Wednesday, 25 September 2024



संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त 
होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है

यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्य हो जाती है। विडंबना है कि जबतक उस चीज की प्राप्ती नहीं हो जाती, तबतक उसकी प्राप्ती हेतु जान तक की बाजी भी लगाई जाती है। यह कड़ुवा सच है; हमारे पूर्वजों ने 1855 में अन्याय के विरुद्ध हूल किया। और उस हूल की एवज में उन्हें एक बड़ा-सा भूखण्ड मिल गया। पर हम उस भूखण्ड को संभाल पाने में विफल रहे। सोचने वाली बात है; इतना सख्त कानून रहने के बावजूद भी उस नये भूखण्ड में बाहरियों की बाढ़ आ गई और उसने हमारी ”डेमोग्राफी“ ही बदलकर रख दी है। अब उसमें हिन्दु आये या मुसलमां; यह शोध का विषय हो सकता है। संताल परगना गजेटियर्स बताता है कि अलग संताल परगना गठन होने के समय देवघर एवं राजमहल में मात्र 10% ही बाहरी आबादी थी। लेकिन इस आबादी के साथ जादुई करिश्मा हो गई, जिससे आज सच में संताल परगना की डेमोग्राफी बदली हुई है। संताल परगना के छोटे-बड़े शहरों की बात ही छोड़ दीजिए। अब तो गांव-देहातों में भी बाहरी घुसपैठियों की बाढ़ आ गई है। आश्चर्य करने वाली बात तो यह है कि एसपीटी एक्ट के तहत जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। फिर भी हो सकता है; शायद ये बाहरी घुसपैठिये आसमान से टपक पड़े हों!

देश 1947 को आजाद हुआ। हम अपने हूल के परिणामस्वरुप मिले भूखण्ड को संभालने में विफल रहे। महानायक सिदो-कान्हू एवं हूल में शहीदों के सपने अधूरे रह गए। फिर हम झारखण्ड अलग प्रांत के आंदोलन में कूद पड़े। इस आंदोलन के परिणामस्वरुप भी हमें 50 वर्षों के बाद 2000 को अलग झारखण्ड राज्य तो मिल गया, पर उसे भी संभाल न पाए। तब बाहरी आबादी अपना बोरिया-बिस्तार समेट ही चुकी थे कि हमने उसे अग्रज मानकर उन्हें अपने पास ही पनाह दे डाली। अब डेमोग्राफी ... डेमोग्राफी चुनावी झुनझुना बजाते रहो। इससे कुछ होना-जाना नहीं है। परिणाम यह हुआ कि हमारे लोग अपनी मातृभूमि से पलायन कर रहे हैं, जबकि बाहरी आबादी टिड्डी की भांति उसकी भरपाई हेतु घुसपैठ कर रहे हैं। दोनों ही परिस्थितियों में हमारी हालत पतली हुई जा रही है।

आदिवासी संतालों की सुरक्षा हेतु क्या नहीं है? उनके पास सभी तरह के कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। फिर भी वे लुप्त होने की कगार पर खड़े हैं। अब उनकी जनसंख्या झारखण्ड में 2011 के अनुसार मात्र 26% रह गई है।

झारखण्ड में चुनावी शंखनाद हो चुका है। इस चुनाव के दौरान काले-पीले सभी तरह के राजनैतिक दल आयेंगे। और वे भूतकाल की तरह संतालों को किसी दुधारी गाय की तरह दुहकर अंतर्धान हो जाएंगे। और हम मूरख संताल भाषा को छोड़ धर्म और लिपि का घूंट पीने में मस्त हो जाएंगे। वाह रे आदिम जाति संताड़ खेरवाल!

Tuesday, 24 September 2024

हमारी पहचान है या विनाश की फाँस?

अगर दुनिया में लिपि ही किसी समुदाय विशेष की पहचान होती, तो आज अंग्रेज ही दुनिया के महामूर्ख कहलाते। यही वे महामूर्ख अंग्रेज हैं, जिनके पास अपनी कोई लिपि नहीं है। मालूम हो; अंग्रेजी की लिपि उधारी है। फिर भी अंग्रेजों ने आज किसी सौतेली लिपि के भरोसे दुनिया को अपनी मुट्ठी में कैदकर रखा है। क्या यह झूठ है कि अंग्रेजों ने अपने ही देश भारत में करीब तीन सौ साल तक डंके की चोट पर राज किया है? क्या यह भी असत्य है कि उन्होंने दुनिया के अन्य करीब ढाई सौ देशों में अपना परचम लहराते रहा है? फिर तो यह भी अविश्वासनीय ही होगा कि आज भी अंग्रेज पचास देशों में राज कर रहे हैं? क्या आपको मालूम है कि उन देशों में उनके बगैर हुक्म सूर्यास्त भी नहीं होता है? उन देशों में अंग्रेजों की तूती बोलती है। एक बार अपने गिरेबां में झांककर कह दो कि यह सब बकवास है, झूठ है और फरेब है। हे कंबल ओढ़कर घी पीने वालो अंग्रेजों की औलाद! हे अंग्रेजों के पैंट पहनने वालो! छोड़ दो हम जैसे गरीब और असहाय संतालों को। खुद के बच्चे अंग्रेजी मिडियम में और हमारे बच्चे वही झोल चिकी का झोल पिलाते रहो? यह सब गोरखधंधा अब और चलने वाला नहीं है। हमें बेवकूफ बनाना बंद करो। और बंद करो अपनी वाहियात चिकी मिशन-2025। तुम्हारा पाप का घड़ा  अब भर चुका है। देखते नहीं हो, तुम्हारे आका मुख्यमंत्री मांझी साहब ने उस घड़े को फोड़ दिया है। और तुम्हें क्या चाहिए? दूर हो जा हमारी नजरों से, नहीं तो बेमौत मरने के लिए तैयार रहना।

अंग्रेजों को लाख गाली दो, पर सच्चाई छुप नहीं सकती है। यह सच है कि यही वह शख्स है जिसने सिर्फ आपको ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम नंग-धड़ंगों को अपनी आबरु बचाने हेतु अपनी पैंट पहना रखी है। न सिर्फ उसने अपनी पैंट ही पहना रखी है बल्कि यह बताओ कि उनका हस्तक्षेप कहाँ नहीं है? तुम्हारे उठते-बैठते, सोते-जागते, रोना-धोना और तमाम तरह के क्रिया-क्लापों में सिर्फ अंग्रेजों का ही भूत सवार रहता है। बगैर अंग्रेजियत आपकी सांस एक सेकेण्ड भी नहीं चल सकती है। समय रहते चेत जाओ। तुम्हारी यह गंदी हरकत ने हमें सौ साल तक बेवकूफ बनाती रही है। तुम्हारी यह बुझी रोशनी, अब किसी काम की नहीं है। छोटे बच्चे ज्यादा गुस्सा नहीं कलते, अब सो जाओ!

पहचान ... पहचान ... पहचान! पहचान कौन? पहचान झोल चिकी! सब जगह पहचान! अरे महामूर्खो! आपने तो हद ही कर दी है। तुम्हारी हर सांस में ही अंग्रेजियत है। फिर किस बात की पहचान? अंग्रेजी की अपनी लिपि नहीं है। फिर भी अंग्रेजी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बन गई है। सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं बल्कि दुनिया की कई अन्य भाषाएं भी हैं, जिनकी अपनी लिपि नहीं है, पर उन्होंने अपनी भाषा की समृद्धि  के लिए रोमन लिपि को ही अपना रखा है। जरा गहराई से सोचो। आखिर ऐसा क्यों? आपकी लिपि संतालों की फाँस बन गई है।

Monday, 9 September 2024

पी. ओ. बोडिंग साहब की अनमोल भेंट

तब संतालों में एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति नहीं था, फिर भी वे शेर के जबड़े से संताल परगना को खींच निकालने में सफल रहे। इसके विपरीत, आज हर घर में पढे-लिखे लोग मौजूद हैं। संतालों के अत्याचारियों ने जुल्म करने की सीमा को लांघ दिया है। फिर भी हम भिंगी बिल्ली बनकर किसी एक कोने में दुबके हुए हैं। हूल बीते मात्र 5 वर्ष ही बीते थे। हूल एवं हूल के परिणामों से मनुवादी अत्यधिक बौखला उठे थे। उनकी बौखलाहट स्वाभाविक थी। कारण, हूल में महाजनों को अपने किये का फल मिल चुका था। जहां भी दा॑व लगा, वे मौत के घाट उतारे गए थे। हूल तत्कालीन अंग्रेज साम्राज्य के विरुद्ध नहीं बल्कि अत्याचारी महाजनों के विरुद्ध था। अतः मनुवादियों का जख्मी शेर में परिणत होना स्वाभाविक था। हुआ यूं कि अब महाजन दुगुना रफ्तार से संतालों पर अत्याचार करने लगे थे। ऐसी हालत में मिशनरियों का संताल परगना में आगमन और निरीह संतालों की मदद करना; इन सूदखोर महाजनों को फूटी कौड़ी नहीं सुहाया।

तब बेनगड़िया मिशन पापा-केराप की भलमनसाहत के कारण अपनी प्रसिद्धि पाने में सफल हो चुका था। पापा-केराप साहब ने संतालों की भलाई हेतु कोई कोर कसर न छोड़ रखी थी। कुछ वर्षों बाद उसी स्थान पर पी. ओ. बोडिंग का भी आगमन हुआ। कुछ ही वर्षों के बाद दोनों संतालों के मसीहा पापा-केराप साहब इस दुनिया से चल बसे। अब संतालों की देखरेख का सारा भार बोडिंग साहब पर आ गिरा था।

पी. ओ. बोडिंग साहब एक महान भाषावैज्ञानिक थे। वे संताली के अलावे अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी, नॉर्वेजियन आदि भाषाओं के भी अच्छे जानकार थे। उन्हें संताली भाषा-साहित्य से बेहद लगाव था। उन्होंने 44 वर्षों तक संतालों के बीच रहकर संताली साहित्य की सेवा की है।

भारत प्रवास के दौरान उन्होंने देखा कि संतालों की आर्थिक स्थिति बहुत ही नाजुक अवस्था में पड़ी हुई थी। और इधर महाजनों ने भी संतालों का जीना हराम कर रखा था। मिशन स्कूल के भरोसे एकाध संताल जरूर अपना नाम व कुछ पढ़-लिख सकने में कामयाब तो हो चुके थे। परंतु वे इतने योग्य नहीं थे कि वे अपनी भाषा की समृद्धि एवं शब्द संचयन के मामले में कुछ कर सकें। बोडिंग साहब को डर सता रहा था, अगर समय रहते संताली शब्दावली को संजोकर नहीं रखा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब संताली भी एक न एक दिन विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाएगी। यही एकमात्र कारण था कि बोडिंग साहब की 20 वर्षों की कड़ी मेहनत ने रंग लाई। जिसके फलस्वरूप उनके द्वारा संग्रहित, लिखित, संपादित एवं प्रकाशित A Santal Dictionary (5 Vol) हमारे लिये छोड़ गए। इस डिक्शनरी की उपयोगिता तब तक होती रहेगी, जब तक एक भी संताल इस धरा पर विचरण करता रहेगा। पी. ओ. बोडिंग का नाम सदा-सदा के लिये स्वर्ण अक्षरों में चमकता रहेगा! संताली साहित्य के मसीहा पी. ओ. बोडिंग साहब को शत-शत नमन!

Friday, 6 September 2024

शिक्षा की अलख किसने जगाई?

यह आधुनिक युग है। इस युग में शिक्षा अनिवार्य हो गया है। अब अंगूठा टेक का जमाना लाद लिया। यह अलग विषय हो सकता है कि इस वक्त संताल परगना में खासकर संतालों में शिक्षा की क्या स्थिति है? यह सोलह आने सच है कि महान संताल विद्रोह अर्थात संताल हूल-1855 घटित होने तक एक भी संताल पढ़ा-लिखा नहीं था। हूल के परिणामस्वरूप अलग संताल परगना मिल तो गया पर शिक्षा के क्षेत्र में संताल परगना फिसड्डी ही रहा।

हूल के ठीक 5 वर्ष बाद 1860 को संताल परगना में ईसाई मिशनरियों का अगमन हुआ। उसने संतालों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार आरंभ कर दिया। देखते ही देखते करीब तीन सौ छोटे-बड़े स्कूलों का उदय हुआ। इन स्कूलों में अमीर-गरीब बगैर किसी भेदभाव के सभी तरह के बच्चों को तालीम दी जाने लगी। मिशनरियों का नक्शा आपके सामने है कि आज भी इनके द्वारा प्रायोजित कई अच्छे-अच्छे स्कूल एवं कॉलेज चल रहे हैं।

कोई माने या न माने, लेकिन यह कड़ुवा सच है कि इन्हीं मिशन स्कूल से निकले बच्चों ने अपने हक और अधिकारों को पहचाना एवं संघर्ष के लिये सड़क पर उतर आए, चाहे वह अलग प्रांत की मांग हो अथवा किसी और तरह की मांग। इन्हीं की अगुवाई में कई आंदोलन हुए एवं आगे भी होते रहेंगे। एक ही कारण है कि अब इनकी आँखें खुल चुकी हैं। आदिवासियों को जहां भी प्रताड़ित किया जाएगा, ये शिक्षित बच्चे अग्रिम पंक्ति में अवश्य दिखाई देंगे। ऐसा इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि मिशनरियों ने आजतक शिक्षा की अलख को जगाए रखा है।

 रोमन लिपि : परिवर्धित संताली लिपि

आखिर कोट-टाई-पैन्ट किसकी पोशाक है? नि:संदेह यह अंग्रेजों की पोशाक है। पर इस वक्त इसे दुनिया तो छोड़ो हर संताल द्वारा इसका उपयोग बड़े ही गर्व के साथ किया जाता है। इसे पहनने में किसी भी संताल को कोई गुरेज व एतराज नहीं और न ही कोई इसके विरोध में चूँ तक कर रहा है। सभी संताल इसे पहनने में अपना गौरव महसूस करते हैं। लेकिन रोमन संताली लिपि के साथ ठीक इसके विपरीत हो गया। अक्सर इनपर आरोप मढ़ दिया जाता है कि यह तो ईसाईयों द्वारा ईजाद की हुई लिपि है। अतः यह संतालों की लिपि कतई नहीं हो सकती है। यह लिपि हमें किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। हमें तो किसी संताल द्वारा ईजाद की हुई अपनी लिपि चाहिए, जिससे हम अपनी पहचान को बरकरार रखते हुए गौरव महसूस कर सकें। बेशक वह लिपि चोरी की हुई, अवैज्ञानिक एवं मानक संताली के लिये अनुपयुक्त ही क्यों न हों।

मालूम हो कि रेव्ह. पी. ओ. बोडिंग ने जिस रोमन लिपि को संताली के लिये परिवर्धित कर संताली लिखने के लिये ईजाद किया, इससे श्रेष्ठ, उत्कृष्ट एवं बेहत्तर संताली लिपि और कोई दूसरी नहीं हो सकती है। अतः इस संताली लिपि को कोई अन्य माने या न माने, अपनाए या न अपनाए, इसका विरोध करे; हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। हमें इस संताली लिपि की उन्नति के लिये हर संभव प्रयास करते रहना चाहिए। यह लिपि संताली के लिये सर्वश्रेष्ठ लिपि है।
बोडिंग साहब : एक महान संताल

बेशक पी. ओ. बोडिंग किसी संताल की कोख से पैदा नहीं हुए थे। वे अवश्य ही मूल रूप से एक विदेशी एवं ईसाई धर्म प्रचारक थे। पर उनकी सारी रचनाएं बेहद उम्दी, बेहतरीन, उत्कृष्ट एवं अव्वल दर्जे की हैं। उनकी किसी भी रचनाओं से किसी भी ऐंगल से विदेशी एवं ईसाई धर्म प्रचारक होने की बू नहीं आती है। उनकी ”ए संताल डिक्शनरी” को ही देख लिया जाए। उन्होंने इसमें हर शब्द की व्याख्या बड़े ही उत्कृष्ट तरीके से किया हुआ है। उन्होंने इस शब्दकोश में भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का अक्षरश: अनुपालन करते हुए अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया है; जो कि इस तरह का कृत्य किसी साधारण संताल द्वारा संभव नहीं है।
 
अतः उपरोक्त कारणों को मद्देनजर रखते हुए डंके की चोट पर कहा जा रहा है कि रेव्ह. पी. ओ. बोडिंग संतालों में महान संताल थे!
पी. ओ. बोडिंग : मानक संताली के महान रक्षक
(2 नवंबर 1865 - 25 सितंबर 1938)
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पी. ओ. बोडिंग का आगमन यूरोप के नॉर्वे देश से भारत में 1890 के उतरार्द्ध में हुआ। उनका कार्यक्षेत्र था - संताल परगना के बेनागाड़िया, मुहलपहाड़ी एवं दुमका। उन्होंने बहुत ही कम समय में संताली भाषा को न सिर्फ सीखा, बल्कि वह अपने को संताली का महान विचारक, मानवशास्त्री, दार्शनिक एवं भाषावैज्ञानिक के रूप में स्थापित कर दिया। इनके जैसा संताली के महान विद्वान न कभी थे और न ही निकट भविष्य में होने की संभावना नजर आ रही है। वह संताली को जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखने का प्रबल, कठोर, सशक्त एवं घोर समर्थक था। इसीलिए तो उसने अपने पूर्व मिशनरियों के द्वारा ईजाद की गई रोमन संताली लिपि को परिवर्धित कर संताली लिपि में परिवर्तित कर दिया।

पी. ओ. बोडिंग को अपने ही काल में अच्छी तरह पता चल गया था कि संताल परगना के संतालों को अपनी मानक संताली को बचाने के लिए भविष्य में अपने ही बिरादरी के लोगों के साथ गृहयुद्ध करना पड़ेगा। वे लोग संताल परगना पर हावी होंगे। अर्थात दक्षिणी संताली जो तब तक आर्यों की भाषा के साथ मिश्रित एवं प्रदूषित हो चुकी है को उत्तरी संतालों पर जबरन लागू करने की कोशिश की जाएगी। अतः इस भयंकर मुस्किलत से बचने हेतु पी. ओ. बोडिंग ने इसका बेड़ा उठा लिया था। इस महान कार्य के लिए उसने दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने अपने खून-पसीने एक कर दिए। उन्होंने करीब 22 वर्षों तक कड़ी मेहनत की। और अंततः अपने अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप उन्होंने इन पुस्तकों की रचना कर डाली। पी. ओ. बोडिंग ने इन पुस्तकों को मानक संताली के किसी भी तरह के दुश्मनों को मार गिराने के लिए हैड्रोजन बम तुल्य आविष्कार किया है :- 1. Materials for a Santali Grammar, Part-I (Mostly Phonetics); 2. Materials for a Santali Grammar, Part-II (Mostly Morphology) एवं 3. A Santal Dictionary (V Vols). अतः यह अब हमारी ड्यूटी बनती है कि हम उपरोक्त हैड्रोजन बमों का प्रयोग कब, कहाँ और किस तरह के दुश्मनों पर करें?

Thursday, 5 September 2024

जेरेत् टुटी हूलगा़रकोआ़ञ

लाच् रे बा़नुक् दाना,
बा़नुक् हो़ड़मो़रे लुगड़ी,
बो़हो़क् उमूल चातो़म,
हो़यते ओटाङ आत्एन।
चेकायता़मा़ञ चाम्पा-बादोली,
चेकायता़मा़ञ बारो़ दोलान?
लादा़ञ सेञ रापागा,
आमाक् किसा़-का़हनी।
हानको ञेलकोम टुईला़,
न्हाते गो़दो़र गोचो,
झा़पुत् केदिञको देने-बानार,
दिपिला़दिञको हेन्दे टुकुच्,
हेलाविना़ञ नामाल का़मी।
इमा़ञ बापधो़न इमा़ञमे से,
आकेल रेआक् दुगुर सेंगेल,
मित् मित् ते सानाम बा़ईरी, 
जेरेत् टुटी हूलगा़रकोआ़ञ।
भाषाविज्ञान क्या है?

जिसने लिपि को ही भाषा मान बैठा हो, उनसे भाषा के बारे में ज्यादा बहस करना बेवकूफी है। उनके पास मिशन-2024 के अलावे भी कई ऐसे कार्यक्रम हैं, जिनसे संतालों की सामाजिक समरसता तो बिगड़ेगी ही साथ ही उनकी लिपि भी थक हारकर अपनी कोख में पुनः प्रवेश कर जाएगी। अर्थात् उन्हें कुछ ही दिनों के पश्चात् स्वाभाविक मौत की प्राप्ती हो जाएगी। काश! वे अपनी भाषाई शुद्धता एवं भाषा के मानकीकारण पर ज्यादा ध्यान देते तो क्या ही अच्छा होता। लेकिन उन्हें कौन समझाए? जो अपनी बड़ी-बड़ी रैलियों में “आदिमकोवाग मेंद दो छेद काना” का बेसिर-पैर वाला नारा लगा रहा हो, उनसे और ज्यादा क्या उम्मीद की जा सकती है?

तमाम भाषाविज्ञानिकों ने उनकी भाषा को सदियों पूर्व ही प्रदूषित एवं मिश्रित घोषित कर रखा है। वास्तव में उनकी भाषा में आर्यं भाषाओं का मिश्रण अथवा प्रभाव है। अतः संताली भाषा वैज्ञानिकों की दृष्टि से उत्तरी संताली को ही मानक संताली कहा गया है।

भाषाविज्ञान एक निःरस विषय है। फिर भी आइए, आज हम इस विषय पर कुछ चर्चा कर लें।

भाषा-विज्ञान की शाखाएँ - भाषा की परिभाषा रेखांकित करते हुए हमने जाना है कि भाषा-विज्ञान विज्ञान की वह शाखा है जिसमें भाषा का (विशिष्ट और सामान्य, समकालिक और ऐतिहासिक, तुलनात्मक और प्रायोगिक) दृष्टि से अध्ययन किया जाता है, जिसके अध्ययन के द्वारा भाषा की उत्पत्ति, गठन, प्रकृति एवं विकास आदि की सम्यक व्याख्या करते हुए इन सभी प्रकरणों के विषय में वैज्ञानिक सिद्धांतों का निर्धारण किया जाता है। स्पष्ट है भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन हेतु भाषा से संबंधित प्रायः सभी प्रश्नों पर विचार किया जाता है। इन सारे प्रश्नों में कुछ प्रश्न तो अपने आप में आधारभूत महत्त्व रखते हैं और कुछ आनुषंगिक। स्पष्ट है इसी कारण भाषा की अनेक शाखाएँ निर्मित की गयी हैं। इनमें कुछ शाखाएँ तो प्रमुख या प्रधान हैं और कुछ शाखाएँ गौण हैं।

(क) प्रधान शाखाएँ:

1. वाक्य-विज्ञान - भाषा का एकमात्र प्रमुख प्रकार्य भावों और विचारों का आदान-प्रदान है। विचारों का आदान-प्रदान वाक्यों द्वारा ही संभव हो पाता है। अतः निश्चय ही वाक्य, भाषा की सर्वाधिक स्वाभाविक और महत्त्वपूर्ण शाखा के रूप में जाना जाता है। भाषा विज्ञान की जिस शाखा में वाक्य के विषय में अध्ययन-विश्लेषण किया जाता है उसे वाक्य-विज्ञान कहा जाता है। वाक्य-विज्ञान के तीन रूप होते हैं:

(क) समकालिक

(ख) ऐतिहासिक, और

(ग) तुलनात्मक।

वाक्य-रचना का प्रत्यक्ष संबंध पदक्रम, अन्वय, निकटस्थ अवयव केन्द्रिकता, परिवर्तन के कारण, परिवर्तन की दिशाएँ आदि दृष्टियों से किया जाता है। भाषा-विज्ञान की यह शाखा अपेक्षया कठिन मानी जाती है। इस दिशा में कार्य तो काफी हुए हैं परंतु अभी भी इस क्षेत्र में काफी कार्य की जरूरत है।

2. पद-विज्ञान (रूप-विज्ञान) - वाक्य का निर्माण पदों (रूपों) से होता है। यही कारण है कि भाषा वैज्ञानिक अध्ययन क्रम में वाक्य के बाद पदों (रूपों) पर विचार किया जाना समीचीन माना गया है। पद-विज्ञान को ‘रूप-विज्ञान’ या ‘पद-रचनाशास्त्र’ भी कहा गया है। पद-विज्ञान के अंतर्गत संबंध तत्व, उसके प्रकार और रूप भाषा के वैयाकरणिक रूपों के विकास, उसके कारण तथा धातु, उपसर्ग, प्रत्यय आदि उन तमाम उपकरणों पर विचार किया जाता है जिनसे पद या रूप बनते हैं। पद-निर्माण या रूप निर्माण की प्रक्रिया भी इसके अंतर्गत आती है। इसका अध्ययन भी समकालिक, तुलनात्मक तथा ऐतिहासिक-इन तीनों रूपों में किया जाता है।

3. ध्वनि-विज्ञान - शब्दों का आधार ध्वनियाँ हैं। ध्वनि-विज्ञान के अंतर्गत भाषा की ध्वनियों पर अनेक दृष्टियों से विचार किया जाता है। इस शाखा के अंतर्गत ध्वनि-शास्त्र (फोनेटिक्स) एक विभाग है, जिसमें ध्वनि से संबंध रखने वाले अवयवों (मुख-विवर, नासिका-विवर, स्वर-तंत्री और ध्वनि यंत्र आदि) ध्वनि उत्पन्न होने की क्रिया तथा ध्वनि-लहर और उसके सुने जाने आदि का भी अध्ययन किया जाता है। किसी भाषा में प्रयुक्त ध्वनियों का वर्णन और विवेचन आदि भी इसी शाखा के अंतर्गत आता है। ध्वनि-प्रक्रिया पर उसके कारणों एवं दिशाओं के विश्लेषण के साथ विचार होता है। इस विज्ञान के अध्ययन के भी पूर्व की ही तरह समकालिक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक-तीन रूप होते हैं। इसमें एक ही भाषा-परिवार की भाषाओं को लेकर ध्वनि-विकास पर विचार करके नियमों का निर्धारण किया जाता है। प्रसिद्ध ‘ग्रिम’ नियम का संबंध ध्वनि-विज्ञान से ही है। इसमें भाषिक इतिहास का अध्ययन भी ध्वनि की दृष्टि से किया जाता है। ध्वनि-विज्ञान के अंतर्गत ध्वनि-ग्राम विज्ञान जैसे कुछ नये उपविभाग भी बनाए गये हैं। ये ध्वनि के सूक्ष्म अध्ययन की गरज से किये गये हैं।

4. अर्थ-विज्ञान - भाषा की शरीर-यष्टि वाक्य से चलकर ध्वनि की इकाई पर समाप्त होती है। इसके बाद उसकी आत्मा पर विचार करना पड़ता है। आत्मा से तात्पर्य ‘अर्थ’ से है। शब्दों का अर्थ-विवेचन काफी बाद में शुरू हुआ है, क्योंकि काफी समय तक आधुनिक भाषा वैज्ञानिक इस प्रकरण को भाषा-विज्ञान के क्षेत्र का मानते ही नहीं थे। वे इसे दर्शन का क्षेत्र मानते थे। हालाँकि अब यह तय हो चुका है कि अर्थ का भाषा से अत्यंत गहरा संबंध होता है। ‘अर्थ’ का अध्ययन भी समकालिक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक-तीनों ही रूपों में होता है। अर्थ-विज्ञान में प्रमुख रूप से शब्दों के अर्थ का निर्धारण, उसके स्तर, उसके विकास और कारणों आदि पर विचार किया जाता है। इसके साथ ही अर्थ और ध्वनि के संबंध, पर्याय, विलोम आदि के विवेचन भी उसमें सम्मिलित होते हैं। भाषा-विज्ञान में इस प्रकरण को ‘अर्थ-विचार’ कहकर भी अभिहित किया जाता रहा है। भाषा-विज्ञान की ये सभी शाखाएँ अत्यंत प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण मानी गयी हैं। इसके अलावा भाषा-विज्ञान की कुछ गौण शाखाएँ भी विकसित हुई हैं। भाषा को गहरे, अति गहरे रूप में जानने-समझने के लिये ही भाषा वैज्ञानिक नित्य उपक्रम में लगे रहते हैं।

उपर्युक्त चार प्रमुख शाखाओं के अलावा एक और प्रमुख शाखा की उद्भावना हिंदी के ख्यात भाषा-वैज्ञानिक डॉ० भोला नाथ तिवारी ने की है। जिसका नाम है ‘शब्द-विज्ञान’ । वे कहते हैं कि पद-विज्ञान में शब्दों की रचना पर तो विचार होता है परंतु शब्दों का वर्गीकरण, नाम-विज्ञान, व्यक्ति या भाषा के शब्द-समूह में परिवर्तन के कारण और दिशाओं आदि का विचार शब्द-विज्ञान के अंतर्गत आएगा। कोश-विज्ञान एवं व्युत्पति का विज्ञान भी शब्द-विज्ञान के ही अंग है। इस शाखा में शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाता है। यह अध्ययन प्रमुख रूप से व्युत्पत्तियों के संदर्भ में किया जाता है।

भाषा-विज्ञान की कुछ गौण शाखाएँ:

1. भाषा की उत्पत्ति-भाषा - विज्ञान का सर्वाधिक स्वाभाविक एवं आवश्यक प्रश्न भाषा की उत्पत्ति का है। इस प्रश्न पर विद्वानों ने तरह-तरह से विचार कर अनेक सिद्धांतों का प्रदिपादन किया है। आधुनिक काल के अधिकांश विद्वान तो एक सीमा में ही इसे भाषा-विज्ञान की शाखा के रूप में मानते हैं, परंतु सच तो यह है कि यह भी उसकी एक शाखा ही है। जब भाषा का पूरा जीवन हमारे अध्ययन का विषय है, तो इसके जन्म से जुड़े प्रश्नों को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। इसमें कोई संदेह नहीं कि इसका अध्ययन कठिन जरूर है। परंतु इस पर अनुसंधान और विचार तो चलते ही रहेंगे ।

2. भाषाओं का वर्गीकरण-भाषा - विज्ञान की शब्द-विज्ञान को लेकर पाँच प्रधान शाखाओं (वाक्य, पद, शब्द, ध्वनि और अर्थ) के आधार पर संसार की भाषाओं का तुलनात्मक और ऐतिहासिक अध्ययन कर उनका वर्गीकरण इस शाखा के अंतर्गत किया गया है। इसी आधार पर यह तय किया गया है कि कौन-कौन भाषाएँ एक परिवार की हैं। इसके साथ ही इससे अर्थ या ध्वनि संबंधी अनेक गुत्थियों पर भी प्रकाश पड़ता है। तात्विक दृष्टि से यह क्षेत्र प्रधान पाँचों शाखाओं को मिलाकर अध्ययन की एक स्वतंत्र शाखा बनाई गयी है।

3. भाषा काल-क्रम-विज्ञान - भाषा-विज्ञान में सांख्यकीय पद्धति से काम करने या सांख्यिकी की सहायता से अध्ययन का सिलसिला 19वीं शताब्दी में ही प्रारंभ हो चुका था। ह्विटनी जैसे विद्वानों ने 1874 ई० में अंग्रेजी की ध्वनियों पर इस पद्धति से कुछ कार्य किया था।

भाषा काल-क्रम - विज्ञान में वर्णनात्मक भाषा-विज्ञान के आधार पर एक भाषा-परिवार की दो या अधिक भाषाओं के शब्द-समूह को एकत्र किया जाता है और फिर उसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। इस तुलनात्मक अध्ययन में पुराने शब्दों के लोप और नये के आगम के आधार पर भाषाओं के एक मूल. भाषा से अलग होने के काल तक का पता लगाया जाता है। साथ ही, कभी-कभी ऐसी भाषाओं में जिनमें कुछ समानता हो और कुछ भिन्नता हो जिसके कारण उनके एक परिवार के होने के संबंध में निश्चयात्मक रूप से कुछ भी कहना कठिन हो, भाषा काल-क्रम-विज्ञान के आधार पर उनके एक परिवार के होने या न होने के संबंध में अपेक्षया अधिक निश्चय के साथ कहा जा सकता है। एक ही भाषा के दो कालों का शब्द-समूह ज्ञात हो तो उनके बीच के समय के संबंध में भी इसके आधार पर कुछ कहा जा सकता है। इस प्रकार वर्णनात्मक और तुलनात्मक भाषा-विज्ञान पर आधारित भाषा-विज्ञान की इस शाखा के आधार पर ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान की बहुत सी गुत्थियों को सुलझाने की संभावना बढ़ गयी है।

4. भाषिक भूगोल-शाखा - भौगोलिक विस्तार में स्थानीय वैशिष्ट्य की दृष्टि से किसी क्षेत्र की भाषा का अध्ययन ही भाषिक भूगोल शाखा का विषय है। इसे ही ब्याज से भाषा या बोली आदि में ध्वनि, सुर, शब्द-समूह, रूप (पद), वाक्य-संरचना एवं मुहावरे आदि की दृष्टि से कहाँ और क्या अंतर है या उसकी क्या विशेषताएँ हैं, इन्हीं सभी पक्षों का अध्ययन भाषिक भूगोल नामक शाखा का मुख्य विषय है।

भाषा-भूगोल में सर्वप्रथम क्षेत्र विशेष के भिन्न-भिन्न स्थानों की भाषा का वर्णनात्मक अध्ययन किया जाता है और फिर उन विभिन्न स्थानों की भाषा विषयक विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन कर यह निश्चय किया जाता है कि कितने स्थानों की भाषा में लगभग साम्य है। इतना ही नहीं स्थानीय अंतर कहाँ कम है और कहाँ अधिक-इस पर भी विचार किया जाता है। साथ ही कहाँ से भाषा में इतना परिवर्तन आरंभ हो गया है कि एक क्षेत्र का व्यक्ति दूसरे क्षेत्र की भाषा को समझ सके, इस पर भी विचार किया जाता है। इन बातों का निर्धारण हो जाने पर यह सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में इतनी भाषाएँ हैं और उनके क्षेत्र की सीमा अमुक जगह तक है। साथ ही, प्रत्येक भाषा के अंतर्गत आने वाली बोलियों और प्रत्येक बोली की उपबोलियों एवं उनके क्षेत्रों तथा एक-दूसरे की अलग करनेवाली विशेषताओं का भी निर्धारण किया जाता है।

5. भाषा (प्रागैतिहासिक खोजद्) - भाषा-विज्ञान की यह शाखा इतिहास, सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसमें इतिहास के उस अंधे युग पर, जिसके संबंध में कोई भी सामग्री उपलब्ध नहीं होती, भाषा के सहारे प्रकाश डाला जा सकता है। प्रसिद्ध जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने भाषा-विज्ञान की इस शाखा की नींव डाली थी। इस तरह की खोज के लिये पहले किसी भाषा के प्राचीन शब्दों को लिया जाता है, तत्पश्चात् उस परिवार की अन्य भाषाओं के प्राचीन शब्दों की तुलना के आधार पर यह निश्चित किया जाता है कि प्राचीनतम काल के शब्द कौन-कौन थे। इन शब्दों को इकट्ठा करके उनका विश्लेषण कई दृष्टियों से किया जाता है। सामाजिक, धार्मिक आदि वर्गों में शब्दों को अलग-अलग करके अनुमान लगाया जाता है कि उस समय की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक दशा क्या थी। जानवरों के नामों से यह पता चलता है कि उनके पास कौन-कौन से जानवर थे। ‘क्रियापरक’ शब्दों से उनके सामाजिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है। इस तरह यथासाध्य उन शब्दों के आधार पर जीवन के प्रत्येक अंग की छानबीन की जाती है और एक पूरा नक्शा तैयार करने की कोशिश की जाती है। साथ ही प्रकृति, पर्वत, नदी, पेड़-पौधे तथा ऋतु से संबंधित शब्दों के आधार पर यह अनुमान भी लगाया जाता है कि किस स्थान पर इन सबका इस रूप में पाया जाना संभव है। इससे उसके आदिम स्थान का अनुमान लगाना सहज हो जाता है।

6. मनोभाषा-विज्ञान - इस शाखा में भाषा के मनोवैज्ञानिक संदर्भो एवं पक्षों पर विचार किया जाता है। वास्तव में, भाषा हमारे मनोभावों एवं विचारों को ही तो व्यक्त करती है। इसी कारण शब्दों के प्रयोग में हम बहुत सतर्क रहते हैं। हम सदा ही शब्दों के चयन की प्रक्रिया से जुड़े रहते हैं। जाहिर है चयन की यह प्रक्रिया हमारे मन की विशिष्ट स्थिति की संकेतिका है। इसी कारण इस शाखा में मानसिकता एवं मन की गुह्यता के अध्ययन के आधार पर भाषा का अध्ययन करते हैं।

7. समाज भाषा-विज्ञान - भाषा पूर्णतया सामाजिक वस्तु है। व्यक्ति समाज में ही उसे सीखता है। समाज में ही वह उसका प्रयोग करता है। स्पष्ट है भाषा और समाज अन्योन्याश्रित हैं। इस संबंध का ही परिणाम है कि भाषा अपनी व्यवस्था में समाज के अनुरूप होती है। साथ ही उसका विकास भी सामाजिक विकास के समानांतर चलता है। किसी समाज के विषय में उसके द्वारा प्रयुक्त भाषा के आधार पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। भारतीय भाषाओं में चाचा, ताऊ, मामा, मौसा जैसे संबंध द्योतक शब्दों का अभाव है। जाहिर है भारतीय समाज में इन मानवीय संबंधों का वहाँ की अपेक्षा अधिक महत्व रहा है। फारसी में बड़े लोगों के लिये समानार्थ क्रिया के बहुवचन रूप का प्रयोग इस तथ्य का प्रमाण है कि वहाँ की सामंती व्यवस्था में अमीर या बड़े आदमी एक से अधिक सामान्य या निम्न श्रेणी के व्यक्ति के बराबर माने जाते थे। जापान में राजा तथा राजघराने के लोगों के लिये सामान्य भाषा से अलग शब्दों एवं रूपों के प्रयोग इस बात के संकेत हैं कि वहाँ के समाज में राज्य का स्थान बहुत ही विशिष्ट हुआ करता रहा है। संभवतः भाषा और समाज के इस अभिन्नत्व के कारण ही इस शाखा का जन्म हुआ है। भाषा के इस सामाजिक संदर्भ को व्याख्यायित करने वाली इस शाखा का संबंध वास्तव में सामाजिक विज्ञान से भी बनता है।

8. लिपि-विज्ञान - वैसे लिपि भाषा का प्रत्यक्ष अंग नहीं है। तभी कुछ विद्वान इसे भाषा-विज्ञान की शाखा के रूप में स्वीकार करना नहीं चाहते किंतु फिर भी प्रत्यक्षतया भाषा-विज्ञान के अंतर्गत न आने पर भी भाषा-विज्ञान के अंतर्गत इसका अध्ययन असंबंद्ध नहीं माना जा सकता। हमें पता है कि लिखित भाषा में लिपि का सहारा नितांत अपरिहार्य है। जाहिर है इसी कारण भाषा-विज्ञान के अंतर्गत यदि इसके अध्ययन को भी भाषा वैज्ञानिक कुछ ही सीमा तक सही मानते हैं तो इसके पीछे एक तर्क है। लिपि की उत्पत्ति विकास शक्ति तथा उपयोगितायें पर कुछ ऐसे प्रकरण हैं जिनपर भाषा-विज्ञान की इस शाखा में विचार किया जाता है। ध्वनि-विज्ञान की सहायता से लिपि

के सुधार आदि पर भी इस शाखा में विचार किया जाता है।

9. शैली-विज्ञान-भाषा - विज्ञान की यह शाखा वस्तुतः बहुत नई नहीं है। बहुत पूर्व में ही भाषा-शास्त्रियों का ध्यान इस पर गया था। सच तो यह है कि हर व्यक्ति की शैली ही उसके व्यक्तित्व के अनुरूप होती है।

प्रश्न है, शैली है क्या? वास्तव में भाषा के संदर्भ में शैली का प्रत्यक्ष संबंध अभिव्यक्ति से जुड़ा हुआ है। हर भाषा में ध्वनि, शब्द-समूह, रूप-रचना तथा वाक्य-संरचना की दृष्टि से अभिव्यक्ति का एक सर्व स्वीकृत मानक या परिनिष्ठित रूप होता है, जिसे उस भाषा में अभिव्यक्ति का एक सामान्य ढंग कह सकते हैं। जो लेखन में या बोलने में इसी सामान्य रूप का प्रयोग करते हैं, उनकी अपनी कोई शैली नहीं होती। शैली मानी जाती है उनकी जो इस सामान्य रूप से ध्वनि, शब्द-समूह, रूप-संरचना और वाक्य-संरचना आदि की दृष्टि से हटकर भाषा का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार शैली विशेष के लिये आवश्यक है कि चुनकर भाषिक ईकाइयों का ऐसा प्रयोग हो जो सामान्य की तुलना में विशेष या अलग हो। भाषा की सामान्य अभिव्यक्ति पूरे भाषा-समाज की होती है, किन्तु शैली व्यक्ति की या वैयक्तिक होती है। इसका मुख्य आधार है चयन। व्यक्ति अपनी आवश्यकता और रुचि के अनुकूल चयन कर अपनी अभिव्यक्ति करता है। महाकवि निराला या पंत को उनके चयन की इसी प्रक्रिया के आधार पर पाठक पहचान लेता है। यह आधार है उनकी शैली । वास्तव में भाषा-विज्ञान में शैली का अध्ययन ही शैली-विज्ञान है।

10. भू-भाषा विज्ञान - इसके अंतर्गत विश्व में भाषाओं का वितरण, उनके राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व का आकलन, कैसे एक-दूसरे पर अंतरूक्रिया करती हैं, राष्ट्रों की संस्कृति भाषा को कैसे प्रभावित करती है, यहाँ तक कि राष्ट्रभाषा और राजभाषा जैसे प्रकरणों का अध्ययन भी इस शाखा के अंतर्गत किया जाता है। यह शाखा वास्तव में भाषा-विज्ञान की अपेक्षाकृत नयी शाखा है।

11. व्यक्ति-बोली विकास-शाखा - वस्तुतः अंग्रेजी का ‘आटोजेनी’ शब्द मूलतः जीव-विज्ञान का है

जिसका प्रयोग 1870 के आस-पास किसी एक व्यक्ति के विकास के अर्थ में किया गया था । आधुनिक काल में भाषा वैज्ञानिकों ने इसके साथ भाषिक शब्द जोड़कर उसे भाषा-विज्ञान की एक शाखा के रूप में स्वीकार कर लिया है। इसमें व्यक्ति विशेष की बोली या व्यक्ति विशेष की भाषा के, जन्म से लेकर मृत्यु तक के विकास की प्रक्रिया का विस्तृत और गहन अध्ययन किया जाता है। कह सकते हैं कि इसमें एक व्यक्ति की भाषा के विकास (जन्म से मृत्यु तक) का अध्ययन-विश्लेषण वैज्ञानिक पद्धति पर किया जाता है। सैद्धांतिक दृष्टि से इस विषय पर हॉकेट जैसे भाषाविद् ने काफी विचार किया है।

सब जानते हैं कि छोटे बच्चों में भाषा जैसी कोई चीज नहीं होती, किंतु भूखा रहने पर या दर्द होने पर पीड़ित होकर वह रोकर या अंगों को पीटकर अपनी बात व्यक्त करना चाहता है। यही प्रतिक्रिया बच्चों के लिये भाषा की मनिंद है। हर माँ समय और स्थिति के आधार पर इन प्रतिक्रियाओं से उसकी भूख और दर्द होने की स्थिति का अनुमान कर लेती है। बच्चा धीरे-धीरे यह जान लेता है कि भूखा रहने पर रोने की क्रिया द्वारा वह खाना खा सकता है। फिर तो रोने की क्रिया का वह भाषा के रूप में प्रयोग करने लगता है। इतना ही नहीं, माँ अनेक संदर्भो को उसे अनेक संकेतों या इशारों से ही समझा देती है। बच्चा समझ भी लेता है। इस तरह अपने विचारों का आदान-प्रदान बच्चे छोटी अवस्था से ही करने लगते हैं। इस शाखा में इसी का अध्ययन किया जाता है।

12. सर्वेक्षण-पद्धति शाखा - यदि हमें किसी ऐसी भाषा का सर्वेक्षण करना हो, जिसकी सामग्री लिखित रूप में हमें उपलब्ध नहीं है और वह भाषा किसी खास क्षेत्र में प्रयोग में आ रही है, तो क्षेत्र में जाकर उस भाषा के प्रयोग करने वालों को सुनकर, अध्ययन के लिये अपेक्षित सामग्री संकलित करने की स्थिति बनाते हैं। वस्तुतः अध्ययनार्थ अपेक्षित सामग्री संकलित करने की पद्धति ही सर्वेक्षण-पद्धति कहलाती है। इसके लिये सामग्री संकलन की दो पद्धतियाँ होती हैं रू 1. स्वयं उस क्षेत्र में जाकर यह संकलन तैयार करना, और 2. उस भाषा को मातृभाषा के रूप में बोलने वाले अर्थात् मातृभाषा भाषी को अपने यहाँ बुलाकर । इस संदर्भ में सूचना देने वाला व्यक्ति अर्थात्

सूचक एक महत्त्वपूर्ण इकाई है। स्वयं सर्वेक्षण करनेवाला व्यक्ति योग्य एवं प्रशिक्षित होना चाहिये । सर्वेक्षक इस हेतु एक प्रश्नावली पूर्व से तैयार कर लेता है । सूचक से हुई बातों की रिकार्डिंग तैयार की जाती है। उपलब्ध सामग्री को सर्वेक्षक साथ-साथ लिखता जाता है। साथ ही उसके विशेष अर्थ भी वह लिखता जाता है। जाहिर है, इसमें सूचक कैसा चुनें, सर्वेक्षक कैसा हो, प्रश्नावली कैसे बनाएँ, सामग्रियों को किस तरह लिखें, यह सब अत्यंत महत्त्व की बातें हैं।

13. सांख्यिकीय भाषा-विज्ञान - भाषा-विज्ञान की इस शाखा में सांख्यिकी के आधार पर भाषा के विभिन्न पक्षों पर गहनता से विचार किया जाता है। यह गणितीय भाषा-विज्ञान के अंतर्गत आता है। सांख्यिकी गणित की ही एक शाखा है। यह जान-समझकर विस्मय होता है कि भाषा-विज्ञान के क्षेत्र की अपेक्षाकृत यह नयी शाखा भारतवर्ष के लिये सर्वथा नयी नहीं है। सच तो यह है कि इस दिशा में पहला कार्य करने का श्रेय भी भारत को ही जाता है। ईसा की तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व में बनायी गयी वैदिक अनुक्रमणियाँ वास्तव में और कुछ नहीं सांख्यिकी भाषा-विज्ञान की ही पृष्ठभूमि है। सारे संसार के भाषाविदों ने इसे अपने ढंग का अनूठा प्रयास माना है।

14. तुलनात्मक पद्धति या पुनर्निर्माण शाखा - तुलनात्मक पद्धति भाषा-विज्ञान में पूर्व से ही अध्ययन की पद्धति के रूप तुलनात्मक भाषा-विज्ञान के ही अंग की तरह है, परंतु इसकी विशेषता यह है कि इसमें दो या दो से अधिक भाषाओं या बोलियों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर पहले से ही निश्चय किया जाता है कि वे एक ही परिवार की है या नहीं, और फिर सूक्षम तुलना के आधार पर उन भाषाओं या बोलियों की पूर्वजा भाषा-(जिनसे उनकी उत्पत्ति हुई है, जैसे हिन्दी के लिये अप्रभंश या फिर संस्कृत) का पुनर्निर्माण किया जाता है, अर्थात् उसकी ध्वनियों तथा उसके व्याकरणिक रूपों एवं अन्य नियमों आदि को ज्ञात किया जाता है।

17वीं सदी से लेकर अब तक भाषा के पारिवारिक वर्गीकरण एवं पारिवारिक अध्ययन के क्षेत्र में जो कार्य हुए हैं उसका आधार तुलनात्मक पद्धति ही है। इस पद्धति में पहले दो भाषाओं के शब्दों को एकत्र कर उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। शब्दों के तुलनात्मक अध्ययन के फलस्वरूप देखा गया है कि दोनों भाषाओं के बहुत-से शब्दों में ध्वनि (या रूप) और अर्थ की दृष्टि से बहुत साम्य है। स्पष्ट ही यह एक वैज्ञानिक पद्धति है।

ऊपर जिस सांख्यिकीय शाखा की चर्चा की गयी है, अपने यहाँ की संहिताओं पर इस दृष्टि से कार्य हुआ है। इनमें से एक के अनुसार ऋग्वेद में 1017 मंत्र, 10580.5 छंद, 153826 शब्द तथा 432002 अक्षर हैं।

यों आधुनिक काल के सांख्यिकीय भाषा-विज्ञान का प्राचीन भारतीय कार्य से कोई तालमेल नहीं है। कहा जाता है कि सर्वप्रथम रूसी भाषाविद् बुंजकोपस्की ने 1847 ई० में भाषा-विज्ञान में गणित के प्रभाग के प्रयोग की संभावना जताई थी। सांख्यिकी भाषा-विज्ञान में ध्वनि, ध्वनि ग्राम, अक्षर, शब्द, रूप, मुहावरे, लोकोक्तियाँ तथा वाक्यों की पद्धति आदि सभी भाषिक इकाइयों की गणना की जाती है और उनके आधार पर अनेक दृष्टियों से उपयोगी परिणाम निकाले जा सकते हैं। इसके द्वारा किसी रचनाकर के बारे में किसी कवि या लेखक की विभिन्न रचनाओं के कालक्रम के बारे में, किसी भाषा से दूसरी या कई भाषाएँ कब निकली, किसी भाषा की आधारभूत शब्दावली कितनी है, आधारभूत व्याकरणिक ढांचा क्या है, ये सब जाने या बताए जा सकते हैं।

इन सभी शाखाओं के अलावा कुछ अन्य दृष्टियों एवं आधारों पर भी अध्ययन किया जाता है। इनमें कुछ का भाषा-विज्ञान के विभागों-उपविभागों के रूप में उल्लेख किया जाता है। जैसे ‘सुर-विज्ञान’ जिसमें भाषा के सुरों का अध्ययन होता है। इसमें से लघुतम सार्थक भाषिक इकाई का अध्ययन संभव होता है। ऐसे ही भाषा-विकास में भाषा में परिवर्तनशीलता तथा उसके कारणों की खोज की जाती है। ‘रूपांतरण’ नामक शाखा में भाषा के व्याकरण एवं ध्वनियों के रूपांतरण की दृष्टि से अध्ययन किया जाता है। ‘व्यतिरेकी विश्लेषण’ भाषा-विज्ञान की ऐसी शाखा है जिसमें दो भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करके उनकी समानताओं का विश्लेषण किया जाता है।

बोली-विज्ञान भी भाषा-विज्ञान की एक उप शाखा है जिसमें उनकी ध्वनियों तथा रूप विषयक विशेषताओं के आधार पर ही वर्गीकरण किया जाता है। जाहिर है यह भाषाओं के रूपात्मक या आकृतिमूलक वर्गीकरण के अधिक समीप की शाखा प्रतीत होती है।

इधर एक नयी शाखा भी प्रकाश में आई है जिसे ‘जाति-विज्ञान’ के नाम से अभिहित किया जाता है। इस शाखा में जाति-विज्ञान और भाषा-विज्ञान इन दोनों विज्ञानों के संबंधों और आपसी प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। भाषा की प्रकृति और भाषा-विज्ञान के इतिहास आदि का अध्ययन भाषा-विज्ञान की विशिष्ट शाखा के अंतर्गत किया जाता है। 

(सौजन्य: गुगल)
धर्म, भाषा और लिपि

1. धर्म - यह एक व्यक्तिगत और बहुत ही संवेदनशील विषय है। सबसे पहले तो आस्तिक-नास्तिक का सवाल उठ खड़ा होता है। साथ ही ईश्वर है-नहीं है का सवाल है। अगर ईश्वर है, तो कितने तरह के ईश्वर हैं, वगैरह-वगैरह। इस बहस में नास्तिकों ने हमेशा आस्तिकों से बाजी मारी है। किसी धर्म विशेष का ठेकेदार जो धर्म पर बहस करने को राजी हो, तो समझ लेना उससे महा अधार्मिक व्यक्ति इस जगत में और कोई हो नहीं सकता है। चूंकि यह व्यक्तिगत है, अतएव इसका भाषा और लिपि से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।

2. भाषा - भाषा वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भाषा कोई दैवीय देन नहीं है। इसकी उत्पत्ति मानव समाज में बहुत बाद में हुई होगी। मानव जाति के पास जन्म लेते ही ध्वनि तो है पर भाषा नहीं। यह स्वाभाविक है कि मानव समुदाय कई वर्षों तक इशारों में ही अपना काम चलाते रहे। लेकिन पास रहे तो इशारों में काम चल सकता है। पर त्वरित एवं दूर-दराज तक संप्रेषण कर पाना असंभव है। अतः इसके लिए प्रतीकों का सृजन अवश्यंभावी था।

ध्वनि का निकलना मानव मुख से ही संभव है। ध्वनि मुख के किस कोण से निकलती है, समाज ने उसपर चिंतन किया और उस ध्वनि के अर्थ को सामाजिक मान्यता दी। बगैर सामाजिक मान्यता दिये वह ध्वनि भाषा कदापि नहीं बन सकती है। इससे एक दूसरे के साथ संप्रेषण करने में सुविधा होती है। अतः मुख से निकलने वाले प्रतीक चिन्हों को भाषा कहा जाता है। भाषा की प्रकार दो तरह की होती है - मौखिक (oral) और लिखित (written)।

3. लिपि - जो ध्वनि/वर्ण भाषा को लिखित रूप प्रदान करे, उसे लिपि कहा जाता है। अतः सिद्ध हो गया कि :

· भाषा ध्वनि संकेतों से मिलकर बनी होती है, जबकि लिपि वर्ण संकेतों से मिलकर बनी होती है।

· भाषा मौखिक होती है, जबकि लिपि को लिखने के लिए भौतिक साधनों की ज़रूरत होती है।

· भाषा का संबंध कानों से होता है, जबकि लिपि समय-स्थान की सीमाओं से मुक्त होती है।

· भाषा में अस्थायित्व होता है, जबकि लिपि ज़्यादा स्थायी होती है।
सार यही है कि धर्म, भाषा और लिपि में कोई आपसी संबंध नहीं है। अगर कोई संबंध है, तो उसे सामाजिक मान्यता देने वाली संस्था है। उस संस्था को किसी समाज विशेष का नाम भी दिया जा सकता है।

Tuesday, 3 September 2024

आखिर दो-दो सृष्टि क्यों?

भगवान भी बड़ा अजीब है! उसने ब्रह्माण्ड की सृष्टि कर दी और कहाँ गायब हो गया? आजतक किसी को कुछ पता न चल पाया। न वह बोलता है, न सुनता है और न ही वह किसी के सामने प्रकट होता है। सबकुछ सृष्टि करने के बाद उसने प्रथम नर-नारी को बनाया होगा। जहां से मानव सृष्टि की शुरुआत हुई। उसी का ही परिणाम है कि आज हम हिन्दू-मुस्लिम करने में सक्षम हैं। यह परंपरा आगे भी बढ़ती जाएगी।

बेशक भगवान न दीखते हों। परंतु उसने अपनी सृष्टि के माध्यम से सबकुछ बताने की चेष्टा की है। इसके लिए समझने की दिव्यदृष्टि होनी चाहिए। आश्चर्य तो तब होता है, जब हम पाते हैं कि उसने एक अकेला नहीं बल्कि जोड़े में ही किसी सजीव-निर्जीव की सृष्टि कर रखी है। जैसे - नर-नारी, सूरज-चंद्रमा, दिन-रात, सूख-दुख वगैरह। अपने शरीरांग को ही देख लो। कोई भी अंग अकेला नहीं बल्कि जोड़े में हैं - हाथ, पैर, नाक, कान .. सभी डबल हैं। यहाँ तक कि दांत की भी ऊपर-नीचे दो पंक्तियाँ हैं। सोचो, अगर एक ही पंक्ति होती, तो क्या हम खाने को सक्षम होते? नहीं। ऐसा इसलिए; वे एक दूसरे के पूरक हैं। वे आपस में एक दूसरे के अच्छे दोस्त एवं सहायक हैं। वे एक दूसरे के मददगार हैं। वे आपसी दुश्मन तो कतई नहीं हैं। ठीक यही स्थिति सबके साथ है। देखो न; देश सन् 1947 को आजाद हुआ। संविधान बना। और देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए एक राष्ट्र एवं कई राज्यों का निर्माण हुआ। राष्ट्र व देश को चलाने के लिए सांसदों एवं राज्य को चलाने के लिए विधायकों की जरूरत होती है। इन सांसदों/विधायकों का चुनाव जनता करती है। अतः स्पष्ट हो गया कि सांसद-विधायक एवं जनता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक दूसरे की अनुपस्थिति में न तो राष्ट्र और न ही राज्य चल सकता है। अर्थात नेता और जनता एक दूसरे के पूरक हैं।

जब जनता और नेता का इतना घनिष्ठ संबंध हो, फिर भी दोनों एक दूसरे के घोर शत्रु बने हुए हैं। क्यों? क्योंकि दोनों के बीच आपसी तालमेल नहीं है। बल्कि नेता जनता का शोषण करना अपना धर्म समझता है। यही कारण है कि नेताओं की हार-जीत होती रहती है। अतः जब तक नेता-जनता के बीच शरीरांग माफिक सामंजस्य स्थापित नहीं होगा, तब तक देश की उन्नति के बारे में सोचना फिजूल की बातें होंगी।
शिक्षा रूपी मशाल दे दो!

ओशो ने ठीक कहा है - "राजनीति...! क्या ही सुंदर शब्द गढ़ा है लोगों ने “राजनीति!” जिसमें नीति बिलकुल भी नहीं है, उसको कहते हैं “राजनीति”। राजनीति सिर्फ चालबाजी है, धोखा-धड़ी है, लुटपाट है, बेईमानी है। इसकी खासियत यही है कि जो नेता जनता को जितना ठग सके, वह उतना ही कामयाब कहलाएगा। हालांकि राजनीतिज्ञों को ईमानदारी के नकाब ओढ़ने पड़ते हैं, मुखौटे ओढ़ने पड़ते हैं, अपने को छिपा-छिपा कर चलना पड़ता है। राजनीतिक नेताओं के पास जितने चेहरे होते हैं, उतने किसी के पास नहीं होते। उनको खुद ही पता नहीं होता है कि उसका असली चेहरा कौन-सा है। मुखौटे ही बदलते रहते हैं, गिरगिट की तरह।” जैसे कि हमारे झारखण्ड में इस वक्त कई तरह के गिरगिट उग आए हैं!

इस वक्त हमारे पास सबसे बड़ा सवाल क्या है? यही न कि हमें सिदो-बिरसा का झारखण्ड दे दो, कहानी खत्म, अध्याय समाप्त। सिदो-बिरसा ने हमें एस पी टी एवं सी एन टी एक्ट दिया। आपने हमें कौन-सा एक्ट दिया? बताओ जरा। इन तथाकथित राजनीतिज्ञों से डोमिसाइल नीति नहीं बन पा रही है, खतियान का बँटाधार हो चला है, पेसा एक्ट नहीं लागू हो रहा है। भ्रष्टाचार आसमान छू रहा है। फिर क्या दोगे? खाक दोगे? जब तक आरक्षण है, मजे लूटते रहो।

फ्री बी का जमाना चल पड़ा है। आपने चौरासी करोड़ जनता को भिखारियों की लाइन में खड़ा कर दिया है। आप भी खुश और जनता भी खुश! हिन्दू-मुस्लिम करते रहो, आबोआक्-आबोआक् करते रहो। किसने रोका है? आपकी गाड़ी चल रही है, चलाते रहो। हमें कुछ भी नहीं चाहिए। हमें शिक्षा रूपी मशाल दे दो। हम अपना रास्ता खुद-ब-खुद ढूँढ़ लेंगे।

Sunday, 1 September 2024

राजनीतिज्ञ और डाकू

ओशो ने कहीं कहा है - "राजनीति...! क्या ही सुंदर शब्द गढ़ा है लोगों ने ”राजनीति!“ जिसमें नीति बिलकुल भी नहीं है, उसको कहते हैं राजनीति। सिर्फ चालबाजी है, धोखा-धड़ी है, बेईमानी है। हालांकि ईमानदारी के नकाब ओढ़ने पड़ते हैं, मुखौटे ओढ़ने पड़ते हैं, अपने को छिपा-छिपा कर चलना पड़ता है। राजनीतिक नेताओं के पास जितने चेहरे होते हैं, उतने किसी के पास नहीं होते। उनको खुद ही पता नहीं होता कि उसका असली चेहरा कौन-सा है। मुखौटे ही बदलते रहते हैं, गिरगिट की तरह।

राजनीति डकैती है। दिन-दहाड़े! जिनको लूटो, वे भी समझते हैं कि उनकी बड़ी सेवा की जा रही है! यह बड़ी अदभुत डकैती है। डाकू भी इससे मात खा गए। डाकू भी पिछड़ गए। सब तिथि-बाह्य हो गए "आउट ऑफ डेट।" इसलिए तो बेचारे डाकू समर्पण करने लगे कि क्या सार है! चुनाव लड़ेंगे, उसमें ज्यादा सार है। तो राजनीतिज्ञों के सामने डाकू समर्पण कर रहे हैं, क्योंकि देख लिया डाकुओं ने, इतनी समझ तो उनमें भी है, कि मारे-मारे फिरो जंगल-जंगल और हाथ क्या खाक लगता है कुछ! और हमेशा जीवन खतरे में। इससे तो राजनीति बेहतर, राजनीति डकैती की आधुनिक व्यवस्था है, प्रक्रिया है। 

एक मिनिस्टर जनसंपर्क दौरे पर बाहर निकले। मंजिल पर पहुंचने से पहले डाकुओं द्वारा पकड़े गए। रस्सियों से जकड़े गए कार से उतार कर पेश किए गए। सामने सरकार के बुरी तरह हांफ रहे थे मारे डर के कांप रहे थे। तभी बोल उठा सरदार डरो मत यार हम तुम एक हैं। दोनों के इरादे नेक हैं। तुम्हारे हाथ सत्ता ... हमारे हाथ बंदूक, दोनों के निशाने अचूक। हम बच रहे हैं अड्डे बदल और तुम दल बदल कर दोनों ही एक-दूसरे के प्रचंड फ्रेंड जनता को लूटने में दोनों ट्रेंड। या यों कह लो सगे भैया, रास्ते अलग-अलग लक्ष्य दोनों का रुपैया। दोनों के साथ पुलिस हमारे पीछे, तुम्हारे आगे। यहां आए हो तो एक काम कर जाओ, अपनों के बीच आराम कर जाओ। बैंक लूटने के उपलक्ष में, हमारे पक्ष में आज की रात ठीक आठ बजे तुम्हारा भाषण है और तुम्हारे ही हाथों नए अड्डे का कल उदघाटन है। राजनीति एक संगठित लूट-तंत्र है। पूरे देश में राजनीति की आड़ में भ्रष्टखोरों की नूरा-कुश्ती-कबड्डी जारी है और रैफरी भी कोई नहीं।

”राजनीति”... यह खेल ठीक वैसा ही है जैसे सब चोर मिल कर विचार करें कि देश में चोरी कैसे बंद हो? भ्रष्टाचार कैसे बंद हो? अपराध कैसे बंद हो? सब एक-दूसरे की तरफ देखें, हंसें, मुस्कराएं, सभाएं करें, लंबे-लंबे भाषण करें और फिर अपने-अपने उसी काम-धंधे पर निकल जाएं। जैसे छिपकलियां रातभर हजारों कीड़े-मकौड़े खाकर सुबह होते ही दीवारों पर टंगी हुई देवी-देवताओं - संतों-महापुरुषों की तस्वीरों के पीछे जाकर छुप जाती हैं। ठीक यही चरित्र राजनैतिक दलों और राजनेताओं का है।   

राजनीति तो विध्वंस है, शोषण है, हिंसा है; शुद्ध डकैती है। डाकुओं के दल हैं। और उन्होंने बड़ा जाल रच लिया है। एक डाकुओं का दल हार जाता है, दूसरों का जीत जाता है; दूसरों का हार जाता है, पहलों का जीत जाता है। और जनता एक डाकुओं के दल से दूसरे डाकुओं के दल के हाथ में डोलती रहती है। यहां भी लुटोगे, वहां भी लुटोगे। यहां भी पिटोगे, वहां भी पिटोगे। राजनैतिक पार्टियां सिर्फ शोषण करती हैं। पांच साल एक पार्टी शोषण करती है, तब तक लोग दूसरी पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। फिर दूसरी पार्टी सत्ता में आ जाती है, पांच साल तक वह शोषण करती है, तब तक लोग पहली पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। यह एक बहुत मजेदार खेल है। होश पता नहीं तुम्हें कब आए! जिस दिन तुम्हें होश आएगा, उस दिन राजनीति दुनिया से उठ जाएगी; उस दिन राजनीति पर कफन ओढ़ा दिया जाएगा; राजनीति की कब्र बन जाएगी। 

मैंने सुना है कि जंगल के जानवरों को आदमियों का एक दफे रोग लग गया। जंगल में दौड़ती जीपें और झंडे और चुनाव! जानवरों ने कहा, हमको भी चुनाव करना चाहिए। लोकतंत्र हमें भी चाहिए। बड़ी अशांति फैल गई जंगल में। सिंह ने भी देखा कि अगर लोकतंत्र का साथ न दे तो उसका सिंहासन डंवाडोल हो जाएगा। तो उसने कहा, भई, हम तो पहले ही से लोकतंत्री हैं। खतम करो इमरजेंसी, चुनाव होगा। चुनाव होने लगा। अब बिचारे सिंह को घर-घर, द्वार-द्वार हाथ जोड़कर खड़ा होना पड़ा। गधों से बाप कहना पड़ा। एक लोमड़ी उसके साथ चलती थी, सलाहकार, जैसे दिल्ली में होते हैं। उस लोमड़ी ने कहा, एक बात बड़ी कठिन है। आप अभी-अभी भेड़ों से मिलकर आए और आपने भेड़ों से कहा कि तुम्हारे हित के लिए ही खड़ा हुआ हूं। तुम्हारा विकास हो। सदा से तुम्हारा शोषण किया गया है, प्यारी भेड़ो, तुम्हारे ही लिए मैं खड़ा हुआ हूं। आपने भेड़ों से यह कह दिया है। और आप भेड़ों के दुश्मन भेड़ियों के पास भी कल गए थे और उनसे भी आप कह रहे थे कि प्यारे भेडियो, तुम्हारे हित के लिए मैं खड़ा हूं। तुम्हारा हित हो, तुम्हें रोज-रोज नयी-नयी जवान-जवान भेड़ें खाने को मिलें, यही तो हमारा लक्ष्य है। तो लोमड़ी ने कहा, यह तो ठीक है कि इधर तुमने भेड़ों को भी समझा दिया है, भेड़ियों को भी समझा दिया है। और अगर अब दोनों कभी साथ-साथ मिल जाएं, फिर क्या करोगे? उसने कहा, तुम गांधी बाबा का नाम सुने कि नहीं? सुने, उस लोमड़ी ने कहा, गांधी बाबा का नाम सुने। तो उसने कहा, गांधी बाबा हर तरकीब छोड़ गए हैं। जब दोनों साथ मिल जाते हैं तब मैं कहता हूं, मैं सर्वाेदयी हूं? सबका उदय चाहता हूं। भेड़ों का भी उदय हो, भेड़ियों का भी उदय हो, सबका उदय चाहता हूं। जब अकेले-अकेले मिलता हूं तो उनको बता देता हूं, जब सबको मिलता हूं तो सर्वाेदयी की बात कर देता हूं। तुम अपने मन को जांचो। तुम बड़ी राजनीति मन में पाओगे। तुम चकित होओगे देखकर कि तुम्हारा मन कितना अवसरवादी है लेकिन तुम एक मजे की बात देखोगे, पार्टी कोई भी हो, कांग्रेस हों, भारतीय जनता पार्टी हो, पार्टी कोई भी हो, लेकिन सब कहेंगे कि महात्मा गांधी के अनुयायी हैं हम। कुछ बात है गांधी बाबा में। समय पर काम पड़ते हैं। कुछ तरकीब है। तरकीब है - अवसरवादिता के लिए सुविधा है। तो है। जब जो तुम्हारे अनुकूल पड़ जाता है, उसी को तुम स्वीकार कर लेते हो। जब जिस चीज से जिस तरह शोषण हो सके, तुम वैसा ही शोषण कर लेते हो। जब जैसा स्वांग रचना पड़े, वैसा ही स्वांग रच लेते हो।" 

सत्ता का खेल अजीबोगरीब है

आपका यह मंगरु कोई राजनीतिज्ञ नहीं है और न ही उसे राजनीति के बारे में a, b, c मालूम है। हाँ, इतना जरूर है कि उसके पास कच्चा-पक्का ढेर सारा अनुभव है। उसने अपनी निरीह आँखों से इन चिन्हों के उगते-डूबते सूरज को बहुत करीब से देखा है; यथा - मुर्गा, जोड़ा पत्ता और अब तीर-धनुष; जोड़ा बैल, गाय-बछड़ा और अब पंजा। इसके अलावे उसने टिमटिमाती दीये की लौ को भी बहुत करीब से देखा है। अब वह दीया फूल बनकर एक से तीन सौ पार करेगा, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा है। उसे घोर आश्चर्य तो तब हुआ जब उसकी नींद खुली तो देखा कि केंद्र में तीन टर्म से उसकी सरकार चल रही है। बाकी कई राज्यों में भी उसकी सरकार है।

मंगरु झाखण्ड की कल-परसों की घटना को देखकर अत्यधिक विचलित हुआ जा रहा है। सुना है कि तथाकथित डूबते जहाज से कुछ कप्तान कूद गए हैं और वे अपना बेड़ा पार करने हेतु दूसरे जहाज पर सवार हो गए हैं। उनकी यात्रा मंगलमय हो! यह भी सुना है कि सत्ता का नशा अपरंपार है। यह नशा मरते दम तक उतरने का नाम ही नहीं लेता है। राजनीति के सामने नीतिविज्ञान फेल है। यह भी सच है कि अब मुर्गे का दौर समाप्त हो चुका है। मीटिंगों में कोई स्वयं जाता नहीं है बल्कि उन्हें ले जाना पड़ता है। जनता भी पैसे की भाषा को ही समझती है। हाय पैसा! चुनावी खर्चा हद से ज्यादा हो गया है। सत्ता पैसामय हो चुका है। और उस पैसे का जुगाड़ जनता को सूली पर टाँग कर ही प्राप्त किया जा सकता है। सोचो फिर दोनों विभीषणों ने कितने पैसों का डील किया होगा? इसीलिए कहा जाता है कि सत्ता का खेल जैसा दीखता है, वैसा वह है नहीं।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...