Wednesday, 25 September 2024
Tuesday, 24 September 2024
Monday, 9 September 2024
Friday, 6 September 2024
रोमन लिपि : परिवर्धित संताली लिपि
Thursday, 5 September 2024
लाच् रे बा़नुक् दाना,
बा़नुक् हो़ड़मो़रे लुगड़ी,
बो़हो़क् उमूल चातो़म,
हो़यते ओटाङ आत्एन।
चेकायता़मा़ञ चाम्पा-बादोली,
चेकायता़मा़ञ बारो़ दोलान?
लादा़ञ सेञ रापागा,
आमाक् किसा़-का़हनी।
हानको ञेलकोम टुईला़,
न्हाते गो़दो़र गोचो,
झा़पुत् केदिञको देने-बानार,
दिपिला़दिञको हेन्दे टुकुच्,
हेलाविना़ञ नामाल का़मी।
इमा़ञ बापधो़न इमा़ञमे से,
आकेल रेआक् दुगुर सेंगेल,
मित् मित् ते सानाम बा़ईरी,
Tuesday, 3 September 2024
Sunday, 1 September 2024
राजनीतिज्ञ और डाकू
ओशो ने कहीं कहा है - "राजनीति...! क्या ही सुंदर शब्द गढ़ा है लोगों ने ”राजनीति!“ जिसमें नीति बिलकुल भी नहीं है, उसको कहते हैं राजनीति। सिर्फ चालबाजी है, धोखा-धड़ी है, बेईमानी है। हालांकि ईमानदारी के नकाब ओढ़ने पड़ते हैं, मुखौटे ओढ़ने पड़ते हैं, अपने को छिपा-छिपा कर चलना पड़ता है। राजनीतिक नेताओं के पास जितने चेहरे होते हैं, उतने किसी के पास नहीं होते। उनको खुद ही पता नहीं होता कि उसका असली चेहरा कौन-सा है। मुखौटे ही बदलते रहते हैं, गिरगिट की तरह।
राजनीति डकैती है। दिन-दहाड़े! जिनको लूटो, वे भी समझते हैं कि उनकी बड़ी सेवा की जा रही है! यह बड़ी अदभुत डकैती है। डाकू भी इससे मात खा गए। डाकू भी पिछड़ गए। सब तिथि-बाह्य हो गए "आउट ऑफ डेट।" इसलिए तो बेचारे डाकू समर्पण करने लगे कि क्या सार है! चुनाव लड़ेंगे, उसमें ज्यादा सार है। तो राजनीतिज्ञों के सामने डाकू समर्पण कर रहे हैं, क्योंकि देख लिया डाकुओं ने, इतनी समझ तो उनमें भी है, कि मारे-मारे फिरो जंगल-जंगल और हाथ क्या खाक लगता है कुछ! और हमेशा जीवन खतरे में। इससे तो राजनीति बेहतर, राजनीति डकैती की आधुनिक व्यवस्था है, प्रक्रिया है।
एक मिनिस्टर जनसंपर्क दौरे पर बाहर निकले। मंजिल पर पहुंचने से पहले डाकुओं द्वारा पकड़े गए। रस्सियों से जकड़े गए कार से उतार कर पेश किए गए। सामने सरकार के बुरी तरह हांफ रहे थे मारे डर के कांप रहे थे। तभी बोल उठा सरदार डरो मत यार हम तुम एक हैं। दोनों के इरादे नेक हैं। तुम्हारे हाथ सत्ता ... हमारे हाथ बंदूक, दोनों के निशाने अचूक। हम बच रहे हैं अड्डे बदल और तुम दल बदल कर दोनों ही एक-दूसरे के प्रचंड फ्रेंड जनता को लूटने में दोनों ट्रेंड। या यों कह लो सगे भैया, रास्ते अलग-अलग लक्ष्य दोनों का रुपैया। दोनों के साथ पुलिस हमारे पीछे, तुम्हारे आगे। यहां आए हो तो एक काम कर जाओ, अपनों के बीच आराम कर जाओ। बैंक लूटने के उपलक्ष में, हमारे पक्ष में आज की रात ठीक आठ बजे तुम्हारा भाषण है और तुम्हारे ही हाथों नए अड्डे का कल उदघाटन है। राजनीति एक संगठित लूट-तंत्र है। पूरे देश में राजनीति की आड़ में भ्रष्टखोरों की नूरा-कुश्ती-कबड्डी जारी है और रैफरी भी कोई नहीं।
”राजनीति”... यह खेल ठीक वैसा ही है जैसे सब चोर मिल कर विचार करें कि देश में चोरी कैसे बंद हो? भ्रष्टाचार कैसे बंद हो? अपराध कैसे बंद हो? सब एक-दूसरे की तरफ देखें, हंसें, मुस्कराएं, सभाएं करें, लंबे-लंबे भाषण करें और फिर अपने-अपने उसी काम-धंधे पर निकल जाएं। जैसे छिपकलियां रातभर हजारों कीड़े-मकौड़े खाकर सुबह होते ही दीवारों पर टंगी हुई देवी-देवताओं - संतों-महापुरुषों की तस्वीरों के पीछे जाकर छुप जाती हैं। ठीक यही चरित्र राजनैतिक दलों और राजनेताओं का है।
राजनीति तो विध्वंस है, शोषण है, हिंसा है; शुद्ध डकैती है। डाकुओं के दल हैं। और उन्होंने बड़ा जाल रच लिया है। एक डाकुओं का दल हार जाता है, दूसरों का जीत जाता है; दूसरों का हार जाता है, पहलों का जीत जाता है। और जनता एक डाकुओं के दल से दूसरे डाकुओं के दल के हाथ में डोलती रहती है। यहां भी लुटोगे, वहां भी लुटोगे। यहां भी पिटोगे, वहां भी पिटोगे। राजनैतिक पार्टियां सिर्फ शोषण करती हैं। पांच साल एक पार्टी शोषण करती है, तब तक लोग दूसरी पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। फिर दूसरी पार्टी सत्ता में आ जाती है, पांच साल तक वह शोषण करती है, तब तक लोग पहली पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। यह एक बहुत मजेदार खेल है। होश पता नहीं तुम्हें कब आए! जिस दिन तुम्हें होश आएगा, उस दिन राजनीति दुनिया से उठ जाएगी; उस दिन राजनीति पर कफन ओढ़ा दिया जाएगा; राजनीति की कब्र बन जाएगी।
मैंने सुना है कि जंगल के जानवरों को आदमियों का एक दफे रोग लग गया। जंगल में दौड़ती जीपें और झंडे और चुनाव! जानवरों ने कहा, हमको भी चुनाव करना चाहिए। लोकतंत्र हमें भी चाहिए। बड़ी अशांति फैल गई जंगल में। सिंह ने भी देखा कि अगर लोकतंत्र का साथ न दे तो उसका सिंहासन डंवाडोल हो जाएगा। तो उसने कहा, भई, हम तो पहले ही से लोकतंत्री हैं। खतम करो इमरजेंसी, चुनाव होगा। चुनाव होने लगा। अब बिचारे सिंह को घर-घर, द्वार-द्वार हाथ जोड़कर खड़ा होना पड़ा। गधों से बाप कहना पड़ा। एक लोमड़ी उसके साथ चलती थी, सलाहकार, जैसे दिल्ली में होते हैं। उस लोमड़ी ने कहा, एक बात बड़ी कठिन है। आप अभी-अभी भेड़ों से मिलकर आए और आपने भेड़ों से कहा कि तुम्हारे हित के लिए ही खड़ा हुआ हूं। तुम्हारा विकास हो। सदा से तुम्हारा शोषण किया गया है, प्यारी भेड़ो, तुम्हारे ही लिए मैं खड़ा हुआ हूं। आपने भेड़ों से यह कह दिया है। और आप भेड़ों के दुश्मन भेड़ियों के पास भी कल गए थे और उनसे भी आप कह रहे थे कि प्यारे भेडियो, तुम्हारे हित के लिए मैं खड़ा हूं। तुम्हारा हित हो, तुम्हें रोज-रोज नयी-नयी जवान-जवान भेड़ें खाने को मिलें, यही तो हमारा लक्ष्य है। तो लोमड़ी ने कहा, यह तो ठीक है कि इधर तुमने भेड़ों को भी समझा दिया है, भेड़ियों को भी समझा दिया है। और अगर अब दोनों कभी साथ-साथ मिल जाएं, फिर क्या करोगे? उसने कहा, तुम गांधी बाबा का नाम सुने कि नहीं? सुने, उस लोमड़ी ने कहा, गांधी बाबा का नाम सुने। तो उसने कहा, गांधी बाबा हर तरकीब छोड़ गए हैं। जब दोनों साथ मिल जाते हैं तब मैं कहता हूं, मैं सर्वाेदयी हूं? सबका उदय चाहता हूं। भेड़ों का भी उदय हो, भेड़ियों का भी उदय हो, सबका उदय चाहता हूं। जब अकेले-अकेले मिलता हूं तो उनको बता देता हूं, जब सबको मिलता हूं तो सर्वाेदयी की बात कर देता हूं। तुम अपने मन को जांचो। तुम बड़ी राजनीति मन में पाओगे। तुम चकित होओगे देखकर कि तुम्हारा मन कितना अवसरवादी है लेकिन तुम एक मजे की बात देखोगे, पार्टी कोई भी हो, कांग्रेस हों, भारतीय जनता पार्टी हो, पार्टी कोई भी हो, लेकिन सब कहेंगे कि महात्मा गांधी के अनुयायी हैं हम। कुछ बात है गांधी बाबा में। समय पर काम पड़ते हैं। कुछ तरकीब है। तरकीब है - अवसरवादिता के लिए सुविधा है। तो है। जब जो तुम्हारे अनुकूल पड़ जाता है, उसी को तुम स्वीकार कर लेते हो। जब जिस चीज से जिस तरह शोषण हो सके, तुम वैसा ही शोषण कर लेते हो। जब जैसा स्वांग रचना पड़े, वैसा ही स्वांग रच लेते हो।"
Saturday, 31 August 2024
Friday, 30 August 2024
Tuesday, 27 August 2024
BAŃCAOLEM BABA
Monday, 26 August 2024
BAṄGEM TAHẼ̱NA HO̱Ṛ HO̱PO̱N
Umạr reak̕ noa hạsur anacurre,
Campa-Badoli ar Citri disạlere,
Hiḍir-hiḍir hae ban bạsien!
Purkhạkoak̕ co̱l durib,
Miť miťte hasa lataren,
Hae iń sudhạń aṅge̱n aťen!
Lạṛhại-lạpạṛhại sạrdi se̱ṅge̱len,
Bo̱ko̱-boeha talare tarwaṛe,
Lo̱ho̱ť laṭ paṭaoen jive̱ť mãyãmte.
Ho̱mo̱r halaṅeťko era-ho̱po̱n,
So̱maj go̱ hõ̱e gạrsilo̱mena,
Hae ho̱po̱niń cedak̕ko mapak̕?
Bo̱rno̱re o̱no̱l bạnuk̕ ce̱ťge,
Pachnao bạnuk̕ jạt-kujạt,
Pạris hõ̱ co̱ bạnuk̕ o̱l,
Amak̕ bo̱rno̱ sapha pĩṛĩť,
Cak̕ to̱be̱m potaoeť?
Amak̕ bo̱rno̱ arak̕ mãyãmte.
Judi niạ dho̱co̱r tahẽ̱yena amak̕,
Gapam ńamok̕a ciṛiạkhanare,
Jae jug lạgiť noa pirthimi kho̱n,
Ať apať ado̱k̕am tirikal lạgiť,
Friday, 23 August 2024
जातिवाद : एक घनचक्करी
बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर द्वारा रचित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ”जाति प्रथा का विनाश“ में बहुत कुछ कहा गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य कब तक पूर्ण होगा, कहना किसी के वश की बात नहीं। कभी-कभी यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य मालूम पड़ता है कि आखिर क्यों संताल लोग ही हूल के महानायक सिदो मुर्मू को मानते हैं? बाकी समुदाय के लोगों को इतनी महान हस्ती सिदो मुर्मू से कोई लेना-देना नहीं है। उसी तरह सिर्फ दलित लोग ही डॉ भीमराव आम्बेडकर की जयंती वगैरह मनाते हैं। बाबा साहब भारत के संविधान के रचयिता हैं, इसलिए मजबूरीवश अन्य समुदाय के लोग इन्हें याद करते हैं। वरना जाति प्रथा ने तो सबका नाश कर रखा है। सच कहा जाय, तो दलितों के महापुरुषों की पूजा दलित लोग ही करते हैं। अन्य समुदाय के लोग इन महापुरुषों के प्रति ईर्ष्या और घृणा का भाव रखते हैं। आखिर ऐसा क्यों?
सुना है; दुनिया के अन्य देशों में जहां जाति प्रथा नहीं है, वहां काले-गोरे का भेदभाव है। यह भी एक जटिल समस्या है। जाति प्रथा हो या काले-गोरे का भेदभाव, समाज के लिए यह एक बहुत बड़ा अभिशाप है। मालूम होता है, जिसने भी इस तरह के भेदभाव की सृष्टि की है, वह बड़ा ही चालाक और चतुर प्रवृति का रहा होगा। कुछ भी हो, हमारे देश में ऐसी कुप्रथा के जनक मनु महाराज को दोष देना कहां तक उचित है? जब तक वर्ण व्यवस्था जीवित है, तब तक जाति प्रथा का विनाश संभव नहीं लगता है।
देश में लोकसभा का चुनाव अंतिम पड़ाव पर है। सवाल इसलिए उठ रहा है; क्योंकि देखा जा रहा है कि इस चुनाव में जातीय समीकरण का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। अनजाने में ही सही, जनता भी उम्मीदवार की जाति देखकर ही वोट देती है। उम्मीदवार कितना भी अयोग्य क्यों न हों जनता उसे ही वोट देने के लिए लालायित रहती है। यही कारण है कि दलित आज भी पूना एक्ट को याद करते हैं।
वर्ण व्यवस्था की स्थापना यूं ही चुटकियों में नहीं हुई है। इसके पीछे न जाने कितने रहस्य छिपे हुए हैं। इतिहास साक्षी है कि भारत में अंग्रेजों के आगमन तक उच्च जाति के लोगों ने शुद्रों का जी भरकर दोहन किया। यह तो ईश्वरीय वरदान ही समझो कि अंग्रेजों ने शूद्रों की आंखें खोल दीं एवं उनकी मुक्ति के लिए कई सारे मार्ग प्रशस्त किये। ब्रिटिश काल में ही डॉ भीमराव आम्बेडकर का जन्म हुआ। उस दलित भीमराव आम्बेडकर ने देश में छुआछूत को झेलते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण किया। डॉ भीमराव आम्बेडकर दलितों के मसीहा बन गए। देश 1947 को आजाद हुआ। विडंबना देखिए कि डॉ भीमराव आम्बेडकर देश के प्रथम कानून एवं न्याय मंत्री बनाए गए एवं उन्हें भारत का संविधान लिखने की जिम्मेदारी दी गई। बाबा साहब की अगुवाई में दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान लिखा गया। इसी संविधान में सदियों से दबाये गए एससी, एसटी एवं ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी संविधान के बदौलत ही आज दबे-कुचलों के लिए सरकारी संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह भी सच है कि इसी आरक्षण के तहत ही आज हम चुनाव-चुनाव का खेल खेल रहे हैं।
लोकसभा चुनाव 2024 के अंतिम एवं 7वें चरण का मतदान 1 जून 2024 को होना है। इसी चरण में ही दुमका एवं राजमहल (आरक्षित-अजजा) के लिए मतदान होना है। दोनों ही क्षेत्रों में इंडिया गठबंधन और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। मालूम हो कि भाजपा जहां संविधान एवं आरक्षण को समाप्त करना चाहती है, वहीं इंडिया गठबंधन-झामुमो इसे बचाने के लिए पूरे देश में जी तोड़ मेहनत कर रहा है। ध्यान रहे, राजमहल से कोई निर्दलीय उम्मीदवार भी है, जो जिसने जिस थाली में खाया है, उसी को ही छेद करने में जुटा हुआ है।
सवाल यही है कि अगर संविधान एवं आरक्षण समाप्त हो गया तो न हम घर के और न घाट के रहेंगे। समाज से फिलहाल जाति प्रथा का विनाश भी संभव नहीं है। यह एक घनचक्करी है। इस स्थिति में हमारा क्या दायित्व बनता है। आइए, हम सब मिलकर इस संबंध में सोचें एवं विचारें।
Thursday, 15 August 2024
Friday, 31 May 2024
आओ चुनाव-चुनाव खेलें
यह कैसी विडंबना है कि आजकल धर्म-धर्म एवं चिकी-चिकी का खेल कुछ सुस्त-सा पड़ गया है। हो सकता है शायद लोकसभा चुनाव की बाढ़ उन्हें बहा ले गई होगी। यह सत्य है कि अभी तक धर्म और चिकी से किसी की क्षुधा नहीं मिट पाई है। हो सकता है; देश से इस चुनाव के वक्त जब धर्म-धर्म का खेल ही समाप्त हो गया, तो हमारे आंगने में इनका क्या काम?
छठवें चरण का मतदान समाप्त हो गया है। अब सातवें और अंतिम चरण का मतदान 01 जून को होगा। देशभर का संपूर्ण नतीजा 4 जून 2024 को घोषित होगा। कहा जाता है कि साहब अपनी निश्चित हार को देखते हुए पगला गया है। वह अनाप-शनाप बकवास किए जा रहा है। छठवें चरण का मतदान आते-आते उसकी सारी चालें निष्क्रिय होती गई। यही वजह है कि अब वह किसी कोठे में मुजरे का मजा ले रहा होगा।
इस बार का लोकसभा चुनाव बड़ा अनोखा रहा! इस तरह का चुनाव न कभी हुआ था और न ही कभी होगा। एक तरफ सारी सरकारी मशीनरी, तो दूसरी तरफ विपक्ष न होकर जनता सत्ता पक्ष का डटकर मुकाबला कर रही है। वाकई यह चुनाव अद्भूत है! इस चुनाव में साहब ने अपने आपको किसी भगवान का अवतार घोषित कर रखा है। इतना ही नहीं भगवान भी उनकी आरती उतारने को मजबूर हो गया है। इसीलिए तो "जो राम को लाये हैं, हम उनको लायेंगे" का डंका बज रहा है।
Whatsapp University में चुनाव का खेल खेलने में सभी तथाकथित छात्र-छात्राओं को बड़ा मजा आता है। आपके बुजुर्ग छात्र को भी यह खेल बड़ा सुहाता है। इस वक्त दुमका-राजमहल लोकसभा क्षेत्र आरक्षित है। याद रखना जिस दिन भी यह क्षेत्र सामान्य हो जाएगा, फिर समझो आपका यह चुनाव चुनाव का खेल भी समाप्त हो जाएगा। इसलिए कबीर दास सही कह गए हैं - "कल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय होएगी, बहुरि करोगे कब?"
ज्ञात हो कि दुमका-राजमहल से जहां इंडिया गठबंधन और एनडीए के बीच कांटे का टक्कर है, तो वहीं दूसरी ओर झामुमो को अपने ही मीरजाफरों से दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं। दुमका से जामा की वर्तमान विधायक बागी बनकर कमल फूल सूंघ रही है। वह अपने ही ससुराल वालों को आईना दिखाने में जुट गई है। जनता से उनकी एक ही अपील है कि उसे ही भारी से भारी मतों से जीताएं, ताकि वह ससुराल वालों से बदला ले सके।
दूसरी ओर राजमहल के झामुमो विभीषण बोरियो विधायक ने अपने ही राज में आक्रमण कर दिया है। उनका एक ही आरोप है कि वर्तमान राजा ठीक नहीं है। वह दस वर्षों से भगौड़ा और लापता हैं। इसलिए वह कहता है कि जीत जाने पर वह घर-घर विकास को पहुंचा देगा।
इस तरह विभिन्न छात्र-छात्राओं का थीसिस अलग-अलग है। उनके बारे में ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं। सुना है; वर्षों पहले कुछ मीरजाफर, जयचंद, विभीषण, मुनिया मांझी भी पार्टी छोड़कर चले गए थे। कुछ तो शाम को घर वापस लौट आए थे पर कुछ गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं।
मंगरु को किसी से कोई लेना-देना नहीं है। पर इतना तय है कि Whatsapp University में बहुत तरह के मतभेद हो सकते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अब समय बहुत बदल चुका है। आपको वक्त की नजाकत को पहचानना ही होगा। कभी अंधेरे में तीर मत चला देना।
विशेषकर युवकों से अपील है। हूल हुआ संताल परगना मिल गया, झारखण्ड आंदोलन हुआ और अलग झारखण्ड राज्य भी मिल गया। पर हम आदिवासियों की हालत अभी भी जस की तस बनी हुई है। इसके एक नहीं हजार कारण हो सकते हैं। इस चुनाव में सिर्फ बदलाव मात्र से समाज का कोई भला होने वाला नहीं है। इस बरसात में सिर्फ मेढ़कों का टर्र-टर्र करने मात्र से भी कोई लाभ नहीं है। अगर वास्तव में आपको समाज की चिंता है, तो अविराम फुल टाईमर के रूप में अभी और आज से लोगों के बीच सामाजिक चेतना जगाने के लिए दिन और रात एक करना होगा। आपको समाज उत्थान के लिए पूर्व में ही ब्लूप्रिंट और रोड मैप तैयार करना होगा। वरना आओ चुनाव-चुनाव का खेल खेलें।
Thursday, 23 May 2024
जिसकी लाठी उसकी भैंस
न चाहते हुए भी मंगरु को अपना मुंह खोलना पड़ रहा है कि इस वक्त संतालों की आधी जमीन परायों के हाथों चली गई है। क्यों? कानून तो कहता है कि एसपीटी एक्ट के तहत संतालों की जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। फिर भी क्यों संतालों की जमीन को हड़पा जा रहा है? इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यही है - ”मियां-बीबी राजी तो क्या करेगा काजी।“ अब दुनिया बदल चुकी है। हर परिवार में एक चमकता हुआ एंड्रोयड फोन की जरुरत है। समय को देखते हुए घर में मोटर साईकिल की मांग भी बढ़ती गई है। आमदनी आठन्नी, खर्चा रुपैया वाली बात हो गई है। समय की मांग को देखते हुए आधुनिक आवश्यकताओं की पूर्ति किस तरह हो, एक बहुत बड़ी समस्या मुंह बांयें खड़ी है। कोई और उपाय न देख, चलो अपनी अचल संपत्ति पर ही अपना हाथ साफ कर लें। मना करने पर, नोट कर लो आपकी एक भी दलील चलने वाली नहीं है। अब इसमें किसी भी राजनीतिक दल का क्या कसूर? इस समस्या से आपका भगवान भी आपको नहीं बचा पाएगा।
चुनाव का माहौल है। मतदान की तारिख नजदीक आ रही है। दुमका-राजमहल से खड़े उम्मीदवारों की सांसे फूली हुई हैं। सभी अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। हर गली-कूचों की जनता के बीच राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। हर किसी उम्मीदवार पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। हर व्यक्ति अपनी पीड़ा का ठीकरा अपने विधायक/सांसदों पर फोड़ रहा है। सच देखा जाय, तो जितनी गलियां राजनीतिज्ञों को दिया जाता है, शायद ही किसी और को दिया जाता हो।
सत्ता का नशा बादशाहों को मतवाला बना देता है। वे सत्ता वापसी के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वे सरकारी मशीनरियों का दुरुपयोग करने से बाज नहीं आते। कभी-कभी वे अपने ही बुने हुए जाल में फंस जाते हैं। उदाहारणार्थ - इलेक्ट्रोल बॉण्ड। सुना है; सत्ताधारियों ने कोई धुलाई मशीन की ईजाद की हुई है। इस मशीन की हैसियत बहुत अनोखी है! लोग कहते हैं, जितना भी बड़ा भ्रष्टाचारी क्यों न हो, इस मशीन में धुलाई के उपरांत वह दूध-सा उज्जवल चमकने लगता है। वाह री, मोती धुलाई मशीन!
आपने सुना होगा। सत्ता में आसीन बादशाह का हुक्म हुआ - "जाओ, विपक्ष के सभी सदस्यों को अपने खेमे में शामिल कर लो। इससे हमारी शक्ति मजबूत होगी।"
"हुजूर अनार्थ हो जाएगा। वे सभी महा भ्रष्टाचारी हैं।"
"कोई बात नहीं। उन्हें हमारी धुलाई मशीन में नहला दो। जाओ, हमारा मुंह क्या ताक रहे हो?"
"हुजूर उनका क्या करें, जो उस मशीन में नहाने से मना कर दे?"
"उन्हें सलाखों के पीछे धकेल दो। कितनी बार समझाया? समझ में नहीं आता है क्या?"
थानेदार मुंह लटकाये चला गया। उसने आव देखा न ताव, एक आदिवासी मुख्यमंत्री को अकारण ही पकड़ कर जेल में ठूंस दिया। बेचारा शरीफ आदिवासी चुपचाप त्यागपत्र देकर जेल चला गया।
इसके बाद बादशाह का हुक्म हुआ - "दिल्ली का मुख्यमंत्री बहुत फड़फड़ा रहा है। चुनाव में वह हमारा मटियामेट कर देगा। अतः उसे भी जेल में ठूंस दो।" और इस तरह थानेदार ने बादशाह की आज्ञा का पालन किया। लेकिन दिल्ली के सीएम ने हुंकार भरी - "तू डाल-डाल, तो हम पात-पात। हम रिजाईन नहीं करेंगे।"
देशभर में विपक्षी दलों को परेशान करने का सिलसिला जारी है। बादशाह की इच्छा जो चाहे वह कर रहा है। देश की संपत्ति को बेच दो और वह बेच रहा है। वह संविधान, आरक्षण, लोकतंत्र सबकुछ बेच देना चाहता है। वह जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत को चरितार्थ करने पर उतारु हो गया है। इंडिया गठबंधन उस बादशाह का जोरदार विरोध कर रहा है। चुनाव विश्लेषकों की मानें, तो बादशाह 400 नहीं 140 सीट पर अटक रहा है।
दुमका-राजमहल से भी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार कमर कस कर मैदान में आ डटे हैं। बादशाह के चेले भी रणक्षेत्र में है। इसमें आश्चर्य की बात यही है कि कुछ निर्दलीय उम्मीदवार बदलाव चाहते हैं। उनका मनिफेस्टो क्या कहता है, यह तो राम जाने। पर वे अकेले ही संविधान एवं आरक्षण को बचा लेने का दंभ भर रहे हैं। आइए, 4 जून 2024 का इंतजार करें।
Thursday, 16 May 2024
Sunday, 12 May 2024
करो या मरो
दुनिया में राजनीति का नशा बड़ा ही अद्भूत है। एक पैर कब्र पर है, फिर भी यह नशा उतरने का नाम नहीं लेता है। जिस तरह दर्जी का बेटा दर्जी, कुम्हार का बेटा कुम्हार उसी तरह यह पेशा भी खानदानी बन जाने का रिवाज है।
देश में तीसरे चरण का मतदान हो चुका है। 13 मई 2024 को चौथे चरण का मतदान होना है। अब तक सभी चरणों में मतदान करने वालों की संख्या गिर गई है। आखिर ऐसा क्यों? इस संबंध में सौ बात की एक बात लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठना बताया जा रहा है। उनके अनुसार सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं। उनकी दलील है कि इस बार तुम लुट लो, फिर हमें अगले पाँच साल बाद लुटने का मौका दो। यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। परंतु यह भी सच है कि अधिक दिनों तक जमा किया हुआ पानी जरुर गंदा होता है, अतः इसकी सफाई बहुत जरुरी है। एवं उस तालाब पर नये जल का भराव अत्यावश्यक है। इसे ही एंटीइनकॉम्बेन्सी कहा जाता है।
विश्वास बहुत बड़ी चीज है। अगर विश्वास ही उठ गया, तो सबकुछ का सत्यानाश तय है। आजकल ईव्हीएम द्वारा मतदान का प्रावधान है। ईव्हीएम एक मतदान करने की मशीन है। उस पर आरोप लगते रहा है कि उस मशीन को अपने मनमुताबिक सेट किया जा सकता है। आरोपकर्ता की दलील है कि उसे इस तरह सेट किया जा सकता है कि अगर उस मशीन में दस वोट पड़ा, तो छः वोटों को अपने खाते में आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है। लो कर लो बात। कुछ भी चिल्लाते रहो। जीत तो उसी की होगी, जिसके पास लाठी है।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब देश में गरीबों की संख्या 84 करोड़ हो गई है। यह जनसंख्या सिर्फ पाँच किलो सरकारी राशन पर जीवित है। यह भी सच है कि आने वाले दिनों में इनकी संख्या घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ती ही जायगी। देश में नौकरी करने की सुविधा गायब हो गई है। वंचित एवं दबे-कुचले लोग अब आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए हैं। उनकी आरक्षित सीट घटा दी गई है। उन्हें अपने हाल में जीने के लिए अवारा छोड़ दिया गया है। देश की सरकारी संपत्तियों को धड़ल्ले से बेचा रहा है। और जैसे कि आपको मालूम है कि प्राईवेट संस्थानों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। बेचारा आरक्षित वर्ग आखिर जांय तो कहाँ जांय?
देश के संविधान पर भयानक खतरा मंडरा रहा है। बीते दिनों इसे संसद भवन के समीप जलाया गया। जगह-जगह आरक्षण का विरोध किया जा रहा है। इस बात की पुष्टि भी हो चुकी है कि सत्तापक्ष के लोकसभा उम्मीदवारों ने चार सौ पर लाने की दुहाई देते हुए संविधान को बदलने की वकालत कर डाली है। इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब देश से लोकतंत्र एवं संविधान का नामोनिशान मिट जाएगा।
अतः अब देश में "करो या मरो" की स्थिति आ गई है। अगर आपसे किसी तरह की चूक हो गई, तो यह आपका अंतिम मतदान होगा। इसके बाद देश जल रहा होगा और साहब बांसुरी बजाने में मस्त होंगे। तब तक देश खण्ड-खण्ड हो जायगा।
Sunday, 5 May 2024
मान लो; संविधान बदल गया?
तर्क विज्ञान के कई नियमों में यह भी एक नियम है कि जहां धुआँ उठे, समझो वहां आग है। इसका मतलब अगर वहां धुआँ हो, तो वहां आग होने की पूरी-पूरी संभावना से कोई नहीं इंकार कर सकता है। धुआँ और आग में चोली-दामन का साथ है। बगैर धुआँ आग की कल्पना हो ही नहीं सकती है। इसका अर्थ यही हुआ कि भाजपा एवं उसके सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक गाहे-बगाहे यह जो संविधान बदलने की बात उठाते हैं, यह सत्य प्रतीत होता है। इसी चुनाव में भाजपा के कुछ उम्मीदवारों ने साफ तौर पर कह दिया है कि उन्हें 400 पार करा दो, वे संविधान अवश्य बदल देंगे। और तो और वे खुलेआम संविधान को जलाते हैं। उनके समर्थक एससी/एसटी/ओबीसी मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं। यह सब धुआँ क्यों उठ रहा है? इसका मतलब साफ है कि वहां आग लगी हुई। वे संविधान बदलने को उतारु हैं।
भारत देश सन् 1947 को आजाद हुआ। बाबा साहब डॉ भीमराव आम्बेडकर की अगुवाई में लिखे हुए इस संविधान को 1949 में हम भारत के लोगों ने उसे अंगीकृत किया। और इसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया। कुछ संशोधनों के साथ फिलहाल इसमें 25 भाग और 448 अनुच्छेद हैं। भारत का संविधान दुनिया के सर्वोत्तम संविधानों में से एक है। परंतु इतना उच्च कोटि का संविधान रहते हुए भी कुछेक घटनाओं को देखकर मन बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाता है। संविधान के अनुसार भारत का हर नागरिक बराबरी का हक रखता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। इस देश में छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं, उसे सदा के लिए मिटा दिया गया है। हर नागरिक को मौलिक अधिकारों से सुसज्जित किया गया है। फिर भी हमारे वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति के साथ ऐसा तुच्छ भेदभाव क्यों? इसके पूर्व में भी कई दलित नेताओं के साथ ऐसा ही भेदभाव किया गया है। ऐसा क्यों? इसके अलावे भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने पर मनाही क्यों? इस तरह के कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं।
अब सवाल उठता है मान लो; संविधान को बदल दिया गया, फिर क्या होगा? क्या होगा? ये जो चुनाव-चुनाव हमलोग खेल रहे हैं, सब खत्म। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। न तुम्हारे विधायक होंगे और न कोई सांसद। पंचायत चुनाव में भी आपकी कोई भागीदारी नहीं होगी। सरकारी आरक्षण खत्म हो जायगा। राजनैतिक हो अथवा सरकारी नौकरी, सब समाप्त। याद रखना, सदियों से दबाए गए दलित फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से वे आये थे। सभी दलित गले में हांड़ी और कमर में झाड़ू टांगते हुए नजर आएंगे। महिलाओं को स्तन ढांकने की आजादी नहीं होगी। जिस दलित को शिक्षा ग्रहण करने का भूत सवार हो, उनके कानों में पिघलते हुए शीशे डाले जाएंगे। दलित गुलामगीरी करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पक्का सबूत के तौर पर अभी देख लेना। लोकसभा सामान्य सीट से उम्मीदवारी करके देख लेना। वहां से बाहरी जीत सकता है, पर आपकी पूछ नहीं के बराबर होगी।
सवाल यह नहीं है कि जब संविधान बदलने की घड़ी आएगी, फिर देखा जाएगा। आग लगने पर कुआँ खोदना कहां की बुद्धिमानी होगी? आदिवासी विरोधी मानसिकता वाले को कौन नहीं जानता है? 1977 से पहले वे ”दीया“ दिखाया करते थे। इसके बाद उनके हाथ में "कमल फूल" उग आया। तब से वे धीरे-धीरे सत्तासीन होते गए। और अब तो वे 10 वर्षों से हमारे सिर पर सवार हो गये हैं। उनके काले करतूतों के बारे में इतना ही काफी है कि वे आपको "वनवासी" के नाम से पुकारते हैं एवं धर्म की घूंट पिलाते हैं।
एसपीटी एक्ट इतना सख्त कानून रहते हुए भी किसने मनुवादियों को अपने इलाके में प्रवेश करने की अनुमति दी? उन्हें किसने आमंत्रण दिया? सिर्फ राजनीतिज्ञों को दोष देने मात्र से आपकी समस्या नहीं सुलझ सकती है। इसके जिम्मेवार आप स्वयं हो। यहां "मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। आपके इलाके में इतने सारे पत्थर एवं कोयला खदान के स्वामी कौन लोग हैं। सारे के सारे मालिक मनुवादी हैं।
चालू लोकसभा चुनाव में वे किस तरह की चाल चल रहे हैं, आप पूर्णतः अनभिज्ञ मालूम पड़ते हो। पूरे देश में एक ओर संविधान बचाने वाले खड़े हैं, तो दूसरी ओर इसको बदलने वाले 400 पार का नारा दे रहे हैं। साफ शब्दों में कहा जाय, तो राजमहल की सीट किसकी झोली में जाती है, देखना बड़ा दिलचस्प होगा। आपकी सावधानी हटी, तो दुर्घटना घट सकती है। पछताने से कोई लाभ नहीं, जब चिड़िया चुग गई खेत।
Saturday, 4 May 2024
Friday, 3 May 2024
अब कौन होगा दलितों का तारणहार?
जिन्हें हम भगवान मानते हैं, जब वे अपने आपको बचा न पाये, तो हम किस खेत की मूली हैं। कोई मानव प्राणी इस दुनिया में सदा रहने के लिए नहीं आया है। इस धरा पर आने का कुछ पता नहीं, पर जाना निश्चित है। हम-तुम बस इस लेख पर विचार-मंथन करते रहेंगे। और एक दिन हम भी चल बसेंगे। बापू नहीं रहे, बाबा नहीं रहे, सिदो-कान्हू भी नहीं रहे। बाबा साहब जिन्होंने इतना अच्छा संविधान दिया, सब चले गए। पर उनकी कृति हमें बहुत कुछ बता रही है।
जिन अंग्रेजों ने दलितों को जीवनदान दिया, उन अंग्रेजों को मनुवादियों द्वारा जी भरकर गाली देना कहाँ की इंसानियत है? यह समझने वाली बात है। मनुवादी अंग्रेजों को गाली क्यों दे रहे हैं? वे इसलिए गाली दे रहे हैं क्योंकि अंग्रेजों ने मनुवादियों के गुलामों को मुक्ति दिलाई है। इसके सिवा और कोई कारण ही नहीं है। इस मसले को आप इस तरह भी समझ सकते हैं। कानून की भाषा में या यों कहें उचित निर्णय देने हेतु जज को निष्पक्ष होना अति आवश्यक है। यह सौ फीसदी सच है कि निष्पक्ष हुए बगैर कहीं भी और किसी भी मामले में उचित फैसला हो ही नहीं सकता है। जिस देश में सदियों से दलितों को सताया जा रहा हो, उन्हें गुलाम बनाया जा रहा हो, उनपर बेतहाशा अत्याचार किये जा रहे हों और तो और उन्हें तमाम तरह के मानवाधिकार के अंतर्गत मिलने वाली सुविधाओं से भी वंचित किये जा रहे हों, तो इनका न्यायाधीश किसे नियुक्त किया जाय, ताकि पीड़ितों को प्राकृतिक न्याय मिल सके? इस भारत देश के साथ यही हुआ है। यहाँ मनुवादियों का साम्राज्य था। ये सदियों से शूद्रों को प्रताड़ित करते आ रहे थे। भगवान ने शूद्रों की सुनी। और उसने अपने प्रतिनिधि के रूप में अंग्रेजों को भारत भेजा। अंग्रेजी काल में भारत में क्या हुआ? इसे आप अच्छी तरह परिचित हैं। सार यही है कि अंग्रेजों ने मनुवादी साम्राज्य को ध्वंस कर दिया। जज बनकर शूद्रों को उचित निर्णय दिया। अंतोगत्वा भगवान द्वारा आवंटित काम को अंजाम देने के पश्चात् वे सन् 1947 को अपना घर वापस लौट चले। साथ ही वे अपने होनहार छात्र डॉ भीम राव अम्बेडकर को भारत का संविधान लिखने के लिए तमाम तरह के नोट्स देकर इस देश से बिदा हो लिए।
भगवान द्वारा प्रेषित निष्पक्ष जज अंग्रेज पुनः मनुवादी को भारत की सत्ता सौंपकर अपने वतन को लौट चले। अब शूद्रों का क्या होगा? शूद्रों का वही होगा जो मंजूरे खुदा। यही सच है कि भारत के हर नागरिक को संविधान के अनुसार चलना चाहिए। लेकिन बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस वक्त मनुवादियों के फन उठने लगे हैं। मनुवादियों द्वारा गाहे-बगाहे इसकी आलोचना करना एक बहुत बड़ा अशुभ संदेश है। जिस तरह संविधान की धज्जियां उड़ रही हैं, वह आपके सामने है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। अब यहाँ के सत्ताधीश किसी एक धर्म विशेष को ही बढ़ावे दे, यह कहीं से भी शोभा नहीं देता है। पूरी सरकारी मशीनरी प्राण प्रतिष्ठा में लग जाय, तो इसे क्या धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है? इसी तरह आरक्षण को समाप्त करने हेतु सभी सरकारी संस्थाओं को ही बेच देना, कहाँ तक उचित है? ईडी, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट जैसी स्वतंत्र निकाय, अब सरकार के दिशा निर्देश पर काम करे, तो दाल में कुछ काला जरुर नजर आता है। इस हालात में अब कौन होगा दलितों का तारणहार? मामला सोचनीय है।
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