ... खो़बो़र पाड़हावेत्आ़ञ हो़रो़ प्रसाद मुर्मू ... तेहेञ मालदो़ रेयाक् ... डा़हीरे सिरा़मंत्री  ...तेकिनकिन ला़ईकेत्आ जे तिरला़ हो़पो़नको ... उनकिन दो़ आ़किनाक् गालोचरे ... । खो़बो़र पाड़हाव दो़ नो़ण्डेगे मुचा़त्एना ...।”

“खो़बो़र मुचा़त्एना” सुनते ही बच्चे तो बच्चे बड़े बुड्ढों की मानो सांस में सांस आ गई हो। खबर की गाथा तो उनके पल्ले कुछ न पड़ी। पर जिस घड़ी की इंजतार में सारा गाँव इकट्ठा था, वह आखिर आ ही गई। “... नितोक् दो़ मित्टेन सेरेञबोन आञजो़मा। सेरेञत्आको राम किस्कू आर साँवतेनको ... ।”

पिन ड्रोप साइलेंस! सुनने वालों की दो तो क्या चार-चार कानें खुली हुई हैं। सभी सांस थामकर महान गायक राम किस्कू के गाने का आनंद ले रहे हैं। मानो, वे जन्नत का सैर कर रहे हों। राम किस्कू का गाना खत्म। अब रेडियो पर जैसे ही ... “हें हों... हें ... हों ...” शुरु, धीरे-धीरे भीड़ छंटनी शुरु। एक पल भी नहीं गुजरा कि अब मास्टरजी अकेले अपने संतोष रेडियो को निहार रहा है। मानो, किसी की मैयत में बैठे हों!

मास्टरजी क्या करते? 6 बजने से पहले तो बच्चे वगैरह बड़े बुजुर्गों के लिए घर से दो-चार कुर्सी बाहर उठा लाते थे। अब वहाँ कोई भी नहीं। मास्टरजी अब खुद ही उन कुर्सियों को घर के अंदर ले जाते।

यह घटना आज से करीब 50 वर्ष पुरानी है। यह घटना क्यों हो रही थी? घटना क्या बताना चाह रही थी? आज जिनकी उम्र 55 वर्ष पार कर रही होगी, उन्होंने इस घटना को न सुना हो, ऐसा कदापि नहीं हो सकता है। बल्कि उन्होंने इस घटना को भुगता जरुर होगा। उनसे तो अपेक्षा है ही; बाकी आप जो भी इस सवाल को पढ़ रहे हों, कृपया इस सवाल का जवाब शेयर करने की चेष्टा करें। वरना, समझा यही जाएगा कि भैंस के आगे बीन बजावे, भैंस रही पगुराई।

सवाल टेढ़ा जरुर है, पर इसी में ही वर्तमान परिस्थिति का जवाब छिपा हुआ है। 

Sunday, 14 August 1994

ग्वाला कभी अपने दही को खट्टा नहीं कहता है

सच पूछो, तो उस कहानी का माजरा आज इस बुढ़ापे में समझ में आया। हो सकता है; समझने में कोई गलती हुई हौ। क्योंकि दृष्टि, सोच, समझ, नजर सबकी अलग-अलग होती है। किसी विद्वान ने सही कहा है कि सत्यवादी हमेशा सच ही बोलता है, पर सुनने वाले इसे गलत समझें, तो इसमें सत्यवादी का क्या कसूर? हर मानव प्राणी सोचता कुछ है, और होता कुछ है। उस दृष्टांत की व्याख्या अलग-अलग हो सकती है। उस समय संताली रेडिया सुनने का क्या ही क्रेज था! अब चूँकि पूरी दुनिया आपके हाथ में सिमटी हुई है; इसलिए आप उस क्रेज की बात को समझ नहीं सकते हो। जिस तरह हम हूल की घटनाओं को समझ पाने में असमर्थ हो रहे हैं; उसी तरह आज के बच्चे उस कथित घटना के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। लेकिन यह आँखों देखी घटना है, कोई कपोल कल्पना वाली बात नहीं है। आहा! क्या क्रेज था! मानना पड़ेगा! उस दृष्टांत के बारे में जरा सोचो; मास्टरजी, उसका संतोष रेडियो (“हार की जीत” वाला बाबा भारती का घोड़ा सुल्तान से कम न था), गाँव के श्रोतागणों का हुजुम; राम किस्कू का गायन, फिर हें...हों...शुरु होते ही श्रोताओं का पतली गली से खिसक जाना, आज भी प्रासंगिक है। हाँ, इसमें काल, दृश्य, पात्र, पटकथा समय के हिसाब से अवश्य बदले गए हैं। कहानी वही है। सिर्फ हमारी समझ का फेर है।

उपरोक्त दृष्टांत को एक सेेकेंड में समझा जा सकता है। उत्तरी संतालीभाषियों (खासकर संताल परगना निवासियों) से एक निवेदन है; हाथ में एक एण्ड्रोयड फोन लिया जाए। युट्यूब में किसी भी एक बुगड़ी गाने को सुना जाए। अगर शुद्ध संताल परगनावासी होगा, तो वही मास्टरजी की संतोष रेडियो वाली कहानी हो जाएगी। “हें...हो़ं ...” शुरु और युट्यूब निश्चित रूप से बंद हो जाएगा एवं श्रोता पतली गली से खिसक लेगा। इसी कहानी को समझाने हेतु आप एक काम करना। भावी साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता “सिपाहीजी” को बुगड़ी भाषा में लिखित कोई एक अच्छी-सी पुस्तक थमा दो। फिर उससे पढ़ने के लिए निवेदन करना। एक सेकेंड के लिए तो उसकी सांस फुल जाएगी। वह निश्चित रूप से धाराप्रवाह पढ़ने में असमर्थ होगा। सिपाहीजी जरुर सोचेगा - “कहाँ किस दलदल में फंस गया रे बाबा?” लेकिन समस्या वहीं अटक जाती है। हिदुत्व का अफीम खाए व्यक्ति - सरना-इसाई तो उसको करना ही है। संताल परगना के इसाई-सरना एक ही भाषा - संताली बोलते हैं। कितने उत्तर के लोग ट्राइब टी.बी, कलिंगा-फलिंगा बुगड़ी टी.बी चैनल देखते-सुनते हैं, मालूम नहीं। अपना तो उसका कोई क्रेज नहीं है। बाकी चीज छोड़ दो। कल ही दुमका गाँधी मैदान में उड़ीसा और संताल परगना के बीच एक लागड़ें नृत्य प्रतियोगिता का आयोजन करना। लिख लो, उड़ीसा की टीम शून्य में आउट हो जाएगी। हो सकता है, शायद जीरो देने की नौबत ही न आए, कारण संताल परगना के दर्शक वही हें...हों के चक्कर में नदारद ही रहे।

बुगड़ियों का रहन-सहन, बोली-चाली, भाषा-संस्कृति, धर्म-कर्म सबकुछ बदल चुका है। उनलोगों ने आर्यों के चक्कर में एक नई भाषा-संस्कृति को अपना लिया है, जिसका नाम है - संताड़ी। संताल परगना और उड़ीसा के संताल एक नहीं, बल्कि दो अलग-अलग समुदाय (संताल) हैं। लिपि विवाद पर दोनों कभी एक नहीं हो सकते हैं। दोनों को एक दूसरे का तर्क-वितर्क कतई मंजूर नहीं है। दोनों ग्वाला अपने दही को कभी खट्टा नहीं कहेगा। इस सच्चाई को और कोई नहीं बल्कि भारतीय भाषाई सर्वेक्षण के तात्कालीन महानिदेशक जी. ए. ग्रियर्सन ने अपनी रिपोर्ट में पहले ही लिख दिया है (Ref ; Linguistic Survey of India, Vol-IV page no. 32)। निष्कर्ष यही है कि मास्टरजी का संतोष रेडियो इस वक्त हर संताल प्रदेश में घुमाया जा रहा है। पर उत्तरी संताल उसे सुनने से ही इंकार कर रहे हैं। सच्चाई यही है। पर मास्टरजी का वह संतोष रेडियो उनलोगों के गले में जबरन टांगा जा रहा है। कुछ लोग अफीम के नशे में धुत हैं।

Friday, 21 August 1987

BHIḌI HARTA TẠRUP̕


Sedae do̱bon tahẽ̱kana Cại˗Campa gaṛ,
Cại˗Campa gaṛ do̱bon bạgiada rẹ.
Jạtgebon bo̱to̱rada gaṛ do̱ babon dayawať,
Cại˗Campa gaṛ do̱bon bạgiada rẹ.
De̱ntiń naego̱ sar˗kạpi,
De̱ntiń naego̱ yurmạl˗pạigạn.
Darahara Campa gaṛ,
Campa gaṛ do̱ń ropha ruạṛa.
Purub-pạchim bạiri bạbu,
Jhalmal-jhalmal darakokan,
Nato-ṭola disạmge do̱ ḍamaḍol,
Nato-ṭola disạmge do̱ hale ḍhaleyen.
Sedae lạṛhại sar-kạpi,
Nahak̕ lạṛhại kạli-ko̱lo̱m,
Kạli-ko̱lo̱m sar bạbu sajaome,
Kạli-ko̱lo̱m sar bạbu de̱ se̱ bojaome.
Bhiḍi harta bạiri bạbu,
Ho̱ro̱k̕akan huṛạt̕akan.
Bhiḍi harta bạiri bạbu jo̱ho̱r khurạni,
Bhiḍi harta bạiri bạbu bis suṅghạni.
Baṅko teraṅ sar-kạpi,
Baṅko he̱se̱y ho̱ṭo̱k̕ nạ̃ṛĩ.
Bo̱ho̱k̕ hataṅ mãyãmreko je̱mbe̱ť,
Jõ̱k leka mãyãmgeko cusạu nańje̱da.
So̱nto̱r so̱nto̱r so̱nto̱r bạbu,
Bhiḍi harta tạrup̕,
Bhiḍi harta tạrup̕ bạbu sagal-sagal, 
Bhiḍi harta bạiri bạbu noromkotam rẹ.

Friday, 20 August 1982

सूरज को दीया दिखाना

इतिहास में हमने पढ़ा है कि तेरहवीं सदी में एक मुगल बादशाह हुआ था। उसका नाम था मोहम्मद बिन तुगलक। बादशाह विद्वान तो था ही, पर कभी-कभी उसकी बुद्धि घास चरने चली जाती थी। वह कई भाषाओं का ज्ञाता भी था। एक दिन ना जाने उसे क्या सूझा, उसने दिल्ली में बनी-बनाई राजधानी को नजदीक के एक छोटा-सा कस्बानुमा तुगलाकाबाद में स्थानांतरण करने का फरमान दे डाला। इस फरमान से उसके राज-दरबारी एवं लाव-लश्कर को मानो सांप सूंघ गया। तमाम राजधानीवासी इस फरमान से नाराज हो उठे। बादशाह की इस बु़िद्धमत्ता पर प्रजा भी नाखुश थी। लेकिन बादशाह का हुक्म सिर आंखों पर। और एक दिन सुनहरी राजधानी दिल्ली से तुगलाकाबाद को उठ चली गई।

समय का चक्र घुमता गया। मोहम्मद बिन तुगलक ने नई राजधानी में अपने राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में चमड़े का सिक्का भी चलवा दिया। शायद नीयति को यह नई राजधानी पसंद न आई। तुगलाकाबाद में पानी की किल्लत होने लगी। साथ ही भयंकार अकाल भी पड़ गया। फिर क्या था? सुबह का भूला बादशाह शाम को वापस दिल्ली लौट चला।

कहीं ऐसा ही तो नहीं? कहीं हमारे आंगने में चमड़े का सिक्का तो जबरन नहीं चलवाया जा रहा है? जब सोने का सुनहरा सिक्का हमारे पास पहले से ही मौजूद है, तो फिर इस खोटे सिक्के का हमारे यहां क्या काम?

उनकी तरफ से लिपि के बारे में रटे-रटाए ये दो-तीन तर्क दिए जाते रहे हैं:- 1. यह ”आबोवाक्“ है; 2. रोमन इसाईयों की लिपि है; 3. रोमन से संताली नहीं लिखी जा सकती है; आदि।

इस संबंध में इतना ही कहना है कि उनके तर्क बेतुके हैं। उनके तर्क को सिरे से खारिज किया जाता है। उनके तर्क में कोई सिर-पैर नहीं है। विदित हो कि भाषाविज्ञान में लिपि एक गौण विषय है। अर्थात् भाषाविज्ञान में कई शाखाएं होती हैं, जिनके विष्वविद्यालयों में अध्ययन किए जाते हैं। उदाहरणार्थ - ध्वनिविज्ञान; पदविज्ञान; वाक्यविज्ञान; अर्थविज्ञान; प्रोक्तिविज्ञान; मनोविज्ञान-भाषाविज्ञान; इतिहास-भाषाविज्ञान; भूगोल-भाषाविज्ञान; समाजविज्ञान-भाषाविज्ञान। इन समस्त कार्यों में ध्वनिविज्ञान, रूपग्रामविज्ञान, अर्थविज्ञान एवं ऐतिहासिक-विज्ञान उसकी प्रत्येक पग पर सहायता करते हैं। वस्तुतः भाषा विज्ञान एवं कोश (निघण्टु एवं निरूक्त) एक दूसरे के पूरक हैं।

आइए, अब उनके बेतुके तर्क को ही देख लेते हैं:-

1. यह ”आबोवाक्“ है - किस संदर्भ में यह ”आबोवाक्“ है? रोजमर्रा के काम में आने वाली समस्त वस्तुएं तो उनकी हैं। सुबह से लेकर शाम तक उपयोग में आने वाली तमाम चीजें तो उनकी हैं। तुम्हारी कौन-सी चीज है? शायद तुम्हारी ईजाद की हुई एक भी चीज नहीं मिल सकती है। यह तुम्हारा कोरा बकवास है। यह लोगों को बरगलाने के सिवा कुछ नहीं है। अपनी लिपि को ”आबोवाक्“ कहना छोड़ दो, क्योंकि यह चोरी की हुई लिपि है।

2. रोमन इसाईयों की लिपि है - जब लिपि संबंधी तुम्हारे सारे तर्क निष्क्रिय कर दिए गए, तो अब धर्म-धर्म के खेल में उतर आए हो। किसी भी निर्जीव वस्तुओं का कोई धार्मिक रंग नहीं होता है। मनुष्यों में भी किसी का कोई धार्मिक रंग नहीं होता है, बल्कि हर मनुष्य इंसान होता है। याद रहे; भाषा और लिपि का कोई आंतरिक संबंध नहीं है। वाणी बोलने में लिपि की कोई आवश्यकता नहीं होती है। कितना ही हस्यास्पद है कि आपने तो अपनी लिपि को ही भाषा मान बैठे हो - ऑल चिकी भाषा। पहले भाषा इसके बाद ही लिपि का आविष्कार होता है। ऐसा कतई संभव नहीं है कि पहले लिपि, तत्पश्चात् भाषा की उत्पत्ति होती है।

3. रोमन से संताली नहीं लिखी जा सकती है - ध्यान से सुन लो। आप जिस रोमन लिपि का जिक्र कर रहे हो, उस लिपि का उसी वक्त संतालीकरण कर दिया गया था, जिस वक्त यह संताली के लिए उपयुक्त घोषित किया गया था। अब यह लिपि लैटिन, रोमन, अंग्रेजी वगैरह कहना भूल जाओ। अब यह लिपि संताली लिपि बन गई है। ठीक उसी तरह जिस तरह आप अपने हर काम में बाहरियों के चीजों का इस्तेमाल करते हो। ध्वनिविज्ञान के अनुसार संताली के लिए 59 वर्णों की जरुरत है। जबकि आपके पास सिर्फ 30 वर्ण हैं। आप बताओ, संताली के लिए बाकी वर्ण कहां से लाओगे? अतः सिद्ध हो गया कि आपकी लिपि ही संताली लिखने के लिए नपुंसक है।

लिपि के साथ-साथ आपने धर्म को भी जोड़ दिया है, जिससे आपकी मानसिक दिवालियापन की बदबू आने का संकेत देता है।

अंत में यही कि आपकी भाषा, भाषा नहीं है, बल्कि यह एक बोली की श्रेणी में आती है। क्योंकि संताली व्याकरण के अनुसार आपकी भाषा में अनेकों त्रुटियां हैं। अतः सूरज को दीया दिखाने की चेष्टा कभी मत करना।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...