Sunday, 21 August 2022

HAERE, HAERE, HAERE MANEWA!

De̱sre do̱ disạmre do̱ haere manewa!
Haere, haere, disạm manewa,
Cete lạgit̕ko kạuạ rạuạkan?
Ańjo̱mpe họ dhạrti manewa,
Cete lạgit̕ko ho̱mo̱r halaṅkan?
Ate̱npe họ disạm manewa,
Haere, haere, haere bachare, dhạrtire do̱
Le̱me̱ń tejoko upạlakan họ.

Bạnuk̕tako họ jeleń gạdi hõ̱,
Bạnuk̕tako họ uḍạuk̕ gadi hõ̱,
Ho̱e lekako ạpira,
Goṭa disạmko dham dhase̱rkeť.

Le̱me̱ń tejoge Ko̱ro̱na họ,
Ạḍige co̱ko bo̱to̱rana họ,
Haere, haere, haere bachare, dhạrtire do̱
Le̱me̱ń tejoko chạplạuena họ.

Jak̕lere Ko̱ro̱na họ,
Jo̱ṭe̱t̕lere Ko̱ro̱na họ,
Ucạṛ-nacaṛ Ko̱ro̱na họ,
Ko̱ro̱na do̱ ho̱e ruạ kan.
Sińregebon tahe̱na họ,
Po̱ṭo̱mrege họ bańcao menak̕a,
Siń Po̱ṭo̱m hukum dela họ,
Noa babon do̱ho̱ lo̱ṭo̱m họ.

Ko̱ro̱na kho̱n bańcaok̕ lạgiť họ,
Ko̱ro̱na kho̱n rophak̕ lạgiť họ,
Tahe̱nabon họ Siń Po̱ṭo̱m,
Ạuṛi sạuṛi babon dãṛãe họ.

Babon jagok̕ bhiṛre họ,
Babon jo̱ṭe̱do̱k̕ hạni nhạ̃i ṭhen,
Sapha sạphibon tahe̱na họ,
To̱be̱khange bańcao menak̕ họ.

Sạṅgiń sạṅgińbon tahe̱na họ,
Sor sopor do̱ alokhange,
Haere, haere, haere, Ko̱ro̱na do̱
Jo̱to̱kotebon laga ḍigire.
So̱nto̱r, so̱nto̱r, so̱nto̱rabon họ,
So̱nto̱rrege họ bańcao menak̕ họ,
So̱nto̱rrege jio̱n-mo̱ro̱n,
So̱nto̱rrege jio̱n menak̕ họ.

Monday, 8 August 2022

OKAENAPE HULGẠRIẠ?


Okaenape Baba Hulgạriạko?
Jarwalenpe 30 Jun 30 hajar,
Bhognaḍi ghuṭure re̱ť-te̱pe̱ť,
Cak̕ do̱ nisun teheń Bhognaḍi?
Siṛạgeťae Pańckạṭhiạ baṛe,
Kathae, o̱ṇḍe̱ge baṅ liṅgilen,
Hul reak̕ pạhil hubạk̕ hule hul.
Kaṭjibạ, kurmutạha sumạrlenkin,
Sãote 14 jo̱n saheb seta hõ̱,
Maṅgaṛ gupiko kol ocoen.
Salgaokedae Hul se̱ṅge̱l,
Gạrbhuak̕ mẽ̱ť arak̕en dugur,
Serma ṭuṅgạu aṛaṅ Hul, Hul.
Bir se̱ṅge̱l Hul salgaoen,
Goṭa ṭạṇḍi dhạu-dhạu.
Cete reak̕ Hul, cedak̕ Bul?
Nera niạ nuru niạ,
Ḍiṇḍạ niạ bhiṭạ niạ.
Mãyãm gaḍa liṅgilena,
Mãyãm kạlite khõ̱ṇḍena,
Apnar disạm, apnar raj,
Sona Santal Pargana!
Me̱nkhan nit?
Nit do̱ sagal-sagal Kena-Beca,
Kurmutạha Mahes Do̱ro̱ga.
Nera-nuru, jo̱l-jumi,
Jimạyen porer tire,
Ceka baṅ michạyen HUL?
Dak̕en mãyãm sạkiťena.
Gujuk̕ kũṇḍre Hul bõ̱ṅso̱, 
Hae! Okaenape Hulgạriạko?

Tuesday, 2 August 2022

आखिर इसकी जड़ कहां है?

कोई भी घटना घटित होने के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण अवश्य होता है। अपने आप कोई भी घटना घटित नहीं होती है। इसके पीछे कोई कारण अवश्य रहा होगा कि यह घटना घट गई। लेकिन हम अक्सर उन वैज्ञानिक कारणों को नहीं जान या पहचान पाते हैं, बल्कि मान जाते हैं और उस पर विश्वास करने लग जाते हैं। इसी को कहा जाता है - अंधभक्ति और इसकी पूजा करने वाले को अंधभक्त। एक छोटा-सा उदाहरण लेते हैं। अभी-अभी इसी सड़क से एक नौजवान सरपट दौड़ा जा रहा था। इसके ठीक दो सेकंड पहले ही एक बस भी चली गई। लोगों ने देखा कि उस नौजवान के पीछे एक कुत्ता भी भागा जा रहा था। आस-पास के लोगों से पूछा गया कि आखिर वह नौजवान क्यों दौड़ रहा था? इस पर लोगों की अलग-अलग राय थी। किसी ने कहा कि बेचारा नौजवान! उसको कहीं जाना था। इसलिए वह बस पकड़ने के लिए दौड़ रहा था। परंतु उसकी बस छूट गई। किसी और ने बताया - गलत। देखते नहीं हो, उस नौजवान के पीछे एक कुत्ता दौड़ रहा था। वह नौजवान कुत्ते के डर से भागा जा रहा था। जितने मुँह, उतनी बातें। जब इस मसले पर अच्छी तरह शोध किया गया, तो पता चला कि वह नौजवान न तो बस पकड़ने और न ही कुत्ते के डर से भाग रहा था। बल्कि यह तो उनका दैनिक जीवन की एक दिनचर्या थी। वह कसरत/व्यायाम कर रहा था।

इस वक्त संताल जगत में लिपि की चर्चा ने सबकी नींद हराम कर रखी है। सभी बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दीवाना बने फिर रहे हैं। सभी अपने आपको महान भाषावैज्ञानिक साबित करने में लगे हुए हैं। एक पक्ष का दावा है कि इस लिपि विशेष से दुनिया की तमाम भाषाएँ शुद्ध-शुद्ध लिखी जा सकती हैं, यहाँ तक कि चाइनीज भाषा को भी लिखा जा सकता है। इस पक्ष का कोई ... पति नामक महापण्डित विदेश भ्रमण पर निकला था। उसके अनुसार इस लिपि को जल्द ही दुनिया के तमाम राष्ट्र अपनाने जा रहे हैं। अरे भई, आपको अग्रिम मुबारक हो, आपकी लिपि यथाशीघ्र दुनिया की लिपि बन जाए। लेकिन इतना तो बता जा कि आपकी लिपि कहीं चोरी की हुई लिपि तो नहीं है? यह वर्णमाला नहीं अपितु यह शब्दमाला है। 

संयोग ही कहा जाएगा कि जब दक्षिण में ओ़ल चिकी लिपि का आविष्कार हो रहा था, तब उत्तर (संताल परगना) में 7 खण्डों में संताल विश्वशब्दकोश बनकर तैयार हो चुका था। इतना ही नहीं, उसी समय जब भारतीय भाषाई सर्वेक्षण की रिपोर्ट उसके महानिदेशक जी. ए. ग्रियर्सन द्वारा लिखी जा रही थी, तो उसने साफ-साफ शब्दों में लिख दिया कि उड़ीसा की संताली आर्यों की भाषा के साथ घुलमिल गई है, इसलिए यह एक बोली है और अमानक भी है। जबकि उत्तर (संताल परगना) की संताली निष्कलंक है, इसलिए संताल परगना की संताली ही विशुद्ध और मानक है।

इस लिपि विवाद पर एक शोधार्थी ने अपने शोधपत्रा में बड़े ही दिलचस्प तथ्यों को उजागर किया है। वह लिखता है कि यह विवाद ओल चिकी बनाम देवनागरी कतई नहीं है। बल्कि इसके सूत्राधार और कहीं बैठे हुए हैं। बल्कि यह लड़ाई वर्षों पुरानी है। अपने शोध में उसने यहाँ तक लिख दिया है कि यह सुर-असुर के जमाने की लड़ाई है। दिन-समय और घटना के हिसाब से इसके पात्र बदले गए हैं। पटकथा वही पुरानी है।

उस शोधार्थी का शोधपत्र बहुत लंबा है। अतएव यहाँ उसका सार बताना ही उचित होगा। वह आगे लिखता है कि अगर भारत में अंग्रेज न आये होते, तो भारत में विशेषकर अ.ज,अ.ज.ज, ओ.बी.सी एवं अल्पसंख्यों की स्थिति आज बद से बदतर हुई होती। आप यकीन करोगे कि दबे-कुचलों को अंग्रेज आगमन से पहले पढ़ने-लिखने भी नहीं दिया जाता था। अगर किसी ने चोरी-छिपे शैक्षिक बातें सुनने की चेष्टा की, तो उसके कान में गरम शीशा डाला जाता था। और जिसने भी शिक्षा की बात की, उसकी जीभ काट दी जाती थी। छुआछूत किस कदर अभी भी जिंदा है, वह आपके सामने है। अगर डॉ भीमराव अम्बेडकर साहब भारत का संविधान न लिखे होते, तो हम यह सब सोचने के काबिल भी न होते। अंग्रेजों की देन विस्मरणीय है।

उस शोधपत्र के पृष्ठ संख्या 540 पर शोधार्थी दलील के साथ लिखता है कि संताल हूल-1855 दिकू महाजनों के विरुद्ध हुआ था न कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ। उन दिकू महाजनों का अत्याचार संतालों के प्रति इतना बढ़ गया था कि संतालों के पास हूल के सिवा और कोई चारा न था। शोधार्थी आगे डंके की चोट पर लिखता है कि उस समय संताल परगना में एक ही तो अंग्रेज साहब-जेम्स पोण्टेट था। क्या एक अंग्रेज अफसर के विरुद्ध हूल किया जाता है? क्या एक व्यक्ति के खिलाफ हूल किया जा सकता है? कदापि नहीं। 

शोधार्थी लिखता है; असली कहानी हूल के बाद घटती है। सूर-असूर की लड़ाई रहते हुए भी असुरों ने मिशनरियों के भरोसे शिक्षा ग्रहण की। असुरों की आँखें खुलीं। वे दूध का दूध और पानी का पानी के न्याय को जानते हैं।

लिपि विवाद की असली जड़ संताल हूल में छिपी हुई है। हूल का मुख्य कारण; दिकू महाजनों ने संतालों को जीभर कर लूटा। दिकूओं ने दमन व अत्याचार की सारी हदें पार कर दी थीं। महाजनों के उत्पीड़न से मानवता तार-तार हो गई थी। यह सच है कि संताल लोग महाजनों से ऋण लेते थे। इनका ब्याज दर 500 गुना से भी ज्यादा होता था। इूसरा सच यह भी है कि जो ऋण नहीं लेते थे, उनको भी बेवजह ऋण के जाल में फंसा दिया जाता था। वैसे तो महाजन खलिहान से ही धान के रूप में ऋण वसूली कर लिया करते थे। लेकिन अदायगी न कर पाने की स्थिति में महाजन संतालों की जमीन-जयदाद, मवेशी यहाँ तक की उनके बीबी-बच्चे को उम्र भर जीभर कर दोहन करते एवं बेगारी के रूप में अपने यहाँ नौकर रख लेते थे।

दंतकथाओं के अनुसार सूर-असूर के युद्ध में छल-कपट के सहारे असूर हमेशा पराजित होते रहे हैं। इसका जीता-जागता उदाहरण “दिबी दासाँय” है, जिसमें संतालों के राजा हुदुड़ दुर्गा़ को छल-कपट के सहारे किसी वेश्या के द्वारा मारा जाता है। इस त्योहार में दिकू उस वेश्या की पूजा-अर्चना करते हैं, तो संताल इसके विरोध में दासाँय करते हैं एवं अपने राजा की हत्या होने पर हाय-हाय करते हैं।

मालूम हो कि संतालों ने हूल में सूद सहित दिकुओं से बदला ले लिया था। जितने भी महाजनी का करोबारी करते थे, उनको चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा। ऐसा नरसंहार दुनिया के इतिहास में नहीं मिलता है। ऐसा नहीं है कि संतालों ने हूल के बारे में ब्रिटिश शासक को आगाह नहीं किया था। आगाह किया था, पर अंग्रेजों ने मजाक समझकर इसे धता बता दिया था। अंग्रेज कभी सोच भी नहीं सकते थे कि जिनके तन-बदन में कपड़ा तक नहीं, जिनको कोई भी आक्षरिक ज्ञान नहीं। क्या वे कभी हूल को अंजाम दे सकते हैं? इसलिए अंग्रेज हूल की संभावना से कोसों दूर थे।

हूल का श्रीगणेश 7 जुलाई, 1855 को पंचकठिया वट वृक्ष के नीचे से हुआ। इसी दिन कुख्यात महाजन केनाराम भगत एवं दबंग दरोगा महेशलाल दत्ता की हत्या कर दी गई। करीब सप्ताह भर तक महाजनों को मौत के घाट उतारा गया। किसी तरह ब्रिटिश शासकों को इस खबर की भनक लगी। पहले तो इन्होंने इस कत्लेआम को रोकने के लिए “हिल रेन्जर्स” को भेजा। पर “हिल रेन्जर्स” संताल सेनानियों के सामने टिक न पाए। बाद में कोलकाता-दानापुर से सेना बुला लिए गए। संताल सेनानी एवं अंग्रेज सैनिकों के बीच घमासान युद्ध हुआ। युद्ध इतना भयंकार था कि ब्रिटिश शासकों को मार्शल लॉ लागू करना पड़ा। विडंबना यही है कि संतालों को हार की जीत मिली। अंग्रेजों को मजबूरन संतालों के लिए एक अलग प्रदेश - संताल परगना देना पड़ा। यहाँ तक कि उस नये प्रदेश में संतालों को अपनी परंपरा के अनुसार राज करने का अधिकार भी मिल गया। 

हूल के ठीक 5 वर्ष के बाद संताल परगना में मिशनरियों को आगमन हुआ। उन्हें संतालों की आर्थिक स्थिति को देखकर तरस आया। संतालों को गरीबी के दलदल से उठाने के लिए उन मिशनरियों ने शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया। संताल परगना में जगह-जगह स्कूल खोल दिए गए। उस शिक्षा के बदौलत ही संतालों की आँखें खुली। उनमें अच्छे-बुरे को पहचानने की शक्ति बढ़ती गई। स्वाभाविक है कि शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने अपनी साहित्यिक गति-विधि को भी बढ़ा दी थी।

हूल के परिणाम से बौखलाए महाजन संतालों की इस तरह की प्रगति को देखकर ईर्ष्या से जल उठे। इन्होंने संतालों की प्रगति में बाधा डालने के लिए भेद की नीति के तहत सबसे संवेदनशील मुद्दा धर्म को इनके बीच लाया। वे प्रत्यक्ष रूप से इनके बीच नहीं आये, परंतु इन्होंने अपने चेलों को उनके बीच भेजा। इस कड़ी के प्रथम चेलों में खेरवाड़ (साफा हो़ड़) आंदोलन के अगुआ बाबा भगीरथ का नाम आता है।

शोधार्थी प्रमाण के साथ लिखता है कि संताल परगना के लोगों ने हमेशा ही झारखण्ड आंदोलनकारियों का साथ दिया है। लेकिन दिकू लोगों ने हमेशा ही अपनी कूटनीति के तहत धर्म को बीच में लाकर संतालों की उन्नति को अवरुद्ध करने का काम किया है। लिपि विवाद कोई विवाद ही नहीं है। उड़ीसा में जन्मी इस लिपि के समर्थक सभी हिंदु हो चुके हैं। हिंदुवादी संगठनों की दाल संताल परगना में नहीं गल रही है। इसीलिए इन्होंने संताल परगना के कट्टर हिंदु समर्थक संतालों का चयन किया हुआ है; जिन्हें लिपि का रत्ती भर ज्ञान नहीं। इसीलिए तो वे हर हमेशा लिपि के तर्क में हार जाने के बाद धर्म-धर्म चिल्ला उठते हैं। इस आलेख का सार यही है कि ओल चिकी एक ऐसा हथियार है जिससे संताल समाज का नाश निश्चित है।

संताली साहित्य का भविष्य

जब संताली के लिए रोमन, देवनागरी एवं बंगला लिपि चलन में थी, तो चौथी अवैज्ञानिक लिपि बनाने की क्या जरुरत थी? सुना है, 1900 के दशक में उड़िसा के मयुरभंज इलाके में किसी लिपि चोर का उदय हुआ। उस लिपि चोर को भाषाविज्ञान के बारे में क, ख, ग ... भी मालूम नहीं। उसके साथ भाषा के मामले में एक तो करेला और दूजा ऊपर से नीम चढ़ा वाली बात हो गई। उसने आव देखा न ताव, इधर-उधर से लिपियों की चोरी कर ली। और इस तरह कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा उस भानुमति भाई ने कुनबा जोड़ दिया। यह भी कहा जाता है कि मूलतः वह लिपि मुण्डारी भाषा समूह के लिए बनाई गई थी। पर संताल छोड़ अन्यों ने अवैज्ञानिक होने के कारण उसे अस्वीकार कर दिया। फिर भागते चोर को लंगोटा ही सही, उसने अपनी लिपि के प्रचार हेतु एक संस्था की स्थापना कर डाली। तब से यह संस्था अपने खट्टे दही का प्रचार-प्रसार में जुटी हुई है। उस प्रचार की कड़ी में सबसे अहम मुद्दा बना "पहचान"। यह किस तरह की पहचान हुई? जबकि वे चौबीसों घंटे विदेशी वस्तुओं का उपयोग करने में तल्लीन हैं, और जब पढ़ाई-लिखाई के लिए लिपि की बात आती है, तो वे "आबुआक्-आबुआक्" करने लग जाते हैं। ज्ञात हो कि "मोंज दान्देर आंक" भी आबोआक् है, और यह इससे पहले और इससे भी अच्छी लिपि बन पड़ी है। फिर भी, क्यों नहीं उसे "आबुआक्-आबुआक्" करते हैं? अब जब "आबुआक्-आबुआक्" करने वाले चारों खाने चित हो गए, तो इन्होंने लिपि के साथ धर्म को भी जोड़ दिया है। जबकि धर्म के साथ भाषा व लिपि का कोई संबंध नहीं है। दुनिया में कई ऐसे देश हैं, जिनका रोम की जात-पात और धर्म के साथ कोई मेल नहीं, फिर भी इन्होंने रोमन लिपि को अपना रखा है। अंग्रेज को ही देख लो, उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। अंग्रेजी रोमन लिपि में लिखी जाती है, और इस वक्त अंग्रेजी दुनिया में अपना डंका बजा रही है। और तो और अपने पड़ोसी देश बंग्लादेश को ही देख लो। यह एक मुस्लिम बाहुल देश है। फिर भी यहां की जनता ने उर्दू-फारसी को छोड़कर बंगला लिपि को अपना रखा है। एक बात समझ में नहीं आती है, जब वे अंग्रेजों की पोशाक पैंट को बड़ी शान के साथ पहनते हैं, तो उनकी पहचान कहां चली जाती है? है न यह अजीब बात! इसे ही कहा जाता है - "गुड़ खाये, गुलगुले से परहेज।"

जब से उस नई लिपि का सृजन हुआ है, तब से उसके अंधभक्त उसके प्रचार कार्य में लगे हुए हैं। शुरुआती दौर में इसका खूब प्रचार-प्रसार हुआ। उनके लिए भाषा भाड़ में जाय, उनके लिए लिपि ही महत्वपूर्ण हो गई। यही कारण है कि 100 वर्ष की जयंती पर उन्होंने अब ओल चिकी मिशन - 2025  चला रखा है। लेकिन इनके सभी प्रचारक कंबल ओढ़कर घी पीने में मस्त निकले। न अभिावक, न मां-बाप और न ही कोई बच्चा, उस नई अवैज्ञानिक लिपि को सीख रहा है। कारण, पैंट के सामने सारी संताली पोशाक बेकार साबित हो गई।

स्पष्ट रूप से कहा जाय, तो हम तो डूबे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे वाली कहावत चरितार्थ हो गई। उन्होंने कोई ऐसी जगह न छोड़ी है, जहां उनका कब्जा न हो। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से लेकर हर जगह उनकी तूती बोल रही है। पाटाबिन्दा हो या लालपनिया धा़ेरो़म गढ़ हर जगह उनके परचम लहरा रहे हैं। लेकिन यह सच है, उनका यह खोटा सिक्का अब तक तो कामयाब होते दीख रहा है। इसका एकमात्र कारण यही है कि अच्छे लोग बुराई पर अपनी जुबान बंद रखे हुए हैं। जौहरी अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभा रहे हैं। तभी तो सोना के बदले लोहा हर जगह फुदक रहा है। "आबुआक्-आबुआक्" सिर्फ भावुकता पर अटकी हुई है। अंदर से यह पूरी तरह खोखली है। इसका साक्षात प्रमाण आपने हाल में संपन्न हुए जमशेदपुर पुस्तक मेले का नजारा देख ही लिया। उस मेले में ओल चिकी से मुद्रित संताली पुस्तकों का स्टॉल भी लगा हुआ था। परंतु कितनी अफसोस की बात है कि उस मेले में एक भी ओल चिकी संताली पुस्तक की बिक्री न हो सकी। हां, संताली पुस्तक प्रेमी देवनागरी/रोमन में प्रकाशित पुस्तकों के बारे में जानकारी अवश्य ले रहे थे। जमशेदपुर के उस पुस्तक मेले ने ओल चिकी के अंधभक्तों को अपना आईना दिखा ही दिया।

सत्य को परेशान किया जा सकता है। पर उसकी जीत अवश्यंभावी है। ओल चिकी एक मरा हुआ हाथी साबित हो रहा है। फिर भी कुछ अंधभक्त उसे जीवित होने की सूई भोंकने में जुटे हुए हैं। झारखण्ड के मुखिया धो़रो़म गढ़ से ओल चिकी की पैरवी करे, तो दाल में कुछ काला नजर आना स्वाभाविक है।

Wednesday, 9 February 2022

1932 खतियान: आदिवासी-मूलवासियों की पहचान
(संताल परगना के संदर्भ में)

यह विडंबना ही है कि युद्ध शांति के लिए अथवा शांति के लिए युद्ध किया जाता है? इसका जवाब ढूंढ़ पाना एक टेढ़ी खीर के समान है। फिर भी सृष्टि से लेकर अब तक अगर घर-परिवार के युद्धों को भी जोड़ दिया जाए, तो दुनिया में औसतन रोज दस युद्ध होते आए हैं। रामायण (राम-रावण) का युद्ध, महाभारत (कौरव-पाण्डवों) का युद्ध, तुर्क-मुगलों का आक्रमण, राजा-महाराजाओं (पानीपत, हल्दीघाटी आदि) का युद्ध, विष्व युद्ध (प्रथम व द्वितीय), भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, भारत-चीन, भारत-पाक, दुनिया की क्रांतियां एवं अब वर्तमान में रुस-युक्रेन का युद्ध। अगर संताल आदिवासी के संदर्भ में कहा जाए, तो छोटे-बड़े कई सामाजिक-राजनैतिक आंदोलनों के साथ सबसे बड़ा जो युद्ध हुआ, उसे हम - “संताल हूल 1855” के नाम से खूब जानते हैं। संताल हूल आखिर क्यों हुआ? अगर गहराई से इसकी जांच की जाए, तो हम पाएंगे कि यह हूल मिट्टी से जुड़ा हुआ है। बीहड़ जंगलों को साफ कर हमने रहने व खेती योग्य जमीन तैयार की और आज आप उसके मालिक बनोगे? यह हमें कतई मंजूर नहीं। हम इसके मालिक हैं। यहां हमारी मर्जी चलेगी, आपकी नहीं।

अंग्रेजों ने भारत पर करीब 200 वर्षों तक राज किया। सवाल उठता है; वाभनों ने उनको भगाने के लिए पूरे भारत में आजादी की जंग क्यों छेड़ दी? क्या कारण था कि इन वाभनों के झांसे में सभी दलित, पिछड़े, आदिवासी एवं अल्पसंख्यक आ गए एवं उनकी अगुवाई में चल रहे हथियार बंद आंदोलन में शामिल हो गए?

अब सवाल यह उठता है कि इससे पहले भी तो कई मुगल शासकों ने भारत पर अपना अधिपत्य या यों कहें कि उन्होंने बड़ी शान के साथ राज किया था। फिर क्यों नहीं इन वाभनों ने उस दौरान कोई आजादी का आंदोलन चलाया? जबकि भारत पर सबसे पहला हमला मुस्लिम शासक मीर कासिम ने 712 ई. में किया। उसके बाद मानो मुसलमानों में भारत पर राज करने की होड़-सी लग गई। जिनमें प्रमुख रूप से - महमूद गजनबी, मुहम्मद गौरी, चंगेज खान, कुतुबुद्दिन ऐबक, गुलाम वंश, तुगलक वंश, खिलजी वंश, लोदी वंश, फिर मुसलमान (ये मुसलमान नहीं थे, मुगल एक रेस या वंश का नाम है।) आदि वंशों ने भारत पर राज किया एवं खूब अत्याचार किये। फिर भी वाभनों ने कोई क्रांति या आंदोलन नहीं चलाया। फिर अंग्रेजों के खिलाफ ही इन्होंने क्रांति क्यों कर दी? इसका स्पष्ट कारण यही था कि मुगलों ने भारत पर सदियों से चली आ रही “मनुस्मृति” के संविधान को यथावत बनाये रखा। मुगलों को इस संविधान पर कोई आपत्ति न थी। उन्होंने बीच का रास्ता अपना रखा था। पर अंग्रजों ने उस तथाकथित संविधान (मनुस्मृति) की धज्जियां उड़ाकर रख दी थी। वे मनुस्मृति के घोर विरोधी थे। उन्होंने दलित, पिछड़ों, आदिवासियों, मूलवासियों और अल्पसंख्यकों को समानाधिकार दिया। अर्थात् कानून के सामने सब बराबर हैं। महान चिंतक एवं संविधान निर्माता बाबा साहेब उपरोक्त सवाल का जवाब देते हुए आगे लिखते हैं - “चूँकि मुसलमानों ने सदियों से चली आ रही तथाकथित वाभनों की “मनुस्मृति” पर कोई उंगली न उठाई। उन्होंने चापलूसी की राजनीति अपनाई। उनको (वाभनों को) अपने “नवरत्नों” में जगह दी। अतः स्पष्ट तौर पर कहा जाय तो, मुगल शासकों ने “मनुस्मृति” की आत्मा को जिंदा बनाए रखा। यथा दलित, पिछड़े एवं जंगली आदिवासियों की औरतों को स्तन ढकने के लिए कर देना होता था। वे गले में हांडी, कमर में झाड़ू बंधकर चलने को मजबूर थे। कारण कुछ भी रहा हो, करीब 1600 ई. के आस पास अग्रेजों का भारत में पदार्पण हुआ। सर्वप्रथम अंग्रेजों ने तमाम मुगल शासकों के पर उखाड़ते गए। जब बादशाह बहादुरशाह जाफर के रूप में अंतिम पर उखाड़े गए तो, भारत में पूर्णरूपेण अंग्रेजी हुकुमत कायम हो गई। अंग्रेजों को मनुस्मृति की कुरीतियों को समझने में देर न लगी। उन्होंने छुआछूत, सती प्रथा, शिक्षा, राजनीति, प्रशासन एवं तमाम तरह के दलित, पिछड़े, आदिवासी की हकमारी को बहुत करीब से देखा। तात्पर्य यही कि भारतवर्ष में अंग्रेजी राज नहीं, अपितु देश मनु महाराज की “मनुस्मृति” के संविधान के अनुसार चल रहा है, जो मानवाधिकार की दृष्टि से अति निंदनीय एवं निहायत ही अमानवीय है। फिर क्या था; अंग्रेजों ने धीरे-धीरे लंकारूपी “मनुस्मृति” पर आग लगानी शुरू कर दी। इसके कुछ अंश उदाहरणार्थ दिए जा रहे हैं। ये अंश डॉ. हीरालाल यादब (पीएचडी इतिहास) के व्हाट्सअप वाल से उद्धृत हैं:-

1. अंग्रेजो ने 1795 में अधिनियम 11 द्वारा शूद्रों को भी संपत्ति रखने का कानून बनाया।

2. 1773 में ईस्ट इण्डिया कंपनी ने रेगुलेटिंग एक्ट पास किया जिसमें न्याय व्यवस्था समानता पर आधारित थी। 6 मई 1775 को इसी कानून के तहत बंगाल के सामंत ब्राह्मण नन्द कुमार देव को फांसी की सजा दी गई।

3. 1804 अधिनियम 3 द्वारा अंग्रेजों ने कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाई (लड़कियों के पैदा होते ही तालु में अफीम चिपका कर, मां के स्तन पर धतूरे का लेप लगाकर एवं गड्ढा बनाकर उसमें दूध भरकर डूबो कर मारा जाता था।)।

4. 1813 में ब्रिटिष सरकार ने कानून बनाकर षिक्षा ग्रहण करने का सभी जातियों और धर्मों के लोगों को अधिकार दे दिया।

5. 1813 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर दास प्रथा का अंत कर दिया।

6. 1817 में अंग्रेजों ने समान नागरिक संहिता कानून बनाया (1817 के पहले सजा का प्रावधान वर्ण के आधार पर था। ब्राह्मण को कोई सजा नहीं होती थी, बल्कि शूद्र को कठोर दण्ड दिया जाता था। अंग्रेजों ने सजा प्रावधान समान कर दिया।)।

7. 1819 में अधिनियम 7 द्वारा ब्राह्मणो द्वारा शूद्रों के शुद्धिकरण पर रोक लगाई। (शूद्रों की शादी होने पर दुल्हन को अपने दूल्हे के घर न जाकर कम से कम तीन रात ब्राह्मण के घर शारीरिक सेवा देनी पड़ती थी।)

8. 1830 नरबलि प्रथा पर रोक लगा दिया। (देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए ब्राह्मण शूद्रों, स्त्री व पुरुष दोनों को मंदिर में सिर पटक-पटक कर चढ़ा देता था।)।

9. 1833 अधिनियम 87 द्वारा सरकारी सेवा में भेदभाव पर रोक अर्थात् योग्यता ही सेवा का आधार स्वीकार किया गया तथा कंपनी के अधीन किसी भारतीय नागरिक को जन्म स्थान, धर्म, जाति या रंग के आधार पर पद से वंचित नहीं रखा जा सकता है।

10. 1834 में पहला भारतीय विधि आयोग का गठन हुआ। कानून बनाने की व्यवस्था जाति, वर्ण, धर्म और क्षेत्र की भावना से ऊपर उठकर करना आयोग का प्रमुख उद्देश्य था।

11. 1835 प्रथम पुत्र को गंगा दान पर रोक लगा दिया। (ब्राह्मणों ने नियम बनाया कि शूद्रों के घर यदि पहला बच्चा लड़का पैदा हो, तो उसे गंगा में फेंक देना चाहिए। पहला पुत्र हृष्ट-पुष्ट ब्राह्मणों से लड़ न पाए, इसलिए उसे पैदा होते ही गंगा को दान करवा देते थे।)

12. 7 मार्च 1835 को लॉर्ड मैकाले ने शिक्षा नीति को राज्य का विषय बनाया और उच्च शिक्षा को अंग्रेजी भाषा का माध्यम बनाया।

13. 1835 को कानून बनाकर अंग्रेजों ने शूद्रों को कुर्सी पर बैठने का अधिकार दिया।

14. दिसम्बर 1829 के नियम 17 द्वारा विधवाओं को जलाना अवैध घोषित कर सती प्रथा का अंत किया।

15. देवदासी प्रथा पर रोक लगाई। ब्राह्मणों के कहने से शूद्र अपनी लड़कियों को मंदिर की सेवा के लिए दान देते थे। मंदिर के पुजारी उनका शारीरिक शोषण करते थे। बच्चा पैदा होने पर उसे फेंक देते थे और उस बच्चे को “हरिजन” नाम देते थे।

1921 को जातिवार जनगणना के आंकड़े के अनुसार अकेले मद्रास में कुल जनसंख्या 4 करोड़ 23 लाख थी, जिसमें 2 लाख देवदासियां मंदिरों में पड़ी थी। यह प्रथा अभी भी दक्षिण भारत के मंदिरों में चल रही है।

16. 1837 अधिनियम द्वारा ठगी प्रथा का अंत किया।

17. 1849 में कलकत्ता में एक बालिका विद्यालय जे. ई. डी. बेटन ने स्थापित किया।

18. 1854 में अंग्रेजों ने 3 विश्वविद्यालय कलकत्ता, मद्रास और बॉम्बे में स्थापित किया। और 1902 में विश्वविद्यालय आयोग नियुक्त किया।

19. 6 अक्टूबर 1860 को अंग्रेजों ने इण्डियन पैनल कोड-आईपीसी बनाया। लार्ड मैकाले ने सदियों से जकड़े शूद्रों की जंजीरों को काट दिया और भारत में जाति, वर्ण और धर्म के बिना एक समान क्रिमिनल लॉ लागू कर दिया।

20. 1863 में अंग्रेजों ने कानून बनाकर चरक पूजा पर रोक लगा दिया। (आलिशान भवन एवं पुल निर्माण पर शूद्रों को पकड़कर जिन्दा चुनवा दिया जाता था। इस पूजा में मान्यता थी कि भवन और पुल ज्यादा दिनों तक टिकाऊ रहेंगे।)

21. 1867 में बहुविवाह प्रथा पर पूरे देष में प्रतिबंध लगाने के उद्देष्य से बंगाल सकार ने एक कमिटि गठित किया।

22. 1871 में अंग्रेजों ने भारत में जातिवार गणना प्रारंभ की। यह जनगण्ना 1941 तक हुई। 1948 में पण्डित नेहरु ने कानून बनाकर जातिवार गणना पर रोक लगा दी।

23. 1872 में सिविल मैरिज एक्ट द्वारा 14 वर्ष से कम आयु की कन्याओं एवं 18 वर्ष से कम आयु के लड़कों का विवाह पर रोक लगाई।

24. अंग्रेजों ने महार और चमार रेजिमेंट बनाकर इन जातियों को सेना में भर्ती किया, लेकिन 1892 में ब्राह्मणों के दबाव के कारण सेना में अछूतों की भर्ती बन्द हो गई।

25. रैयत वाणी पद्धति अंग्रेजों ने बनाकर प्रत्येक पंजीकृत भूमिदार को भूमि का स्वामी स्वीकार किया।

26. 1918 में साऊथबरो कमेटी को भारत में अंग्रेजो ने भेजा। यह कमेटी भारत में सभी जातियों का विधि मण्डल (कानून बनाने की संस्था) में भागीदारी के लिए आया। शाहू जी महाराज के कहने पर पिछड़ों के नेता भाष्कर राव जाधव एवं अछूतों के नेता डॉ. अम्बेडकर ने अपने लोगों को विधि मण्डल में भागीदारी के लिए मेमोरेंडम/ज्ञापन दिया।

27. अंग्रेजों ने 1919 में भारत सरकार अधिनियम का गठन किया।

28. 1919 में अंग्रेजों ने ब्राह्मणों को जज बनने पर रोक लगा दी थी और कहा था कि इनके अंदर न्यायिक चरित्र नहीं होता है।

29. 25 दिसम्बर 1927 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा मनुस्मृति का दहन किया गया। मनुस्मृति में शूद्रों और महिलाओं को गुलाम तथा भोग की वस्तु समझा जाता था, एक पुरुष को अनगिनत शादियां करने का धार्मिक अधिकार है, महिला अधिकार विहीन तथा दासी की स्थिति में थी। एक-एक औरत के अनगिनत सौतनें हुआ करती थीं। औरतों-शूद्रों के लिए सिर्फ और सिर्फ गुलामी लिखा है, जिसको ब्राह्मण मनु ने धर्म का नाम दिया है।

30. 1 मार्च 1930 को डॉ. अम्बेडकर द्वारा काला राम मंदिर (नासिक) प्रवेश का आंदोलन चलाया गया।

31. 1927 को अंग्रेजों ने कानून बनाकर शूद्रों के सार्वजनिक स्थानों पर जाने का अधिकार दिया।

32. 1927 में साईमन कमीशन की नियुक्ति की जो 1928 में भारत के अछूत लोगों की स्थिति का सर्वे करने और उनको अतिरिक्त अधिकार देने के लिए आया। भारत के लोगों को अंग्रेज अधिकार न दे सके, इसलिए इस कमीशन के भारत पहुंचते ही गांधी और लाला लाजपत राय ने इस कमीशन के विरोध में बहुत बड़ा आंदोलन चलाया। जिस कारण साईमन कमीशन अधूरी रिपोर्ट लेकर वापस चला गया। इस पर अंतिम फैसले के लिए अंग्रेजों ने भारतीय प्रतिनिधियों को 12 नवम्बर 1930 को लंदन गोलमेज सम्मेलन में बुलाया।

33. 24 सितम्बर 1932 को अंग्रेजों ने कम्ययुनल अवार्ड घोषित किया, जिसमें निम्न प्रमुख अधिकार दिये:-

i ) वयस्क मताधिकार

ii ) विधान मण्डलों और संघीय सरकार में जनसंख्या के अनुपात में अछूतों को आरक्षण का अधिकार

iii) बुद्ध, सिक्ख, ईसाई और मुसलमानों की तरह अछूतों ; (बौद्ध) को भी स्वतंत्र निर्वाचन के क्षेत्र का अधिकार मिला। जिन क्षेत्रों में अछूत प्रतिनिधि खड़े होंगे, उनका चुनाव केवल अछूत ही करेंगे।

iv) प्रतिनिधियों को चुनने के लिए दो बार वोट देने का अधिकार मिला, जिसमें एक बार सिर्फ अपने प्रतिनिधियों को वोट देंगे तो दूसरी बार सामान्य प्रतिनिधियों को वोट देंगे।

34. 19 मार्च 1928 को बेगारी प्रथा के विरुद्ध डॉ. अम्बेडकर ने मुम्बई विधान परिषद में आवाज उठाई, जिसके बाद अंग्रेजों ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया।

35. अंग्रेजो ने 1 जुलाई 1942 से लेकर 10 सितम्बर 1946 तक डॉ. अम्बेडकर को वायसराय की कार्य साधक कौंसिल में लेबर मेम्बर बनाया। लेबरों को डॉ. अम्बेडकर ने 8.3 प्रतिशत प्रतिनिधित्व दिलवाया।

36. 1937 में अंग्रेजों ने भारत में प्रोविंशियल गवर्नमेंट का चुनाव करवाया।

37. 1942 में अंग्रेजों से डॉ. अम्बेडकर ने 50 हजार हेक्टेयर भूमि को अछूतों एवं पिछड़ों में बांट देने के लिए अपील किया। अंग्रेजों ने 20 वर्षों की समय सीमा तय किया था।

38. अंग्रेजों के शासन प्रशासन में ब्राह्मण की भागीदारी को 100 से 2.5 पर लाकर खड़ा कर दिया था।

इन्हीं सब कारणों से ब्राह्मणों ने अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति शुरु कर दी। क्योंकि अंग्रेजों ने शूद्रों और महिलाओं को सारे अधिकार दे दिये थे और सब जातियों के लोगों को एक समान अधिकार देकर सबको बराबरी में लाकर खड़ा कर दिया था। 

संताल परगना का संक्षिप्त इतिहास

संताल एक खानाबदोश, घुमक्कड़ और कबीला प्रवृति का मानव है। वे अपने में ही मस्त रहने वाले प्राणी हैं। उन्हें अपने जीवन में परायों की दखलंदाजी कतई पसंद नहीं। उन्हें झूठ और फरेब से ज्यादा ही परहेज है। वे सत्यवादी हैं। जहां तक संभव हो, वे अत्याचार के घूंट पीने के आदी हैं। पर जब पानी सर के ऊपर बह जाए, तो वे अपना असली रंग दिखाने में कोई्र कसर नहीं छोड़ते हैं। संताल हूल 1855 इसका पक्का सबूत है।

तब भारतवर्ष में अंग्रेजों का राज स्थापित हो चुका था। उन्होंने देखा कि राजमहल की पहाड़ी घने वन-जंगलों से घिरी हुई एक ऐसी जगह है, जिसकी कटाई/सफाई उपरांत उस पर अच्छी खेती हो सकती है। तब पहाड़ों के ऊपरी हिस्से में पहाड़िया जनजाति का वास था, पर वे आलसी प्रवृति के थे। वे मेहनती नहीं थे। चोरी और राहगीरों की छिनतई से वे अपनी जीविका चलाते थे। अर्थात यही उनका मुख्य पेशा था। फिर अंग्रजों की नजर कटक, मानभूम, धालभूम, हजारीबाग, मिदनापुर आदि स्थानों पर निवास कर रहे संतालों पर पड़ी। संताल मेहनतकश के अलावे परम सत्यवादी भी थे। फिर अंग्रेजों ने संतालों को तात्कालीन संताल परगना में आने का आमंत्रण दे डाला। अंधे को और क्या चाहिए? उनके लिए तो एक आंख ही काफी थी। संताल झुण्ड के झुण्ड टिड्डी की तरह संताल परगना में प्रवेश कर गए। शुरु-शुरु में पहाड़ियों ने इसका विरोध किया। अंतोगत्वा अंग्रेज अफसर सुपरिण्टेण्डेण्ट जेम्स पोण्टेट की देखरेख में संताल-पहाड़िया के बीच उत्पन्न हुए झगड़े को सुलझा लिया गया। इसी कुटनीति के तहत ब्रिटिश शासकों ने पहाड़ियों को खुश रखने के लिए उनके लड़कों को फौज में भर्ती कर लिया (हिल रंजैर्स रेजिमेण्ट/बटालियन) एवं बस्ती के सभी सरदारों को मासिक वेतन के रूप में कुछ रुपये देना शुरु कर दिया। दूसरी ओर संतालों को बगैर खजना दिए खेती करने की आजादी दे डाली। जिससे अंग्रेजों के सांप भी मर गए एवं लाठी भी नहीं टूटी। दोनों जातियों को प्रसन्न रखने के लिए जेम्स पोण्टेट की अगुवाई में ही आदिवासियों के लिए 1832 में भागलपुर से राजमहल तक दामिन-इ-कोह का गठन किया गया, ताकि आदिवासी अपनी सुविधानुसार इस क्षेत्र को साफ कर उस पर अच्छी तरह खेती कर सके।

दामिन-इ-कोह के सीमांकन के बाद, संतालों की बस्तियां बड़ी तेजी से बढ़ीं, संतालों के गांवों की संख्या जो 1838 में 40 थी, तेजी से बढ़कर 1851 तक 1,473 तक पहुंच गई। इसी अवधि में संतालों की जनसंख्या जो केवल 3,000 थी, बढ़कर 82,000 से भी अधिक हो गई। संताल परगना डिस्ट्रिक्ट गजेटियर बताता है कि तब संताल परगना में आदिवासियों की जनसंख्या 90 प्रतिशत थी, जहां दिकूओं की जनसंख्या मात्र 10 प्रतिशत ही थी।

तभी संतालों के बीच एक अजीबो-गरीब घटना घट गई। संतालों का तात्कालीन संताल परगना प्रवेशोपरांत ही उनके पीछे-पीछे दिकू लोगों का आगमन शुरु हुआ। इन्होंने सर्वप्रथम भोले भाले संतालों को पल्थी मारने की जगह मांगी। संतालों के बीच दिकूओं का आने का एक ही मकसद था; उनके बीच महाजनी करोबार करना। किंतु, संतालों ने भी जल्दी ही यह समझ लिया कि उन्होंने जिस भूमि पर खेती करनी शुरु की थी, वह उनके हाथों से निकलती जा रही है। संतालों ने जिस जमीन को साफ करके खेती शुरु की थी, उस पर सरकार (राज्य) भारी कर लगा रही थी, साहूकार, दिकू लोग बहुत ऊंची दर पर ब्याज लगा रहे थे और कर्ज अदा न किए जाने की सूरत में जमीन पर ही कब्जा कर रहे थे और जमींदार लोग दामिन इलाके पर अपने नियंत्रण का दावा कर रहे थे।

1854 आते-आते संतालों के सिर के ऊपर से पानी बहने लगा। खेत-खलिहान तो संतालों के हाथों से जा ही रहा था। उनके मवेशी एवं स्त्री-बच्चे पर भी आफत का पहाड़ टूटने लगा था। संताल किंकर्त्तव्यविमूढ़ः की स्थिति में पहुंच गए थे। तब दामिन-इ-कोह इलाके में जेम्स पोण्टेट के अलावे और कोई अंग्रेज अफसर की बहाली भी न थी। यह भी विडंबना ही थी कि पोण्टेट के पास मजिस्ट्रेयल पावर भी नही था। भला एक अंग्रेज अफसर के लिए इतना बड़ा इलाके को संभाल पाना बड़ा ही दुरुह कार्य था। संतालों को उचित न्याय पाने हेतु दूर-दूर तक जाना पड़ता था। पर महाजन एवं दरोगा की मिलीभगत ने संतालों की आशाओं पर पानी फेर दिया था। कोर्ट-कचहरी में भी आमला-पियुन वगैरह महाजनों की ही दलाली करते थे।

संतालों ने सभी तरह के न्यायिक दरवाजे खटखटाये। पर उन्हें चारों ओर से मुंह की खानी पड़ी। उन्हें मुंह लटका कर लौटना पड़ा। आखिर, मरता क्या नहीं करता। गांव-गांव हूल के बारे में खबर पहुंचा दी गई। आम जनता को अच्छी तरह समझ में आ गया कि ये सूदखोर महाजन ही उनके असली अत्याचारी एवं दुश्मन हैं। अतएव उनको जड़ समेत उखाड़ फेंकने में ही उनकी भलाई है। अतः उनसे निजात पाने के लिए संतालों ने हूल का बिगुल फूँक दिया। “हूल” का शाब्दिक अर्थ है - क्रांति, विद्रोह, बलवा ...। परंतु संताली में इसका आंतरिक अर्थ - अत्याचार के विरुद्ध अंतिम अस्त्र उठाना। फिर क्या था? 07 जुलाई 1855 बरहेट के समीप पंचकठिया वट वृक्ष के नीचे से कुख्यात महेश लाल दरोगा एवं अत्याचारी महाजन केनाराम भगत सहित 14 सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिए जाने के बाद ही हूल का श्रीगणेश हुआ। उन्होंने आर-पार की लड़ाई छेड़ दी। दावानल की तरह हूल की आग जल उठी। चारों ओर हाहाकर मच गया। महाजनों को चुन चुनकर उनका भूरता बनाया जाने लगा। ब्रिटिश शासकों को जब इसकी खबर लगी, तो उन्होंने महाजनों के बचाव हेतु अपनी फौज को संताल इलाके में भेज दिया। संताल फौज और गोरे पल्टनों के बीच घमासन युद्ध हुआ। परंतु हूल थमने का नाम नहीं ले रहा था। आखिर 10 नवम्बर 1855 को मार्शल लॉ भी लागू किया गया। फिर भी हूल नहीं थमा। सर कटा सकते हैं, पर जमीन नहीं दे सकते के नारों से आसमान गूंज उठा था।

अंततः ब्रिटिश शासकों ने हूल के कारणों का गहराई पूर्वक विश्लेषण करने के लिए एक उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया। जांच समिति के निर्देशानुसार संतालों के लिए एक अलग राज्य संताल परगना का गठन किया गया। जहां संतालों को अपने विधि-विधान के अनुसार राज करने का प्रस्ताव पास किया गया। मालूम हो कि सर्वप्रथम 22 दिसम्बर 1855 को जिस संताल परगाना का गठन हुआ था, उसकी सीमा भागलपुर के साथ-साथ कटिहर-पुर्णिया भी शामिल थी। परंतु दिकूओं के विरोधस्वरुप 1857 में इसकी सीमांकन को घटा दी गई। अंग्रेजों को अच्छी तरह समझ में आ गया था कि आदिवासियों के लिए उनकी जमीन ही उनकी आत्मा है। मच्छली की तरह अगर उसे पानी से बाहर कर दिया जाय, तो वह एक पल भी जिंदा नहीं रह सकता है। अतः अंग्रेजों ने जमीन के महत्व को समझते हुए एक ऐसा कानून पास किया, जिसमें आदिवासी न तो अपनी जमीन दिकू को बेच सकता है और न ही कोई दिकू आदिवासी की जमीन को खरीद सकता है। साथ ही यह भी कानून पास किया कि इस कानून को भारत की कोई भी संस्था संशोधन नहीं कर सकती है। यह कानून आज भी संताल परगना काश्तकारी अधिनियम-1949 के तहत जस के तस रक्षा कवच के रूप में खड़ा है। फिर भी आज आदिवासियों की आधी जमीन दिकूओं के हाथों चली गई है।

अंग्रेजों द्वारा संताल परगना का गठन तो कर दिया गया, पर उनसे एक बहुत बड़ी बुनियादी भूल हो गई। अंग्रेज इसे चाहकर भी कुछ नहीं कर सके। वह बुनियादी भूल यही थी कि तब संतालों (आदिवासी) में एक भी शिक्षित व्यक्ति नहीं था। अर्थात् सभी आदिवासी अंगूठा टेक थे। जिसके कारण सरकारी दफ्तर हो या कोर्ट-कचहरी उनकी नियुक्ति नहीं हो सकती थी। इस तरह एक जीवंत एवं नई समस्या उत्पन्न हो गई। अंग्रेज चाहकर भी इस समस्या का समाधान नहीं कर सके। फिर भी उनसे जितना बन पड़ा, उन्होंने भरसक कोशिश की। जहां तक संभव हो सका, उन्होंने आदिवासियों को न्याय देने का अथक प्रयास किया।

वक्त के साथ समय का चक्र घुमता गया। स्वायत्तशासन के तहत परगनैत को दरोगा की शक्ति भी दी गई। हालांकि इस शक्ति को बाद में वापस लिया गया। फिर भी सूदखोर महाजनों का अत्याचार रुकने का नाम नहीं ले रहा था। एक अलग प्रदेश संताल परगना भी मिल गया था, पर लोगों की आर्थिक हालत बद से बदतर होती गई। ढाक के वही तीन पात वाली कहावत चरितार्थ हो गई। जमीन संतालों ने तैयार की थी पर उनकी जमीन तेजी के साथ महाजनों के हाथ जा रही थी। यही कारण था कि लोगों में पुनः द्वितीय हूल करने की भावना जाग उठी थी। लोगों का आक्रोश बढ़ते जा रहा था। इसी मूल उद्देश्य के तहत 1872 को मांझी-परगनाओं की अगुवाई में दुमका में एक महारैली का आयोजन हुआ। उस रैली में हजारों की संख्या में आदिवासी-मूलवासी एकत्र हुए। दुमका में पदस्थापित तात्कालीन डिस्ट्रिक्ट कमिशनर को एक सूत्रीय मांगपत्र सौंपा गया। जिसमें स्पष्ट रूप से भूमि बंदोबस्ती की मांग जोदार तरीके से रखी गई थी।

ब्रिटिश शासकों ने त्वरित कार्रवाई करते हुए तत्क्षण 1872 रेगुलेशन एक्ट पारित कर सर्वे सेटेलमैंट का काम आरंभ कर दिया। इस सेटेलमैंट की प्रकिया पर महाजनों ने कई तरह की अड़चनें पैदा करने की कोशिश की। अंग्रेजों को महाजनों का मजरा शीघ्र ही समझ में आ गया। “जमीन जिसकी, नाम उसका” पहल करते हुए सर्वे सेटेलमेण्ट का काम तीन चरणों में संपन्न हो गया। यथा - (i) प्रथम सर्वे - Browne Wood Settlement (1873-1879); (संताली में इसे ”हुंट“ सेटलमेंट के नाम से जाना गया; (ii) द्वितीय सर्वे - Mr H. McPherson Settlement (1898-1905); एवं (iii) तृतीय सर्वे - J. F. Gantzer Settlement (16.2.1932-8.7.1934)। यह अंतिम सर्वे था, जिसे लोग इन्हें 1932 खतियान के नाम से खूब जानते हैं।

अब सवाल उठता है; अंग्रेजों की वजह से अलग प्रदेश संताल परगना भी मिल गया, एसपीटी/सीएनट जैसे सख्त भूमि कानून भी पास हुए, 1932 का खतियान भी हाथ में आ गया, देश आजाद भी हो गया; फिर झारखण्ड अलग प्रांत की मांग क्यों उठी। अंग्रेज होते; तो शायद यह मांग भी कब की पूरी को गई होती। जिन महान क्रांतिकारियों ने अलग प्रांत की मांग जोरदार ढंग से उठाई, उनमें अग्रिम कतार में थे - सर्वश्री माराङ गोमके जयपाल सिंह मुण्डा, एनई होरो, बागुन सुम्बरुई, जस्टिन रिचार्ड, दिसोम गुरु शिबू सोरेन आदि। झारखण्ड आंदोलन की कहानी लंबी है। खैर, तात्कालीन कांग्रेस सरकार ने “मुर्गा” को ही चखना कर दिया। कोई साढ़े तीन करोड़ लेकर फरार हो गया। कारण कुछ भी रहा हो, अनवरत अलग झारखण्ड आंदोलन की वजह से 2000 में “शेर” के बदले “सांप” स्वरुप “वनांचल” पारित हुआ। बड़ी मशक्कत के बाद उसमें “झारखण्ड” नाम सुधारा गया।

झारखण्ड बने करीब 22 वर्ष गुजर गए। झारखण्ड सरकार भी आती-जाती रही। फिर भी पुरखों का सपना अधूरा ही रह गया। कहा गया कि जब अपनी सरकार होगी, तो अपने लोगो पर नौकरियों की बहार होगी। पुरखों की मनोकामना अवश्य पूरी होगी। अब वादा करने वालों की इच्छा तो पूरी हो गई। सरकार बने ढाई वर्ष भी बीतने को है। पर अब आदिवासी-मूलवासी को अपने ही घर में भोजपूरी बोलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। साथ ही झारखण्ड सरकार की नौकरियों पर बाहरी लोगों की बहार हो रही है। जब अपनी सरकार में यह हाल है, तो आखिर आदिवासी-मूलवासी जाएं तो कहां जाएं? इस हालात में 1932 खतियान न करें तो क्या करें? आप बताओ। काश! आज अंग्रेज जीवित होते!

Tuesday, 2 November 2021

BOḌIṄ MÃHÃ DINISẠ
(02 No̱be̱mbo̱r, 1865)


Cando Babawak̕ ạḍi hahaṛa sirjo̱n! Pilcu Haṛam-Buḍhi kho̱n nit hạbic̕te ạḍi lekan manwa, noa dhuṛi dhạrtire he̱c̕ arko dukạn lahaena. Onko modre ado̱mko do̱ ḍig-ḍig noa dhạrtipuriko marsal oṭokada. Onkan mamarsalkoak̕ thạrre Pạul Olaph Boḍiṅak̕ ńutum do̱ sona akho̱rte o̱l tahe̱na. Cedak̕ hale baṅ! Pạul Olaph Boḍiṅ (Paul Olaf Bodding) Santali lạgiť okae kạmi oṭokať, ona do̱ tire juge jiạṛge tahẽ̱ idik̕a. Jo̱s do̱ niạge je uni leka Santali lạgiť baṅ do̱ bitạuen dinkore jãhãeko hoyakan, ar baṅ do̱ darakan dinkore jãhãeko upe̱lok̕ reak̕ as dhoraok̕kan.

P. O. Boḍiṅ do̱ abo disạm kho̱n sat sạmud o̱n paro̱m Norway disạm reak̕ miť ạḍi kạṭic̕ so̱ho̱r Gajobhikre 02 Nobe̱mbo̱r, 1865 hilok̕ noa dhuṛi dhạrti reak̕ pạhil marsale ńe̱lleda. Boḍiṅ̇ sahebren do̱ miť kuṛi boehae tahẽ̱kana. Boḍiṅ ac̕ baba do̱ puthi to̱to̱lic̕e (Book Binder) tahẽ̱kana.

Boḍiṅ saheb do̱ ac̕e paṛhaok̕ bidạlrege, Santalko talareko kạmikan ako disạmren dho̱ro̱m gurukoak̕ moca kho̱n Ho̱ṛ ho̱po̱nko babo̱tre do̱e ańjo̱makať tahẽ̱gea. Cando Babawak̕ oka co̱ me̱njo̱ṅ, uni do̱ Ho̱ṛ ho̱po̱n oarko lạgiť Boḍiṅ sahebe bachaokedea. Lạiako; kathae, miť dhao Kerap saheb (L. O. Skrefsrud) o̱ko̱e do̱ abo disạmre Ho̱ṛko talareye kạmikan tahẽ̱, ako disạm, metak̕me Norwayte chuṭi bitạu lạgiťe se̱nakan tahẽ̱kana. Unre uni do̱ Boḍiṅ saheb sanamak̕ lạiade tayo̱me kuliledea, “Henda ya Pạul, e̱ṇḍe̱khan ceka Ho̱ṛko talare kạmie lạgiťem re̱be̱nkok̕a?” Unre Boḍiṅ sahebe jobableda, “Hẽ̱ da, apekoak̕ katha ańjo̱mte, ceka co̱ mo̱n-o̱nto̱r sanam do̱ Ho̱ṛko talare maṇḍrao baṛaekantińạ. Ho̱ṛmo̱te̱ťge no̱ṇḍe̱ menak̕a, bakhan iń do̱ onko talarege minạńa.” Kerap saheb uniak̕ ro̱ṛ ruạṛ ańjo̱mte ạḍie kusiena. Khaṭianae je darakan dinre unige nãhãk̕ ac̕ak̕ kạmi do̱e sambṛaotaea. Noṅka hudis baṛakate, uni do̱ Boḍiṅ saheb Bharo̱t disạm Ho̱ṛko talare kạmie lạgiť ho̱r-ḍahar sapṛao lạgiťe dhurạuena.

Ar miť dinok̕ 1889 sal reak̕ mucạť cando se̱c̕ sajen-sapṛaoen miť chaelak̕ koṛa, ume̱rtae do̱ 24 bo̱cho̱r, ac̕ak̕ jhola-jhampa go̱k̕kate dak̕ jahajrey sawarena. Uni koṛage baṅ ḍaṭ mo̱ṭ, e̱se̱l sapha, sõ̱ṛõ̱ko̱c̕ Boḍiṅ bạbu do̱! Timina din co̱ dak̕ jahajre sapho̱rkeť tayo̱m Iṅgle̱ṇḍ se̱c̕ lekate Bharo̱t disạm Kolkataye sẹṭe̱rena. o̱ṇḍe̱ kho̱n do̱ relgạḍi sap̕kate Rampurhaṭ tisạne phe̱ḍena. Ar Rampurhaṭ kho̱n 16 Jạnuạri, 1890 hilok̕ do̱ sagaṛte Benagaḍiại tiok̕keda. Lạiako kathae; daramdage jo̱khe̱n kạṭic̕-kạṭic̕ kuṛi gidrạ oka Ho̱ṛteko õ̱ṛhẽ̱-sereńade tahẽ̱ do̱ saname buj ńamkeda. Ar kathae; he̱c̕en dosar hilok̕ kho̱nge Ho̱ṛte galmak̕rao hõ̱e sạrdi se̱ṅge̱llena. 

Ạjgut hahaṛa! Din-mãhãko do̱ hud-hudạu paro̱mo̱k̕kan tahẽ̱kana. Kerap saheb do̱ Boḍiṅ lekan jhukạl koṛae ńamkedete tulede-do̱ho̱yede lekae aṭkarkeda. Ce̱ť baṅ se̱ Kerap saheb do̱ jo̱to̱ lekan Ho̱ṛ (Santali) kạmiko do̱ Boḍiṅ cetanre lade go̱ťkak̕ lạgiť ạḍie ạkutena. Ar ńe̱lme se̱ sạrige, Kerap saheb do̱ jo̱to̱ lekan kạmi Boḍiṅ cetanreye lade go̱ťkada. E̱n sermage Boḍiṅ bạbu do̱ “Ho̱ṛ Ho̱po̱nren Peṛa” namjạdi sãohe̱ť sakamren são-saspṛaoic̕ko do̱ho̱kedea.

Boḍiṅ bạbu do̱ miť dhaote ạḍi lekan kạmie e̱ho̱p̕keda. Mo̱ṭ kathatem me̱nlekhan; uniak̕ mul kạmi do̱ pạrsi ar ona hõ̱ Santali babo̱t do̱ maraṅ kạmi tahẽ̱kantaea. Dinek dinte Santali pạrsire do̱ liṇḍạr are gạkhuṛ idiyena. Dho̱ro̱m guru lekate uni do̱ Santali pạrsite dho̱ro̱m puthikoe to̱rjo̱makeda. São so̱ṅge̱te Ho̱ṛ ho̱po̱nak̕ jo̱to̱ lekan le̱gcar-ạricạliko hõ̱ hạr samṭao lạgiť ho̱ṛkoe go̱ṛo̱ ocokeťkoa.

Lạiako kathae; Boḍiṅ saheb do̱ mimiť kạhni o̱no̱liạko lek leka ona reak̕ be̱rho̱n hõ̱e e̱maťko tahẽ̱kana. Aso̱kaete 13 hajar Santali sabad oka do̱ Kerap sahebe tumạlleť, ona do̱ Boḍiṅ sahebak̕ tire he̱c̕ena. Boḍiṅ saheb ṭhen kạmi do̱ aema tahẽ̱kana, me̱nkhan, o̱kte̱ reak̕ do̱ ạḍi anaṭ. E̱ntere hõ̱ Boḍiṅ saheb do̱ jo̱to̱ak̕ sahaokate pạrsi lahanti kạmire do̱e laha idiena.

Namjạdi Santal Hul tambhaoakan, un do̱ e̱ke̱n kichu sermage paro̱makan tahẽ̱kana. Ạḍi gạhir satalak̕ un o̱kte̱ reak̕ mạli halo̱t babo̱tbon kho̱nd ro̱nd lekhan, ekal noa do̱ sạrigea je un hạbic̕ hõ̱ Ho̱ṛ ho̱po̱nko do̱ purub-pạchimgebon tahẽ̱kana. Pạchmạ, Ḍhạuạ ar se̱ Moera Baṅgaliko do̱ Ho̱ṛ ho̱po̱nko e̱ṛe̱ lipuk̕leťkoa. Jạt reak̕ hewa do̱m okatekak̕a? Un hõ̱ nit lekage jage jo̱m-ńũ ar ḍuḍuk-ḍuḍuk e̱ne̱c̕-sereń chaḍa ar eṭak̕ khạṭuạge baṅ. Ho̱ṛ ho̱po̱n do̱ kuń ro̱ṭe̱ baragge. Noṅkan o̱kte̱re noko miso̱nạriko Ho̱ṛ talareko hijuk̕ do̱ Candoak̕ bho̱rdange. Hul dhara-dhạrige noko miso̱nạriko do̱ matko̱m ńũruk̕ leka Ho̱ṛ talareko ńũr ńamena.

Piọ Cẽ̱ṛẽ̱ do̱ Ho̱ṛ ho̱po̱nkoak̕ chaṭkare uḍạu mae uḍạu he̱c̕enge, me̱nkhan, oka rạṛtey sereń do̱ ạḍi maraṅ maha muskilrey paṛaoena. Santalko babo̱t reak̕ pạhil puthi - “An Introduction to the Santal Language” - Jeremia Philips o̱lak̕re Santali lạgiť do̱ Baṇgla haro̱p beoharakan tahẽ̱kana. No̱te̱ Deonạgri haro̱p hõ̱ hạtṛạu baṛalengea. Me̱nkhan, banar haro̱pge, metak̕me, Baṅgla ar Deonạgri haro̱p do̱ Santali lạgiť mungạ kaṭ sạbitena. Santali o̱l lạgiť miť ạḍi maraṅ muskilak̕ge hoyena. Cekaeam, ado̱m miso̱nạriko do̱ kathae, Santali o̱l lạgiť miť nirạ nãwã haro̱p hõ̱ sirjạu lạgiťko uṭu-cuṭu baṛalengea. Me̱nkhan, onkan pontha do̱ lelha reak̕ mucạťte̱ťko metawaťte, ona huṛmusti, bo̱be̱, lelha ar o̱bigyanik kạmi do̱ko tak dhamkada.

Un ma Ho̱ṛ ho̱po̱nko miť ho̱ṛ hõ̱ poṇḍ goḍare he̱nde̱ ho̱ṛe̱c̕ casok̕ko ma baṅko tahẽ̱kan. Cekaeam, miso̱nạriko do̱ se̱santire ona Roman/Lạṭin haro̱ptege Santali o̱l lạgiť jo̱to̱ ho̱ṛteko gulạṇḍ uric̕keda. Piọ Cẽ̱ṛẽ̱ abo tala dara hạbic̕ miso̱nạriko noa kạmi do̱ko laga lahawakať tahẽ̱gea. Me̱nkhan, lạikak̕ do̱ niạge je Boḍiṅ saheb do̱ Santali lạgiť oka Roman/Lạṭin haro̱p beoharok̕kan tahẽ̱, ona do̱ ạḍi batrao lak̕ are hulsiń sapha go̱ťkada.

Boḍiṅ babo̱tre hahaṛa do̱ niạge je Boḍiṅ saheb oka hilok̕ noa Ho̱ṛ disome le̱be̱ťkeť, e̱nhilok̕ kho̱n dhạrti bạgiak̕ dhạbic̕, uni do̱ Ho̱ṛ lạgiť tãhã Santali pạrsi lạgiťge ac̕ak̕ jibo̱ne atar giḍi go̱ťkada. Jãhãtinạk̕ge Kerap saheb do̱ Boḍiṅren gurui tahẽ̱kan, me̱nkhan ko̱ dintege unkin talare do̱ “Guru guṛ, cela cini” reak̕ sạgại so̱mpo̱k joṛaoena. Boḍiṅ saheb do̱ nase dintege Santaliren maraṅ gạkhuṛiại benaoena, me̱nkhan, ạḍi lekan digdhạko do̱ mo̱n-o̱nto̱rre he̱ḍe̱jo̱k̕tege tahẽ̱kana. Khange, subita baṅte, uni do̱ thoṛa ho̱ṛkoante Kolkata so̱ho̱re riṅgạuena. O̱ṇḍe̱ uni do̱ aṛaṅ (phonem) jãc lạgiť mimiť ho̱ṛkoak̕ ro̱ro̱ṛ jo̱khe̱nak̕ mocae phoṭo (x-ray) ocokeda. Noṅkate Boḍiṅ saheb do̱e khạṭi utạrana je moca kho̱n Santali reak̕ oka aṛaṅ do̱ oka ṭhen kho̱n bahe̱rok̕kana.

Lạikak̕ do̱ niạge je Boḍiṅ saheb do̱ e̱ke̱n 10 (ge̱l) serma bhitạrtege Santali pạrsiren e̱ke̱n masṭo̱ mo̱to̱ do̱ baṅ, bicko̱m, maha pạṇḍite benaoena. Sạbut me̱nte do̱ niạge je Boḍiṅ saheb do̱ 1899 salrege Ho̱ṛte o̱lak̕ pạhil puthie chapa so̱do̱rkeda - “KUKLI.” Inạkate dho̱ro̱m puthiko me̱nte “Mare Niạm”, “Nãwã Niạm” eman do̱ sanam Santaliteye to̱rjo̱ma cabakeda.

No̱ṇḍe̱ ạ̃ṛtiak̕ do̱ niạge je Boḍiṅ saheb do̱ oka leka ro̱ṛ, onkage o̱lo̱k̕ren ạḍi maraṅ turphidare tahẽ̱kana. Onatege lahateko beohareťkan tahẽ̱ Santali Roman/Lạṭin haro̱pre do̱ miť bar nãwã ṭuḍạk̕/ṭo̱yo̱ť cinhạkoe juṭic̕ada, ar ona reak̕ man ar mạhima sanamko bujhạu ocoko reak̕e kurumuṭukeda. Noa hõ̱ baḍaekak̕ do̱ jạruṛgea je ac̕ bidạlrege Bharo̱t disomre Linguistic Survey of India - George A Grierson ho̱te̱te lahkaoakan tahẽ̱kana. Unre onko Dạkhnạhi boehako aso̱kaete ona checked consonants (ke̱ce̱ť/tạpuk̕ aṛaṅ - k̕, c̕, ť ar p̕ ) babo̱tre ạḍiko do̱n baṛaleťgea, me̱nkhan, okage bae bataoleťtakoa ar sanamko bhugạk̕reye dal ade̱rleťkoa. São so̱ṅge̱te open vowel (e̱, o̱) ar resultant vowel (ạ, ẹ ar ọ) reak̕ mo̱ho̱t hõ̱ ruti-rutiye chiṇḍạuaťkoa. Uni do̱ ạḍi saphateye bujhạuleda je ul bili do̱ baṅ ul bele, ciṭhi kul do̱ baṅ ciṭhi kol ar solo ana do̱ baṅ bicko̱m sọlọ ana ro̱ṛ ar o̱lge sạhia. Me̱nkhan, bhabna reak̕ katha, Boḍiṅ sahebak̕ sikhạuna do̱ ke̱ na puche̱yente, abo do̱ nit hạbic̕ hõ̱ o̱l giḍi ar paṛhao sojheren ạḍi maraṅ lelha ho̱ṛbon sạbit hijuk̕kana. Ar pase̱c̕ nõ̱k̕õ̱e noa karo̱n kangea je ne̱ hạli abo disomre goṭa ṭạṇḍi, ona jilạpi akho̱rko aka pe̱re̱c̕ idieťre, oka hõ̱ babon to̱tho̱c̕ daṛeak̕kana.

O̱ne̱bon baḍaekeť leka Boḍiṅ saheb do̱ oka lekabon ro̱ṛ, onkage o̱lren ạḍi maraṅ turphidare tahẽ̱kana. Me̱nkhan, un bidalren ḍher ho̱ṛ, nunak̕ hạbic̕ je ado̱m miso̱nạriko hõ̱ Boḍiṅak̕ ona Santali Pạrsi reak̕ Aṛaṅ ar Urgạn Go̱ṛho̱n (Santali Phonetics and Morphology) ạn-ạri bujhạu lạgiť do̱ o̱ko̱ege baṅko re̱be̱nlena. Boḍiṅ do̱ bujhạuako lạgiť ạḍie kurumuṭukeda je ro̱ṛ ar o̱lre do̱ noa leka begar menak̕a - ul bele : hoṛo ge̱le̱; sereń kuṛi : re̱re̱ń rak̕; se̱ṅge̱l ṭhen jorok̕ : dak̕ jo̱ro̱k̕; iń do̱ baṅ : do calak̕me; dak̕ lo : se̱ṅge̱lte lo̱ ar emanteak̕.

Boḍiṅ baṅko bujhạu tiok̕ daṛeaekanre uni do̱ ạḍie bhabnaena. Unrege uniye nạbileťa; judi Ho̱ṛ ho̱po̱nkoak̕ sạri Santali (standard Santali) baṅe nạthi oṭokak̕kana, to̱be̱khan, uni do̱ Cando hõ̱ bae ikạyea. Dạkhnạhi Santalko o̱ko̱eak̕ Santali do̱ bagaṛge, miť din hilok̕ noko do̱ nãhãk̕, ona bagaṛ Santali goṭa ṭạṇḍi chạplạu reak̕ko kurumuṭuia. Ona karo̱n kangea je uni do̱ ac̕ak̕ sanam lekan Santali puthiko do̱ oka lekabon ro̱ṛ, onkage o̱lkateye chapa so̱do̱r oṭokada. Inạkate pea Santali Beako̱ro̱n (Materials for A Santali Grammar) puthie chapa so̱do̱r oṭokada. Ninak̕te hõ̱ Boḍiṅ saheb do̱ bae tirpitlena. Unie hudisana; ũhũk̕ dhora baṅ dhora, noko sạri Santal do̱ nãhãk̕, oka baṅ oka hilok̕ co̱, khạṭigeko e̱ṛe̱ ocok̕a. Onate uni do̱ muc̕ lekae khaṭaoente jugero jug hạbic̕ rạkhi jogaok̕ lekan Santali Sabad Murại (A Santal Dictionary) puthie sapṛaokeda ar ona do̱ ako disom Norway (Oslo) kho̱ngeye chapa so̱do̱rkada. Kathae; noa Sabad Murại sapṛaore Boḍiṅ saheb do̱ 22 bo̱cho̱r din lagaoade tahẽ̱kana. Ạḍi khạṭi utạr katha kana je Boḍiṅ saheb do̱ un o̱kte̱ Ho̱ṛ ho̱po̱nko, okako sabadko laṛcaṛeťkan tahẽ̱, onako do̱ miť miťteye to̱l do̱ho̱, o̱l samṭao oṭokada. No̱ṇḍe̱ so̱geak̕ do̱  niạge je mimiť sabadko do̱ Beako̱ro̱n reak̕ niạm lekate ce̱ťko metak̕a, ar ona sabad reak̕ laṛcaṛ oka leka kana, ona do̱ Iṅgrạji ar Santaliteye o̱l oṭokada. Baḍaekak̕ mabon je Boḍiṅ sahebak̕ sãohe̱ťkore, dho̱ro̱m reak̕ kathako do̱ pusri in maraṅ hõ̱ bạnuk̕a.

O̱ko̱e Ho̱ṛ Santali reak̕ “S” hõ̱ bae baḍae; onkan Ho̱ṛge siṛạgateko ro̱ṛa - “Bidesi kanae; dho̱ro̱m guru kanae; jạti-dho̱ro̱m no̱nosṭo̱ic̕ kanae … ar onkage emantek̕.” Inạkateko to̱ṛahẽ̱ťak̕ge; “O̱l Ciki do̱ ce̱ť kana? Ạdimkoak̕ mẽ̱ť kana.” Ar onkage laṭ balaṅko hukạ-paskaea. Me̱nkhan, onko bako bhạbite̱ťa je onko do̱ “siń cando divhe̱ko uduk̕aekana.” Onkoak̕ noa hõ̱ jãhãn disạ paesa do̱ bạnuk̕a je siń cando do̱ onkoe lo̱ to̱ro̱c̕koa. Onko do̱ miť talao pạrsi bạgikate oprom ar dho̱ro̱m sãote pạrsiko suṛe̱ go̱ťkak̕a. Boḍiṅ sahebak̕ sãohe̱ťre, jãhãtinạk̕ uni do̱ dho̱ro̱m gurui tahẽ̱kan, me̱nkhan onare dho̱ro̱m reak̕ katha do̱ nasenak̕ hõ̱ bạnuk̕a, bicko̱m, uniak̕ o̱no̱lkore do̱ sapha-sạphi, rilạmala phạriạphạṭi dak̕ leka e̱ke̱n ar e̱ke̱n do̱ Santal Le̱gcar reak̕ kathakoge menak̕a se̱ o̱lakana.

02 No̱be̱mbo̱r do̱ Boḍiṅ Sahebak̕ Jo̱no̱m Mãhã. Nagamre nuige onkan miť ho̱ṛ, o̱ko̱e do̱ Santali lạgiťe janamen, jive̱ťen are Boṅga talaen. Boḍiṅ do̱ Santali lạgiť Boṅga lekan ho̱ṛ! Boḍiṅe danaṅen 81 serma tap̕ calaoena. Me̱nkhan, Boḍiṅ Saheb do̱ Santali pạrsi lạgiť ce̱ťe ceka oṭoakať, baḍae lạgiť do̱ o̱ko̱e ṭhen hõ̱ phursạt do̱ bạnuk̕a. Judi baḍae tahe̱nkhan, Santali pạrsi reak̕ unạk̕ bạṛic̕ do̱sa do̱ o̱ho̱ hoelena. Onatege celec̕ miť dukhạli gaenaha do̱e relaleťa :-
(Rạṛ - Ho̱mo̱r)
Pạrsi Baba họ lilạmok̕kan, Boḍiṅ Baba!
Pạrsi Baba họ mo̱ho̱r meṭaok̕kan.
Namge co̱ Boḍiṅ Baba,
Dho̱ro̱m-dho̱ro̱mem bicạrkatale.
Nalo manewape rag manewa,
Nalo manewape ho̱mo̱r manewa.
Nińge co̱ Boḍiṅ Baba,
Dho̱ro̱m-dho̱ro̱miń bicạrkatape.

Kathae; manwa do̱ calak̕ lạgiťgebon hijuk̕kana. Dhạrtire niạge sạri je jo̱to̱ ho̱ṛge calak̕tege hoyok̕tabona. Ar e̱nte o̱ko̱e sanam daṛeanbon metakokan, onko hõ̱ co̱ko dukạn lahaen do̱! 02 No̱be̱mbo̱r do̱ Boḍiṅ sahebak̕ Jo̱no̱m Mãhã! Uni do̱ noa dhuṛi dhạrtire 73 bo̱cho̱r hạbic̕e dãṛãleda, onare 44 bo̱cho̱r do̱ Santali lạgiťe jive̱ťena. Lại reak̕ do̱ niage je uni do̱ janamte̱ťge bidesreye janamlena, me̱nkhan, uni do̱ Ho̱ṛ ho̱po̱n kho̱n hõ̱ jạstiye Ho̱ṛlena. Bhabna reak̕ do̱ niạge je Boḍiṅ saheb oka lekae Ho̱ṛlen do̱ abo hõ̱ Ho̱ṛ hũiạkatere hõ̱ uniak̕ Ho̱ṛte̱ť do̱ baṅbon bujhạu daṛeak̕kana. Me̱nkhan, rạskạ reak̕ katha je hẽ̱ nase-nase, polok̕-polsoge sạhi, abo talare nit miť onkan ho̱ṛ menaea, o̱ko̱e do̱ Boḍiṅ saheb chiṇḍạue reak̕ ạḍi kurumuṭure menaea. Uni babo̱t lại labaṛ do̱ niạge je uni do̱ Boḍiṅ sahebak̕ pạrsi ạri do̱ gitic̕-duṛup̕ ar jãhãtegey calak̕ jaogeye ho̱bo̱r baṛaea. Onkan mano̱tạnic̕ak̕ dulạṛ ńutum do̱ hoyok̕kana Man Rạghunath Hãsdak̕, Pako̱ṛ (S. P.).

02 No̱be̱mbo̱r do̱ ạḍi jagakore Boḍiṅ Mãhãbon manao baṛaea. Onkan dupṛup̕kore Boḍiṅ Babae kạmi oṭoakať, ạḍi lekan baḍaejo̱ṅteak̕ko hõ̱bon ce̱pe̱c̕-re̱pe̱c̕ hạṭińjo̱ṅa. Me̱nkhan, niạ do̱ ro̱ṛkak̕tege hoyok̕kana je judi nasenak̕ hõ̱ Boḍiṅ saheb Santali reak̕ oka majte̱ťe lạiakať, ona judibon suṭik ńamkeda, e̱ṇḍe̱khantege Boḍiṅ Mãhã manao reak̕ jo̱ste̱ť do̱ khạṭige purạuk̕tabona.

Boḍiṅ saheb nit abo talare bạnuia. Me̱nkhan, uni do̱ Santali reak̕ jo̱to̱ kho̱n daṛean bo̱m do̱ abo talareye do̱ho̱ oṭoakada. Noṅkan bo̱m je dusmạnko talare ona bo̱mbon ńũrhạlekhan do̱ sanamko go̱c̕ lo̱ho̱m utạrok̕a. Bhabna do̱ niạge je ạikhạ ona bo̱m beoharge tho̱ baṅ dhe̱jabonkana.
Boḍiṅ Janam Mãhã reak̕ noa o̱no̱l do̱ no̱ṇḍe̱gebon durumjak̕eťkana. As ar pạtiạu menak̕a je Boḍiṅak̕ Santali cetan banaḍaebon hạtṛạu ńamtaema. To̱be̱ khange Boḍiṅ sahebak̕ Janam Mãhã do̱ sarkok̕a-sạgunkok̕a!

Friday, 20 August 2021

 पुस्तक प्रेमी समाज 

एक निवेदन : संताल समाज पढ़ाकु समाज नहीं है। अर्थात् हमारा समाज पुस्तक प्रेमी समाज नहीं है। पुस्तक बोलती नहीं है, पर वह बहुत कुछ सिखाती है। परंतु हमारा समाज अब तक पुस्तक प्रेमी समाज क्यों नहीं बन पाया है? यह एक शोध का विषय हो सकता है। कहा जाता है कि जो समाज जितना पढ़ाकु होगा, वह समाज उतना ही उन्नत कहलाता है। पुस्तक पढ़ना समाज तौलने का एक पैमाना माना जाता है। या यूं कहें कि यह सीधा-सा तर्क है कि अगर पढ़ाकु समाज होगा, तो यह निश्चित है कि वह समाज उन्नत होगा। इसके उलट अगर समाज उन्नत है, तो वह समाज अवश्य ही पढ़ाकु समाज होगा। यह तथ्य निश्चित तौर पर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

इस संदर्भ में स्कूल-कॉलेजों की डिग्री से ही कोई शिक्षित कहलाएगा, ऐसा भी संभव नहीं है। शिक्षा में पैनापन लाने के लिए अनुभव एवं पुस्तक प्रेमी होना बहुत ही जरुरी विधा है। बहुत सारे ऐसे विषय हैं जो हमें कोर्स की किताबों में पढ़ने को नहीं मिलता है। जीवन में बहुत सारी ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, जो हमें दैनंदिनी के जीवन में बहुत प्रभावित करती हैं। ध्यान रहे; कोई कितना भी बड़ा डिग्रीधारी क्यों न हो, पर उसका बुनियादी ज्ञान मैट्रिक स्तर पर ही आधारित रहता है। हाँ, वह अपने ज्ञान का विस्तार आगे की पढ़ाई, पुस्तक प्रेमी बनकर एवं अनुभवी होकर ही कर सकता है।

आज मंगरु को इस संदर्भ में क्यों निवेदन करना पड़ रहा है? इसको इस तरह से समझा जा सकता है। आपने किसी फिल्म को थियेटर में अवश्य देखा होगा। उस फिल्म में क्या दिखाया जाता है? उस फिल्म में औसत 60 वर्ष की जिंदगी को सिर्फ 2 घंटे में दिखाया जाता है। कारण यही है कि इस भागमभाग की दौड़ में पूरी जिंदगी को समझ पाने के लिए 2 घंटे से ज्यादा वक्त किसी के पास उपलब्ध नहीं होता है। टी. व्ही. वगैरह में भी यही फार्मूला चलता है। ठीक ऐसे ही प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक मीडिया, इसी फार्मूला को ही अपनाया जाता है। साहित्य जगत में भी ऐसा ही होता है। यही कारण है कि महाग्रंथ, उपन्यास, कहानी-कविता को लिखा जाता है। साहित्य विधा में आपने देखा होगा कि लंबे-चौड़े विषय को भी एक ही वाक्य में कह दिया जाता है। ऐसे वाक्य को मुहावरा, कहावत, परिभाषा, नारा/स्लोगन कहा जाता है। उदाहरण - "लेल्हा गोडो, मोटा फुट", "आदो़ बाबोन बातावा, झारखण्ड राजबोन हातावा", "तुम मुझे  खून दो, मैं तुझे आजादी दूंगा" आदि। 

स्पष्ट रूप से कह दूं, तो आपका मंगरु भी इसी फार्मूले का मुरीद है। वह दुनिया भर की बातों को एक छोटा-सा लेख के द्वारा पाठको तक पहुंचाने की कोशिश करता है। ज्यादा वक्त किसी के पास नहीं होता है। यहाँ तक कि 2/3 पन्नों को पढ़ सकने का वक्त भी किसी के पास नसीब नहीं होता है। अतः उदाहरण के लिए शक्ति का वर्णन के लिए - "जिसकी लाठी उसकी भैंस" लिखा हो, तो उसी प्रसंग में ही उसके अर्थ को समझा जाय।

आदिवासी समाज अवनति के कई कारण हो सकते हैं, उनमें यह भी एक मूल कारण है कि समाज में पढ़ने-पढ़ाने की प्रवृति नगण्य है। अतः समाज को पुस्तक प्रेमी बनना ही होगा। 

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...