Saturday, 7 February 2015

पोते के नाम पत्र

मानव समाज में चिट्ठी लिखने की परंपरा बहुत पुरानी है। इस परंपरा से कोई अछूता नहीं। चिट्ठी की कई प्रजातियाँ हैं; यथा सरकारी, गैर-सरकारी एवं निजी। कई तरह से चिट्ठियाँ लिखने का प्रचलन है। बच्चों के चाचाजी ने भी अपनी पुत्री के नाम खत लिखा था। उसने यह पत्र किसी काल कोठरी से लिखा था। पर आपका परदादा फूस के नीचे खटिया पर पड़े-पड़े आपको यह अंतिम पत्र लिख रहा है, वह भी ठीक अपनी अंतिम श्वास लेने से पहले। यह कोई पत्र नहीं है, यह तो आपके परदादे के जीवन-दर्शन का अंतिम निचोड़ है। आपको यह पत्र लिखकर कोई गुनाह तो नहीं किया है? खैर, जिस काल में यह पत्र आपके नाम लिखा गया था, उस दौरान खत लिखने की परंपरा ही अपनी अंतिम साँस ले रही थी। दुनिया के वैज्ञानिकों ने द्रुतगामी से संदेश पहुँचाने के लिए तब नई विधि ईजाद कर ली थी, दूरभाष, घुमंतूभाष, एसएमएस और ई-मेल आदि। अब तो विज्ञान ने यहाँ तक प्रगति कर ली है कि बात करने वाले एक दूसरे का खोपड़ा भी आसानी से देख सकते हैं। आपका जमाना इस विधि को छोड़ वार्त्ताकार स्वयं एक दूसरे से ई-मेल से भी कम समय में मिल सकने की तरकीब निकाल लेंगे। कितनी बार मैंने आपके पिताजी को आगाह करते रहा कि सावधान! आपके गाँव-घर में आग लग चुकी है। इसे बुझाने का कोई उपाय ढूँढ़ों। पर उन्होंने मेरी सलाह को सिरे से ही खारिज कर दिया था। अब और पत्र लिखने की मेरी हिम्मत नहीं बची है। कब मैं भगवान का प्यारा बन जाऊँ, मुझे भी नहीं मालूम। अतः आपके नाम यह मेरा आखिरी पैगाम समझो। आप यह खत न समझना पर इसे तार समझना। चूँकि तार का उपयोग हमेशा दुःख की घड़ी में ही हुआ करता था। यह बहुत बड़ी विडंबना ही होगी कि इस पत्र को आप तक सुपुर्दगी होने में करीब पाँच सौ वर्ष तक का सफर तय करना होगा। आप इसे पढ़ पाओगे, मुझे संदेह है। दुनिया के किसी कोने में यह खत मिले या न मिले पर संपादक जी के पाँचवें गोदाम में यह आपके लिए सुरक्षित रखा रहेगा। रिवाजानुसार खत सिर्फ जीवित लोगों को ही लिखा जाता है। पर यह आठवाँ आश्चर्य ही होगा कि एक परदादे ने अपने भावी पोते के लिए एक दुःखभरी दास्तान लिख छोड़ी है।

यह जानकर आपको अति प्रसन्नता होगी कि मैं ही आपका एकमात्र बदनसीब परदादा हूँ; जिसने इस ममतामयी पत्र की माला को गूँथने की चेष्टा की है। दूध का दूध और पानी का पानी न्याय कर सको, अतः मैंने इस खत को लिखने का दुःसाहस किया हैै। बताते चलूँ कि पत्र लिखते वक्त यहाँ चंद्रग्रहण हो रहा है। आशा है आप लोग तब सूर्यग्रहण झेल रहे होंगे। आज मुझे मालूम नहीं क्योंकर खत लिखते समय मेरा हाथ काँप रहा है। गला सूखता जा रहा है। मस्तिष्क में अनगिनत अच्छे-बुरे विचार कौंध रहे हैं। आगे नाथ न पीछे पगहा वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। फिर भी ताकि आपका शोध-पत्र तथ्य पर आधारित हो; अतएव मैंने सोचा कि इस पत्र के माध्यम से आपके लिए एक सत्य की गठरी छोड़ जाऊँ। इस खत में जो कुछ भी लिखा जा रहा है, वह सच्ची घटना पर आधारित है। मनगढ़ंत व कपोल कल्पना जैसी कोई भी चीज इस पत्र में वर्णित नहीं है। मुझे अच्छी तरह मालूम है कि आप मुझे एक बार नहीं हजारों बार दोषी ठहरा रहे होओगे। यहाँ तक कि मेरी अस्थियों को फाँसी के तख्ते पर लटकाने के लिए भी उतावले हो रहे होंगे। पर करुँ भी तो क्या करुँ? मैं भी वक्त का मारा हूँ। समय के थपेड़ों ने मुझे अधमरा कर दिया है। आपकी दशा का ख्याल आते ही मैं जी भरकर रो पड़ता था। और मेरे आँसूओं की बूँद स्याही बनकर मेरी लेखनी को ताउम्र मदद करती रही। लेकिन एक बात का ध्यान रखो। जिस दुःख से सिदो-बिरसा परेशान थे, जिन कारणों को लेकर मारांग गोमके व दिसोम गुरु ने आंदोलन किया, आज हम भी उन्हीं कारणों से पीड़ित हो रहे हैं। और आशा है आप भी उसी दुःख से ही दबे रहोगे। अर्थात् दुःख के अंतराल में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं होगा। आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए।

कहा जाता है; पुरखे हमारे शहीद होते रहे हैं। किसी को घोड़े की चंवार से बाँधकर तब तक घसीटा गया जब तक कि उनके प्राणपखेरु उड़ नहीं गए, तो किसी को अपने ही जन्मस्थल में फाँसी दी गई और तो और किसी को तो जहर का प्याला पीने के लिए भी मजबूर किया गया। जिस किसी ने भी अन्याय के विरुद्ध मुँह खोला, उसकी बोलती सदा-सदा के लिए बंद कर दी गई। पुरखों के बलिदानस्वरुप हमने कुछ दिन सीएनटी और एसपीटी एक्ट का लुत्फ उठाने का असफल प्रयास किया। पर यह वही साबित हुआ, जिसे हाथी के दाँत दिखाने के कुछ और खाने को कुछ कहते हैं। बलि का बकरा कब तक खैर मनाता? जगह-जगह उनकी बपौती जमीन पर कल-कारखाने बैठा दिए गए। बड़े-बड़े बाँधों का निर्माण हुआ। वे कुशल कारीगर तो थे नहीं; अतः उन्हें चतुर्थ श्रेणी की नौकरी से भी वंचित कर दिया गया। वे बेचारे भूमिपुत्र विस्थापन के जाल में फँसते चले गए थे। वे रोजगार की तलाश में असम, अंडमान और महानगरों की ओर कूच कर गए। आरक्षण मिलने लायक आबादी न रही। सरल, सीधे और सत्यवादी भूमिपुत्र अपने ऊपर हो रहे अत्याचार का सामना करने में विफल रहे। हमेशा उनके मुखवृंद से भगवान देखता है का सुवचन निकलता था। किन्तु कोई भी भगवान उसे बचाने नहीं आया। क्यों आता? यहाँ तो यह उक्ति चरितार्थ हो रही थी; भगवान भी उसी की मदद करता है, जो अपनी मदद स्वयं करता है।

मुगलों के बाद दो सौ वर्षों तक देश अंग्रेजों का गुलाम रहा। आजादी की लड़ाई छेड़ दी गई और अंततः सन् 1947 ई. में अंग्रेज देश छोड़कर चले गए। पर झाड़ जंगल में काले अंग्रेजों का साम्राज्य बढ़ता गया। उनके फन कुचलने के लिए आँधी-तूफान की तरह झाड़ जंगल में मारांग गोमके का उदय हुआ। सदियों से दबाए गए लोगों ने अपने बीच एक ऐसा गरीबों का मसीहा पाकर बहुत आनंदित हो उठे। गरीबों ने कुछ हद तक राहत की साँस ली। लोग उनसे जुड़ते गए एवं कारवां बनते गया। मारांङ गोमके जहाँ भी जाते, उन्हें सुनने के लिए ऐसी भीड़ जमा होती, जो न अब तक इकट्ठी हुई थी और न ही भविष्य में ऐसी भीड़ कभी इकट्ठा होने की उम्मीद है। उनकी सभा में शामिल होने के लिए लोग भूखे-प्यासे कई सौ मील तक का सफर पैदल ही तय करते। मुर्गे की बांग ने लोगों को गहरी नींद से जगा दिया था। लोगों में जागरुकता नाम का जीव प्रवेश कर गया था। फिर क्या था? जहाँ देखो मुर्गा छाप, वहीं लगाओ मोहर आप चरितार्थ हो गया। इस तरह मारांङ गोमके ने तैंतीस विधायकों को बिहार विधान सभा में भेज दिया। इस प्रकरण से कुछ हुआ कि नहीं यह तो ज्ञात नहीं पर यह सर्वविदित है कि लोगों के मन मंदिर में एक ऐसी ममतामयी भावना जाग उठी, जिससे लोग इस कदर ग्रसित हो गए कि यह भावना भुलाए न भूली। अपने लिए अलग झाड़ जंगल प्रदेश की माँग ने लोगों की नींद हराम कर रखी थी। उठते, बैठते, सोते आँखों के सामने सिर्फ और सिर्फ अलग प्रदेश ही दिखाई दे रहा था; क्योंकि अलग प्रदेश मूर्छितों की एकमात्र संजीवनी बूटी थी। मुर्गे की कुकड़ुकूं से सारी जनता अति प्रसन्नचित्त थी। पर हाय री अभागिन जनता! एक दिन उन्हें पता चला कि मारांग गोमके और उनके सहयोगियों ने उस मुर्गे को ही चखना कर दिया था। और इस तरह मारांङ गोमके देश के प्रथम प्रधानमंत्री की गोद में जा बैठे। मारांङ गोमके राजनीति छोड़ एक किसान बन गए। जिसे वह हल में जोतने हेतु जोड़ा बैल बन गए। मारांग गोमके द्वारा खरीद-फरोख्त की यह एक ऐसी बेसुरी परंपरा स्थापित की गई कि बाद के नेता भी इनके पदचिह्नों का अनुसरण करते नहीं अघाते थे।

मारांङ गोमके के अस्त होने के बाद झाड़ जंगल में एक बहुत बड़ी रिक्तता पैदा हो गई। लगा, मानो लोगों को साँप सूँघ गया हो। कहीं से कोई चूँ तक की आवाज न आई। इस रिक्तता की पूर्ति हेतु फिर आया तेज हवा का एक झोंका। एक मुट्ठी चावल और एक रुपया का कमाल देखिए कि वह कुछ ही दिनों में साढ़े तीन करोड़ में परिणत हो गया। लोगों ने उन्हें सिर आँखों पर बैठा लिया था। लोगों ने अपनी ममतामयी भावना को गिरवी रख दिया। तीस वर्षों तक उन्हें राज करने का मौका दिया गया। इस दौरान कुछ हासिल हुआ कि नहीं यह तो मालूम नहीं। लेकिन उन्हीं की सहमति से एक देश लूटा गया। हुल में शहीदों के खून से लिखा गया उपझारखण्ड नीलाम हो गया। एक के बदले अब वह छह टुकड़ों में विभाजित हो गया। प्रशासनिक दृष्टिकोण से चाहे वह सौ टुकड़ों में बाँट दिया होता पर उनका नामकरण तो अपनी संस्कृति की पहचान पर आधारित होता। पर ऐसा संभव न हो सका। इस तरह खून की नदी से सिंची गई धरती भी परायी हो गई। वह सदैव तारे तोड़ने का वादा करने वाले, लोगों की आँखों में धूल झोंकने में कामयाब हो गया। मारांग गोमके और दिसोम गुरु दलितों के सर्वमान्य नेता रहे हैं। दोनों ही महान क्रांतिकारी थे; इसमें कोई दो राय नहीं। पर क्यों कांग्रेस में विलय और साढ़े तीन में बिकने की घटना घटी? इस प्रश्न का उत्तर अब तक कोई दे न सका। निश्चित तौर पर लगता है; दोनों नेताओं के पास दूरदृष्टि, स्पष्ट विचारधारा और अच्छे दर्शन की कमी थी। और आपको जानकर आश्चर्य होगा कि रातोंरात एक झाड़ जंगल प्रदेश का सृजन भी हो गया था। इस प्रदेश सृजन के पीछे भी एक बहुत बड़ा रहस्य छिपा हुआ है। दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा हुआ। तीसरा असहाय और दरिद्र था। संक्षेप में आपको बता दूँ कि यह तो वही बात हो गई कि रातोंरात एक भिखारी को मर्सीडिज कार की भेंट दी गई। अब भिखारी कार को सुबह-शाम देखे, चाटे या सूँघे? कुछ भी करे, यह तो वो जाने और उसका काम जाने। पर भिखारी अब दूर से ही टुकुर-टुकुर उस मर्सीडिज कार को निहारने में तल्लीन है। मर्सीडिज को चलाने के लिए उस भिखारी के पास न तो तेल है और न ही तेल लेने के लिए जेब में पैसे। पानी से आखिर गाड़ी भी तो नहीं चल सकती। रखे-रखे मर्सीडिज अब सड़ने के कगार पर खड़ी है।

मेरे प्रिय पोते! कहीं धोखे में न रहना कि आपके परदादे अनपढ़ और गंवार थे। यह सच है कि देश आजाद होने तक गाँव में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या नगण्य थी। पर इसके पूर्व अंग्रेजों से लोहा लेने वाले तिलका मुर्मू, सिदो मुर्मू एवं बिरसा मुंडा ने कौन से विश्वविद्यालय से कौन-सी डिग्रियां ली थी, जिसे अंग्रेजों को लोहे का चना चबवाया था? ये महान नेता अंगूठा टेक थे। इन्होंने किसी स्कूल का दरवाजा न देखा था। फिर भी इन्होंने अंग्रेजों को छठी का दूध पिलाया था। और इनके आंदोलन के फलस्वरुप संताल परगना एवं छोटानागपुर का जन्म हुआ था। जहाँ कहीं भी समाज उन्नति की बात होती, लोगों ने सर्वसम्मति से मान लिया था कि शिक्षा ही विकास की एकमात्र कुंजी है। बगैर शिक्षा उन्नति करना कोरी कल्पना ही होगी। अतएव प्रदेश में सरकारी, गैर-सरकारी एवं अर्द्धसरकारी विद्यालयों की बाढ़ आ गई। देश आजाद होने के साठ वर्ष में कोई ऐसा गाँव न रहा, जहाँ कोई स्नातक न हुआ हो। बालक-बालिकाएँ ओले की तरह पढ़ लिखकर बादलों से बारिश के रुप में दनादन गिर रहे थे। लेकिन यह क्या? विद्यार्थियों के मस्तिष्क में मीठे फल के बीज बोए जा रहे थे, लेकिन फल आ रहे थे कड़ुवे। बच्चों को अमीर बनने की सिखावन दी जा रही थी; पर बन रहे थे रंक। स्वर्ग जाने का रास्ता बताया जा रहा था; पर जी रहे थे नरक में। ऐसा क्यों? समाज की माली हालत अब बद से बदतर होती जा रही थी। कोई ऐसी समस्या न बची; जिससे लोग पीड़ित न हों। उन्नति के बारे समाज के ठेकेदारों की अलग-अलग दलीलें थीं। राजनीतिज्ञ अपने लिए वोट को ही समाज प्रगति का एकमात्र नुस्खा बताते। धर्मगुरु इस दुनिया के बारे न बताकर परलोक की बात करते। समाज सेवक गाँव का आँकड़ा लेकर सिर्फ कागजी घोड़ा दौड़ा रहे थे। और तो और सरकारी संपत्ति, किसी की संपत्ति नहीं चरितार्थ हो रहा था। सरकारी तंत्र लूट-खसोट का अड्डा बन गया था। सरकार का मतलब मूर्खों का, मूर्खों द्वारा, मूर्खों के लिए।

किसी दार्शनिक ने बिल्कुल सही कहा है कि कोई भी शिक्षा कभी निष्क्रिय नहीं रह सकती। या तो यह मुक्त करती है अथवा दास बनाती है। दबंग समाज द्वारा शिक्षा का पाठ्यक्रम इस तरह तैयार किया जाता है कि हम दास व गुलामी खटने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

मेरे प्रिय पोते! अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि हम और आप चाहे लाख यत्न कर लें। हमें रेड इंडियन बनने से कोई रोक नहीं सकता। इसमें दोष उनका नहीं, सौ फीसदी गलती हमारी ही है। पत्र मिलने तक आप "लाल भारतीय" के रुप में परिणत हो चुके होंगे। ढेर सारे आशीर्वाद सहित पत्रांत करता हूँ।

Friday, 6 February 2015

बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?

पिछले अंक में हमने शिक्षा के प्रति मंगरु की सोच को जान लिया है। किसी भी तरह की गलतफहमी में न रहें कि वह शिक्षा का घोर विरोधी है। अपितु उसका कहने का तात्पर्य यही है कि शिक्षा के साथ-साथ किसी श्रृंगार के रुप में अच्छे विवेक का भी वह तीमारदारी है; जिसे सोने पे सुहागा कहा जाता है। वह ऐसी शिक्षा हासिल करने का पक्षधर है, जिस शिक्षा से हमें मुक्ति मिल सके। वह ऐसी शिक्षा का समर्थक है; जिस शिक्षा से हमारी सभी तरह की गरीबी मिट सके एवं हम सदा उन्नति की राह पर आगे बढ़ते रहें। ऐसी शिक्षा का क्या औचित्य? जिस शिक्षा से हम गुलाम अथवा दास बनने के लिए मजबूर हो जाते हैं। बल्कि मंगरु पढ़-लिखकर मूर्ख बन जाने का घोर विरोधी है। प्रमाण देते हुए वह कहना चाहता है कि क्या आठ वर्षों से झारखंड में एक भी शिक्षित व्यक्ति का उदय नहीं हुआ है? क्या हमारे पास एक भी डिग्रीधारी उपलब्ध नहीं हैं? एक नहीं, हमारे पास हजारों डिग्रीधारी मौजूद हैं। पर उनकी शिक्षा पर हमें शक और संदेह है। यह अतिश्योक्ति नहीं कि जिस शिक्षा को उन्होंने ग्रहण किया, जिस शिक्षा ने उन्हें बड़ी-बड़ी डिग्रियों का हकदार बनाया; उस शिक्षा ने आखिरकार उन्हें अंत में पशुतुल्य बना दिया है। अच्छे और बुरे पहचानने के वे काबिल नहीं रहे। यही कारण है कि झारखण्ड गठन के बाद से आदिवासी मुख्यमंत्रियों के पदस्थापित होते रहने के बावजूद भी आज हमारी यह सुनहरी हालत हो रखी है!

मंगरु आज कब खाना खा रहा है, कब सो रहा है, उसे कुछ ध्यान ही नहीं। आज वह अपने समाज के प्रति चिंतामग्न है। लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर पहुँच पाना, उसे टेढ़ी खीर लग रहा है। मंगरु आगे विश्लेषण कर रहा है। सामाजिक बैठकों में शिक्षा के बाद सबसे ज्यादा चर्चा होने वाला विषय है; मद्यपान। बार-बार कहा जाता है कि नशे की लत ने हमारे समाज को बर्बाद करके रख दिया है। लोग पीने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। शादी-ब्याह व पर्व-त्योहार के अवसर पर तो बात ही छोड़ दीजिए। आज रानू देवता हमारे गाँव.घर की चहार दीवारों को फाँदकर, बीच सड़क पर खड़े होकर अपना जलवा दिखा रहा है। झारखण्ड में ऐसा कोई हाट-बाजार नहीं बचा है, जहाँ खुलेआम हँड़िया-दारु की बिक्री न हो रही हो। कोई मेला, कोई सभास्थल, कोई सार्वजनिक स्थल ऐसा नहीं बचा है, जहाँ देसी शराब धड़ल्ले के साथ न बेची जाती हो। इस पर किसी तरह की कोई सरकारी रोक-टोक भी नहीं। सेल्स गर्ल के रुप में हमारी भोली-भाली बालाएँ ही इस धंधे में लिप्त दिखाई देती हैं। लगता है; मानो पूरा झारखण्ड ही ऑपेन बार में तब्दील हो गया हो। जिसमें खासकर हम आदिवासी उस बार में गोता लगाने में मशगूल हो गए हैं। बच्चे हों या बुड्ढे, सारे सोमरस का मजा लूटने में व्यस्त हो गए हैं। और इस तरह अत्यधिक नशे के फलस्वरुप हम शारीरिक व मानसिक रुप से कमजोर हो चले हैं। यहाँ तक तो बात जायज लगती है। दारु पीना कोई बुरी बात नहीं; लेकिन दारु हम सभी को पी डाले, यह कतई बर्दास्त नहीं। लेकिन सवाल उठता है; क्या आपने कभी दारुबाज के सामने यह सवाल उठाया है कि वह दारु क्यों पीता है? क्या कारण है कि वह हमेशा हँड़िया-दारु के साथ रहता है? बाँहों में बाँहें डाले वह उसके संग घुमता रहता है? शराब सिर्फ दो ही अवस्था में पी जाती है; एक खुशी और दूसरा गम को भुलाने के लिए। लेकिन हम आदिवासी किस कारण शराब को गले लगाए हुए हैं; इसका जवाब शायद सिंग बोंगा के पास भी उपलब्ध नहीं है। झारखण्ड को देखकर न तो हमें खुशी है और न ही गम। फिर भी हम शराब के इतने दीवाने क्यों हैं? इसकी जड़ तक पहुँचने के लिए मंगरु को शायद और भी वक्त की जरुरत है। लेकिन इस संबंध में मंगरु के मन में अनगिनत शंकाएँ उठ रही हैं। मंगरु को अच्छी तरह याद है; गुरु जी के आरंभिक काल में, आदिवासी समाज से नशापान को जड़ समेत उखाड़ फेंकने के लिए, उसने हँड़िया-दारु की बिक्री बंद करने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया। हुक्म हुआ कि अगर कोई पीने-पिलाने के धंधे में रंगेहाथ पकड़ा गया, तो उसे "दिल्ली रोड" दिखा दिया जाएगा। और कुदरत का करिश्मा देखिए कि उस हुक्म की जोरशोर से तामील की गई। लेकिन आम जनता पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा। कहीं जगह न मिलने पर नशेबाजों ने गुदड़ी में पनाह लेनी शुरु कर दी। लोग चोरी-छिपे पर पहले की अपेक्षा और अधिक मस्त होकर पीने में लीन हो गए। परंतु आश्चर्य तो तब हुआ, जब गुरु जी के चेले दिन के उजाले में नशेड़ियों को दिल्ली रोड दिखा रहे थे, तो रात अँधेरे में वे स्वयं ही मस्त होकर दिल्ली रोड पर सरपट भाग रहे थे। अर्थात् उनके ही चमचे-बेलचे भयंकर दारुबाज निकले। हँड़िया-दारु उर्फ गुरु जी ने बिन माँगे जगप्रसिद्धि पा ली। इस तरह मद्यपान खत्म नहीं हुआ। परंतु यह दिन दुगुनी रात चौगुनी प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता ही गया।

उदाहरण के तौर पर झारखण्ड से निकल कर एक ऐसे प्रदेश की ओर निगाह डालें, जहाँ हर गाँव में बिजली की व्यवस्था है और हर गाँव सड़क से जुड़ा हुआ है। यह एक कृषि प्रधान प्रदेश है; और यहाँ के निवासी काफी खुशहाल हैं। उस प्रदेश को आप हरियाणा के नाम से जानते हैं। कुछ वर्ष पहले की घटना है। तब हरियाणा में श्री बंसीलाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुआ करते थे। प्रदेश की खुशहाली में चार चाँद लगाने हेतु बंसीलाल की सरकार ने प्रदेश में सौ फीसदी मद्यपान निषेध की घोषणा कर दी। हरियाणा में नशामुक्ति का सरकारी आंदोलन छेड़ दिया गया। पूरे प्रदेश में एक बूँद शराब की बिक्री नहीं हो सकती थी। इसका परिणाम क्या हुआ? होना क्या था; जो उपरवर्णित घटना गुरु जी के साथ हुई, वही घटना यहाँ भी दुहरा दी गई। पहले सौ की बोतल मिलती थी, अब अवैध रुप से उस बोतल की कीमत हजारों में पहुँच गई थी। इसकी विपरीत प्रतिक्रिया हुई; पहले लोग गिलास में पीते थे, अब लोग मग्गे में पीने लग गए। दुष्परिणाम यही कि जब विधान सभा का अगला चुनाव हुआ; तो शराब ने बंसीलाल की लुटिया ही डूबो दी। उसकी सरकार तो गई ही साथ में उसकी मिट्टी ऐसी पलीद हो गई कि वह मुँह छिपाने के लायक न रहा। कहने का तात्पर्य यही कि जहाँ भी मद्यपान रोकने की कोशिश की गई है; वहाँ बुरा हाल ही हुआ है।

मंगरु को आज यह तर्क समझ में नहीं आ रहा है। वह देख रहा है कि भोले-भाले आदिवासी तो सिर्फ घरेलू और सस्ती शराब का ही पान कर रहे हैं; पर अन्य शहरी लोग तो एक से एक बढ़िया और महंगी शराब का सेवन करते हैं। कोई भी बड़े-बड़े होटल, रेस्तरां, पब का नजारा देखिए, वहाँ शराब इस तरह परोसी जाती है; जैसे उसकी बिक्री मुफ्त में हो रही हो। फिर भी उनका कुछ नहीं बिगड़ रहा है। उसे यह भी ज्ञात है कि हमारे फौजियों को शराब से नहला देने का सरकारी नियम भी है। ऐसा क्यों होता है? कारण कुछ भी हो; पर आदिवासियों के संदर्भ में इतना अवश्य है कि यह हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई प्रथा है। जबरन इस प्रथा को बंद नहीं किया जा सकता। हाँ, किसी भी चीज का अति होना हानिकारक है; इसमें कोई दो राय नहीं। जरुरत है तो सिर्फ इतनी कि हमें पीने की कला अवश्य सीखनी चाहिए। ध्यान रहे कि किसी भी कीमत पर हँड़िया हमें डकार न जाए। निचोड़ यही कि जो भी हमारे मद्यपान विरोधी मित्र हैं; उनसे आग्रह है कि वे जबरन हँड़िया-दारु की संस्कृति को बंद न कराए। क्योंकि मनोवैज्ञानिक कारण है कि जिस भी चीज को जितना भी छुपाने की कोशिश करोगे; उसे देखने के लिए मन में उतनी ही जिज्ञासा तीव्रगति से बढ़ती जाएगी। और यकीन मानो, लोग उस छिपी हुई चीज को देखने के लिए दूसरा अवैध रास्ता निकाल ही लेते हैं। लेकिन हमारे मद्यपान विरोधी मित्र, उस ग्वाले की भाँति इस तथ्य को समझने से ही इनकार करते हैं। वे तर्क देते हुए कहते हैं कि मद्यपान ही है हमारे समाज का पिछड़ने का एकमात्र कारण। अगर तत्काल शराबबंदी हो जाए तो हम क्षण भर में उन्नति की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए नजर आएंगे। लेकिन दोस्तो, अक्सर ऐसा होता नहीं है। दुनिया के ठंडे देशों में देखो, तो वहाँ पानी की तरह लोग शराब का सेवन करते हैं। और विडंबना यही कि वे हमसे कई गुना अधिक प्रगतिशील हैं। अगर शराब विनाश का कारण होता, तो वे बेचारे ठंडे देश के लोग कब के मर-खप गए होते।

दोपहर का खाना खा चुकने के बाद मंगरु फिर अपनी सोच को जारी रखे हुए है। सोचते.सोचते उसे लगा कि समाज की समस्याएँ तो अनेक हैं। किस.किसके बारे वह सोचे? कौन सी समस्या के लिए, कौन से समाधानों को वह सुझाए? काफी देर चिंतन करने के बाद मंगरु इस नतीजे पर पहुँचा कि समस्या तो सिर्फ दो प्रकार की होती है - व्यक्तिगत और सामूहिक। परिभाषा के रुप में अगर कहना चाहें तो व्यक्तिगत समस्या उसे कहा जाता है; जो निजी हो एवं उस समस्या के समाधान हेतु किसी बाहरी व्यक्ति की मदद की कोई आवश्यकता ही न हो। अर्थात् जिसका समाधान खुद को ही करना पड़े। इसके विपरीत; सामूहिक समस्या उसे कहा जाता है; जिस समस्या से पूरा समाज ही पीड़ित हो एवं जिसका समाधान एक व्यक्ति द्वारा संभव न हो। परंतु इस समस्या के समाधान के लिए पूरे समाज की जरुरत हो। फिर तो पेसा, परिसीमन ... आदि सामूहिक समस्याएँ हुईं? बिल्कुल। सामूहिक समस्याओं के समाधान के लिए आज हमारे पास कई सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाएँ कार्यरत हैं। इनके अलावे छोटे-मोटे कई क्लब, संस्था, संघ, दल वगैरह भी इस शुभ कार्य में हाथ बँटा रहे हैं। इनमें कुछ पंजीकृत हैं तो कुछ अपंजीकृत। और इन सभी दलों में से जो सबसे बड़ा दल है, जो हमारे देश की प्रजातांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ है; वह राजनीतिक दल किसी भी सामूहिक समस्या के निदान के लिए अनवरत कार्यरत है। अतएव क्यों न राजनीति के बारे थोड़ी-सी चर्चा की जाए।

राजनीति अर्थात् ऐसी नीतियों का निर्धारण करना, जिन नीतियों व नियमों के तहत जनता पर शासन किया जा सके अर्थात् राज्य चलाया जा सके। राज दरबार में बैठकर ऐसी नीति बनाना जिससे जनता/प्रजा की भलाई हो सके। और इस नीति को बनाने के लिए जिसे भी उत्तरदायित्व सौंपा जाता है, उसे राजनीतिज्ञ या विशुद्ध रुप से आधुनिक भाषा में उन्हें सांसद या विधायक कहा जाता है। देश, प्रदेश व समाज की उन्नति या अवनति के लिए बहुत हद तक राजनीति को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। छोटी-मोटी कोई भी गैर-सरकारी संस्थाएँ अपनी सोच को दर्शा सकती हैं; पर नियम व कानून बनाने का हक तो सिर्फ राजनीतिज्ञों को ही है। अतः कहा जा सकता है कि राजनीति का अखाड़ा (विधान सभा/संसदद्) एक मंदिर के समान है और सांसद या विधायक उस मंदिर के पुरोहित व पुजारी होते हैं। अतः सिद्ध हो गया कि राजनीति एक धार्मिक स्थल है। यहाँ पुण्य के अलावे और किसी तरह के गलत धंधे को अंजाम देना सख्त वर्जित है। लेकिन अभी तक हमें जिस शिक्षा का घूँट पिलाया गया है; उस घूँट में राजनीति को हमेशा ही बुरी नजर से देखने की हिदायत दी गई है। राजनीति एक गंदा खेल है का कुपाठ हमें पढ़ाया गया है। राजनीति से दूर-दूर तक भी रिश्ते जोड़ने की मनाही है। मंगरु इस तर्क को समझने में आजतक सौ फीसदी विफल रहा है। जिस मंदिर में सिर्फ स्वर्ग जाने का ही रास्ता बताया जा रहा हो, उसे आजतक हमने जाने अनजाने नरक की संज्ञा दी हुई है। उस मंदिर की पूजा-अर्चना में शामिल होना तो दूर, उस ओर झाँकने तक भी मनाही है। जिस मंदिर में हमारे भाग्य और तकदीर का फैसला होता हो, उस स्थल को अभी तक हमने कूड़ेदान समझकर तिरस्कृत किया हुआ है। ऐड्स की तरह पॉलिटिक्स की पी तक को छूने नहीं दिया जाता है। कहा जाता है कि राजनीति गंदे लोगों का खेल है। इस खेल में जो अपराधी होता है, वही सफल होता है। इस तरह की भूलभुलैया के चक्कर में अच्छे और नेक इंसानों ने बुरे लोगों के लिए मंदिर जाने का रास्ता ही त्याग दिया है। यकीन मानो, इस प्रकरण में कसूरवार नेक इंसान ही हैं न कि अपराधी। थोड़ी देर के लिए कल्पना करो। मान लो, उस पवित्र मंदिर में किसी पुरोहित के बदले डाकू सुल्तान सिंह जैसे अपराधिक छवि वाले लोगों का कब्जा हो जाए, तो वहाँ का दृश्य कैसा होगा? उस भव्य मंदिर में अगर वास्तव में चोर-डकैत इकट्ठे हो जाएँ, तो यह निश्चित है कि वहाँ भजन-कीर्तन तो होने से रहा। बल्कि मारकाट और खून-खराबे की ऐसी भयावह स्थिति पैदा हो जाएगी कि आप सोच भी नहीं सकते। रोज अत्याचार, बलात्कार, भ्रष्टाचार और खूनी संघर्ष से उस मंदिर का तो सत्यानाश होगा ही, साथ ही श्रद्धालुओं का भी बेड़ा गर्क हो जाएगा। इस तरह सोचते-सोचते मंगरु की बंद आँखें खुल गईं। उसे लगा कहीं वह सपना तो नहीं देख रहा है?

Tuesday, 3 February 2015

बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?

कहा जाता है कि चिंता चिता समान है। अत्याधिक चिंता करने से अच्छी-भली सेहत भी बिगड़ सकती है। जो व्यक्ति ज्यादा चिंतित रहता है, वह उस चिंता रुपी चिता में जलकर भस्म हो जाता है। लेकिन आज मंगरु तो केवल सोच ही रहा है। सबसे पहले वह अपनी सोच में बदलाव लाना चाहता है। चूँकि सोच बदलना ही उन्नति की पहली सीढ़ी है। वह अपने समाज का गहराई से विश्लेषण कर रहा है। वह कोई अपनी व्यक्तिगत समस्या से थोडे़ ही न चिंतित है। अगर वह चिंतित भी है, तो वह अपने सुनहरे समाज को देखकर चिंतित है! वाह रे आदिवासी समाज! मंगरु देख रहा है; किस तरह आदिवासी लोग आत्महत्या कर रहे हैं। ठीक उसी तरह; जैसे पहली बरसात के समय बिजली के खंभे पर जल रहे बल्ब की रोशनी की ओर आकर्षित होकर कीड़े-मकोड़े अपने आप जलकर मर-मिटते हैं। इस भूमंडलीकरण के युग में आदिवासी आधुनिकता के बहाव में बह गए। वे अपने आदिवासी मूल्यों को त्याग कर किस तरह चमगादड़ बनने की कोशिश में जुट गए हैं। और जैसे कि आपको मालूम है; चमगादड़ न तो जानवर है और न ही पक्षी। उसी तरह मंगरु को डर है, कहीं आदिवासी भी धोबी के कुत्ते की तरह न घर का और न ही घाट का रह जाएगा। घड़ी के पेंडुलम की तरह वह झूलता ही रह जाएगा। मंगरु सोच रहा है; आखिर लोग दुःखी क्यों होते हैं? अनुभव के आधार पर मंगरु का मानना है कि लोगों को अपने आप से संतुष्ट होना सीखना चाहिए। क्योंकि अक्सर लोग, जो कुछ अपने पास उपलब्ध है, उससे खुश नहीं होते; पर जो दूसरों के पास है, उसे देखकर दुःखी होते हैं। उसी तरह दूसरों के पास जब कोई चीज नहीं होती है अर्थात् जब दूसरे लोग दुःखी होते हैं, तो वह खुश होता है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहोगे?

आज मंगरु सोचने में कुछ ज्यादा ही व्यस्त हो गया है। कब दिन निकला, कब दोपहर हुई और कब शाम ढल गई, कुछ पता भी न चला। वह अच्छी तरह जानता है; उसकी सोच के फलस्वरुप निकली छोटी सी रश्मि भी अगर समाज को थोड़ी दूर तक ही सही, कोई रास्ता दिखाने में कामयाब हो सके, तो वह अपने मनुष्य जन्म को सफल मानकर, इस दुनिया से विदाई लेने में उसे थोड़ी-सी वेदना भी नहीं होगी। उसे किसी तरह का कोई गिला शिकवा भी नहीं रहेगा; परंतु उसे आनंदपूर्वक परलोक सिधार जाने में परम संतुष्टी होगी।

हमने पिछले अंक में राजनीति के बारे मंगरु की थोड़ी-सी सोच को जाना। हमारे कुछ मित्रगण, राजनीति को ही सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान मानते हैं। वे भी उस ग्वाले की भाँति अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करते हैं। कुछ भी हो, मंगरु के अनुसार राजनीति का अखाड़ा एक मंदिर के समान है। जहाँ सिर्फ स्वर्ग की ही बातें होती हैं। वहाँ दूध का दूध और पानी का पानी न्याय होता है। लेकिन जरा देश-दुनिया की राजनीति को देख लो; वह हमें कहाँ ले जाना चाहती है, भगवान ही मालिक है। खैर, मंगरु की सोच का दायरा सिर्फ झारखण्ड तक ही सीमित है। अतएव मंगरु आगे सोचता ही चला जा रहा है। राजनीति के अखाड़े में अंदर क्या होता है; मंगरु को इस बारे कुछ भी नहीं मालूम। पर उस राजनीति के फलस्वरुप जो फल उग आते हैं, उसे चखकर वह बता सकने में जरुर काबिल है कि फल मीठा है कि खट्टा। मारांङ गोमके से लेकर दिसोम गुरु तक की राजनीतिक घटनाओं को वह माइक्रोस्कॉप के जरिए देखकर, उसकी जाँच पड़ताल करने में जुटा हुआ है। इस दौरान हमने क्या पाया, क्या खोया विश्लेषण कर रहा है। राजनीतिक मंदिर के पुजारियों ने हमें कौन से गुल खिलाए हैं, मंगरु जानने की कोशिश कर रहा है। पर मंगरु को खाक कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। मस्तिष्क पर जोर देते हुए, वह राजनीतिक उठा-पटक को गहराई से खंगालने की चेष्टा कर रहा है। पर हवा की तरह कुछ पकड़ में ही नहीं आ रहा। काफी देर मंथन करने के बाद, उसे लगा कि देश आजाद होने के बाद से अभी तक झारखंड की राजनीति में काफी उथल-पुथल हुआ है। झारखण्ड की राजनीति आदिवासियों को केन्द्रबिन्दु मानकर ही संपन्न होती रही है। पर बेचारे आदिवासी! अभी तक वे प्रयोगशाला की सामग्री बनकर ही रह गए हैं। झारखंडी राजनीति को कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है। फुटबॉल या हॉकी खेल से आप अच्छी तरह परिचित होंगे। इस मैच में टीम कप्तान चाहे मारांग गोमके, लालबाबू, मुंडा, कोड़ा, हो या गुरु जी; सभी ने अब तक एक बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया है। पर उस उत्कृष्ट खेल का क्या फायदा, जब उनकी टीमें एक भी गोल करने में विफल रही हों। अतएव स्पष्ट रुप से कहा जा सकता है कि किसी मैच में विजयी घोषित होने के लिए गोल नितांत जरुरी है। मैच देखकर लगता है; कहीं हमारी टीम ही गोल खाकर मुँह लटकाए तो नहीं बैठी है? कुछ भी हो। इतना निश्चित है कि हमारी टीम ने कभी गोल नहीं दागा है। हो सकता है प्रतिद्वंदी टीम ने हमारे ऊपर ही दनादन गोल किए हों? इसके बारे आप ही ज्यादा जानकार हैं। इतने दिनों से इतना बढ़िया मैच खेलने के बावजूद भी गोल न कर सकना ही साबित करता है कि राजनीति भी एकमात्र समाधान नहीं है।

मंगरु सोच-सोचकर अत्यंत दुःखी हुआ जा रहा है। फिर क्या हो समस्या का सही समाधान? वह गहरी चिंता में डूब गया है। मंगरु नास्तिक तो नहीं पर असली आस्तिक भी नहीं बन पाया है। वह भगवान को ढूँढ़े जा रहा है; पर अब तक तो उसके साथ मुलाकात संभव नहीं हो पाई है। कब होगी उसकी भेंट, उसे कुछ नहीं मालूम। सोचता है; जो कुछ भी उसके साथ हो रहा है, कभी वह इसके लिए उसे ही जिम्मेवार ठहरा रहा है। वह अपने दिमाग पर जोर देते हुए भगवान पर ही लांछन लगा देता है। वह पूछना चाहता है; हे भगवान, तूने क्या हमारी सृष्टि यही दिन देखने के लिए ही की है? क्या हमारे भाग्य में सारी उम्र गुलामी की जिंदगी जीने के लिए ही लिख दी गई है? क्या हमारे नसीब में दर-दर की ठोकरें खाना ही दर्ज है? हे परमपिता परमेश्वर! तू तो दयासागर है। तू तो दयानिधि है। कहाँ गई आपकी वह दयालुता? कहाँ गई आपकी वह स्नेह और दयामयी ममता? तुम तो चालाकों के चालाक ठहरे! आकाश, पाताल और धरती का सृजन करने के बाद ऐसा छूमंतर हो गया कि आपको ढूँढ़ने के लिए हमें चर्च, मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद आदि के निर्माण करने पड़े। फिर भी न तो आप दिखते हो और न ही सुनते हो। कोई भी दुखियारा कितना भी रोए-पीटे, गिड़गिड़ाए; न तो तू उसे सुनता है, न तो दर्शन देता है और न ही उसे सांत्वना भरी कुछ बातें ही करता है। कैसा भगवान है तू? किस मिट्टी का बना है तू? इतना कुछ भगवान पर इल्जाम लगाने के बाद, मंगरु ठंडे दिमाग से सोचने के लिए मजबूर हो गया। अत्यधिक पीड़ा के कारण उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। वह ओछेपन पर उतार आया। गुस्से से आदमी पागल भी हो सकता है। खैर, इस दौरान सोची गई बातों पर उसे पछतावा हो रहा है। उसे अब समझ में आ गया है कि कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली। कहाँ भगवान और कहाँ मंगरु? उसे अपने किए पर पछतावा हो रहा है। उसे यकीन हो चला था कि इस संसार को चलाने वाला कोई न कोई तो होगा ही। ईश्वर, अल्लाह कुछ भी कह लो; कोई तो इस जग का मालिक होगा ही। संसार को चलाने के पीछे कोई न कोई ताकत, कोई शक्ति तो अवश्य होगी ही। एक तुच्छ प्राणी की यह कैसी हिम्मत की वह ब्रह्मांड के सृष्टिकर्ता पर ही उँगली उठाए; जिसने पूरे मानव समुदाय के साथ-साथ जग के सारे सजीव और निर्जीव पदार्थों की रचना की है। जिसने आकाश में चाँद, तारे और सूर्य को टाँग दिया है; इनका कोई न कोई सृष्टिकर्ता तो होगा ही। उसके अंतःमन में ज्ञान की एक छोटी सी ज्योति जल उठी थी। उसके मन में एक छोटा सा दिव्यप्रकाश जल उठा था। वह समझ गया था कि भगवान इतना बेवकूफ नहीं। भगवान ने सृष्टि के द्वारा अपने सारे रहस्य को बताने की पूरी चेष्टा की है। बस, उसे समझने की देर है। जो उसकी लीला को समझ सकता है, वही ज्ञानी है। धीरे-धीरे वह भगवान की अपरंपार महिमा को समझने की कोशिश कर रहा है। अंत में वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि कहीं हमारा समाज शरीर की तरह तो नहीं है? हमारे समाजशास्त्री ही किसी धोखे में अवश्य होंगे। महान दार्शनिक अरस्तु कुछ भी कहता रहे कि व्यक्ति के समूह को ही समाज कहा जाता है। फूल व्यक्ति है, तो माला समाज। और जो व्यक्ति समाज के अंदर नहीं रहता; वह या तो देवता है और नहीं तो भूत। ऐसी परिभाषा मंगरु तो क्या बड़े-बड़े समाजशास्त्रियों की समझ से परे की बात है। समाज क्या है; कुछ समझ में नहीं आ रहा। अतएव काफी गहन चिंतन के पश्चात् मंगरु अपने समाज की तुलना किसी शरीर के साथ कर रहा है। मानव देह से उसकी तुलना कर रहा है। समाज एक शरीर की तरह है। जिस तरह शरीर का हरेक अंग महत्वपूर्ण है; उसी तरह समाज का हरेक प्राणी महत्वपूर्ण है। शरीर के किसी भी अंग की अहमियत तुच्छ नहीं गिनी जा सकती। शरीर की एड़ी से लेकर चोटी तक के संपूर्ण हिस्से महत्वपूर्ण हैं। नाखून से लेकर बाल तक सभी जरुरी अंग हैं। अगर कोई भी अंग बीमार हो जाए, तो पूरा शरीर ही चरमरा जाता है। शरीर के किसी भी अंग पर छोटी सी चुभन लग जाए, तो पूरा शरीर ही सिहर उठता है। हो सकता है हाथ, पैर, आँख, कान, नाक, दाँत, दिमाग आदि शरीर के महत्वपूर्ण हिस्से हों; पर अगर सिर में एक भी बाल न हों तो मनुष्य की सुंदरता में बट्टा ही लग जाता है। कहने का तात्पर्य यही कि शरीर के किसी भी अंग को कम नहीं आँका जा सकता है। सारे अंग ही महत्वपूर्ण हैं और वे अपने-अपने तरीके से ही अपने सारे काम को अंजाम देते रहते हैं। अतः मंगरु से लेकर दिसोम गुरु तक सभी समाज के अभिन्न अंग हैं। अपनी-अपनी जगह वे सारे महत्वपूर्ण हैं। हो सकता है; समाज में कोई किसान, मजदूर, रेजाकूली, विद्यार्थी, नौकर, व्यापारी, बुद्धिजीवी, लेखक, समाज सेवक, याजक, राजनीतिज्ञ आदि हों; वे सारे ही एक दूसरे के पूरक हैं। जिस तरह पूरा शरीर स्वस्थ हो पर आँख ही न हो, तो वह व्यक्ति अंधा कहलाता है। उस अंधे को चलने-फिरने में किस तरह की तकलीफ होती होगी, उसे आप अच्छी तरह समझते हो। उसी तरह कोई समाज ठीक-ठाक हो, पर उस समाज में कोई लेखक ही न हो, तो वह समाज भी अंधा ही कहलाता है। शरीर के हाथ-पैर समाज के किसान-मजदूर तुल्य हैं। और अगर दिमाग की तुलना राजनीतिज्ञ से की जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। अतः स्पष्ट हो गया कि हमारे समाज की बनावट भी किसी शरीर की तरह ही है। शरीर के किसी भी अंग में दर्द हो, तो पूरा शरीर ही बीमार हो जाता है। उसी तरह समाज में किसी भी वर्ग को चोट लग जाए, तो पूरा समाज ही बीमार हो जाता है। अतः शरीर के सारे अंग सही, तो शरीर स्वस्थ। उसी तरह समाज के सारे वर्ग ठीक, तो पूरा समाज ही स्वस्थ समाज कहलाता है।

मंगरु को समाज का इस तरह विश्लेषण करते हुए काफी देर हो चली थी। गहन विश्लेषण के उपरांत जो निष्कर्ष निकला; काफी मंथन करने के बाद जो निचोड़ निकला, वह यही कि समाज की समस्याएँ कुछ और हैं और समाधान के रुप में कुछ और दवाएँ सुझाई जा रही हैं। अब तक समाज के रोग और औषधि में कोई मिलान नहीं हो पाया है। यही कारण है कि हमारा समाज स्वस्थ होने का नाम ही नहीं ले रहा। हमारे समाज सेवक भी उस ग्वाले की तरह अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करते रहे हैं। उनकी दलील यही कि शरीर के हाथ-पैर ठीक तो पूरा शरीर ही ठीक। दिमाग सही तो पूरा शरीर ही सही। लेकिन ऐसा नहीं है। अगर शरीर के किसी भी अंग पर दर्द हो, तो पूरा शरीर ही बीमार हो जाता है; इस कड़ुवे सच को कोई नकार नहीं सकता है।

अतः हमारे समाज के शुभचिंतकों की हालत भी उन अंधों जैसी तो नहीं, जिन्होंने हाथी के किसी एक भाग को छू लेने भर से ही हाथी के वास्तविक हुलिया के बारे ऊटपटांग घोषणा कर दी। जिस अंधे ने हाथी की पूँछ पकड़ ली, उसने कह दिया कि हाथी रस्सी जैसा है। जिसने पैर छू लिया, उसका दावा था कि हाथी किसी खंभे जैसा है। जिसने हाथी के कान पकड़ लिया, उसका कहना था कि हाथी का आकार सूप जैसा है। जिसने हाथी का पेट छू लिया, उसने सभी की दलील को धता बताते हुए ढिंढोरा पीट दिया कि हाथी किसी दीवार जैसा है। इस तरह जिस अंधे को हाथी के जो भी अंग छूने का मौका मिला, वह उसी अनुरुप हाथी के बारे अपनी गलत दलील देते गया। पर किसी भी अंधे ने हाथी के पूरे आकार को न तो ठीक से छू सका था और न ही वे हाथी के सही आकार को ही समझ पाने में सफल हुए थे। अतः कहीं हमारे समाज के शुभचिंतकों की स्थिति भी ऐसी तो नहीं, जो स्थिति उन बेचारे अंधों की बन गई है। मंगरु की यह अंतिम सोच ने उसे आसमान से लाकर पथरीली जमीन पर पटक दिया है। उसके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ने लगी थीं। और यह प्रश्न उसके मस्तिष्क पर हथौड़े की तरह बारंबार चोट किए जा रहा था कि उन बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी है?

Thursday, 29 January 2015


बेचारे अंधों का यह कैसा हाथी?

आज मंगरु बहुत उदास है। उसके मुखमंडल पर ग्रहण लगा हुआ है। चेहरे पर उदासी छाई हुई है। उसके मन में बेचैनी कुंडली मारकर बैठी हुई है। किसी भी काम में उसका जी नहीं लग रहा। कभी खेत की ओर जा रहा है, कभी नदी किनारे, तो कभी अपने गाँव की पश्चिम दिशा में स्थित टीले की ओर चल पड़ता है। सब तरफ चक्कर मारने के बावजूद भी, आज मंगरु का मन है कि वह एकाग्र होने का नाम ही नहीं ले रहा। घर वापस लौट आने पर वह कभी मेज पर रखे बासी अखबार को पढ़ने की कोशिश करता है, तो कभी दूरदर्शन पर विभिन्न चैनलों को छेड़ रहा है। फिर भी मंगरु का मन स्थिर नहीं हो पा रहा है। आज उसका जी ना खाने में, ना बैठने में और ना ही सोने में लग रहा है। वह अपने कमरे में एकांत बैठे किसी गहरी सोच में डूब गया है। वह गहराई के साथ मनन-चिंतन करने में व्यस्त हो गया है। चूँकि वह अपने समाज में वैचारिक क्रांति लाने का पक्षधर है; अतएव वह मारांङ गोमके से लेकर दिसोम गुरु तक की विभिन्न घटनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण कर रहा है। उसके मन में बारंबार यही सवाल कौंध रहा है; क्या कारण है कि अपना अलग प्रदेश मिलने के बावजूद भी हम आदिवासियों की हालत सुधरने के बजाय और भी बिगड़ती जा रही है? क्या वजह है कि आज हम आसमान से गिरे और खजूर पर अटक कर रह गए हैं? किन कारणों से हमारे सुनहरे सपने शीशे की तरह चकनाचूर हो गए हैं? विभिन्न संगठनों द्वारा अविराम जद्दोजहद करने के बाद भी, हमारा समाज अवनति की गर्त में चला जा रहा है। क्या कारण है कि लाख कोशिश करने के बावजूद भी, हमें सफलता हाथ नहीं लग रही है? समाज पिछड़ने का दोष किसके माथे मढ़ दिया जाए? इस तरह मंगरु के मन में ना जाने कितने प्रश्न उमड़-घुमड़ रहे हैं? चलचित्र की भाँति उनकी आँखों के सामने सारे दृश्य चमक रहे हैं। जब से मंगरु ने होश संभाला है; जब से मंगरु को अपने समाज के बारे थोड़ी-बहुत समझ आई है, वह विभिन्न सभा-सम्मेलनों में अवश्य हाजिर हुआ है। जब भी उसे मौका मिला है; वह सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक बैठकों में जरुर शामिल हुआ है। वह अधिकतम अपने सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक अगुओं के बारे अच्छी जानकारी भी रखता है। वह अपने समुदाय के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा लिखी गई अधिकांश रचनाओं से वाकिफ है। वह अपने आदिवासी लेखकों द्वारा रचित उनकी मुख्य कहानियाँ एवं कविताओं के बारे अच्छा ज्ञान रखता है। अपने समुदाय के बीच प्रकाशित होने वाली ऐसी कोई पत्र-पत्रिका न बची है, जिसका वह ग्राहक न हो। किस धार्मिक पंडित ने कहाँ और क्या संदेश दिया, उसके बारे भी वह थोड़ी-बहुत समझदारी रखता है। इसके बाद तमाम तरह के राजनैतिक नेताओं की हरकतों को तो वह भली भाँति समझता ही है। वह उन नेताओं की हर नब्ज को अच्छी तरह पहचानता भी है। मंगरु को अच्छी तरह ज्ञात है कि समाज के एक निम्न प्राणी से लेकर दिसोम गुरु तक, सभी अपने-अपने हिसाब से समाज उत्थान के कार्य में लगे हुए हैं। फिर भी हमारा समाज आगे बढ़ने के बजाय पीछे की ओर ही सरकते जा रहा है। क्यों? इसका मुख्य कारण क्या है? समाज अवनति की जड़ कहाँ छिपी हुई है? आज इन्हीं सवालों को लेकर मंगरु बीच भँवर में फँस गया है। वह उस भँवर से उबरने की भरपूर चेष्टा कर रहा है; पर दूर-दूर तक आशा की कोई किरण उसे नहीं दिखाई दे रही। जितना वह उस भँवर से निकलने की कोशिश कर रहा है; वह उतना ही अधिक प्रवाह से उसकी गहराई में धँसते चला जा रहा है।

मंगरु अपने समाज का एक अनुभवी प्राणी है। वह एक श्रेष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ही नहीं अपितु एक महान विचारक व चिंतक भी है। उसने ना जाने कितने घाटों का पानी पी रखा होगा। उसने जितना दूध पीया होगा, उतना तो शायद आपने पानी भी नहीं पीया होगा। अपने समाज के अंदर घट रही हर अच्छी-बुरी घटनाओं पर उसकी पैनी नजर रहती है। उन घटनाओं की बारीकी से छानबीन करना उसकी मजबूरी बन गई है। मंगरु ने अब तक जो जाना, देखा, सुना और सीखा; वह यही कि ग्वाला कभी अपने दही को खट्टा नहीं कहता है। ग्वाला अपने दही की बड़ाई करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता है। चाहे उस दही से सड़ांध की बू आ रही हो; फिर भी ग्वाला अंतिम क्षण तक अपने दही की प्रशंसा करते हुए नहीं थकता है। ग्वाला मर-मिट सकता है पर अपने दही का अपमान वह कभी सहन नहीं कर सकता। भला क्यों माने ग्वाला आपकी बात? ग्वाले के लिए दही ही है, उसका जीविका का एकमात्र साधन। इसी से ही होता है, उसके परिवार का भरण-पोषण। अतः ग्वाला यथार्थ से वाकिफ होते हुए भी, वह अपनी जिद पर अड़ा रहता है। इस तथ्य से आपको सहमत होने के सिवाय और कोई चारा ही नहीं रहता है। अतः आज मंगरु चीर-फाड़ कर अपने समाज की शल्य-चिकित्सा करने में जुट गया है। विगत दिनों की अपनी सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, ऐतिहासिक एवं राजनीतिक अवस्था का विश्लेषण करने में लीन हो गया है। वह सिदो-बिरसा के पश्चात् घटी घटनाओं का सविस्तार अध्ययन करने में तल्लीन हो गया है। ताकि मंगरु को अपने समाज पिछड़ने का सही कारण समझ में आ जाए; वह एक नहीं, पर अलग-अलग कोणों से अपने समाज का विश्लेषण कर रहा है। वह विभिन्न पहलूओं की ओर अपनी नजर दौड़ाता है। वह शोध करने के उपरांत अपने समाज अवनति का सही और सटीक कारणों का पता लगाना चाहता है। जाँच पड़ताल करने के बाद वह समाज में फैली बीमारी की असली जड़ को पकड़ना चाहता है; ताकि सुचारु रुप से उसका निदान किया जा सके। जिससे हमारा समाज खुशहाल और आनंदमय हो सके।

इतना महान चिंतक होते हुए भी आज मंगरु की सोच पटरी से नीचे उतर गई है। वह अपनी सोच को सिलसिलेवार तरीके से संपादन करने में असमर्थ हो रहा है। किन समस्याओं के बारे वह प्रमुखता से विचार करे, उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा। किन विषयों का वह गहनपूर्वक अध्ययन करे; वह घनी असमंजस की स्थिति में है। लेकिन उसने तय कर लिया है कि कुछ भी हो जाए; आज वह अपने समाज को एक नई सोच और एक नई राह दिखाने में कामयाब होकर ही रहेगा। वह अच्छी तरह जानता है कि कोई भी सभा-सम्मेलन हो, किसी भी तरह की कोई भी सामाजिक बैठकें हों, समाज पिछड़ने के जिन कारणों के ऊपर विशेष रुप से चर्चाएँ होती रहती हैं; उनमें प्रमुख है - अशिक्षा, गरीबी, मद्यपान, अंधविश्वास, कृषि, सहभागिता, विस्थापन, पलायन, बेरोजगारी, हासा-भाषा, संस्कृति, आरक्षण, डोमिसाईल, पेसा, परिसीमन, एमओयू आदि। इन विषयों के अलावे और भी कई ऐसे विषय हैं, जिन पर बारंबार चर्चाएँ होती रहती हैं। रोज चर्चाएँ होनी चाहिए, इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन अफसोस है कि इतनी चर्चाएँ होने के बावजूद भी आज हमारा समाज जस का तस खड़ा है। अर्थात् ढाक के वही तीन पात। जिस रफ्तार से हमारा समाज उन्नति की ऊँचाई को लाँघने की कोशिश करता है, वह उसी वेग से नीचे की ओर खिसकते भी जा रहा है। अगर हमारा समाज दो कदम प्रगति के पथ पर आगे बढ़ता है, तो चार कदम पीछे की ओर सरकता भी है। हमारे शिक्षाविदों का मानना है कि जब तक हमारा समाज शिक्षा की ओर विशेष ध्यान नहीं देता, तब तक हमारे समाज का उत्थान होना संभव ही नहीं, असंभव है। अशिक्षा ही एकमात्र कारण है कि हम पिछड़ते ही जा रहे हैं। तर्क देते हुए उनका मत है कि शिक्षा के अभाव में हम दुनिया की आधुनिक प्रतियोगिता की दौड़ से बाहर हो जाते हैं। उनके मतानुसार हमारे समाज का अवनति की गर्त में जाने का एकमात्र कारण है; अशिक्षा। अगर हम शिक्षित हो जाएँ तो सौ बात की एक बात, हमारी उन्नति में किसी प्रकार की कोई बाधा न रह जाएगी। अर्थात् उन्नति हमारे कदमों को चूमने के लिए मजबूर हो जाएगी। अतः हमारे समाज में मौजूद सभी समस्याओं का एकमात्र समाधान है; शिक्षा। लेकिन हमारे शिक्षाविद् शिक्षा के सही मूल्यों का आकलन करने से चूक जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि किताबी कीड़ा बन जाने से ही कोई महान पंडित नहीं बन जाता। महान बनने के लिए शिक्षा के साथ-साथ ज्ञान, विवेक और विद्या की भी उतनी ही जरुरत होती है, जितना कि सब्जी में नमक। साक्षात उदाहरण के तौर पर अपने समाज को ही देख लो। आजकल हर गली में पढ़े-लिखे युवक-युवतियाँ मिल जाएंगे। लेकिन वे किन समस्याओं से जूझ रहे हैं; ज्यादा जानने के लिए आप उन्हीं से पूछिए। वे बेचारे रोेजगार के अभाव में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। पढ़-लिखकर न तो वे हल जोतने के काबिल रहते हैं और न ही वे कुली-मजदूरी करने के लायक रह जाते हैं। देश में जनसंख्या इतनी बढ़ गई है कि नौकरी मिलना दुर्लभ हो गया है। कहीं भी नौकरी की कतार में खड़े हो जाओ; एक अनार सौ बीमार वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। अतएव खाली दिमाग शैतान का घर होता है। ऐसी हालत में कोई अनहोनी घटना घटे, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। शिक्षकगण भी हमारे बच्चों को किस तरह की शिक्षा दे रहे हैं; अभी तक तो कुछ समझ में नहीं आया। वे हमारे बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, पदाधिकारी, शिक्षक, शिक्षिका, नर्स, क्लर्क वगैरह तो बना रहे हैं; पर वे एक भी बच्चे को मालिक बनाने में विफल रहे हैं। वे एक भी बच्चे को स्वावलंबी बनाने में असमर्थ रहे हैं। यह भी सौ फीसदी सत्य है कि आजकल नौकरी की तलाश में हमारे बच्चों का मतिपलायन हो रहा है। इसीलिए तो झारखंड जैसे अपने प्रांत में आग लग जाए, सुदूर बैठे नौकरी करने वालों को उससे कोई मतलब ही नहीं। झारखंड मरे-जीए उन्हें कोई सरोकार नहीं। वे अपने समाज से इस कदर गायब हो जाते हैं; जैसे कि गधे के सिर से सींग। मजबूरी में वे अपने वतन को भूल जाते हैं। वे जहाँ भी नौकरी करते हैं; वे वहीं के होकर रह जाते हैं। सरकारी नौकरी करने वालों के लिए तो आचरण नियमावली की शर्तें ही कुछ ऐसी हैं कि वे राजनीतिक गतिविधियों में लिप्त नहीं हो सकते। अतः जहाँ कहीं भी, जब किसी समस्या के समाधान हेतु राजनीतिक दांव.पेंच खेला जाता है; वहाँ हमारे नौकरी करने वालों की उपस्थिति नगण्य हो जाती है। इस तरह किसी राजनीतिक जलसे-जुलूस में शामिल होने के लिए रह जाते हैं; कुछ गंवार और बेरोजगार किस्म के लोग। किसी ने ठीक कहा है कि अभी तक की शिक्षा नीति ने स्कूल, कॉलेज में पढ़ रहे विद्यार्थियों को सिर्फ सरकारी और गैर-सरकारी कर्मचारी ही बनाए हैं। उन विद्यार्थियों को वे मालिक बनाने में असफल ही रहे हैं।

शिक्षा जिस तरह दिखाई देती है; वास्तव में वह वैसी है नहीं। पोथी पढ़-पढ़कर अब तक तो कोई पंडित नहीं हुआ है। अलबत्ता यह खुला सत्य है कि शिक्षा कभी भी निष्क्रिय नहीं रह सकती है; या तो यह दास बनाती है अथवा मुक्ति प्रदान करती है। यही कारण है कि अब तक हमारे समाज में शिक्षा ने अपना जलवा दिखाते हुए अधिकांश लोगों को दास बनाकर बीच बाज़ार में मरने के लिए छोड़ दिया है। अगर यह तथ्य सत्य से परे होता, अगर शिक्षा का रुप सिर्फ मुक्ति दिलाना ही होता, अगर शिक्षा ही सभी समस्याओं का समाधान होता, तो आज हम सभी तरह के बँधनों से मुक्त हो गए होते। किसी भी तरह की कोई परेशानी नहीं होती। किसी भी प्रकार की समस्या हमारे सामने नहीं आती। और हम मुक्ति का जश्न मनाते हुए हर्षोल्लास के साथ आनंदमय जीवन बिताते। मुक्ति का अर्थ न तो गरीबी रहेगी, न अत्याचार होगा और न ही कोई किसी तरह की गुलामी की जंजीरों से बँधा रहेगा। अतः स्पष्ट हो गया कि सही शिक्षा के अभाव में झारखंड गठन के आठ वर्ष बाद भी हमारी स्थिति बद से बदतर होती गई है। इस रहस्य को ऐसे भी समझा जा सकता है; शिक्षा ने दुनिया में बहुत सारे वैज्ञानिकों को पैदा किया और उस शिक्षा की बदौलत उन्होंने बहुत सारे विध्वंसकारी यंत्रों यथा एटम बम, हाईड्रोजन बम, धरती से आकाश तक मार करने वाली मिसाइलें आदि आविष्कार करने में सफलता भी प्राप्त कर ली। उन खतरनाक बमों की वर्तमान परिवेश में क्या उपयोगिता है? क्या उन बमों को चिड़िया मारने के लिए बनाया गया है? कदापि नहीं। अपितु उन बमों से निश्चित रुप से हम मनुष्यों का ही संहार होगा। अब आप बताइए, क्यों अरबों रुपए उन बमों को बनाने में खर्च हो रहे हैं? क्या उन रुपयों को किसी दबे-कुचलों के कल्याणार्थ व्यय नहीं हो सकता था? हो सकता है। पर जो शिक्षा हमें मिली, उस शिक्षा से हमारी आँखें चौंधिया गई हैं। और हम मनुष्य संहार के रास्ते पर चल पड़े हैं। वाह री शिक्षा!

शिक्षा और विवेक एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पढ़-लिख लेने से ही कोई भी व्यक्ति बुद्धिमान नहीं कहलाता है। बुद्धिमान होने के लिए उसे विवेक की भी सख्त जरुरत होती है। आज की तारीख में हमारे बीच हजारों पढे़-लिखे लोग मौजूद हैं, फिर भी वे झारखंड बचाने में असफल ही रहे हैं। लेकिन हमारे महानतम शहीद सिदो-बिरसा की ओर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि वे कम पढ़े-लिखे थे। कितनी जमात तक की शिक्षा उन्हें हासिल हुई थी, इस बारे किसी को भी ठीक से ज्ञात नहीं। पर इतना सच है कि सिदो-बिरसा ने किसी विश्वविद्यालय का मुँह तक न देखा था। उनके पास किसी तरह की कोई डिग्री भी नहीं थी। लेकिन उन्होंने अपने विवेक का सही इस्तेमाल किया एवं अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने का बिगुल फूँक दिया। और उस संघर्ष के परिणामस्वरुप सिदो-बिरसा को क्रमशः संताल परगना और छोटानागपुर के जल, जंगल और जमीन बचाने में बहुत बड़ी सफलता मिली। सिदो-बिरसा के बलिदानस्वरुप ही हम अभी तक जीवित हैं; अन्यथा कब का हमारा राम नाम सत्य है हो गया होता। अतः सिद्ध हो गया कि न्याय पाने के लिए किसी तरह की कोई भी डिग्री की जरुरत नहीं होती। जरुरत है तो सही विवेक की।

हुल और उलगुलान घटित हुए कई वर्ष बीत चुके हैं। इस समय उनकी प्रासंगिकता से हम अनभिज्ञ हैं। लेकिन मारांग गोमके के बाद एक ऐसे मसीहा का उदय हुआ कि उसने समाज में हुल-सा वातावरण पैदा करने में सफलता प्राप्त कर ली। यह जीवंत उदाहरण है कि चालीस वर्षों से लोग उनकी जय जयकार करते आ रहे हैं। विधायक की तो बात ही छोड़ दीजिए, वह अपने बलबूते किसी समय छह सांसदों को दिल्ली दरबार तक भेजने में भी कामयाब हुए हैं। अकेले झारखंड में इस वक्त उनके पास चार सांसद और सत्रह विधायक हैं। और आप उनके मुखिया बने हुए हैं। यह मसीहा और कोई नहीं, उसे आप गुरु जी के नाम से खूब जानते हैं। गुरु जी पर आरोप-प्रत्यारोप लगाना बुरी बात है। उनकी शान के खिलाफ बोलना, किसी को शोभा नहीं देता है। यह अलग बात है कि इतना बड़ा समर्थन मिलते रहने के बावजूद भी उन्होंने अपने लोगों के लिए कुछ नहीं किया है। लेकिन उनको व्यक्तिगत रुप से गाली देना, कतई उचित नहीं। हो सकता है, आपके पास विश्वविद्यालय की ढेर सारी डिग्रियों की भरमार होगी। आप अच्छे पढ़े-लिखे और उच्च शिक्षित नेता होंगे। लेकिन आप अभी तक एक भी विधायक को जीत दिलाने में असफल ही रहे होंगे। फिर आप महान हैं या गुरु जी? निश्चित रुप से गुरु जी महान हैं। यह कड़ुवा सच है कि गुरु जी के पास किसी विश्वविद्यालय की कोई डिग्री नहीं, पर उनके पास निश्चित रुप से अच्छे विवेक की बहुतायत है। जिसकी वजह से वह आज की तारीख में आदिवासियों के सर्वमान्य नेता के पद पर आसीन हैं। अब आप बताओ, फिर क्या शिक्षा ही हमारी समस्याओं का एकमात्र समाधान है? शिक्षाविदों के अनुसार हो सकता है, समाज उन्नति का शिक्षा ही एकमात्र उपाय हो। अतः शिक्षाविद् ग्वाले की भाँति अपने दही को खट्टा मानने से ही इनकार करे, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

Monday, 18 August 2014

“A B O A K̕”

Oka do̱ “aboak̕” ar oka do̱ “onkoak̕”? Noa beoṛa sạri-sạrite bujhạu, unạk̕ alga katha do̱ baṅ kana. Onko do̱ ic̕ uru leka ṭhelaok̕tege menak̕koa je noa do̱ “aboak̕” kana, onate noage beohar jạruṛa. Himạl buru lekan kukli do̱ niạge je ce̱ť lekate ona do̱ “aboak̕” hoyena ar cedak̕ “aboak̕ge” beohar jạruṛa? Mẽ̱t̕te ńe̱lo̱k̕ lekate aṅga puṭạk̕ kho̱n ńindạ gitic̕ hạbic̕ sui kho̱n e̱ho̱p̕kate haḍga jahaj hạbic̕ sanamak̕ ma “onkoak̕ge” beoharok̕kan, ar tãhã no̱ṇḍe̱ do̱ “aboak̕” beohar reak̕re cedak̕ unạk̕ jo̱bo̱rjạsti do̱?

Sạriak̕tem me̱nlekhan noa “aboak̕” ar “onkoak̕” reak̕ lạpạṛhại calak̕kan reak̕ karo̱n (re̱he̱ť) do̱ ar eṭak̕re menak̕a. Ar ona karo̱n noa sadharo̱n mẽ̱t̕kinte do̱ baṅge ńe̱l oromok̕a, bicko̱m, ona do̱ ńe̱l oromok̕a sạri ạkil reak̕ mạli marsalte. Mit̕ nạmuna lạikate ona beoṛa do̱ bujhạu reak̕bon kurumuṭuia. Ar ona nạmuna do̱ noa leka - Mit̕ṭe̱n Ho̱ṛ oṛak̕ kana. Ona oṛak̕re bar boeha menak̕kinạ. Unkin boeha koṛa do̱ ạḍi jumit̕re menak̕kinạ. Onate jãhãe bạirige unkin do̱ ce̱t̕ge baṅko to̱tho̱c̕ daṛeạkinkana.

So̱mo̱e ạcurok̕ sãote unkin modre mit̕ boeha do̱ o̱lo̱k̕-paṛhaok̕e cet̕ idikeda. O̱ko̱e boeha o̱lo̱k̕ ạkile hame̱ṭkeť, uni do̱ cạkrire hõ̱e bo̱lo̱ena. Cạkri me̱nte uni do̱ oṛak̕ kho̱n oḍokok̕ hoyentaea. Ar oṛak̕re do̱ ac̕ huḍiń boehae bạgi oṭoadea. Me̱nkhan, o̱ko̱e boeha oṛak̕re menae dukre-bipo̱tre, re̱ṅge̱c̕re-tetaṅre jaogeye go̱ṛo̱ idiaekana. Unkinak̕ jibo̱n lạukạ do̱ ạḍi suk ar mulukte calao idik̕kan tahẽ̱kana.

Khan bạirikoak̕ mẽ̱t̕ do̱ unkin Ho̱ṛ boehawak̕ jumi-hasare kiṛbit̕ena. Ạḍi lekate onko bạiri do̱ unkin boeha koṛawak̕ jumi hatme reak̕ko kuṛpaṛkeda. Me̱nkhan, cạkrikan boeha mẽ̱t̕ marsale tahẽ̱kan iạte kạnun lekate ạkinak̕ jumi-hasa bạiri kho̱n rạkhi jogaore ac̕ boehae go̱ṛo̱ idiaekan tahẽ̱kana.

Bạiriko do̱ unkin boeha koṛawak̕ ranajo̱ṭ ńe̱lte ạḍi thar-thrao arko bo̱to̱rena. Bujkedako, je tin hạbic̕ nukin boeha koṛawak̕ ranajo̱ṭ baṅ rạpudok̕a, un hạbic̕ nukinak̕ jumi-hasa hatme do̱ muskil hataṛgea.

Nukin boeha koṛaren bạiri akoak̕ buddhiko lagaokeda. Buddhi me̱nte do̱ niạge je nukin boehawak̕ jumit̕te̱t̕gebon rạput̕lege. Ar ona buddhi do̱ sidhạ kathate - Divide and rule (फूट डालो और राज करो, Hạṭińem ar Rajok̕me) reak̕ phạrmulako apnarkeda.

Ona phạrmula lekate onko bạiriko do̱ o̱ko̱e oṛak̕rege menae boehawak̕ luturre ạḍi lekan ạuṛi-sạuṛi kathako lại pe̱re̱c̕adea. Uni cạkrire menae boeha birudre ạḍi lekan sea-sĩṛĩc̕ kathate uniak̕ luturko tube̱t̕ pe̱re̱c̕keda. Uniko lạiaekana je nõ̱k̕õ̱e am do̱ jumi-hasarege odoe-balbalem khaṭaok̕kana, ar uni do̱ ho̱e-batas bijli marsalreye tahe̱nkana. Uni do̱ Iṅgrạjite hõ̱e ro̱ṛ daṛeak̕kana, mõ̱ńj-mõ̱ńj kicric̕-khạṇḍuạk̕e ladeyet̕kana ar onkage oka lekate cạkri boeha cetan hirkhạ janamae, onkan kathate uni raṅgaok̕ lạgit̕ko uskur idiyedea. Nunạk̕ hạbic̕ko lạiaekana je uni mae cạkrikan, onate amak̕ jumi-hasare uniak̕ do̱ cc̱t̕ ho̱kge bạnuk̕taea. Onkage ar emanteak̕.

Oka “aboak̕” reak̕ katha ro̱ṛogo̱k̕kan, ona ma maṛaṅre Santali lipire lagao lahalen. Nit cedak̕ eṭak̕ko hõ̱ akoak̕ o̱lo̱k̕ dharakore resultant vowelre (gạhlạ ṭuḍạk̕ - akho̱r latarre ṭuḍạk̕ - .) ko lagaoet̕kana? Nạmuna - ạ, आ़ eman. ...

Mucạt̕re niạge je namjạdi Santal Hul o̱kte̱re Ho̱ṛ ho̱po̱nre oka jumit̕te̱t̕ tahẽ̱kan, ona jumit̕te̱t̕ (ranajo̱ṭ) rạput̕ giḍikak̕ lạgit̕, noko Ho̱ṛren bạiri do̱ tinạk̕ hạbic̕ko calao daṛeak̕a, unạk̕ hạbic̕ko calak̕a, je̱mo̱nko gulạm daṛeako.

Nạmuna pase̱c̕ unạk̕ do̱ baṅ jothatlen, me̱nkhan, oka “Hạṭińem ar Rajok̕me” reak̕ phạrmula kan, ona do̱ sạrigea.

Nạbi katha do̱ niạge je judi Ho̱ṛ ho̱po̱nko o̱kte̱ tahe̱nre baṅbon ạkilok̕a, to̱be̱ aboak̕ mo̱ro̱n do̱ khạṭi utạrgea.

Saturday, 19 January 2013

CETE REAK̕ TOPOT̕?

Cete reak̕ topot̕?
Cete reak̕ kạphạri?
Cete reak̕ be̱ne̱-bạiri?
Mit̕ ṭhenlaṅ kucạlena,
Mit̕ toalaṅ je̱mbe̱t̕len,
Haere hae dhạrtire do̱!
Balaṅ saho̱p̕len.
Nagam reak̕ anacurre,
Apat̕enlaṅ, begarenlaṅ;
Nagamiạko sạbit oṭokat̕,
Amaṅ ro̱ṛ, amaṅ rạṛ,
Le̱ske̱˗be̱ḍe̱r bo̱ḍe̱yen,
Deko sãote ghar˗ghạrien,
Kabra koṭha gabaoen,
At̕kedam amak̕ oprom,
Pheraoenam bardũṛũc̕re,
Dạlil noa baṅgem aṅgo̱c.
Saṅge ale boeha amren,
Taseyenle, tarseyenle,
Goṭa Nepal, Baṅglade̱s,
Mit̕getale ro̱ṛ˗landa,
Mit̕getale e̱ne̱c̕˗sereń.
Sạri noa nạthien,
Giyạrso̱nak̕ bạhire.
Sạkhi kanae nagam,
Mẽ̱t̕ marsal baṅre hõ̱,
Ńe̱ńe̱lkoak̕ ho̱ṭo̱rlet̕le mẽ̱t̕,
To̱be̱te̱ṛo̱ṅ HUL niạ,
Mit̕ judạ disom sirjạulena.
Jumi niạge HUL do̱ baṅ,
Pạrsi HUL hõ̱ salgaolena,
Ona reak̕ bijir˗bilis,
Pạrsi baganre bahaena,
Nana ro̱ṅan saṛ bahako.
Baṅ kana re̱pe̱c̕ ciki reak̕,
Baṅ kana kạphạri lipi reak̕,
Amaṅ ro̱ṛ, amaṅ landa,
Sạgunkok̕ ma amaṅ racare.
"Cupud sumuṅ jivi abinag,
Cag do abin galoceda?
Saṅgi hoṛre ladi lagid,
Abinag ona bagaṛ Santaṛi."
Dho̱ro̱m reak̕ ạphim sãote,
Cak̕ do̱m ghaṇṭaet̕ o̱l cemed?
Jumi˗jagako lilạmet̕kan,
Era˗ho̱po̱nko santaoet̕le,
Onko sãote cak̕ do̱ haere,
“Mit̕ gaṇḍo, mit̕ mạci.”
Dinạ-rate go̱so̱ṅ-go̱so̱ṅ.
Amaṅ racare amaṅ akhṛa,
Ińaṅ racare ińaṅ akhṛa,
To̱be̱rege akhṛa sohanok̕.
Bạrphại menak̕ onarege,
Suluk̕ seteńok̕ onarege,
Balaṅ topot̕ boeha kanlaṅ,
Bạiri de̱ ma oromkolaṅ,
Bạiri baṅkhan merel-merel,
Jaejug lạgit̕ bhaṇḍankalaṅ.

Sunday, 30 June 1996

मैं आ रहा हूँ : हूल 

भादो का महीना। बेला गोधूली। कभी धूप तो कभी छाँव। मौसम के मिजाज के बारे किसी को नहीं मालूम। राजमहल की पश्चिम दिशा पहाड़ियों से आच्छादित। उस पर्वतमाला के ऊपर कारे-कारे बादल मंडरा रहे थे। ठीक उसी समय चरवाहे अपने मवेशियों को घर की तरफ हाँकने के लिए तैयारी कर रहे थे। गाँव की बालाएँ पनघट से पानी लेकर लौट चुकी थी। सनसनाती हवाओं ने आँधी-तूफान का रुप ले लिया। आकाश में बिजली चमकी और उमड़ते-घुमड़ते बादल के खंड एक दूसरे से टकराने के बाद हड़ हड़ाने की आवाज के साथ ही आसमान गूँज उठा। बारिश तो नहीं पर बूँदा-बूँंदी की वजह से धरती जरुर गीली हो गई। कृषक व खेतिहार मजदूर खेत-खलिहान से घर की ओर लौट चले। पक्षी दिनभर की मेहनत के पश्चात् अपने डेरे आ चुके थे। बस्ती में फूस के छप्परों पर धुआँ ही धुआँ दिखाई देने लगा। आसमान ने चुप्पी साध ली। क्षितिज में अँधेरा छा गया। फिर घनघोर अँधियारे ने गाँव-बस्ती को अपनी आगोश में ले लिया। थोड़ी देर में पुनः बादल-बिजली की टकरोपरांत एक अनहोनी आकाशीय आवाज गूँज उठी -  मैं आ रहा हूँ ... मैं आ रहा हूँ ... मैं ...। मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कहाँ से आ रहा हूँ? मेरा परिचय देने की जरुरत नहीं। जब भी आपने मुझे याद किया है, मैं आपके दरवाजे पर हाजिर हुआ हूँ। किसी जमाने में तिलका मुर्मू, बुधू भगत, सिदो मुर्मू, बिरसा मुंडा आदि के आह्वान पर मैं अलग-अलग रुपों में उनकी सेवा में हाजिर था। पर अब मैं आपकी उपेक्षा के कारण अज्ञातवास का जीवन जी रहा हूँ। मैं मानवप्राणी नहीं, जो परलोक के बाद इस संसार पर आ नहीं सकता।

मैं आऊँगा ... और निश्चित रुप से आऊँगा। एक बार नहीं, हजार बार आऊँगा। मेरा कोई अमीर दोस्त नहीं। उनसे मेरा दूर-दूर तक कोई रिश्ता भी नहीं। मेरा उनसे साँप-नेवले का संबंध है। मैं गरीबों का मसीहा हूँ। मेरा स्मरण करो और मैं आपके सम्मुख हाजिर हूँ। इतनी जल्दी मुझे भूल जाओगे, मुझे आशा नहीं थी। मैं कौन? मस्तिष्क पर जोर दो। याद करो कुर्बानी सन् 1855 की। स्वतंत्रता संग्राम की पहली जयघोष। मुझे नहीं भाता राजकीय शानो-शौकत। मुझे नहीं चाहिए मखमल की चादर। जरुरत नहीं सोने के चम्मच की। तमसी भोज्य से है मुझे नफरत। धिक्कार है राजसी ठाट-बाट की। मैं पसंद करता हूँ पैदा होना ढिबरी तले छोटी-सी कुटिया में। सुनना चाहते हो मेरी आत्मकहानी? सुनो, बताता हूँ मैं स्वयं अपनी जुबां से।

आज से ठीक 153 वर्ष पूर्व की कहानी है। पूरा प्रदेश झाड़-जंगलों की चादर से लिपटा हुआ था। वन्य प्राणियों का साम्राज्य था उस पर। कौन से जानवर नहीं थे उस वन-जंगल में? दुनिया के तमाम जंगली जानवरों का बसेरा था। तीतर-बटेर से लेकर डायनासॉर की प्रजाति थी राजमहल की पहाड़ियों पर। बड़े.बड़े फलदार वृक्ष, कंद-मूल और सुगंधित फूलों से सजा वन-उपवन। नदी-नाले और झर-झर करते झरनों का है उद्गम। दूर-दूर तक मानवगंध उपलब्ध नहीं। लेकिन छोटी-छोटी टोलियों में आदिमानव जरुर थे। यह छोटी सी जनसंख्या राजमहल पहाड़ी के उत्तरी हिस्से में निवास कर रही थी; जो बाद में मालेर (माले/सावरिया पहाड़िया) जनजाति के रुप में पहचानी गई। यह वही प्रदेश है; जिसे आज आप संताल परगना के नाम से जानते हैं।

देश में फिरंगियों का साम्राज्य था। आश्चर्य की बात! मुट्ठी भर अंग्रेज पूरे देश के मालिक बन बैठे थे। उनके बगैर आदेश पेड़ के पत्ते भी नहीं हिलते। भारतीयों की बोलती बंद थी। कौन बाँधे बिल्ली के गले में घंटी? अठारहवीं सदी का आखिरी पड़ाव। जंगल साफ करने में निपुण संताल आदिवासी। वे कर्मयोगी, कर्मठ और कुशल थे। उनकी रग-रग में सत्य और ईमानदारी की प्रतिछवि थी। वह प्रकृति का प्रेमी और माराङ बुरु का पुजारी था। माँदर की थाप पर वह बेसुध रहनेवाला प्राणी था। अंग्रेजों की उन पर नजर पड़ी। अंग्रेजों ने इन आदिवासियों को मूलतः जंगल साफ करने के लिए ही बीरभूम, मिदनापुर, मानभूम, धालभूम और हजारीबाग आदि जगहों से आमंत्रित किया। मेहनत के धनी ये आदिवासी जंगलों को एक छोर से साफ कर रहे थे और साथ-साथ अपना ठौर भी बनाते जाते थे। बदले में जमीनदारों के मार्फत सरकार को कर अदा करते। जमीन जरुरत से ज्यादा उपजाऊ थी। अतः थोड़ी मेहनत से ही अत्यधिक फसल होती थी। हँसी-खुशी और हर्षोल्लास के साथ समय बीत रहा था। आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत हो रहा था। पर यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिक न पाई। खुशियों भरे जीवन पर जल्द ही ग्रहण लग गया था।

आदिवासियों का संताल परगना में प्रवेश करने के थोड़े ही अंतराल में मुट्ठी भर विदेशी यथा पूरब से मोईरा बंगाली और पश्चिम से भोजपुरियों (बिहारियों) का आगमन हुआ। देशी भाषा में इन विदेशियों को दिकु नाम से पुकारा जाने लगा। बंगालियों ने महाजनी व बिहारियों ने फेर-बेपारी का धंधा शुरु कर दिया। तेल-नून व कपड़े-लत्ते के चक्कर में पूरा आदिवासी समाज ऋण में फँसता चला गया। सूद इतना ज्यादा कि आदिवासी पीढ़ी दर पीढ़ी गुलामी व बेगारी खटने के लिए मजबूर हो गए। आदिवासियों को बीस तक गिनती न आती थी। ऋण के चंगुल में सोना उगलती जमीन, गाय-बैल व मासूम स्त्री-बच्चे सब बिकते चले गए। भारी भरकम मालगुजारी ने भी इनकी कमर तोड़कर रख दी। महाजन व जमीनदारों ने जी भरकर आदिवासियों को लूटा। अत्याचार की सारी सीमाएं लाँघ दी गई। चारों ओर हाहाकार मच गया। भागलपुर और जंगीपुर में स्थित कचहरी आदिवासियों की पहुँच से बाहर की बात थी। अतः वे न्याय से कोसों दूर हो गए। आदिवासी लोग अनपढ़ के साथ-साथ भाषाई समस्या से भी अत्यधिक पीड़ित थे। वे परेशान हो उठे थे, झूठ की व्यापकता, साहबों (अंग्रेज प्रशासकों) की लापरवाही, महाजनों की लूट-खसोट, आमला-पियुनों के भ्रष्टाचार एवं पुलिसों के अत्याचार से।

आदिवासी दुःख के इन पहाड़ों को देखकर चिंतित हो उठे। फिर मैंने इनकी कोख में धीरे-धीरे पनपना शुरु कर दिया। समाज के माँझी-परगना नींद से जाग उठे थे। गाँव-गाँव में कुल्ही दुड़ुप् (ग्राम सभा) करने का आयोजन शुरु हुआ। गाँव के तमाम रैयत उस सभा में शामिल होते और उस सभा में समाज की दशा और दिशा तय करते। कैसे हो समाज का उद्धार? कैसे हो अत्याचारियों से मुक्ति? कैसे हो शेरों के जबड़ों से छुटकारा? इन तमाम समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए लोग उतावले हो उठे। चारों ओर वैचारिक क्रांति की आग सुलग गई। मुक्ति का एक ही उपाय, एक ही राह बची - हमारा गाँव, हमारा राज कायम करना। इतना कुछ होने तक मैं इस धरा पर पदार्पण कर चुका था। मैं प्रत्येक आदिवासी के दिलोदिमाग में प्रवेश कर गया था। आदिवासियों ने अपना राज कायम करने की ठान ली थी।

तभी संताल परगना के पूर्वी छोर में रेल लाईन बिछाने का कार्य शुरु हुआ। ऋण से दबे आदिवासी क्या करते? वे अपना घर-बार छोड़कर टिड्डी की भाँति काम की तलाश में निकल पड़े। सपरिवार रेल बिछाने की मजदूरी में जुट गए। अनाप-शनाप मजदूरी मिली पर महाजनों की धोखाधड़ी और कपट चाल के कारण ऋण की अदायगी न हो पाई। इसके विपरीत रेलवे के इंजीनियर, ठेकेदार एवं मुंशी वगैरह आदिवासी बालाओं को बुरी नजरों से घूरने लगे। माँ-बहनों की इज्जत से कोई खिलवाड़ करे, आदिवासियों से रहा न गया। उनका खून खौल उठा और उनसे बदला लेने की कसमें खाने लगे।

माँझी-परगनाओं की बैठकों में लिए गए निर्णयानुसार; अपने ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ लिखित माँग पत्र तैयार किया गया और उनकी प्रतिलिपि सारे संबंधित मैजिस्ट्रेटों को भेज दी गई। महीनों बीत जाने के बाद भी इस पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नजर नहीं आई। फिर मौखिक रुप से शिकायत करने के लिए माँझी-परगना के प्रतिनिधि मंडल ने जंगीपुर, देवघर और भागलपुर का दौरा किया। वहाँ भी कोई सुनवाई नहीं हुई। अंत में कोई उपाय न देखकर आदिवासी लोग सब से बड़े हकीम/लाट साहब, जिसका पदस्थापन कोलकाता में था, उनसे भेंट करने हेतु पैदल मार्च करने के लिए मजबूर हो गए। लॉर्ड वायसराय के पास पहुँचकर आदिवासियों ने जी भरकर रोते हुए अपना दुःखड़ा सुनाया पर उनकी आपबीती पर उसे भी कोई दया न आई। उनके कान में जूँ तक न रेंगी। इतनी दूर से शिकायत लेकर जाने पर तो शायद भगवान भी पसीज जाते पर चुरूट की कस लेने में मशगूल लाट साहब अपने में ही मस्त रहे। बेचारे आदिवासी मुँह लटका कर खाली हाथ घर वापस आ गए।

आदिवासियों को साफ दिखाई दे गया कि अब उनके लिए कहीं से कोई न्यायोचित इंसाफ की आस नहीं। उनके लिए न्याय के सारे दरवाजे बंद हो चुके थे। अब मैं जवानी की दहलीज पर खड़ा था। अंतिम उपाय के रुप में लोग मेरी ओर आशाभरी नजरों से देखने लग गए। जैसे, मैं ही हूँ उनका एकमात्र मुक्तिदाता। अब आप जानना चाहोगे मेरा नाम? आदिवासियों ने मेरा नामकरण किया हुआ था "हूल"। हूल शब्द की उत्पत्ति कहाँ से हुई, यह अब भी रहस्य बना हुआ है। मुंडारी भाषा समूह के भाषाविद् भी इस शब्द की परिभाषा देने में असमर्थ रहे हैं। इस शब्द का शाब्दिक व साहित्यिक अर्थ समझाने में भी वे विफल रहे हैं। दुनिया की किसी भी भाषा में इसका सटीक अर्थ उपलब्ध नहीं। संक्षेप में हुल का मतलब ऐसा भी हो सकता है - जब इंसाफ के लिए न्याय के सारे दरवाजे जानबूझ कर बंद कर दिए जाएँ; तो न्याय पाने के लिए जो कार्रवाई की जाती है; उसे हूल कहा जाता है। बताते चलें कि इस शब्द का उपयोग इतिहास में सिर्फ एक ही बार हुआ है। वह है संताल हुल - 1855। भविष्य में इस शब्द का कभी उपयोग होगा, संदेह है। हिन्दुस्तानी में हूल शब्द रिश्ते में विद्रोह, बगावत, बलवा और क्रांति के दादा जी हैं।

नादान और भोले-भाले आदिवासियो की ऐसी नाजुक हालत देखकर मारांङ बुरु (सिंग बोंगा) की आँखों में आँसू आ गए। उसने भोगनाडीह के चुनू मुर्मू के सुपुत्रों सिदो, कान्हू, चाँद और भैरो को अलग-अलग रुपों में सात बार दर्शन दिए। वरदान देते हुए उसने उन्हें अपना राज्य स्थापित करने का आदेश दे दिया। फिर क्या था? चारों दिशाओं में शाल-पत्र व नगाड़े की धुन द्वारा भोगनाडीह में 28-30 जून, 1855 को एक विराट आमसभा आयोजित होने की सूचना दी गई। 30 हजार की भारी भरकम जनसंख्या ने अपने परंपरागत हथियारों से लैस उस आमसभा में शिरकत किया। तीन दिनों तक चली आमसभा में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि मारांग बुरु के आदेशानुसार अब एक ही उपाय रह गया है - हूल का प्रारंभ करना। मारांङ बुरु ने यह भी आदेश दिया है कि हूल का श्रीगणेश करने के लिए वह एक संकेत देगा। इस आमसभा में भी कई प्रस्तावना पारित किए गए एवं 15 दिनों का समय देते हुए, उसे संबंधित मैजिस्ट्रेटों को माँग-पत्र के रुप में भेज दिया गया। मैं अब प्रत्येक आदिवासी के जेहन में प्रवेश कर गया था। स्त्री हो या पुरुष, बच्चे हो या बूढ़े, सब के दिमाग में मैं घर कर गया था। चारों ओर मेरी और सिर्फ मेरी ही चर्चा होने लगी थी। मैं बिल्कुल तैयार बैठा था। सिर्फ इंतजार था तो उस शुभ संकेत का, जिसे मारांङ बुरु ने बताया था। आखिरकार, वह शुभ घड़ी आ ही गई। 7 जूलाई, 1855 को अत्याचारी केनाराम भगत की मिलीभगत से कुछ बेगुनाह आदिवासियों को गिरफ्तार किया गया था। कुख्यात दरोगा महेश लाल दत्ता बरहेट के रास्ते उन कैदियों को भागलपुर जेल ले जा रहे थे। पाडेरकोला के शाम (टुडू) परगना ने उन बेकसूर आदिवासियों को छुड़ाने की भरसक कोशिश की। लेकिन वे असफल रहे। हुल के चाणक्य कहे जाने वाले शाम परगना ने विवेक से काम लिया एवं तत्क्षण एक तेजधावक युवक को भोगनाडी इसलिए दौड़ा दिया ताकि वे सिदो-कान्हू को इस घटना की सूचना दे सके। यही माराङ बुरु का संकेत है; सिदो मुर्मू को समझने में कोई देर न हुई। उसने खतरा-संकेतिक नगाड़ा बजाने का आदेश दे दिया। तड़के भोर होते ही हजारों लोग बरहेट के समीप पाँचकठिया में एकत्रित हुए, क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि महेशलाल दरोगा इसी रास्ते से होकर कैदियों को भागलपुर ले जाएंगे। मुर्गे की दूसरी बाँग होते ही महेश लाल महायोद्धा की तरह खुद घोड़े पर सवार उन कैदियों को चाबुक से हाँक रहे थे। साथ में केनाराम भगत अन्य बरकंदजों के साथ चल रहे थे। महेश लाल दरोगा पाँचकठिया वट वृक्ष के नीचे हजारों की भीड़ देखकर सहम गए। उसे माजरा समझ में न आया। सरकारी रोब दिखाते हुए उसने भीड़ को चीरते हुए कैदियों को आगे ले जाने की हिम्मत जुटाई पर सामने कान्हू मुर्मू की दहाड़ सुनकर वे सिहर उठे। दरोगा को काटो तो खून नहीं।

गरमागरम बहस में कान्हू मुर्मू ने चिंघाड़ते हुए दरोगा से कहा - "यह मेरा देश है और ये मेरी प्रजा हैं। इन्होंने कोई गुनाह नहीं किया है। अतः इन्हें बाइज्जत रिहा कर दो।" पर दरोगा अपनी जिद पर अड़े रहे और सरकारी काम में बाधा डालने वाले को सख्त से सख्त सजा देने का फरमान सुना दिया। तब तक भीड़ में से किसी ने गरभू देशमाँझी जो कैदियों में से एक था की हथकड़ी खोल दी। हथकड़ी खुलते ही गरभू देशमाँझी ने भीड़ के किसी व्यक्ति से फरसा छीनते हुए आव देखा न ताव; अपने जानीदुश्मन केनाराम भगत पर वार कर दिया। गरभू देशमाँझी ने मेरा नाम अर्थात् हूल ... हूल का हुंकार भरते हुए केनाराम भगत का सिर धड़ से अलग कर दिया। एकत्रित भीड़ बाकी कैदियों को भी छुड़ाते हुए दरोगा महेश लाल और उनके सहयोगियों पर टूट पड़ी एवं उनकी हत्या कर दी। सुबा ठाकुर सिदो मुर्मू ने हुल का एलान कर दिया। उसने आदिवासी सैनिकों को आदेश दे दिया कि जो अत्याचारी हैं, उन्हें तलवार की धार दिखा दो एवं जो इन्हें बचाने आएगा, उन्हें अपने देश से बाहर खदेड़ दिया जाए। आदिवासी सैनिकों और अंग्रेज सिपाहियों के बीच घमासान युद्ध हुआ। हुल थमने का नाम नहीं ले रहा था। चारों दिशाओं में आदिवासी सैनिकों का परचम लहरा रहा था। मजबूर होकर अंग्रेज प्रशासकों को 10 नवंबर, 1855 को मार्शल लॉ लागू करना पड़ा। तब तक हुल के महानायक सिदो मुर्मू को छलपूर्वक गिरफ्तार किया गया और उन्हें अपने जन्मस्थल भोगनाडीह मेें तत्कालीन सुपरिन्टेन्डेंट जेम्स पोन्तेत द्वारा भारी भीड़ के सामने फाँसी दे दी गई। हुल में आदिवासी सैनिक बेशक हार गए पर वे अपना लक्ष्य प्राप्त करने में विजयी रहे। महानायक सिदो मुर्मू एवं 60 हजार आदिवासी सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। पर उन शहीदों के खून से आदिवासियों के लिए एक अलग प्रदेश संताल परगना का गठन 22 दिसंबर, 1855 को कर दिया गया। जहाँ आदिवासियों को स्वशासन की पूरी छूट दी गई। इस तरह मैं अपने मिशन में कामयाब हो गया।

वक्त बदलता गया। आदिवासी अपनी मस्ती में सारे होश खो बैठे। अपना मतलब पूर्ण होने पर मैं अंडे के छिलके की तरह फेंक दिया गया। कुछ ही वर्षों के बाद शनैः-शनैः आदिवासियों की हालत फिर बिगड़ती गई। कुख्यात दरोगाओं और अत्याचारी महाजनों का पुनर्जन्म होने लगा। आदिवासियों को फिर वही अंग्रेज काल की दशा झेलनी पड़ गई। मारांङ गोमके और दिशोम गुरु का उदय हुआ भी, पर आदिवासियों की हालत जस की तस बनी रही; क्योंकि बारंबार मेरी भ्रूण हत्या हो रही थी। कोई जोड़ा बैल में जुड़ रहा था तो कोई साढ़े तीन करोड़ में बिक रहा था। और तो और सिंग बोंगा द्वारा प्रदत्त झारखंड प्रदेश की रक्षा करने में आदिवासी विफल रहे। आदिवासियों की इस तरह बिगड़ती हुई हालत देखकर मुझे दया आ रही है। आदिवासियों को बचाने हेतु मैं पुनः आऊँगा। इंतजार है, तो बस उस 30 जून का, जिसमें सर्वसम्मति से हूल करने की घोषणा की जाएगी।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...