Wednesday, 25 September 2024



संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त 
होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है

यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्य हो जाती है। विडंबना है कि जबतक उस चीज की प्राप्ती नहीं हो जाती, तबतक उसकी प्राप्ती हेतु जान तक की बाजी भी लगाई जाती है। यह कड़ुवा सच है; हमारे पूर्वजों ने 1855 में अन्याय के विरुद्ध हूल किया। और उस हूल की एवज में उन्हें एक बड़ा-सा भूखण्ड मिल गया। पर हम उस भूखण्ड को संभाल पाने में विफल रहे। सोचने वाली बात है; इतना सख्त कानून रहने के बावजूद भी उस नये भूखण्ड में बाहरियों की बाढ़ आ गई और उसने हमारी ”डेमोग्राफी“ ही बदलकर रख दी है। अब उसमें हिन्दु आये या मुसलमां; यह शोध का विषय हो सकता है। संताल परगना गजेटियर्स बताता है कि अलग संताल परगना गठन होने के समय देवघर एवं राजमहल में मात्र 10% ही बाहरी आबादी थी। लेकिन इस आबादी के साथ जादुई करिश्मा हो गई, जिससे आज सच में संताल परगना की डेमोग्राफी बदली हुई है। संताल परगना के छोटे-बड़े शहरों की बात ही छोड़ दीजिए। अब तो गांव-देहातों में भी बाहरी घुसपैठियों की बाढ़ आ गई है। आश्चर्य करने वाली बात तो यह है कि एसपीटी एक्ट के तहत जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। फिर भी हो सकता है; शायद ये बाहरी घुसपैठिये आसमान से टपक पड़े हों!

देश 1947 को आजाद हुआ। हम अपने हूल के परिणामस्वरुप मिले भूखण्ड को संभालने में विफल रहे। महानायक सिदो-कान्हू एवं हूल में शहीदों के सपने अधूरे रह गए। फिर हम झारखण्ड अलग प्रांत के आंदोलन में कूद पड़े। इस आंदोलन के परिणामस्वरुप भी हमें 50 वर्षों के बाद 2000 को अलग झारखण्ड राज्य तो मिल गया, पर उसे भी संभाल न पाए। तब बाहरी आबादी अपना बोरिया-बिस्तार समेट ही चुकी थे कि हमने उसे अग्रज मानकर उन्हें अपने पास ही पनाह दे डाली। अब डेमोग्राफी ... डेमोग्राफी चुनावी झुनझुना बजाते रहो। इससे कुछ होना-जाना नहीं है। परिणाम यह हुआ कि हमारे लोग अपनी मातृभूमि से पलायन कर रहे हैं, जबकि बाहरी आबादी टिड्डी की भांति उसकी भरपाई हेतु घुसपैठ कर रहे हैं। दोनों ही परिस्थितियों में हमारी हालत पतली हुई जा रही है।

आदिवासी संतालों की सुरक्षा हेतु क्या नहीं है? उनके पास सभी तरह के कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। फिर भी वे लुप्त होने की कगार पर खड़े हैं। अब उनकी जनसंख्या झारखण्ड में 2011 के अनुसार मात्र 26% रह गई है।

झारखण्ड में चुनावी शंखनाद हो चुका है। इस चुनाव के दौरान काले-पीले सभी तरह के राजनैतिक दल आयेंगे। और वे भूतकाल की तरह संतालों को किसी दुधारी गाय की तरह दुहकर अंतर्धान हो जाएंगे। और हम मूरख संताल भाषा को छोड़ धर्म और लिपि का घूंट पीने में मस्त हो जाएंगे। वाह रे आदिम जाति संताड़ खेरवाल!

Tuesday, 24 September 2024

हमारी पहचान है या विनाश की फाँस?

अगर दुनिया में लिपि ही किसी समुदाय विशेष की पहचान होती, तो आज अंग्रेज ही दुनिया के महामूर्ख कहलाते। यही वे महामूर्ख अंग्रेज हैं, जिनके पास अपनी कोई लिपि नहीं है। मालूम हो; अंग्रेजी की लिपि उधारी है। फिर भी अंग्रेजों ने आज किसी सौतेली लिपि के भरोसे दुनिया को अपनी मुट्ठी में कैदकर रखा है। क्या यह झूठ है कि अंग्रेजों ने अपने ही देश भारत में करीब तीन सौ साल तक डंके की चोट पर राज किया है? क्या यह भी असत्य है कि उन्होंने दुनिया के अन्य करीब ढाई सौ देशों में अपना परचम लहराते रहा है? फिर तो यह भी अविश्वासनीय ही होगा कि आज भी अंग्रेज पचास देशों में राज कर रहे हैं? क्या आपको मालूम है कि उन देशों में उनके बगैर हुक्म सूर्यास्त भी नहीं होता है? उन देशों में अंग्रेजों की तूती बोलती है। एक बार अपने गिरेबां में झांककर कह दो कि यह सब बकवास है, झूठ है और फरेब है। हे कंबल ओढ़कर घी पीने वालो अंग्रेजों की औलाद! हे अंग्रेजों के पैंट पहनने वालो! छोड़ दो हम जैसे गरीब और असहाय संतालों को। खुद के बच्चे अंग्रेजी मिडियम में और हमारे बच्चे वही झोल चिकी का झोल पिलाते रहो? यह सब गोरखधंधा अब और चलने वाला नहीं है। हमें बेवकूफ बनाना बंद करो। और बंद करो अपनी वाहियात चिकी मिशन-2025। तुम्हारा पाप का घड़ा  अब भर चुका है। देखते नहीं हो, तुम्हारे आका मुख्यमंत्री मांझी साहब ने उस घड़े को फोड़ दिया है। और तुम्हें क्या चाहिए? दूर हो जा हमारी नजरों से, नहीं तो बेमौत मरने के लिए तैयार रहना।

अंग्रेजों को लाख गाली दो, पर सच्चाई छुप नहीं सकती है। यह सच है कि यही वह शख्स है जिसने सिर्फ आपको ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम नंग-धड़ंगों को अपनी आबरु बचाने हेतु अपनी पैंट पहना रखी है। न सिर्फ उसने अपनी पैंट ही पहना रखी है बल्कि यह बताओ कि उनका हस्तक्षेप कहाँ नहीं है? तुम्हारे उठते-बैठते, सोते-जागते, रोना-धोना और तमाम तरह के क्रिया-क्लापों में सिर्फ अंग्रेजों का ही भूत सवार रहता है। बगैर अंग्रेजियत आपकी सांस एक सेकेण्ड भी नहीं चल सकती है। समय रहते चेत जाओ। तुम्हारी यह गंदी हरकत ने हमें सौ साल तक बेवकूफ बनाती रही है। तुम्हारी यह बुझी रोशनी, अब किसी काम की नहीं है। छोटे बच्चे ज्यादा गुस्सा नहीं कलते, अब सो जाओ!

पहचान ... पहचान ... पहचान! पहचान कौन? पहचान झोल चिकी! सब जगह पहचान! अरे महामूर्खो! आपने तो हद ही कर दी है। तुम्हारी हर सांस में ही अंग्रेजियत है। फिर किस बात की पहचान? अंग्रेजी की अपनी लिपि नहीं है। फिर भी अंग्रेजी दुनिया की सबसे बड़ी भाषा बन गई है। सिर्फ अंग्रेजी ही नहीं बल्कि दुनिया की कई अन्य भाषाएं भी हैं, जिनकी अपनी लिपि नहीं है, पर उन्होंने अपनी भाषा की समृद्धि  के लिए रोमन लिपि को ही अपना रखा है। जरा गहराई से सोचो। आखिर ऐसा क्यों? आपकी लिपि संतालों की फाँस बन गई है।

Monday, 9 September 2024

पी. ओ. बोडिंग साहब की अनमोल भेंट

तब संतालों में एक भी पढ़ा-लिखा व्यक्ति नहीं था, फिर भी वे शेर के जबड़े से संताल परगना को खींच निकालने में सफल रहे। इसके विपरीत, आज हर घर में पढे-लिखे लोग मौजूद हैं। संतालों के अत्याचारियों ने जुल्म करने की सीमा को लांघ दिया है। फिर भी हम भिंगी बिल्ली बनकर किसी एक कोने में दुबके हुए हैं। हूल बीते मात्र 5 वर्ष ही बीते थे। हूल एवं हूल के परिणामों से मनुवादी अत्यधिक बौखला उठे थे। उनकी बौखलाहट स्वाभाविक थी। कारण, हूल में महाजनों को अपने किये का फल मिल चुका था। जहां भी दा॑व लगा, वे मौत के घाट उतारे गए थे। हूल तत्कालीन अंग्रेज साम्राज्य के विरुद्ध नहीं बल्कि अत्याचारी महाजनों के विरुद्ध था। अतः मनुवादियों का जख्मी शेर में परिणत होना स्वाभाविक था। हुआ यूं कि अब महाजन दुगुना रफ्तार से संतालों पर अत्याचार करने लगे थे। ऐसी हालत में मिशनरियों का संताल परगना में आगमन और निरीह संतालों की मदद करना; इन सूदखोर महाजनों को फूटी कौड़ी नहीं सुहाया।

तब बेनगड़िया मिशन पापा-केराप की भलमनसाहत के कारण अपनी प्रसिद्धि पाने में सफल हो चुका था। पापा-केराप साहब ने संतालों की भलाई हेतु कोई कोर कसर न छोड़ रखी थी। कुछ वर्षों बाद उसी स्थान पर पी. ओ. बोडिंग का भी आगमन हुआ। कुछ ही वर्षों के बाद दोनों संतालों के मसीहा पापा-केराप साहब इस दुनिया से चल बसे। अब संतालों की देखरेख का सारा भार बोडिंग साहब पर आ गिरा था।

पी. ओ. बोडिंग साहब एक महान भाषावैज्ञानिक थे। वे संताली के अलावे अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मनी, नॉर्वेजियन आदि भाषाओं के भी अच्छे जानकार थे। उन्हें संताली भाषा-साहित्य से बेहद लगाव था। उन्होंने 44 वर्षों तक संतालों के बीच रहकर संताली साहित्य की सेवा की है।

भारत प्रवास के दौरान उन्होंने देखा कि संतालों की आर्थिक स्थिति बहुत ही नाजुक अवस्था में पड़ी हुई थी। और इधर महाजनों ने भी संतालों का जीना हराम कर रखा था। मिशन स्कूल के भरोसे एकाध संताल जरूर अपना नाम व कुछ पढ़-लिख सकने में कामयाब तो हो चुके थे। परंतु वे इतने योग्य नहीं थे कि वे अपनी भाषा की समृद्धि एवं शब्द संचयन के मामले में कुछ कर सकें। बोडिंग साहब को डर सता रहा था, अगर समय रहते संताली शब्दावली को संजोकर नहीं रखा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब संताली भी एक न एक दिन विलुप्त होने के कगार पर पहुँच जाएगी। यही एकमात्र कारण था कि बोडिंग साहब की 20 वर्षों की कड़ी मेहनत ने रंग लाई। जिसके फलस्वरूप उनके द्वारा संग्रहित, लिखित, संपादित एवं प्रकाशित A Santal Dictionary (5 Vol) हमारे लिये छोड़ गए। इस डिक्शनरी की उपयोगिता तब तक होती रहेगी, जब तक एक भी संताल इस धरा पर विचरण करता रहेगा। पी. ओ. बोडिंग का नाम सदा-सदा के लिये स्वर्ण अक्षरों में चमकता रहेगा! संताली साहित्य के मसीहा पी. ओ. बोडिंग साहब को शत-शत नमन!

Friday, 6 September 2024

शिक्षा की अलख किसने जगाई?

यह आधुनिक युग है। इस युग में शिक्षा अनिवार्य हो गया है। अब अंगूठा टेक का जमाना लाद लिया। यह अलग विषय हो सकता है कि इस वक्त संताल परगना में खासकर संतालों में शिक्षा की क्या स्थिति है? यह सोलह आने सच है कि महान संताल विद्रोह अर्थात संताल हूल-1855 घटित होने तक एक भी संताल पढ़ा-लिखा नहीं था। हूल के परिणामस्वरूप अलग संताल परगना मिल तो गया पर शिक्षा के क्षेत्र में संताल परगना फिसड्डी ही रहा।

हूल के ठीक 5 वर्ष बाद 1860 को संताल परगना में ईसाई मिशनरियों का अगमन हुआ। उसने संतालों के बीच शिक्षा का प्रचार-प्रसार आरंभ कर दिया। देखते ही देखते करीब तीन सौ छोटे-बड़े स्कूलों का उदय हुआ। इन स्कूलों में अमीर-गरीब बगैर किसी भेदभाव के सभी तरह के बच्चों को तालीम दी जाने लगी। मिशनरियों का नक्शा आपके सामने है कि आज भी इनके द्वारा प्रायोजित कई अच्छे-अच्छे स्कूल एवं कॉलेज चल रहे हैं।

कोई माने या न माने, लेकिन यह कड़ुवा सच है कि इन्हीं मिशन स्कूल से निकले बच्चों ने अपने हक और अधिकारों को पहचाना एवं संघर्ष के लिये सड़क पर उतर आए, चाहे वह अलग प्रांत की मांग हो अथवा किसी और तरह की मांग। इन्हीं की अगुवाई में कई आंदोलन हुए एवं आगे भी होते रहेंगे। एक ही कारण है कि अब इनकी आँखें खुल चुकी हैं। आदिवासियों को जहां भी प्रताड़ित किया जाएगा, ये शिक्षित बच्चे अग्रिम पंक्ति में अवश्य दिखाई देंगे। ऐसा इसलिए संभव हो पाया है क्योंकि मिशनरियों ने आजतक शिक्षा की अलख को जगाए रखा है।

 रोमन लिपि : परिवर्धित संताली लिपि

आखिर कोट-टाई-पैन्ट किसकी पोशाक है? नि:संदेह यह अंग्रेजों की पोशाक है। पर इस वक्त इसे दुनिया तो छोड़ो हर संताल द्वारा इसका उपयोग बड़े ही गर्व के साथ किया जाता है। इसे पहनने में किसी भी संताल को कोई गुरेज व एतराज नहीं और न ही कोई इसके विरोध में चूँ तक कर रहा है। सभी संताल इसे पहनने में अपना गौरव महसूस करते हैं। लेकिन रोमन संताली लिपि के साथ ठीक इसके विपरीत हो गया। अक्सर इनपर आरोप मढ़ दिया जाता है कि यह तो ईसाईयों द्वारा ईजाद की हुई लिपि है। अतः यह संतालों की लिपि कतई नहीं हो सकती है। यह लिपि हमें किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। हमें तो किसी संताल द्वारा ईजाद की हुई अपनी लिपि चाहिए, जिससे हम अपनी पहचान को बरकरार रखते हुए गौरव महसूस कर सकें। बेशक वह लिपि चोरी की हुई, अवैज्ञानिक एवं मानक संताली के लिये अनुपयुक्त ही क्यों न हों।

मालूम हो कि रेव्ह. पी. ओ. बोडिंग ने जिस रोमन लिपि को संताली के लिये परिवर्धित कर संताली लिखने के लिये ईजाद किया, इससे श्रेष्ठ, उत्कृष्ट एवं बेहत्तर संताली लिपि और कोई दूसरी नहीं हो सकती है। अतः इस संताली लिपि को कोई अन्य माने या न माने, अपनाए या न अपनाए, इसका विरोध करे; हमें कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। हमें इस संताली लिपि की उन्नति के लिये हर संभव प्रयास करते रहना चाहिए। यह लिपि संताली के लिये सर्वश्रेष्ठ लिपि है।
बोडिंग साहब : एक महान संताल

बेशक पी. ओ. बोडिंग किसी संताल की कोख से पैदा नहीं हुए थे। वे अवश्य ही मूल रूप से एक विदेशी एवं ईसाई धर्म प्रचारक थे। पर उनकी सारी रचनाएं बेहद उम्दी, बेहतरीन, उत्कृष्ट एवं अव्वल दर्जे की हैं। उनकी किसी भी रचनाओं से किसी भी ऐंगल से विदेशी एवं ईसाई धर्म प्रचारक होने की बू नहीं आती है। उनकी ”ए संताल डिक्शनरी” को ही देख लिया जाए। उन्होंने इसमें हर शब्द की व्याख्या बड़े ही उत्कृष्ट तरीके से किया हुआ है। उन्होंने इस शब्दकोश में भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का अक्षरश: अनुपालन करते हुए अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया है; जो कि इस तरह का कृत्य किसी साधारण संताल द्वारा संभव नहीं है।
 
अतः उपरोक्त कारणों को मद्देनजर रखते हुए डंके की चोट पर कहा जा रहा है कि रेव्ह. पी. ओ. बोडिंग संतालों में महान संताल थे!
पी. ओ. बोडिंग : मानक संताली के महान रक्षक
(2 नवंबर 1865 - 25 सितंबर 1938)
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पी. ओ. बोडिंग का आगमन यूरोप के नॉर्वे देश से भारत में 1890 के उतरार्द्ध में हुआ। उनका कार्यक्षेत्र था - संताल परगना के बेनागाड़िया, मुहलपहाड़ी एवं दुमका। उन्होंने बहुत ही कम समय में संताली भाषा को न सिर्फ सीखा, बल्कि वह अपने को संताली का महान विचारक, मानवशास्त्री, दार्शनिक एवं भाषावैज्ञानिक के रूप में स्थापित कर दिया। इनके जैसा संताली के महान विद्वान न कभी थे और न ही निकट भविष्य में होने की संभावना नजर आ रही है। वह संताली को जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखने का प्रबल, कठोर, सशक्त एवं घोर समर्थक था। इसीलिए तो उसने अपने पूर्व मिशनरियों के द्वारा ईजाद की गई रोमन संताली लिपि को परिवर्धित कर संताली लिपि में परिवर्तित कर दिया।

पी. ओ. बोडिंग को अपने ही काल में अच्छी तरह पता चल गया था कि संताल परगना के संतालों को अपनी मानक संताली को बचाने के लिए भविष्य में अपने ही बिरादरी के लोगों के साथ गृहयुद्ध करना पड़ेगा। वे लोग संताल परगना पर हावी होंगे। अर्थात दक्षिणी संताली जो तब तक आर्यों की भाषा के साथ मिश्रित एवं प्रदूषित हो चुकी है को उत्तरी संतालों पर जबरन लागू करने की कोशिश की जाएगी। अतः इस भयंकर मुस्किलत से बचने हेतु पी. ओ. बोडिंग ने इसका बेड़ा उठा लिया था। इस महान कार्य के लिए उसने दिन-रात एक कर दिया। उन्होंने अपने खून-पसीने एक कर दिए। उन्होंने करीब 22 वर्षों तक कड़ी मेहनत की। और अंततः अपने अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप उन्होंने इन पुस्तकों की रचना कर डाली। पी. ओ. बोडिंग ने इन पुस्तकों को मानक संताली के किसी भी तरह के दुश्मनों को मार गिराने के लिए हैड्रोजन बम तुल्य आविष्कार किया है :- 1. Materials for a Santali Grammar, Part-I (Mostly Phonetics); 2. Materials for a Santali Grammar, Part-II (Mostly Morphology) एवं 3. A Santal Dictionary (V Vols). अतः यह अब हमारी ड्यूटी बनती है कि हम उपरोक्त हैड्रोजन बमों का प्रयोग कब, कहाँ और किस तरह के दुश्मनों पर करें?

Thursday, 5 September 2024

जेरेत् टुटी हूलगा़रकोआ़ञ

लाच् रे बा़नुक् दाना,
बा़नुक् हो़ड़मो़रे लुगड़ी,
बो़हो़क् उमूल चातो़म,
हो़यते ओटाङ आत्एन।
चेकायता़मा़ञ चाम्पा-बादोली,
चेकायता़मा़ञ बारो़ दोलान?
लादा़ञ सेञ रापागा,
आमाक् किसा़-का़हनी।
हानको ञेलकोम टुईला़,
न्हाते गो़दो़र गोचो,
झा़पुत् केदिञको देने-बानार,
दिपिला़दिञको हेन्दे टुकुच्,
हेलाविना़ञ नामाल का़मी।
इमा़ञ बापधो़न इमा़ञमे से,
आकेल रेआक् दुगुर सेंगेल,
मित् मित् ते सानाम बा़ईरी, 
जेरेत् टुटी हूलगा़रकोआ़ञ।
भाषाविज्ञान क्या है?

जिसने लिपि को ही भाषा मान बैठा हो, उनसे भाषा के बारे में ज्यादा बहस करना बेवकूफी है। उनके पास मिशन-2024 के अलावे भी कई ऐसे कार्यक्रम हैं, जिनसे संतालों की सामाजिक समरसता तो बिगड़ेगी ही साथ ही उनकी लिपि भी थक हारकर अपनी कोख में पुनः प्रवेश कर जाएगी। अर्थात् उन्हें कुछ ही दिनों के पश्चात् स्वाभाविक मौत की प्राप्ती हो जाएगी। काश! वे अपनी भाषाई शुद्धता एवं भाषा के मानकीकारण पर ज्यादा ध्यान देते तो क्या ही अच्छा होता। लेकिन उन्हें कौन समझाए? जो अपनी बड़ी-बड़ी रैलियों में “आदिमकोवाग मेंद दो छेद काना” का बेसिर-पैर वाला नारा लगा रहा हो, उनसे और ज्यादा क्या उम्मीद की जा सकती है?

तमाम भाषाविज्ञानिकों ने उनकी भाषा को सदियों पूर्व ही प्रदूषित एवं मिश्रित घोषित कर रखा है। वास्तव में उनकी भाषा में आर्यं भाषाओं का मिश्रण अथवा प्रभाव है। अतः संताली भाषा वैज्ञानिकों की दृष्टि से उत्तरी संताली को ही मानक संताली कहा गया है।

भाषाविज्ञान एक निःरस विषय है। फिर भी आइए, आज हम इस विषय पर कुछ चर्चा कर लें।

भाषा-विज्ञान की शाखाएँ - भाषा की परिभाषा रेखांकित करते हुए हमने जाना है कि भाषा-विज्ञान विज्ञान की वह शाखा है जिसमें भाषा का (विशिष्ट और सामान्य, समकालिक और ऐतिहासिक, तुलनात्मक और प्रायोगिक) दृष्टि से अध्ययन किया जाता है, जिसके अध्ययन के द्वारा भाषा की उत्पत्ति, गठन, प्रकृति एवं विकास आदि की सम्यक व्याख्या करते हुए इन सभी प्रकरणों के विषय में वैज्ञानिक सिद्धांतों का निर्धारण किया जाता है। स्पष्ट है भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन हेतु भाषा से संबंधित प्रायः सभी प्रश्नों पर विचार किया जाता है। इन सारे प्रश्नों में कुछ प्रश्न तो अपने आप में आधारभूत महत्त्व रखते हैं और कुछ आनुषंगिक। स्पष्ट है इसी कारण भाषा की अनेक शाखाएँ निर्मित की गयी हैं। इनमें कुछ शाखाएँ तो प्रमुख या प्रधान हैं और कुछ शाखाएँ गौण हैं।

(क) प्रधान शाखाएँ:

1. वाक्य-विज्ञान - भाषा का एकमात्र प्रमुख प्रकार्य भावों और विचारों का आदान-प्रदान है। विचारों का आदान-प्रदान वाक्यों द्वारा ही संभव हो पाता है। अतः निश्चय ही वाक्य, भाषा की सर्वाधिक स्वाभाविक और महत्त्वपूर्ण शाखा के रूप में जाना जाता है। भाषा विज्ञान की जिस शाखा में वाक्य के विषय में अध्ययन-विश्लेषण किया जाता है उसे वाक्य-विज्ञान कहा जाता है। वाक्य-विज्ञान के तीन रूप होते हैं:

(क) समकालिक

(ख) ऐतिहासिक, और

(ग) तुलनात्मक।

वाक्य-रचना का प्रत्यक्ष संबंध पदक्रम, अन्वय, निकटस्थ अवयव केन्द्रिकता, परिवर्तन के कारण, परिवर्तन की दिशाएँ आदि दृष्टियों से किया जाता है। भाषा-विज्ञान की यह शाखा अपेक्षया कठिन मानी जाती है। इस दिशा में कार्य तो काफी हुए हैं परंतु अभी भी इस क्षेत्र में काफी कार्य की जरूरत है।

2. पद-विज्ञान (रूप-विज्ञान) - वाक्य का निर्माण पदों (रूपों) से होता है। यही कारण है कि भाषा वैज्ञानिक अध्ययन क्रम में वाक्य के बाद पदों (रूपों) पर विचार किया जाना समीचीन माना गया है। पद-विज्ञान को ‘रूप-विज्ञान’ या ‘पद-रचनाशास्त्र’ भी कहा गया है। पद-विज्ञान के अंतर्गत संबंध तत्व, उसके प्रकार और रूप भाषा के वैयाकरणिक रूपों के विकास, उसके कारण तथा धातु, उपसर्ग, प्रत्यय आदि उन तमाम उपकरणों पर विचार किया जाता है जिनसे पद या रूप बनते हैं। पद-निर्माण या रूप निर्माण की प्रक्रिया भी इसके अंतर्गत आती है। इसका अध्ययन भी समकालिक, तुलनात्मक तथा ऐतिहासिक-इन तीनों रूपों में किया जाता है।

3. ध्वनि-विज्ञान - शब्दों का आधार ध्वनियाँ हैं। ध्वनि-विज्ञान के अंतर्गत भाषा की ध्वनियों पर अनेक दृष्टियों से विचार किया जाता है। इस शाखा के अंतर्गत ध्वनि-शास्त्र (फोनेटिक्स) एक विभाग है, जिसमें ध्वनि से संबंध रखने वाले अवयवों (मुख-विवर, नासिका-विवर, स्वर-तंत्री और ध्वनि यंत्र आदि) ध्वनि उत्पन्न होने की क्रिया तथा ध्वनि-लहर और उसके सुने जाने आदि का भी अध्ययन किया जाता है। किसी भाषा में प्रयुक्त ध्वनियों का वर्णन और विवेचन आदि भी इसी शाखा के अंतर्गत आता है। ध्वनि-प्रक्रिया पर उसके कारणों एवं दिशाओं के विश्लेषण के साथ विचार होता है। इस विज्ञान के अध्ययन के भी पूर्व की ही तरह समकालिक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक-तीन रूप होते हैं। इसमें एक ही भाषा-परिवार की भाषाओं को लेकर ध्वनि-विकास पर विचार करके नियमों का निर्धारण किया जाता है। प्रसिद्ध ‘ग्रिम’ नियम का संबंध ध्वनि-विज्ञान से ही है। इसमें भाषिक इतिहास का अध्ययन भी ध्वनि की दृष्टि से किया जाता है। ध्वनि-विज्ञान के अंतर्गत ध्वनि-ग्राम विज्ञान जैसे कुछ नये उपविभाग भी बनाए गये हैं। ये ध्वनि के सूक्ष्म अध्ययन की गरज से किये गये हैं।

4. अर्थ-विज्ञान - भाषा की शरीर-यष्टि वाक्य से चलकर ध्वनि की इकाई पर समाप्त होती है। इसके बाद उसकी आत्मा पर विचार करना पड़ता है। आत्मा से तात्पर्य ‘अर्थ’ से है। शब्दों का अर्थ-विवेचन काफी बाद में शुरू हुआ है, क्योंकि काफी समय तक आधुनिक भाषा वैज्ञानिक इस प्रकरण को भाषा-विज्ञान के क्षेत्र का मानते ही नहीं थे। वे इसे दर्शन का क्षेत्र मानते थे। हालाँकि अब यह तय हो चुका है कि अर्थ का भाषा से अत्यंत गहरा संबंध होता है। ‘अर्थ’ का अध्ययन भी समकालिक, ऐतिहासिक और तुलनात्मक-तीनों ही रूपों में होता है। अर्थ-विज्ञान में प्रमुख रूप से शब्दों के अर्थ का निर्धारण, उसके स्तर, उसके विकास और कारणों आदि पर विचार किया जाता है। इसके साथ ही अर्थ और ध्वनि के संबंध, पर्याय, विलोम आदि के विवेचन भी उसमें सम्मिलित होते हैं। भाषा-विज्ञान में इस प्रकरण को ‘अर्थ-विचार’ कहकर भी अभिहित किया जाता रहा है। भाषा-विज्ञान की ये सभी शाखाएँ अत्यंत प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण मानी गयी हैं। इसके अलावा भाषा-विज्ञान की कुछ गौण शाखाएँ भी विकसित हुई हैं। भाषा को गहरे, अति गहरे रूप में जानने-समझने के लिये ही भाषा वैज्ञानिक नित्य उपक्रम में लगे रहते हैं।

उपर्युक्त चार प्रमुख शाखाओं के अलावा एक और प्रमुख शाखा की उद्भावना हिंदी के ख्यात भाषा-वैज्ञानिक डॉ० भोला नाथ तिवारी ने की है। जिसका नाम है ‘शब्द-विज्ञान’ । वे कहते हैं कि पद-विज्ञान में शब्दों की रचना पर तो विचार होता है परंतु शब्दों का वर्गीकरण, नाम-विज्ञान, व्यक्ति या भाषा के शब्द-समूह में परिवर्तन के कारण और दिशाओं आदि का विचार शब्द-विज्ञान के अंतर्गत आएगा। कोश-विज्ञान एवं व्युत्पति का विज्ञान भी शब्द-विज्ञान के ही अंग है। इस शाखा में शब्दों का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाता है। यह अध्ययन प्रमुख रूप से व्युत्पत्तियों के संदर्भ में किया जाता है।

भाषा-विज्ञान की कुछ गौण शाखाएँ:

1. भाषा की उत्पत्ति-भाषा - विज्ञान का सर्वाधिक स्वाभाविक एवं आवश्यक प्रश्न भाषा की उत्पत्ति का है। इस प्रश्न पर विद्वानों ने तरह-तरह से विचार कर अनेक सिद्धांतों का प्रदिपादन किया है। आधुनिक काल के अधिकांश विद्वान तो एक सीमा में ही इसे भाषा-विज्ञान की शाखा के रूप में मानते हैं, परंतु सच तो यह है कि यह भी उसकी एक शाखा ही है। जब भाषा का पूरा जीवन हमारे अध्ययन का विषय है, तो इसके जन्म से जुड़े प्रश्नों को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। इसमें कोई संदेह नहीं कि इसका अध्ययन कठिन जरूर है। परंतु इस पर अनुसंधान और विचार तो चलते ही रहेंगे ।

2. भाषाओं का वर्गीकरण-भाषा - विज्ञान की शब्द-विज्ञान को लेकर पाँच प्रधान शाखाओं (वाक्य, पद, शब्द, ध्वनि और अर्थ) के आधार पर संसार की भाषाओं का तुलनात्मक और ऐतिहासिक अध्ययन कर उनका वर्गीकरण इस शाखा के अंतर्गत किया गया है। इसी आधार पर यह तय किया गया है कि कौन-कौन भाषाएँ एक परिवार की हैं। इसके साथ ही इससे अर्थ या ध्वनि संबंधी अनेक गुत्थियों पर भी प्रकाश पड़ता है। तात्विक दृष्टि से यह क्षेत्र प्रधान पाँचों शाखाओं को मिलाकर अध्ययन की एक स्वतंत्र शाखा बनाई गयी है।

3. भाषा काल-क्रम-विज्ञान - भाषा-विज्ञान में सांख्यकीय पद्धति से काम करने या सांख्यिकी की सहायता से अध्ययन का सिलसिला 19वीं शताब्दी में ही प्रारंभ हो चुका था। ह्विटनी जैसे विद्वानों ने 1874 ई० में अंग्रेजी की ध्वनियों पर इस पद्धति से कुछ कार्य किया था।

भाषा काल-क्रम - विज्ञान में वर्णनात्मक भाषा-विज्ञान के आधार पर एक भाषा-परिवार की दो या अधिक भाषाओं के शब्द-समूह को एकत्र किया जाता है और फिर उसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। इस तुलनात्मक अध्ययन में पुराने शब्दों के लोप और नये के आगम के आधार पर भाषाओं के एक मूल. भाषा से अलग होने के काल तक का पता लगाया जाता है। साथ ही, कभी-कभी ऐसी भाषाओं में जिनमें कुछ समानता हो और कुछ भिन्नता हो जिसके कारण उनके एक परिवार के होने के संबंध में निश्चयात्मक रूप से कुछ भी कहना कठिन हो, भाषा काल-क्रम-विज्ञान के आधार पर उनके एक परिवार के होने या न होने के संबंध में अपेक्षया अधिक निश्चय के साथ कहा जा सकता है। एक ही भाषा के दो कालों का शब्द-समूह ज्ञात हो तो उनके बीच के समय के संबंध में भी इसके आधार पर कुछ कहा जा सकता है। इस प्रकार वर्णनात्मक और तुलनात्मक भाषा-विज्ञान पर आधारित भाषा-विज्ञान की इस शाखा के आधार पर ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान की बहुत सी गुत्थियों को सुलझाने की संभावना बढ़ गयी है।

4. भाषिक भूगोल-शाखा - भौगोलिक विस्तार में स्थानीय वैशिष्ट्य की दृष्टि से किसी क्षेत्र की भाषा का अध्ययन ही भाषिक भूगोल शाखा का विषय है। इसे ही ब्याज से भाषा या बोली आदि में ध्वनि, सुर, शब्द-समूह, रूप (पद), वाक्य-संरचना एवं मुहावरे आदि की दृष्टि से कहाँ और क्या अंतर है या उसकी क्या विशेषताएँ हैं, इन्हीं सभी पक्षों का अध्ययन भाषिक भूगोल नामक शाखा का मुख्य विषय है।

भाषा-भूगोल में सर्वप्रथम क्षेत्र विशेष के भिन्न-भिन्न स्थानों की भाषा का वर्णनात्मक अध्ययन किया जाता है और फिर उन विभिन्न स्थानों की भाषा विषयक विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन कर यह निश्चय किया जाता है कि कितने स्थानों की भाषा में लगभग साम्य है। इतना ही नहीं स्थानीय अंतर कहाँ कम है और कहाँ अधिक-इस पर भी विचार किया जाता है। साथ ही कहाँ से भाषा में इतना परिवर्तन आरंभ हो गया है कि एक क्षेत्र का व्यक्ति दूसरे क्षेत्र की भाषा को समझ सके, इस पर भी विचार किया जाता है। इन बातों का निर्धारण हो जाने पर यह सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में इतनी भाषाएँ हैं और उनके क्षेत्र की सीमा अमुक जगह तक है। साथ ही, प्रत्येक भाषा के अंतर्गत आने वाली बोलियों और प्रत्येक बोली की उपबोलियों एवं उनके क्षेत्रों तथा एक-दूसरे की अलग करनेवाली विशेषताओं का भी निर्धारण किया जाता है।

5. भाषा (प्रागैतिहासिक खोजद्) - भाषा-विज्ञान की यह शाखा इतिहास, सभ्यता और संस्कृति की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इसमें इतिहास के उस अंधे युग पर, जिसके संबंध में कोई भी सामग्री उपलब्ध नहीं होती, भाषा के सहारे प्रकाश डाला जा सकता है। प्रसिद्ध जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने भाषा-विज्ञान की इस शाखा की नींव डाली थी। इस तरह की खोज के लिये पहले किसी भाषा के प्राचीन शब्दों को लिया जाता है, तत्पश्चात् उस परिवार की अन्य भाषाओं के प्राचीन शब्दों की तुलना के आधार पर यह निश्चित किया जाता है कि प्राचीनतम काल के शब्द कौन-कौन थे। इन शब्दों को इकट्ठा करके उनका विश्लेषण कई दृष्टियों से किया जाता है। सामाजिक, धार्मिक आदि वर्गों में शब्दों को अलग-अलग करके अनुमान लगाया जाता है कि उस समय की सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक दशा क्या थी। जानवरों के नामों से यह पता चलता है कि उनके पास कौन-कौन से जानवर थे। ‘क्रियापरक’ शब्दों से उनके सामाजिक जीवन पर प्रकाश पड़ता है। इस तरह यथासाध्य उन शब्दों के आधार पर जीवन के प्रत्येक अंग की छानबीन की जाती है और एक पूरा नक्शा तैयार करने की कोशिश की जाती है। साथ ही प्रकृति, पर्वत, नदी, पेड़-पौधे तथा ऋतु से संबंधित शब्दों के आधार पर यह अनुमान भी लगाया जाता है कि किस स्थान पर इन सबका इस रूप में पाया जाना संभव है। इससे उसके आदिम स्थान का अनुमान लगाना सहज हो जाता है।

6. मनोभाषा-विज्ञान - इस शाखा में भाषा के मनोवैज्ञानिक संदर्भो एवं पक्षों पर विचार किया जाता है। वास्तव में, भाषा हमारे मनोभावों एवं विचारों को ही तो व्यक्त करती है। इसी कारण शब्दों के प्रयोग में हम बहुत सतर्क रहते हैं। हम सदा ही शब्दों के चयन की प्रक्रिया से जुड़े रहते हैं। जाहिर है चयन की यह प्रक्रिया हमारे मन की विशिष्ट स्थिति की संकेतिका है। इसी कारण इस शाखा में मानसिकता एवं मन की गुह्यता के अध्ययन के आधार पर भाषा का अध्ययन करते हैं।

7. समाज भाषा-विज्ञान - भाषा पूर्णतया सामाजिक वस्तु है। व्यक्ति समाज में ही उसे सीखता है। समाज में ही वह उसका प्रयोग करता है। स्पष्ट है भाषा और समाज अन्योन्याश्रित हैं। इस संबंध का ही परिणाम है कि भाषा अपनी व्यवस्था में समाज के अनुरूप होती है। साथ ही उसका विकास भी सामाजिक विकास के समानांतर चलता है। किसी समाज के विषय में उसके द्वारा प्रयुक्त भाषा के आधार पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। भारतीय भाषाओं में चाचा, ताऊ, मामा, मौसा जैसे संबंध द्योतक शब्दों का अभाव है। जाहिर है भारतीय समाज में इन मानवीय संबंधों का वहाँ की अपेक्षा अधिक महत्व रहा है। फारसी में बड़े लोगों के लिये समानार्थ क्रिया के बहुवचन रूप का प्रयोग इस तथ्य का प्रमाण है कि वहाँ की सामंती व्यवस्था में अमीर या बड़े आदमी एक से अधिक सामान्य या निम्न श्रेणी के व्यक्ति के बराबर माने जाते थे। जापान में राजा तथा राजघराने के लोगों के लिये सामान्य भाषा से अलग शब्दों एवं रूपों के प्रयोग इस बात के संकेत हैं कि वहाँ के समाज में राज्य का स्थान बहुत ही विशिष्ट हुआ करता रहा है। संभवतः भाषा और समाज के इस अभिन्नत्व के कारण ही इस शाखा का जन्म हुआ है। भाषा के इस सामाजिक संदर्भ को व्याख्यायित करने वाली इस शाखा का संबंध वास्तव में सामाजिक विज्ञान से भी बनता है।

8. लिपि-विज्ञान - वैसे लिपि भाषा का प्रत्यक्ष अंग नहीं है। तभी कुछ विद्वान इसे भाषा-विज्ञान की शाखा के रूप में स्वीकार करना नहीं चाहते किंतु फिर भी प्रत्यक्षतया भाषा-विज्ञान के अंतर्गत न आने पर भी भाषा-विज्ञान के अंतर्गत इसका अध्ययन असंबंद्ध नहीं माना जा सकता। हमें पता है कि लिखित भाषा में लिपि का सहारा नितांत अपरिहार्य है। जाहिर है इसी कारण भाषा-विज्ञान के अंतर्गत यदि इसके अध्ययन को भी भाषा वैज्ञानिक कुछ ही सीमा तक सही मानते हैं तो इसके पीछे एक तर्क है। लिपि की उत्पत्ति विकास शक्ति तथा उपयोगितायें पर कुछ ऐसे प्रकरण हैं जिनपर भाषा-विज्ञान की इस शाखा में विचार किया जाता है। ध्वनि-विज्ञान की सहायता से लिपि

के सुधार आदि पर भी इस शाखा में विचार किया जाता है।

9. शैली-विज्ञान-भाषा - विज्ञान की यह शाखा वस्तुतः बहुत नई नहीं है। बहुत पूर्व में ही भाषा-शास्त्रियों का ध्यान इस पर गया था। सच तो यह है कि हर व्यक्ति की शैली ही उसके व्यक्तित्व के अनुरूप होती है।

प्रश्न है, शैली है क्या? वास्तव में भाषा के संदर्भ में शैली का प्रत्यक्ष संबंध अभिव्यक्ति से जुड़ा हुआ है। हर भाषा में ध्वनि, शब्द-समूह, रूप-रचना तथा वाक्य-संरचना की दृष्टि से अभिव्यक्ति का एक सर्व स्वीकृत मानक या परिनिष्ठित रूप होता है, जिसे उस भाषा में अभिव्यक्ति का एक सामान्य ढंग कह सकते हैं। जो लेखन में या बोलने में इसी सामान्य रूप का प्रयोग करते हैं, उनकी अपनी कोई शैली नहीं होती। शैली मानी जाती है उनकी जो इस सामान्य रूप से ध्वनि, शब्द-समूह, रूप-संरचना और वाक्य-संरचना आदि की दृष्टि से हटकर भाषा का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार शैली विशेष के लिये आवश्यक है कि चुनकर भाषिक ईकाइयों का ऐसा प्रयोग हो जो सामान्य की तुलना में विशेष या अलग हो। भाषा की सामान्य अभिव्यक्ति पूरे भाषा-समाज की होती है, किन्तु शैली व्यक्ति की या वैयक्तिक होती है। इसका मुख्य आधार है चयन। व्यक्ति अपनी आवश्यकता और रुचि के अनुकूल चयन कर अपनी अभिव्यक्ति करता है। महाकवि निराला या पंत को उनके चयन की इसी प्रक्रिया के आधार पर पाठक पहचान लेता है। यह आधार है उनकी शैली । वास्तव में भाषा-विज्ञान में शैली का अध्ययन ही शैली-विज्ञान है।

10. भू-भाषा विज्ञान - इसके अंतर्गत विश्व में भाषाओं का वितरण, उनके राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्त्व का आकलन, कैसे एक-दूसरे पर अंतरूक्रिया करती हैं, राष्ट्रों की संस्कृति भाषा को कैसे प्रभावित करती है, यहाँ तक कि राष्ट्रभाषा और राजभाषा जैसे प्रकरणों का अध्ययन भी इस शाखा के अंतर्गत किया जाता है। यह शाखा वास्तव में भाषा-विज्ञान की अपेक्षाकृत नयी शाखा है।

11. व्यक्ति-बोली विकास-शाखा - वस्तुतः अंग्रेजी का ‘आटोजेनी’ शब्द मूलतः जीव-विज्ञान का है

जिसका प्रयोग 1870 के आस-पास किसी एक व्यक्ति के विकास के अर्थ में किया गया था । आधुनिक काल में भाषा वैज्ञानिकों ने इसके साथ भाषिक शब्द जोड़कर उसे भाषा-विज्ञान की एक शाखा के रूप में स्वीकार कर लिया है। इसमें व्यक्ति विशेष की बोली या व्यक्ति विशेष की भाषा के, जन्म से लेकर मृत्यु तक के विकास की प्रक्रिया का विस्तृत और गहन अध्ययन किया जाता है। कह सकते हैं कि इसमें एक व्यक्ति की भाषा के विकास (जन्म से मृत्यु तक) का अध्ययन-विश्लेषण वैज्ञानिक पद्धति पर किया जाता है। सैद्धांतिक दृष्टि से इस विषय पर हॉकेट जैसे भाषाविद् ने काफी विचार किया है।

सब जानते हैं कि छोटे बच्चों में भाषा जैसी कोई चीज नहीं होती, किंतु भूखा रहने पर या दर्द होने पर पीड़ित होकर वह रोकर या अंगों को पीटकर अपनी बात व्यक्त करना चाहता है। यही प्रतिक्रिया बच्चों के लिये भाषा की मनिंद है। हर माँ समय और स्थिति के आधार पर इन प्रतिक्रियाओं से उसकी भूख और दर्द होने की स्थिति का अनुमान कर लेती है। बच्चा धीरे-धीरे यह जान लेता है कि भूखा रहने पर रोने की क्रिया द्वारा वह खाना खा सकता है। फिर तो रोने की क्रिया का वह भाषा के रूप में प्रयोग करने लगता है। इतना ही नहीं, माँ अनेक संदर्भो को उसे अनेक संकेतों या इशारों से ही समझा देती है। बच्चा समझ भी लेता है। इस तरह अपने विचारों का आदान-प्रदान बच्चे छोटी अवस्था से ही करने लगते हैं। इस शाखा में इसी का अध्ययन किया जाता है।

12. सर्वेक्षण-पद्धति शाखा - यदि हमें किसी ऐसी भाषा का सर्वेक्षण करना हो, जिसकी सामग्री लिखित रूप में हमें उपलब्ध नहीं है और वह भाषा किसी खास क्षेत्र में प्रयोग में आ रही है, तो क्षेत्र में जाकर उस भाषा के प्रयोग करने वालों को सुनकर, अध्ययन के लिये अपेक्षित सामग्री संकलित करने की स्थिति बनाते हैं। वस्तुतः अध्ययनार्थ अपेक्षित सामग्री संकलित करने की पद्धति ही सर्वेक्षण-पद्धति कहलाती है। इसके लिये सामग्री संकलन की दो पद्धतियाँ होती हैं रू 1. स्वयं उस क्षेत्र में जाकर यह संकलन तैयार करना, और 2. उस भाषा को मातृभाषा के रूप में बोलने वाले अर्थात् मातृभाषा भाषी को अपने यहाँ बुलाकर । इस संदर्भ में सूचना देने वाला व्यक्ति अर्थात्

सूचक एक महत्त्वपूर्ण इकाई है। स्वयं सर्वेक्षण करनेवाला व्यक्ति योग्य एवं प्रशिक्षित होना चाहिये । सर्वेक्षक इस हेतु एक प्रश्नावली पूर्व से तैयार कर लेता है । सूचक से हुई बातों की रिकार्डिंग तैयार की जाती है। उपलब्ध सामग्री को सर्वेक्षक साथ-साथ लिखता जाता है। साथ ही उसके विशेष अर्थ भी वह लिखता जाता है। जाहिर है, इसमें सूचक कैसा चुनें, सर्वेक्षक कैसा हो, प्रश्नावली कैसे बनाएँ, सामग्रियों को किस तरह लिखें, यह सब अत्यंत महत्त्व की बातें हैं।

13. सांख्यिकीय भाषा-विज्ञान - भाषा-विज्ञान की इस शाखा में सांख्यिकी के आधार पर भाषा के विभिन्न पक्षों पर गहनता से विचार किया जाता है। यह गणितीय भाषा-विज्ञान के अंतर्गत आता है। सांख्यिकी गणित की ही एक शाखा है। यह जान-समझकर विस्मय होता है कि भाषा-विज्ञान के क्षेत्र की अपेक्षाकृत यह नयी शाखा भारतवर्ष के लिये सर्वथा नयी नहीं है। सच तो यह है कि इस दिशा में पहला कार्य करने का श्रेय भी भारत को ही जाता है। ईसा की तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी पूर्व में बनायी गयी वैदिक अनुक्रमणियाँ वास्तव में और कुछ नहीं सांख्यिकी भाषा-विज्ञान की ही पृष्ठभूमि है। सारे संसार के भाषाविदों ने इसे अपने ढंग का अनूठा प्रयास माना है।

14. तुलनात्मक पद्धति या पुनर्निर्माण शाखा - तुलनात्मक पद्धति भाषा-विज्ञान में पूर्व से ही अध्ययन की पद्धति के रूप तुलनात्मक भाषा-विज्ञान के ही अंग की तरह है, परंतु इसकी विशेषता यह है कि इसमें दो या दो से अधिक भाषाओं या बोलियों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर पहले से ही निश्चय किया जाता है कि वे एक ही परिवार की है या नहीं, और फिर सूक्षम तुलना के आधार पर उन भाषाओं या बोलियों की पूर्वजा भाषा-(जिनसे उनकी उत्पत्ति हुई है, जैसे हिन्दी के लिये अप्रभंश या फिर संस्कृत) का पुनर्निर्माण किया जाता है, अर्थात् उसकी ध्वनियों तथा उसके व्याकरणिक रूपों एवं अन्य नियमों आदि को ज्ञात किया जाता है।

17वीं सदी से लेकर अब तक भाषा के पारिवारिक वर्गीकरण एवं पारिवारिक अध्ययन के क्षेत्र में जो कार्य हुए हैं उसका आधार तुलनात्मक पद्धति ही है। इस पद्धति में पहले दो भाषाओं के शब्दों को एकत्र कर उनका तुलनात्मक अध्ययन किया जाता है। शब्दों के तुलनात्मक अध्ययन के फलस्वरूप देखा गया है कि दोनों भाषाओं के बहुत-से शब्दों में ध्वनि (या रूप) और अर्थ की दृष्टि से बहुत साम्य है। स्पष्ट ही यह एक वैज्ञानिक पद्धति है।

ऊपर जिस सांख्यिकीय शाखा की चर्चा की गयी है, अपने यहाँ की संहिताओं पर इस दृष्टि से कार्य हुआ है। इनमें से एक के अनुसार ऋग्वेद में 1017 मंत्र, 10580.5 छंद, 153826 शब्द तथा 432002 अक्षर हैं।

यों आधुनिक काल के सांख्यिकीय भाषा-विज्ञान का प्राचीन भारतीय कार्य से कोई तालमेल नहीं है। कहा जाता है कि सर्वप्रथम रूसी भाषाविद् बुंजकोपस्की ने 1847 ई० में भाषा-विज्ञान में गणित के प्रभाग के प्रयोग की संभावना जताई थी। सांख्यिकी भाषा-विज्ञान में ध्वनि, ध्वनि ग्राम, अक्षर, शब्द, रूप, मुहावरे, लोकोक्तियाँ तथा वाक्यों की पद्धति आदि सभी भाषिक इकाइयों की गणना की जाती है और उनके आधार पर अनेक दृष्टियों से उपयोगी परिणाम निकाले जा सकते हैं। इसके द्वारा किसी रचनाकर के बारे में किसी कवि या लेखक की विभिन्न रचनाओं के कालक्रम के बारे में, किसी भाषा से दूसरी या कई भाषाएँ कब निकली, किसी भाषा की आधारभूत शब्दावली कितनी है, आधारभूत व्याकरणिक ढांचा क्या है, ये सब जाने या बताए जा सकते हैं।

इन सभी शाखाओं के अलावा कुछ अन्य दृष्टियों एवं आधारों पर भी अध्ययन किया जाता है। इनमें कुछ का भाषा-विज्ञान के विभागों-उपविभागों के रूप में उल्लेख किया जाता है। जैसे ‘सुर-विज्ञान’ जिसमें भाषा के सुरों का अध्ययन होता है। इसमें से लघुतम सार्थक भाषिक इकाई का अध्ययन संभव होता है। ऐसे ही भाषा-विकास में भाषा में परिवर्तनशीलता तथा उसके कारणों की खोज की जाती है। ‘रूपांतरण’ नामक शाखा में भाषा के व्याकरण एवं ध्वनियों के रूपांतरण की दृष्टि से अध्ययन किया जाता है। ‘व्यतिरेकी विश्लेषण’ भाषा-विज्ञान की ऐसी शाखा है जिसमें दो भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन करके उनकी समानताओं का विश्लेषण किया जाता है।

बोली-विज्ञान भी भाषा-विज्ञान की एक उप शाखा है जिसमें उनकी ध्वनियों तथा रूप विषयक विशेषताओं के आधार पर ही वर्गीकरण किया जाता है। जाहिर है यह भाषाओं के रूपात्मक या आकृतिमूलक वर्गीकरण के अधिक समीप की शाखा प्रतीत होती है।

इधर एक नयी शाखा भी प्रकाश में आई है जिसे ‘जाति-विज्ञान’ के नाम से अभिहित किया जाता है। इस शाखा में जाति-विज्ञान और भाषा-विज्ञान इन दोनों विज्ञानों के संबंधों और आपसी प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। भाषा की प्रकृति और भाषा-विज्ञान के इतिहास आदि का अध्ययन भाषा-विज्ञान की विशिष्ट शाखा के अंतर्गत किया जाता है। 

(सौजन्य: गुगल)
धर्म, भाषा और लिपि

1. धर्म - यह एक व्यक्तिगत और बहुत ही संवेदनशील विषय है। सबसे पहले तो आस्तिक-नास्तिक का सवाल उठ खड़ा होता है। साथ ही ईश्वर है-नहीं है का सवाल है। अगर ईश्वर है, तो कितने तरह के ईश्वर हैं, वगैरह-वगैरह। इस बहस में नास्तिकों ने हमेशा आस्तिकों से बाजी मारी है। किसी धर्म विशेष का ठेकेदार जो धर्म पर बहस करने को राजी हो, तो समझ लेना उससे महा अधार्मिक व्यक्ति इस जगत में और कोई हो नहीं सकता है। चूंकि यह व्यक्तिगत है, अतएव इसका भाषा और लिपि से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है।

2. भाषा - भाषा वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि भाषा कोई दैवीय देन नहीं है। इसकी उत्पत्ति मानव समाज में बहुत बाद में हुई होगी। मानव जाति के पास जन्म लेते ही ध्वनि तो है पर भाषा नहीं। यह स्वाभाविक है कि मानव समुदाय कई वर्षों तक इशारों में ही अपना काम चलाते रहे। लेकिन पास रहे तो इशारों में काम चल सकता है। पर त्वरित एवं दूर-दराज तक संप्रेषण कर पाना असंभव है। अतः इसके लिए प्रतीकों का सृजन अवश्यंभावी था।

ध्वनि का निकलना मानव मुख से ही संभव है। ध्वनि मुख के किस कोण से निकलती है, समाज ने उसपर चिंतन किया और उस ध्वनि के अर्थ को सामाजिक मान्यता दी। बगैर सामाजिक मान्यता दिये वह ध्वनि भाषा कदापि नहीं बन सकती है। इससे एक दूसरे के साथ संप्रेषण करने में सुविधा होती है। अतः मुख से निकलने वाले प्रतीक चिन्हों को भाषा कहा जाता है। भाषा की प्रकार दो तरह की होती है - मौखिक (oral) और लिखित (written)।

3. लिपि - जो ध्वनि/वर्ण भाषा को लिखित रूप प्रदान करे, उसे लिपि कहा जाता है। अतः सिद्ध हो गया कि :

· भाषा ध्वनि संकेतों से मिलकर बनी होती है, जबकि लिपि वर्ण संकेतों से मिलकर बनी होती है।

· भाषा मौखिक होती है, जबकि लिपि को लिखने के लिए भौतिक साधनों की ज़रूरत होती है।

· भाषा का संबंध कानों से होता है, जबकि लिपि समय-स्थान की सीमाओं से मुक्त होती है।

· भाषा में अस्थायित्व होता है, जबकि लिपि ज़्यादा स्थायी होती है।
सार यही है कि धर्म, भाषा और लिपि में कोई आपसी संबंध नहीं है। अगर कोई संबंध है, तो उसे सामाजिक मान्यता देने वाली संस्था है। उस संस्था को किसी समाज विशेष का नाम भी दिया जा सकता है।

Tuesday, 3 September 2024

आखिर दो-दो सृष्टि क्यों?

भगवान भी बड़ा अजीब है! उसने ब्रह्माण्ड की सृष्टि कर दी और कहाँ गायब हो गया? आजतक किसी को कुछ पता न चल पाया। न वह बोलता है, न सुनता है और न ही वह किसी के सामने प्रकट होता है। सबकुछ सृष्टि करने के बाद उसने प्रथम नर-नारी को बनाया होगा। जहां से मानव सृष्टि की शुरुआत हुई। उसी का ही परिणाम है कि आज हम हिन्दू-मुस्लिम करने में सक्षम हैं। यह परंपरा आगे भी बढ़ती जाएगी।

बेशक भगवान न दीखते हों। परंतु उसने अपनी सृष्टि के माध्यम से सबकुछ बताने की चेष्टा की है। इसके लिए समझने की दिव्यदृष्टि होनी चाहिए। आश्चर्य तो तब होता है, जब हम पाते हैं कि उसने एक अकेला नहीं बल्कि जोड़े में ही किसी सजीव-निर्जीव की सृष्टि कर रखी है। जैसे - नर-नारी, सूरज-चंद्रमा, दिन-रात, सूख-दुख वगैरह। अपने शरीरांग को ही देख लो। कोई भी अंग अकेला नहीं बल्कि जोड़े में हैं - हाथ, पैर, नाक, कान .. सभी डबल हैं। यहाँ तक कि दांत की भी ऊपर-नीचे दो पंक्तियाँ हैं। सोचो, अगर एक ही पंक्ति होती, तो क्या हम खाने को सक्षम होते? नहीं। ऐसा इसलिए; वे एक दूसरे के पूरक हैं। वे आपस में एक दूसरे के अच्छे दोस्त एवं सहायक हैं। वे एक दूसरे के मददगार हैं। वे आपसी दुश्मन तो कतई नहीं हैं। ठीक यही स्थिति सबके साथ है। देखो न; देश सन् 1947 को आजाद हुआ। संविधान बना। और देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए एक राष्ट्र एवं कई राज्यों का निर्माण हुआ। राष्ट्र व देश को चलाने के लिए सांसदों एवं राज्य को चलाने के लिए विधायकों की जरूरत होती है। इन सांसदों/विधायकों का चुनाव जनता करती है। अतः स्पष्ट हो गया कि सांसद-विधायक एवं जनता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक दूसरे की अनुपस्थिति में न तो राष्ट्र और न ही राज्य चल सकता है। अर्थात नेता और जनता एक दूसरे के पूरक हैं।

जब जनता और नेता का इतना घनिष्ठ संबंध हो, फिर भी दोनों एक दूसरे के घोर शत्रु बने हुए हैं। क्यों? क्योंकि दोनों के बीच आपसी तालमेल नहीं है। बल्कि नेता जनता का शोषण करना अपना धर्म समझता है। यही कारण है कि नेताओं की हार-जीत होती रहती है। अतः जब तक नेता-जनता के बीच शरीरांग माफिक सामंजस्य स्थापित नहीं होगा, तब तक देश की उन्नति के बारे में सोचना फिजूल की बातें होंगी।
शिक्षा रूपी मशाल दे दो!

ओशो ने ठीक कहा है - "राजनीति...! क्या ही सुंदर शब्द गढ़ा है लोगों ने “राजनीति!” जिसमें नीति बिलकुल भी नहीं है, उसको कहते हैं “राजनीति”। राजनीति सिर्फ चालबाजी है, धोखा-धड़ी है, लुटपाट है, बेईमानी है। इसकी खासियत यही है कि जो नेता जनता को जितना ठग सके, वह उतना ही कामयाब कहलाएगा। हालांकि राजनीतिज्ञों को ईमानदारी के नकाब ओढ़ने पड़ते हैं, मुखौटे ओढ़ने पड़ते हैं, अपने को छिपा-छिपा कर चलना पड़ता है। राजनीतिक नेताओं के पास जितने चेहरे होते हैं, उतने किसी के पास नहीं होते। उनको खुद ही पता नहीं होता है कि उसका असली चेहरा कौन-सा है। मुखौटे ही बदलते रहते हैं, गिरगिट की तरह।” जैसे कि हमारे झारखण्ड में इस वक्त कई तरह के गिरगिट उग आए हैं!

इस वक्त हमारे पास सबसे बड़ा सवाल क्या है? यही न कि हमें सिदो-बिरसा का झारखण्ड दे दो, कहानी खत्म, अध्याय समाप्त। सिदो-बिरसा ने हमें एस पी टी एवं सी एन टी एक्ट दिया। आपने हमें कौन-सा एक्ट दिया? बताओ जरा। इन तथाकथित राजनीतिज्ञों से डोमिसाइल नीति नहीं बन पा रही है, खतियान का बँटाधार हो चला है, पेसा एक्ट नहीं लागू हो रहा है। भ्रष्टाचार आसमान छू रहा है। फिर क्या दोगे? खाक दोगे? जब तक आरक्षण है, मजे लूटते रहो।

फ्री बी का जमाना चल पड़ा है। आपने चौरासी करोड़ जनता को भिखारियों की लाइन में खड़ा कर दिया है। आप भी खुश और जनता भी खुश! हिन्दू-मुस्लिम करते रहो, आबोआक्-आबोआक् करते रहो। किसने रोका है? आपकी गाड़ी चल रही है, चलाते रहो। हमें कुछ भी नहीं चाहिए। हमें शिक्षा रूपी मशाल दे दो। हम अपना रास्ता खुद-ब-खुद ढूँढ़ लेंगे।

Sunday, 1 September 2024

राजनीतिज्ञ और डाकू

ओशो ने कहीं कहा है - "राजनीति...! क्या ही सुंदर शब्द गढ़ा है लोगों ने ”राजनीति!“ जिसमें नीति बिलकुल भी नहीं है, उसको कहते हैं राजनीति। सिर्फ चालबाजी है, धोखा-धड़ी है, बेईमानी है। हालांकि ईमानदारी के नकाब ओढ़ने पड़ते हैं, मुखौटे ओढ़ने पड़ते हैं, अपने को छिपा-छिपा कर चलना पड़ता है। राजनीतिक नेताओं के पास जितने चेहरे होते हैं, उतने किसी के पास नहीं होते। उनको खुद ही पता नहीं होता कि उसका असली चेहरा कौन-सा है। मुखौटे ही बदलते रहते हैं, गिरगिट की तरह।

राजनीति डकैती है। दिन-दहाड़े! जिनको लूटो, वे भी समझते हैं कि उनकी बड़ी सेवा की जा रही है! यह बड़ी अदभुत डकैती है। डाकू भी इससे मात खा गए। डाकू भी पिछड़ गए। सब तिथि-बाह्य हो गए "आउट ऑफ डेट।" इसलिए तो बेचारे डाकू समर्पण करने लगे कि क्या सार है! चुनाव लड़ेंगे, उसमें ज्यादा सार है। तो राजनीतिज्ञों के सामने डाकू समर्पण कर रहे हैं, क्योंकि देख लिया डाकुओं ने, इतनी समझ तो उनमें भी है, कि मारे-मारे फिरो जंगल-जंगल और हाथ क्या खाक लगता है कुछ! और हमेशा जीवन खतरे में। इससे तो राजनीति बेहतर, राजनीति डकैती की आधुनिक व्यवस्था है, प्रक्रिया है। 

एक मिनिस्टर जनसंपर्क दौरे पर बाहर निकले। मंजिल पर पहुंचने से पहले डाकुओं द्वारा पकड़े गए। रस्सियों से जकड़े गए कार से उतार कर पेश किए गए। सामने सरकार के बुरी तरह हांफ रहे थे मारे डर के कांप रहे थे। तभी बोल उठा सरदार डरो मत यार हम तुम एक हैं। दोनों के इरादे नेक हैं। तुम्हारे हाथ सत्ता ... हमारे हाथ बंदूक, दोनों के निशाने अचूक। हम बच रहे हैं अड्डे बदल और तुम दल बदल कर दोनों ही एक-दूसरे के प्रचंड फ्रेंड जनता को लूटने में दोनों ट्रेंड। या यों कह लो सगे भैया, रास्ते अलग-अलग लक्ष्य दोनों का रुपैया। दोनों के साथ पुलिस हमारे पीछे, तुम्हारे आगे। यहां आए हो तो एक काम कर जाओ, अपनों के बीच आराम कर जाओ। बैंक लूटने के उपलक्ष में, हमारे पक्ष में आज की रात ठीक आठ बजे तुम्हारा भाषण है और तुम्हारे ही हाथों नए अड्डे का कल उदघाटन है। राजनीति एक संगठित लूट-तंत्र है। पूरे देश में राजनीति की आड़ में भ्रष्टखोरों की नूरा-कुश्ती-कबड्डी जारी है और रैफरी भी कोई नहीं।

”राजनीति”... यह खेल ठीक वैसा ही है जैसे सब चोर मिल कर विचार करें कि देश में चोरी कैसे बंद हो? भ्रष्टाचार कैसे बंद हो? अपराध कैसे बंद हो? सब एक-दूसरे की तरफ देखें, हंसें, मुस्कराएं, सभाएं करें, लंबे-लंबे भाषण करें और फिर अपने-अपने उसी काम-धंधे पर निकल जाएं। जैसे छिपकलियां रातभर हजारों कीड़े-मकौड़े खाकर सुबह होते ही दीवारों पर टंगी हुई देवी-देवताओं - संतों-महापुरुषों की तस्वीरों के पीछे जाकर छुप जाती हैं। ठीक यही चरित्र राजनैतिक दलों और राजनेताओं का है।   

राजनीति तो विध्वंस है, शोषण है, हिंसा है; शुद्ध डकैती है। डाकुओं के दल हैं। और उन्होंने बड़ा जाल रच लिया है। एक डाकुओं का दल हार जाता है, दूसरों का जीत जाता है; दूसरों का हार जाता है, पहलों का जीत जाता है। और जनता एक डाकुओं के दल से दूसरे डाकुओं के दल के हाथ में डोलती रहती है। यहां भी लुटोगे, वहां भी लुटोगे। यहां भी पिटोगे, वहां भी पिटोगे। राजनैतिक पार्टियां सिर्फ शोषण करती हैं। पांच साल एक पार्टी शोषण करती है, तब तक लोग दूसरी पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। फिर दूसरी पार्टी सत्ता में आ जाती है, पांच साल तक वह शोषण करती है, तब तक लोग पहली पार्टी के संबंध में भूल जाते हैं। यह एक बहुत मजेदार खेल है। होश पता नहीं तुम्हें कब आए! जिस दिन तुम्हें होश आएगा, उस दिन राजनीति दुनिया से उठ जाएगी; उस दिन राजनीति पर कफन ओढ़ा दिया जाएगा; राजनीति की कब्र बन जाएगी। 

मैंने सुना है कि जंगल के जानवरों को आदमियों का एक दफे रोग लग गया। जंगल में दौड़ती जीपें और झंडे और चुनाव! जानवरों ने कहा, हमको भी चुनाव करना चाहिए। लोकतंत्र हमें भी चाहिए। बड़ी अशांति फैल गई जंगल में। सिंह ने भी देखा कि अगर लोकतंत्र का साथ न दे तो उसका सिंहासन डंवाडोल हो जाएगा। तो उसने कहा, भई, हम तो पहले ही से लोकतंत्री हैं। खतम करो इमरजेंसी, चुनाव होगा। चुनाव होने लगा। अब बिचारे सिंह को घर-घर, द्वार-द्वार हाथ जोड़कर खड़ा होना पड़ा। गधों से बाप कहना पड़ा। एक लोमड़ी उसके साथ चलती थी, सलाहकार, जैसे दिल्ली में होते हैं। उस लोमड़ी ने कहा, एक बात बड़ी कठिन है। आप अभी-अभी भेड़ों से मिलकर आए और आपने भेड़ों से कहा कि तुम्हारे हित के लिए ही खड़ा हुआ हूं। तुम्हारा विकास हो। सदा से तुम्हारा शोषण किया गया है, प्यारी भेड़ो, तुम्हारे ही लिए मैं खड़ा हुआ हूं। आपने भेड़ों से यह कह दिया है। और आप भेड़ों के दुश्मन भेड़ियों के पास भी कल गए थे और उनसे भी आप कह रहे थे कि प्यारे भेडियो, तुम्हारे हित के लिए मैं खड़ा हूं। तुम्हारा हित हो, तुम्हें रोज-रोज नयी-नयी जवान-जवान भेड़ें खाने को मिलें, यही तो हमारा लक्ष्य है। तो लोमड़ी ने कहा, यह तो ठीक है कि इधर तुमने भेड़ों को भी समझा दिया है, भेड़ियों को भी समझा दिया है। और अगर अब दोनों कभी साथ-साथ मिल जाएं, फिर क्या करोगे? उसने कहा, तुम गांधी बाबा का नाम सुने कि नहीं? सुने, उस लोमड़ी ने कहा, गांधी बाबा का नाम सुने। तो उसने कहा, गांधी बाबा हर तरकीब छोड़ गए हैं। जब दोनों साथ मिल जाते हैं तब मैं कहता हूं, मैं सर्वाेदयी हूं? सबका उदय चाहता हूं। भेड़ों का भी उदय हो, भेड़ियों का भी उदय हो, सबका उदय चाहता हूं। जब अकेले-अकेले मिलता हूं तो उनको बता देता हूं, जब सबको मिलता हूं तो सर्वाेदयी की बात कर देता हूं। तुम अपने मन को जांचो। तुम बड़ी राजनीति मन में पाओगे। तुम चकित होओगे देखकर कि तुम्हारा मन कितना अवसरवादी है लेकिन तुम एक मजे की बात देखोगे, पार्टी कोई भी हो, कांग्रेस हों, भारतीय जनता पार्टी हो, पार्टी कोई भी हो, लेकिन सब कहेंगे कि महात्मा गांधी के अनुयायी हैं हम। कुछ बात है गांधी बाबा में। समय पर काम पड़ते हैं। कुछ तरकीब है। तरकीब है - अवसरवादिता के लिए सुविधा है। तो है। जब जो तुम्हारे अनुकूल पड़ जाता है, उसी को तुम स्वीकार कर लेते हो। जब जिस चीज से जिस तरह शोषण हो सके, तुम वैसा ही शोषण कर लेते हो। जब जैसा स्वांग रचना पड़े, वैसा ही स्वांग रच लेते हो।" 

सत्ता का खेल अजीबोगरीब है

आपका यह मंगरु कोई राजनीतिज्ञ नहीं है और न ही उसे राजनीति के बारे में a, b, c मालूम है। हाँ, इतना जरूर है कि उसके पास कच्चा-पक्का ढेर सारा अनुभव है। उसने अपनी निरीह आँखों से इन चिन्हों के उगते-डूबते सूरज को बहुत करीब से देखा है; यथा - मुर्गा, जोड़ा पत्ता और अब तीर-धनुष; जोड़ा बैल, गाय-बछड़ा और अब पंजा। इसके अलावे उसने टिमटिमाती दीये की लौ को भी बहुत करीब से देखा है। अब वह दीया फूल बनकर एक से तीन सौ पार करेगा, उसे विश्वास ही नहीं हो रहा है। उसे घोर आश्चर्य तो तब हुआ जब उसकी नींद खुली तो देखा कि केंद्र में तीन टर्म से उसकी सरकार चल रही है। बाकी कई राज्यों में भी उसकी सरकार है।

मंगरु झाखण्ड की कल-परसों की घटना को देखकर अत्यधिक विचलित हुआ जा रहा है। सुना है कि तथाकथित डूबते जहाज से कुछ कप्तान कूद गए हैं और वे अपना बेड़ा पार करने हेतु दूसरे जहाज पर सवार हो गए हैं। उनकी यात्रा मंगलमय हो! यह भी सुना है कि सत्ता का नशा अपरंपार है। यह नशा मरते दम तक उतरने का नाम ही नहीं लेता है। राजनीति के सामने नीतिविज्ञान फेल है। यह भी सच है कि अब मुर्गे का दौर समाप्त हो चुका है। मीटिंगों में कोई स्वयं जाता नहीं है बल्कि उन्हें ले जाना पड़ता है। जनता भी पैसे की भाषा को ही समझती है। हाय पैसा! चुनावी खर्चा हद से ज्यादा हो गया है। सत्ता पैसामय हो चुका है। और उस पैसे का जुगाड़ जनता को सूली पर टाँग कर ही प्राप्त किया जा सकता है। सोचो फिर दोनों विभीषणों ने कितने पैसों का डील किया होगा? इसीलिए कहा जाता है कि सत्ता का खेल जैसा दीखता है, वैसा वह है नहीं।

Saturday, 31 August 2024

अच्छे दोस्त की पहचान

कल और आज झारखण्ड में बिजली क्या कड़की, जो डरा वो भागते हुए नजर आए। कल एक तथाकथित टाइगर ने फूलवालों के घर में पनाह ले ली। उसने अपने पैतृक दल पर आरोप लगाया कि उसकी उपेक्षा हुई है। हो सकता है शायद उस नए आशियाने में उसकी आरती उतारी जायेगी। लेकिन इतना तो सच है कि अब तक उसे अपने पैतृक घर में जो इज्जत मिल रही थी, क्या वह बनावटी थी? उस घर ने उसे विधायक से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा दिया। क्या यह कम है? हो सकता है; शायद अब उसका प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा हो जायगा? और आज एक “कैंची” वाले ने भी फूलवालों के घर में शरण ले ली। आपने भी 25 वर्षों तक विधायक एवं मंत्री बनकर जनता की सेवा की है। तब आपकी आँखेँ पीछे की ओर रही होंगी, तभी आपको “बदलती डेमोग्राफी” नहीं दिखाई दे रही थी। कुछ भी हो; आप दोनों महानुभाओं को अग्रिम मुबारक हो! अब सवाल यह उठता है कि इस वक्त वास्तव में झारखण्ड जल रहा है। इस समस्या का समाधान सिर्फ नेताओं का नहीं है, बल्कि हमारा भी फर्ज बनता है। लेकिन आप दोनों तो अपनी इज्जत बचाने के चक्कर में आशियाना बदलते फिर रहे हैं। जनता आप दोनों को स्वार्थी नेताओं की श्रेणी में रख रहे हैं। कोई गलत उपाधि तो नहीं दे रहे हैं? क्योंकि बड़े बुजुर्ग भी कह गए हैं; “जो दुख की घड़ी में साथ दे, वही सच्चा दोस्त कहलाता है।"

Friday, 30 August 2024

डूबता जहाज या नूह की नाव?

सिदो-बिरसा के सपने को साकार करने हेतु आदिवासियों ने माराङ गोमके के नेतृत्व में जिस झारखण्ड पार्टी का गठन किया था, वह आंधी की तरह आया और तूफान की तरह चल बसा। कुछ आदिवासी शुभचिंतकों ने अलग प्रांत की मांग को जिंदा रखने की कोशिश की पर वे असफल रहे। फिर 1970 के दशक में गुरुजी का उदय हुआ। आप आदिवासी भावनाओं के साथ क्रीड़ा करने में सफल रहे। झारखण्ड आंदोलन का उतार-चढ़ाव होते रहा। लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ जब आदिवासियों को अपना सपने का अलग प्रांत नसीब नहीं हुआ। फूलवालों ने इस मांग का अपहरण कर लिया। और इस तरह अलग झारखण्ड राज्य 15 नवंबर, 2000 को मिला। लेकिन खोदा पहाड़ निकली चुहिया, वह भी मरी हुई।

झारखण्ड मिले 24 वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान की कहानी आपके सामने है। यह सच है कि सिदो-बिरसा का सपना चकनाचूर हो गया। इसके लिए हमारे नेताओं को जितना दोष दिया जाय कम है। लेकिन इसके लिए हम भी कम जिम्मेवार नहीं हैं। हम वोट के बदले नोट एवं हँडिया-दारू के अत्यधिक लती व आदी हो चुके हैं। इस वक्त सभी सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। हर तरफ घूसखोरी का आलम है। माफियाओं का राज कायम है। बेचारी झारखण्डी जनता बेमौत मरी जा रही है। वह नरक में जीने को मजबूर है।

आजकल झामुमो जिसकी राज्य में गठबंधन सरकार चल रही है, उसके बारे में जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं। कोई कह रहा है झामुमो एक डूबता जहाज है। सवारी कूदकर अपनी जान बचा रहे हैं। लेकिन इतिहास साक्षी है; जो भी इस जहाज से कूदा, वह मर-खप गया। या यों कहें की वह विलीन हो गया। कोई कह रहा है चिंटू-पिंटूओं ने झामुमो का हैजाक कर रखा है। आरोप-प्रत्यारोप लगाना बहुत आसान है। बांझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा? नई पार्टी बनाना इतना आसान नहीं है।

आज वो देखो कोल्हन का शेर तथाकथित डूबता जहाज से कूद गया है। लेकिन कूदकर वह जिस दूसरे जहाज में सवार हो रहा है, वह तो इससे भी बड़ा खतरनाक है। अब उसका चड्डी-बनियान भी छीना जायगा। खासकर इस वक्त अगर आदिवासियों को धीमा जहर दिया जा रहा है, तो अब उनकी दिन-दहाड़े कत्लेआम होगी। अतः इस नादान मंगरु की सलाह यही है कि हो सकता है कि आपका भवन पुराना हो गया हो, इसे मरम्मत की जरूरत है। इतने आच्छादित मकान को क्यों तोड़ने के लिए लालायित हो रहे हो? नया आशियाना बनाना बहुत मुश्किल है। और दूसरा घर जहां जा रहे हो वह डाकुओं का बसेरा है। वहाँ आपका पनाह लेना खतरे से खाली नहीं होगा। अतः इस परिस्थिति में झामुमो डूबता जहाज है अथवा नूह की नाव? इस पर मंथन करना आपका कर्तव्य है।

Tuesday, 27 August 2024

BAŃCAOLEM BABA


Oka ńumteń ńumme Baba?
Oka buliteń pukạrme?
Rak̕ chaḍa oka hõ̱ bạnuk̕tiń,
Ho̱mo̱r chaḍa bạnuk̕tiń pạrsi.
Meṭaotińme digdhạ ińak̕,
Ho̱po̱n amren kạnạń se̱ baṅ?
Pujại than hõ̱ ạḍitam,
Taṛam taṛamre piṇḍtam,
Nana rup nana ro̱ṅ,
Hataṅ ińak̕ ạulạuen,
Amaṅ menamreń digdhạen.
Cae kho̱n hõ̱m bahe̱rkeťle,
Madho̱ Siń hõ̱m piḍgạuaťle,
Aso̱k̕ ṭayo̱k̕kanle Baba,
Ceka noa amak̕ kạrdhạni?
Kho̱j Kaman se̱ṅge̱l dak̕,
Ạurie aso̱ṛ nit hõ̱,
Haṭak̕te are̱c̕eť nit hõ̱,
Ale talare jaḍame jaḍam.
Ko̱clo̱n birudre holage,
Sar-kạpi malkaoleťle,
Hul se̱ṅge̱lle salgaoleť.
Hapṛamkoak̕ mãyãm kạlite,
Khõ̱ṇḍ begaren ḍiṇḍạ aleak̕.
Re̱c̕keťleko ḍiṇḍạ Baba,
Do̱kho̱lkeťtaleko disạm Baba.
Kena-Beca sagal-sagal,
Jo̱l-jumi, mĩhũ-me̱ro̱m,
Sanam Babako ḍiglạukeťko.
Rak̕ aleak̕, ho̱mo̱r aleak̕,
Ańjo̱mkatalem amge Baba,
Amge Baba bańcaokalem!

Monday, 26 August 2024

BAṄGEM TAHẼ̱NA HO̱Ṛ HO̱PO̱N

Mẽ̱t̕dak̕ge ṭo̱ṛo̱go̱k̕kan hae!
Umạr reak̕ noa hạsur anacurre,
Campa-Badoli ar Citri disạlere,
Hiḍir-hiḍir hae ban bạsien!
Purkhạkoak̕ co̱l durib,
Miť miťte hasa lataren,
Hae iń sudhạń aṅge̱n aťen!
Lạṛhại-lạpạṛhại sạrdi se̱ṅge̱len,
Bo̱ko̱-boeha talare tarwaṛe,
Lo̱ho̱ť laṭ paṭaoen jive̱ť mãyãmte.
Ho̱mo̱r halaṅeťko era-ho̱po̱n,
So̱maj go̱ hõ̱e gạrsilo̱mena,
Hae ho̱po̱niń cedak̕ko mapak̕?
Bo̱rno̱re o̱no̱l bạnuk̕ ce̱ťge,
Pachnao bạnuk̕ jạt-kujạt,
Pạris hõ̱ co̱ bạnuk̕ o̱l,
Amak̕ bo̱rno̱ sapha pĩṛĩť,
Cak̕ to̱be̱m potaoeť?
Amak̕ bo̱rno̱ arak̕ mãyãmte.
Judi niạ dho̱co̱r tahẽ̱yena amak̕,
Gapam ńamok̕a ciṛiạkhanare,
Jae jug lạgiť noa pirthimi kho̱n,
Ať apať ado̱k̕am tirikal lạgiť,
Baṅgem tahẽ̱na am Ho̱ṛ ho̱po̱n.

Friday, 23 August 2024

जातिवाद : एक घनचक्करी

बाबा साहब डॉ. भीमराव आम्बेडकर द्वारा रचित उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ”जाति प्रथा का विनाश“ में बहुत कुछ कहा गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य कब तक पूर्ण होगा, कहना किसी के वश की बात नहीं। कभी-कभी यह देखकर बड़ा ही आश्चर्य मालूम पड़ता है कि आखिर क्यों संताल लोग ही हूल के महानायक सिदो मुर्मू को मानते हैं? बाकी समुदाय के लोगों को इतनी महान हस्ती सिदो मुर्मू से कोई लेना-देना नहीं है। उसी तरह सिर्फ दलित लोग ही डॉ भीमराव आम्बेडकर की जयंती वगैरह मनाते हैं। बाबा साहब भारत के संविधान के रचयिता हैं, इसलिए मजबूरीवश अन्य समुदाय के लोग इन्हें याद करते हैं। वरना जाति प्रथा ने तो सबका नाश कर रखा है। सच कहा जाय, तो दलितों के महापुरुषों की पूजा दलित लोग ही करते हैं। अन्य समुदाय के लोग इन महापुरुषों के प्रति ईर्ष्या और घृणा का भाव रखते हैं। आखिर ऐसा क्यों?

सुना है; दुनिया के अन्य देशों में जहां जाति प्रथा नहीं है, वहां काले-गोरे का भेदभाव है। यह भी एक जटिल समस्या है। जाति प्रथा हो या काले-गोरे का भेदभाव, समाज के लिए यह एक बहुत बड़ा अभिशाप है। मालूम होता है, जिसने भी इस तरह के भेदभाव की सृष्टि की है, वह बड़ा ही चालाक और चतुर प्रवृति का रहा होगा। कुछ भी हो, हमारे देश में ऐसी कुप्रथा के जनक मनु महाराज को दोष देना कहां तक उचित है? जब तक वर्ण व्यवस्था जीवित है, तब तक जाति प्रथा का विनाश संभव नहीं लगता है।

देश में लोकसभा का चुनाव अंतिम पड़ाव पर है। सवाल इसलिए उठ रहा है; क्योंकि देखा जा रहा है कि इस चुनाव में जातीय समीकरण का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। अनजाने में ही सही, जनता भी उम्मीदवार की जाति देखकर ही वोट देती है। उम्मीदवार कितना भी अयोग्य क्यों न हों जनता उसे ही वोट देने के लिए लालायित रहती है। यही कारण है कि दलित आज भी पूना एक्ट को याद करते हैं।

वर्ण व्यवस्था की स्थापना यूं ही चुटकियों में नहीं हुई है। इसके पीछे न जाने कितने रहस्य छिपे हुए हैं। इतिहास साक्षी है कि भारत में अंग्रेजों के आगमन तक उच्च जाति के लोगों ने शुद्रों का जी भरकर दोहन किया। यह तो ईश्वरीय वरदान ही समझो कि अंग्रेजों ने शूद्रों की आंखें खोल दीं एवं उनकी मुक्ति के लिए कई सारे मार्ग प्रशस्त किये। ब्रिटिश काल में ही डॉ भीमराव आम्बेडकर का जन्म हुआ। उस दलित भीमराव आम्बेडकर ने देश में छुआछूत को झेलते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण किया। डॉ भीमराव आम्बेडकर दलितों के मसीहा बन गए। देश 1947 को आजाद हुआ। विडंबना देखिए कि डॉ भीमराव आम्बेडकर देश के प्रथम कानून एवं न्याय मंत्री बनाए गए एवं उन्हें भारत का संविधान लिखने की जिम्मेदारी दी गई। बाबा साहब की अगुवाई में दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान लिखा गया। इसी संविधान में सदियों से दबाये गए एससी, एसटी एवं ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी संविधान के बदौलत ही आज दबे-कुचलों के लिए सरकारी संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह भी सच है कि इसी आरक्षण के तहत ही आज हम चुनाव-चुनाव का खेल खेल रहे हैं।

लोकसभा चुनाव 2024 के अंतिम एवं 7वें चरण का मतदान 1 जून 2024 को होना है। इसी चरण में ही दुमका एवं राजमहल (आरक्षित-अजजा) के लिए मतदान होना है। दोनों ही क्षेत्रों में इंडिया गठबंधन और भाजपा के बीच सीधी टक्कर है। मालूम हो कि भाजपा जहां संविधान एवं आरक्षण को समाप्त करना चाहती है, वहीं इंडिया गठबंधन-झामुमो इसे बचाने के लिए पूरे देश में जी तोड़ मेहनत कर रहा है। ध्यान रहे, राजमहल से कोई निर्दलीय उम्मीदवार भी है, जो जिसने जिस थाली में खाया है, उसी को ही छेद करने में जुटा हुआ है।

सवाल यही है कि अगर संविधान एवं आरक्षण समाप्त हो गया तो न हम घर के और न घाट के रहेंगे। समाज से फिलहाल जाति प्रथा का विनाश भी संभव नहीं है। यह एक घनचक्करी है। इस स्थिति में हमारा क्या दायित्व बनता है। आइए, हम सब मिलकर इस संबंध में सोचें एवं विचारें।


Thursday, 15 August 2024

HO̱HO̱ET́AE BIṬLẠHA

“Hẽ̱ ya, un din do̱ okarepe tahẽ̱̱kana? Okaṭak̕ bhugạk̕repe huṛạt̕akan tahẽ̱kana? Bejãe un din do̱ mẽ̱t̕ge baṅ saṛok̕kantape tahẽ̱kan? Tinạk̕ din kho̱n miť lape̱ť sea mạṇḍ̕i hõ̱ aleak̕ lac̕re baṅ bo̱lo̱akana, ale re̱ṅge̱c̕tele jale-thale ńamakan tahẽ̱ mẽ̱ť do̱ ceka totkare tahẽ̱kantapea? Oṛak̕re cuṭĩạko do̱n gujuk̕kana, miť cupuť khode caole bạnuk̕talea. Un jo̱khe̱n ape susạriạko do̱ okarepe burumakan tahẽ̱kana? Nit nõ̱k̕õ̱e noa ạkrińkate jagele jo̱m lo̱lo̱k̕kanre, ạḍi jo̱lo̱npe ạikạuet̕a? Liṭạ Goḍet ạḍile sarhaoedea, e̱nte uni baṅkhan, ale do̱ re̱ṅge̱c̕tele go̱c̕ kuṛcuṅkok̕a. Uni oka rạnu capat̕e sorwa oṭoakať do̱ ṣamạni bhạlại reak̕ kạituk! Nit do̱ sạrige jug cetan jug hạbic̕ reak̕ mõ̱ńjo̱ko̱c̕ ạri! Dhar-udhạrkate jage mit̕bar puńjile lagaoeda. Onate rạnu emanle saoda ạguiyeda. Jage mit̕bar bo̱to̱l ạkrińok̕kantalea. Ona poesate nõ̱k̕õ̱ele jo̱m lo̱lo̱k̕kanre mẽ̱ť jolok̕kantapea? Khabe̱rdar, hạṇḍi ạkrińpe manaket̕le, ṭhik do̱ baṅ hoyok̕a.”

“Henda ya ṭõ̱ebak̕, noa hõ̱ disạkak̕pe. O̱ko̱e họṅgo̱reda hạṇḍi? Ceka alele ho̱ṅgo̱reda? Apege co̱ ya, bidhuạ! Alegepe cạrik baṛalea. Ale baṅkhan, dinge baṅ calak̕tapea. Apege co̱ haṭ kan, baṭ kan, mela kan, ṭhela kan ale ṭhengepe ńir hijuk̕a. Apege co̱ yape ce̱re̱c̕ baṛale. Apege co̱ yape je̱ńjle̱ baṛae. Hạṇḍi alope ńũia. Bale dokana. Apepe ńũiet̕tege tho̱rle ạkrińet̕a.” ...

“... Ar ape ko̱le̱j koṛa! Ce̱ť no̱le̱j hõ̱ co̱ ya, bạnuk̕tape. Po̱rko sãotele hihi-haha baṛaere mẽ̱ť jolok̕kantapea? Ceka ale hõ̱ mo̱ṭo̱r saekel reak̕ tayo̱m gaṇḍore de̱jo̱k̕ reak̕ sad do̱ bạnuk̕talea? Dinomge marak̕ lekale saj oḍokok̕ cintạ bạnuk̕talea? Ale hõ̱ sinạmaren kuṛi leka saj bajkatele haṭ baṛae, ceka baṅ mo̱ne̱alea? Mõ̱ńjge kạcni bande ar so̱ sunum-paoḍar jo̱ť baṛajo̱ṅ ceka managetalea? Coṇḍok̕ cạṭki ar luṭi jo̱roṅkak̕ do̱ ceka bato̱lgetalea? Ape ma ya laṅṭa, kulạuge bạnuk̕tape. Ape ma ḍiṅgrạ, bhạṅguạ re̱ṅge̱c̕tepe jale-thale baṛaekan. Cele kusik̕a ape odor poṭak̕ ṭhen do̱? Jạkiṭ tanak̕ kirińale reak̕ dhe̱j bạnuk̕tapea. Ale onko ṭhen kho̱n mõ̱ńj-mõ̱ńj sạṛi-saeale ńameťkhan, mẽ̱ť jolok̕kantapea? Ar e̱nte onko ṭhen menak̕lete nõ̱k̕õ̱e Mukhiạ, Sạmiti ar Jilạ Pạrisad emanre sạmạnile daṛe baṛawakana. Ape ma ya, sara din rạnu boṅga sãote phulpe patawakať. Mo̱ro̱ť arpe jokyoť cabawakana. Cele ya, ape ro̱ṅgo̱ muṇḍhạť ṭhen do̱ kusik̕a? Ape kho̱n ma sikṛĩc̕ hõ̱ jạnic̕ko bo̱lmange! Ape do̱ o̱ho̱pe ạsul daṛekelea. Calak̕geale, po̱re̱r culhạle o̱ṅgea. Bogele pạsien, bogeko go̱c̕ket̕le. Am babawak̕ do̱ baṅle jo̱jo̱mkana.”

“Ar ya, mo̱rdha jo̱kyo̱t̕! Aleak̕ lahanti ńe̱lte mẽ̱ť saṛok̕kantapea? Ape do̱ ya, cekate onko po̱rjạt do̱ baṅpe bulạu daṛeakokana? Ape hõ̱ ạgukope, o̱ko̱e manaet̕pea? Onko ạgu daṛeako reak̕ dhe̱j ma bạnuk̕tape, ar tãhã alepe duhmạt ńamakat̕lea.”

Cetanrekin rukhạt̕kan pạhilic̕ hạṇḍi akrińic̕ Jhabarạli ar dosaric̕ ko̱le̱j kuṛi Maenomạtitạkinak̕ ruhạť ańjo̱mte o̱no̱liạ do̱e tuṛi baha ńamena. Dhạrti do̱ ńutadea. Ạḍi hudisreye paṛaoena. Sạri kangea; Jhabarạlitako re̱ṅge̱c̕teko gujuk̕kan tahẽ̱re baṅ co̱le hiri baṛalet̕ko, baṅ co̱le go̱ṛoat̕ko tahẽ̱! O̱ko̱rtale onkan so̱maj susạr bạisi? O̱ko̱rtale sedae lekan mạńjhi-pargana be̱bo̱stha? Okate do̱ onkan re̱ṅge̱c̕ ar rạṇḍi-piṭạri ayojo̱nakole go̱ṛo daṛeako. Ale ma onkanko ḍạn uduk̕kate hakĩạle go̱c̕ giḍikako.

Ar no̱te̱ ko̱le̱j kuṛi Maenomạtiak̕ sad do̱ sạrige he̱ṛangea! Hạ̃sạk̕geae lo̱bo̱e-lo̱bo̱ye saj bajkok̕! Uṭi-uṭi sajok̕ reak̕ sad menak̕taea, je̱mo̱n baro̱ dolan gaṛreko bạnij idiye. Jãhã miť dhaoe bijli ruạṛkeť, ar bańcaok̕ upại do̱ o̱ko̱ran? Menak̕gea upại! Hapṛamko do̱ noa reak̕ko upại oṭoakat̕gea. Onko ma baro̱ jo̱ṛ sagaṛ miť likreko lagaleť. To̱be̱ “Kirtạ” do̱ dohṛaetege hoyok̕a? Hạni ńe̱le̱pe ạḍi tạpis aṛaṅate kạu mạue ho̱ho̱ dilạiyet̕kana - “Biṭlạha, Biṭlạha”. Okaenam Biṭlạha? Ale hõ̱ hirikaleme.

Friday, 31 May 2024

 आओ चुनाव-चुनाव खेलें

यह कैसी विडंबना है कि आजकल धर्म-धर्म एवं चिकी-चिकी का खेल कुछ सुस्त-सा पड़ गया है। हो सकता है शायद लोकसभा चुनाव की बाढ़ उन्हें बहा ले गई होगी। यह सत्य है कि अभी तक धर्म और चिकी से किसी की क्षुधा नहीं मिट पाई है। हो सकता है; देश से इस चुनाव के वक्त जब धर्म-धर्म का खेल ही समाप्त हो गया, तो हमारे आंगने में इनका क्या काम? 

छठवें चरण का मतदान समाप्त हो गया है। अब सातवें और अंतिम चरण का मतदान 01 जून को होगा। देशभर का संपूर्ण नतीजा 4 जून 2024 को घोषित होगा। कहा जाता है कि साहब अपनी निश्चित हार को देखते हुए पगला गया है। वह अनाप-शनाप बकवास किए जा रहा है। छठवें चरण का मतदान आते-आते उसकी सारी चालें निष्क्रिय होती गई। यही वजह है कि अब वह किसी कोठे में मुजरे का मजा ले रहा होगा। 

इस बार का लोकसभा चुनाव बड़ा अनोखा रहा! इस तरह का चुनाव न कभी हुआ था और न ही कभी होगा। एक तरफ सारी सरकारी मशीनरी, तो दूसरी तरफ विपक्ष न होकर जनता सत्ता पक्ष का डटकर मुकाबला कर रही है। वाकई यह चुनाव अद्भूत है! इस चुनाव में साहब ने अपने आपको किसी भगवान का अवतार घोषित कर रखा है। इतना ही नहीं भगवान भी उनकी आरती उतारने को मजबूर हो गया है। इसीलिए तो "जो राम को लाये हैं, हम उनको लायेंगे" का डंका बज रहा है।

Whatsapp University में चुनाव का खेल खेलने में सभी तथाकथित छात्र-छात्राओं को बड़ा मजा आता है। आपके बुजुर्ग छात्र को भी यह खेल बड़ा सुहाता है। इस वक्त दुमका-राजमहल लोकसभा क्षेत्र आरक्षित है। याद रखना जिस दिन भी यह क्षेत्र सामान्य हो जाएगा, फिर समझो आपका यह चुनाव चुनाव का खेल भी समाप्त हो जाएगा। इसलिए कबीर दास सही कह गए हैं - "कल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय होएगी, बहुरि करोगे कब?"

ज्ञात हो कि दुमका-राजमहल से जहां इंडिया गठबंधन और एनडीए के बीच कांटे का टक्कर है, तो वहीं दूसरी ओर झामुमो को अपने ही मीरजाफरों से दो-दो हाथ करने पड़ रहे हैं। दुमका से जामा की वर्तमान विधायक बागी बनकर कमल फूल सूंघ रही है। वह अपने ही ससुराल वालों को आईना दिखाने में जुट गई है। जनता से उनकी एक ही अपील है कि उसे ही भारी से भारी मतों से जीताएं, ताकि वह ससुराल वालों से बदला ले सके।

दूसरी ओर राजमहल के झामुमो विभीषण बोरियो विधायक ने अपने ही राज में आक्रमण कर दिया है। उनका एक ही आरोप है कि वर्तमान राजा ठीक नहीं है। वह दस वर्षों से भगौड़ा और लापता हैं। इसलिए वह कहता है कि जीत जाने पर वह घर-घर विकास को पहुंचा देगा।

इस तरह विभिन्न छात्र-छात्राओं का थीसिस अलग-अलग है। उनके बारे में ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं। सुना है; वर्षों पहले कुछ मीरजाफर, जयचंद, विभीषण, मुनिया मांझी भी पार्टी छोड़कर चले गए थे। कुछ तो शाम को घर वापस लौट आए थे पर कुछ गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं।

मंगरु को किसी से कोई लेना-देना नहीं है। पर इतना तय है कि Whatsapp University में बहुत तरह के मतभेद हो सकते हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अब समय बहुत बदल चुका है। आपको वक्त की नजाकत को पहचानना ही होगा। कभी अंधेरे में तीर मत चला देना।

विशेषकर युवकों से अपील है। हूल हुआ संताल परगना मिल गया, झारखण्ड आंदोलन हुआ और अलग झारखण्ड राज्य भी मिल गया। पर हम आदिवासियों की हालत अभी भी जस की तस बनी हुई है। इसके एक नहीं हजार कारण हो सकते हैं। इस चुनाव में सिर्फ बदलाव मात्र से समाज का कोई भला होने वाला नहीं है। इस बरसात में सिर्फ मेढ़कों का टर्र-टर्र करने मात्र से भी कोई लाभ नहीं है। अगर वास्तव में आपको समाज की चिंता है, तो अविराम फुल टाईमर के रूप में अभी और आज से लोगों के बीच सामाजिक चेतना जगाने के लिए दिन और रात एक करना होगा। आपको समाज उत्थान के लिए पूर्व में ही ब्लूप्रिंट और रोड मैप तैयार करना होगा। वरना आओ चुनाव-चुनाव का खेल खेलें।

Thursday, 23 May 2024

जिसकी लाठी उसकी भैंस

न चाहते हुए भी मंगरु को अपना मुंह खोलना पड़ रहा है कि इस वक्त संतालों की आधी जमीन परायों के हाथों चली गई है। क्यों? कानून तो कहता है कि एसपीटी एक्ट के तहत संतालों की जमीन की खरीद-बिक्री नहीं हो सकती है। फिर भी क्यों संतालों की जमीन को हड़पा जा रहा है? इसके कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यही है - ”मियां-बीबी राजी तो क्या करेगा काजी।“ अब दुनिया बदल चुकी है। हर परिवार में एक चमकता हुआ एंड्रोयड फोन की जरुरत है। समय को देखते हुए घर में मोटर साईकिल की मांग भी बढ़ती गई है। आमदनी आठन्नी, खर्चा रुपैया वाली बात हो गई है। समय की मांग को देखते हुए आधुनिक आवश्यकताओं की पूर्ति किस तरह हो, एक बहुत बड़ी समस्या मुंह बांयें खड़ी है। कोई और उपाय न देख, चलो अपनी अचल संपत्ति पर ही अपना हाथ साफ कर लें। मना करने पर, नोट कर लो आपकी एक भी दलील चलने वाली नहीं है। अब इसमें किसी भी राजनीतिक दल का क्या कसूर? इस समस्या से आपका भगवान भी आपको नहीं बचा पाएगा।

चुनाव का माहौल है। मतदान की तारिख नजदीक आ रही है। दुमका-राजमहल से खड़े उम्मीदवारों की सांसे फूली हुई हैं। सभी अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। हर गली-कूचों की जनता के बीच राजनीतिक बहस छिड़ी हुई है। हर किसी उम्मीदवार पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। हर व्यक्ति अपनी पीड़ा का ठीकरा अपने विधायक/सांसदों पर फोड़ रहा है। सच देखा जाय, तो जितनी गलियां राजनीतिज्ञों को दिया जाता है, शायद ही किसी और को दिया जाता हो।

सत्ता का नशा बादशाहों को मतवाला बना देता है। वे सत्ता वापसी के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाते हैं। वे सरकारी मशीनरियों का दुरुपयोग करने से बाज नहीं आते। कभी-कभी वे अपने ही बुने हुए जाल में फंस जाते हैं। उदाहारणार्थ - इलेक्ट्रोल बॉण्ड। सुना है; सत्ताधारियों ने कोई धुलाई मशीन की ईजाद की हुई है। इस मशीन की हैसियत बहुत अनोखी है! लोग कहते हैं, जितना भी बड़ा भ्रष्टाचारी क्यों न हो, इस मशीन में धुलाई के उपरांत वह दूध-सा उज्जवल चमकने लगता है। वाह री, मोती धुलाई मशीन!

आपने सुना होगा। सत्ता में आसीन बादशाह का हुक्म हुआ - "जाओ, विपक्ष के सभी सदस्यों को अपने खेमे में शामिल कर लो। इससे हमारी शक्ति मजबूत होगी।"

"हुजूर अनार्थ हो जाएगा। वे सभी महा भ्रष्टाचारी हैं।"

"कोई बात नहीं। उन्हें हमारी धुलाई मशीन में नहला दो। जाओ, हमारा मुंह क्या ताक रहे हो?"

"हुजूर उनका क्या करें, जो उस मशीन में नहाने से मना कर दे?"

"उन्हें सलाखों के पीछे धकेल दो। कितनी बार समझाया? समझ में नहीं आता है क्या?"

थानेदार मुंह लटकाये चला गया। उसने आव देखा न ताव, एक आदिवासी मुख्यमंत्री को अकारण ही पकड़ कर जेल में ठूंस दिया। बेचारा शरीफ आदिवासी चुपचाप त्यागपत्र देकर जेल चला गया।

इसके बाद बादशाह का हुक्म हुआ - "दिल्ली का मुख्यमंत्री बहुत फड़फड़ा रहा है। चुनाव में वह हमारा मटियामेट कर देगा। अतः उसे भी जेल में ठूंस दो।" और इस तरह थानेदार ने बादशाह की आज्ञा का पालन किया। लेकिन दिल्ली के सीएम ने हुंकार भरी - "तू डाल-डाल, तो हम पात-पात। हम रिजाईन नहीं करेंगे।"

देशभर में विपक्षी दलों को परेशान करने का सिलसिला जारी है। बादशाह की इच्छा जो चाहे वह कर रहा है। देश की संपत्ति को बेच दो और वह बेच रहा है। वह संविधान, आरक्षण, लोकतंत्र सबकुछ बेच देना चाहता है। वह जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत को चरितार्थ करने पर उतारु हो गया है। इंडिया गठबंधन उस बादशाह का जोरदार विरोध कर रहा है। चुनाव विश्लेषकों की मानें, तो बादशाह 400 नहीं 140 सीट पर अटक रहा है।

दुमका-राजमहल से भी इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार कमर कस कर मैदान में आ डटे हैं। बादशाह के चेले भी रणक्षेत्र में है। इसमें आश्चर्य की बात यही है कि कुछ निर्दलीय उम्मीदवार बदलाव चाहते हैं। उनका मनिफेस्टो क्या कहता है, यह तो राम जाने। पर वे अकेले ही संविधान एवं आरक्षण को बचा लेने का दंभ भर रहे हैं। आइए, 4 जून 2024 का इंतजार करें।

Thursday, 16 May 2024

हूल प्रदेश का भविष्य

कल इलाके में बारिस हुई थी, इस वजह से मौसम कुछ ठंढा है। फिर भी मंगरु अपनी पुरानी आदतन उसी पेड़ तले बैठे-बैठे कुछ सोच रहा था। मंगरु अच्छी तरह जानता है कि वह कोई ज्योतिष नहीं और न ही वह कोई भविष्यवक्ता है। लेकिन इतिहास के पन्नों को खंगालने के बाद कुछ कहा जाय, तो कोई गलत नहीं।

हूल घटित हुए आज 169 वर्ष बीत गए। आज वक्त ने अच्छी तरह अंगड़ाई ले ली है। तब की और आज की परिस्थिति में जमीन-आसमान का फर्क है। हूल तक लोग पाषाण युग में जी रहे थे। तब आज की आधुनिकता के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। उस वक्त कोई सांसद-विधायक नहीं, कोई चिंटु-पिंटु भी नहीं और ना ही कोई राजनीतिक चमचे-बेलचे ही मौजूद थे। और सबसे बड़ी बात कि उस वक्त आज के जैसा कोई लोकसभा का चुनाव वगैरह भी तो नहीं होता था। और ना ही जनता चुनाव के चक्कर में अपनी मित्रता खो बैठते थे। खैर, संतालों की परंपरागत मांझी-परगना व्यवस्था बहुत सुदृढ़ थी, जिसकी वजह से वे अपना एक अलग प्रदेश "संताल परगना" को हासिल करने में सफल हुए। इतना ही नहीं उन्होंने संताल परगना की शासन व्यवस्था को भी अपनी इच्छानुसार स्थापित करने में सफल हुए।

हूल के बाद संताल परगना में मिशनरियों का आगमन हुआ एवं उनकी देन आपके समक्ष है। इधर 1880 के दशक में हूल प्रदेश में संतालों के बीच हिंदुकरण का बीज बोया गया। इस धार्मिक आंदोलन को "खेरवाड़ आंदोलन" के नाम से भी जाना गया। इस आंदोलन के अगुवे बाबा भगीरथ, धुबिया गोसांई आदि बने। इस दौरान हूल प्रदेश में कुछ हुआ या नहीं पर खतियान का काम जरुर हुआ। स्मरण रहे कि संताली साहित्य का विकास रोमन संताली से आरंभ हुआ।

अंग्रेजों का भारत आगमन से पूर्व देश की सामाजिक अवस्था ठीक नहीं थी। यह अंग्रेजों की ही देन है कि इन्होंने दलितों के उत्थान के लिए बहुत सारे मार्ग प्रशस्त किए। उनमें शिक्षा की क्रांति सहित बहुत सारी सामाजिक कुरीतियों के नाश शामिल हैं।

सन् 1947 को भारत देश आजाद हुआ। तात्क्षण भारत का संविधान बना। संविधान बनते ही भारत में दबे-कुचलों के भविष्य का सूर्योदय हुआ। सीधा कहें, तो देश में सरकारी महकमों में दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। इसी व्यवस्था के तहत ही आज हम चुनाव चुनाव का खेल खेल रहे हैं। जिस दिन यह व्यवस्था समाप्त हो जाएगी, उसी दिन हम दलित फिर वही गले में हांड़ी टांगते हुए नजर आएंगे।

अंग्रेजों की देन संताल परगना आज किस स्थिति में है? इस आधुनिक दौड़ में वह किस पायदान पर खड़ा है? इस दौरान उसने क्या खोया-क्या पाया? अगर इसका तुलनात्मक अध्ययन किया जाए, तो बहुत सारे राज परत दर परत खुलते जाएंगे। आज हूल प्रदेश की स्थिति ठीक नहीं है। हालांकि संविधान लागू होने के साथ ही यहां आदिवासियों के लिए अधिकांश सीटें आरक्षित की गई, फिर भी आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक अवस्थाएं ढाक के वही तीन पात हैं। हूल प्रदेश में चाहे वह दिसोम गोमके हों अथवा गुरुजी का दौर झारखण्ड नामधारी दलों का ही वर्चस्व रहा है। इतना कुछ होने के बावजूद भी आज हूल प्रदेश में आदिवासियों की जनसंख्या घटती जा रही हैं एवं इनकी आधी आबादी जीवकोपर्जन के लिए अन्य प्रदेशों की ओर पलायन के लिए मजबूर हैं। क्यों?

हूल प्रदेश के पतन के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है? क्या हमारे धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक पतन के लिए सिर्फ चिंटु-पिंटु को ही दोष दिया जाय? या और भी कोई अन्य कारण हैं? इन कारणों पर जब तक विश्लेषणात्मक अध्ययन नहीं किया जाएगा, जब तक हमारा ब्लूप्रिंट व रोड मैप तैयार नहीं होगा, जब तक हमारा प्रयास सामूहिक नहीं होगा, तब तक हमारा कृत्य अंधेरे में तीर मारना ही साबित होगा।

आइए, इस विषय पर गहनपूर्वक मंथन करें, सामूहिक प्रयास पर बल दें जिससे हम अपने हूल प्रदेश के भविष्य को संवार सकें।

Sunday, 12 May 2024

करो या मरो

दुनिया में राजनीति का नशा बड़ा ही अद्भूत है। एक पैर कब्र पर है, फिर भी यह नशा उतरने का नाम नहीं लेता है। जिस तरह दर्जी का बेटा दर्जी, कुम्हार का बेटा कुम्हार उसी तरह यह पेशा भी खानदानी बन जाने का रिवाज है। 

देश में तीसरे चरण का मतदान हो चुका है। 13 मई 2024 को चौथे चरण का मतदान होना है। अब तक सभी चरणों में मतदान करने वालों की संख्या गिर गई है। आखिर ऐसा क्यों? इस संबंध में सौ बात की एक बात लोगों का लोकतंत्र से विश्वास उठना बताया जा रहा है। उनके अनुसार सत्ता पक्ष हो या विपक्ष सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं। उनकी दलील है कि इस बार तुम लुट लो, फिर हमें अगले पाँच साल बाद लुटने का मौका दो। यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा है। परंतु यह भी सच है कि अधिक दिनों तक जमा किया हुआ पानी जरुर गंदा होता है, अतः इसकी सफाई बहुत जरुरी है। एवं उस तालाब पर नये जल का भराव अत्यावश्यक है। इसे ही एंटीइनकॉम्बेन्सी कहा जाता है।

विश्वास बहुत बड़ी चीज है। अगर विश्वास ही उठ गया, तो सबकुछ का सत्यानाश तय है। आजकल ईव्हीएम द्वारा मतदान का प्रावधान है। ईव्हीएम एक मतदान करने की मशीन है। उस पर आरोप लगते रहा है कि उस मशीन को अपने मनमुताबिक सेट किया जा सकता है। आरोपकर्ता की दलील है कि उसे इस तरह सेट किया जा सकता है कि अगर उस मशीन में दस वोट पड़ा, तो छः वोटों को अपने खाते में आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है। लो कर लो बात। कुछ भी चिल्लाते रहो। जीत तो उसी की होगी, जिसके पास लाठी है। 

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि अब देश में गरीबों की संख्या 84 करोड़ हो गई है। यह जनसंख्या सिर्फ पाँच किलो सरकारी राशन पर जीवित है। यह भी सच है कि आने वाले दिनों में इनकी संख्या घटेगी नहीं, बल्कि बढ़ती ही जायगी। देश में नौकरी करने की सुविधा गायब हो गई है। वंचित एवं दबे-कुचले लोग अब आसमान से गिरे तो खजूर पर अटक गए हैं। उनकी आरक्षित सीट घटा दी गई है। उन्हें अपने हाल में जीने के लिए अवारा छोड़ दिया गया है। देश की सरकारी संपत्तियों को धड़ल्ले से बेचा रहा है। और जैसे कि आपको मालूम है कि प्राईवेट संस्थानों में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। बेचारा आरक्षित वर्ग आखिर जांय तो कहाँ जांय?

देश के संविधान पर भयानक खतरा मंडरा रहा है। बीते दिनों इसे संसद भवन के समीप जलाया गया। जगह-जगह आरक्षण का विरोध किया जा रहा है। इस बात की पुष्टि भी हो चुकी है कि सत्तापक्ष के लोकसभा उम्मीदवारों ने चार सौ पर लाने की दुहाई देते हुए संविधान को बदलने की वकालत कर डाली है। इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है कि वह दिन दूर नहीं जब देश से लोकतंत्र एवं संविधान का नामोनिशान मिट जाएगा।

अतः अब देश में "करो या मरो" की स्थिति आ गई है। अगर आपसे किसी तरह की चूक हो गई, तो यह आपका अंतिम मतदान होगा। इसके बाद देश जल रहा होगा और साहब बांसुरी बजाने में मस्त होंगे। तब तक देश खण्ड-खण्ड हो जायगा। 

Sunday, 5 May 2024

मान लो; संविधान बदल गया?

तर्क विज्ञान के कई नियमों में यह भी एक नियम है कि जहां धुआँ उठे, समझो वहां आग है। इसका मतलब अगर वहां धुआँ हो, तो वहां आग होने की पूरी-पूरी संभावना से कोई नहीं इंकार कर सकता है। धुआँ और आग में चोली-दामन का साथ है। बगैर धुआँ आग की कल्पना हो ही नहीं सकती है। इसका अर्थ यही हुआ कि भाजपा एवं उसके सामाजिक संगठन राष्ट्रीय स्वयं सेवक गाहे-बगाहे यह जो संविधान बदलने की बात उठाते हैं, यह सत्य प्रतीत होता है। इसी चुनाव में भाजपा के कुछ उम्मीदवारों ने साफ तौर पर कह दिया है कि उन्हें 400 पार करा दो, वे संविधान अवश्य बदल देंगे। और तो और वे खुलेआम संविधान को जलाते हैं। उनके समर्थक एससी/एसटी/ओबीसी मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं। यह सब धुआँ क्यों उठ रहा है? इसका मतलब साफ है कि वहां आग लगी हुई। वे संविधान बदलने को उतारु हैं।

भारत देश सन् 1947 को आजाद हुआ। बाबा साहब डॉ भीमराव आम्बेडकर की अगुवाई में लिखे हुए इस संविधान को 1949 में हम भारत के लोगों ने उसे अंगीकृत किया। और इसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया। कुछ संशोधनों के साथ फिलहाल इसमें 25 भाग और 448 अनुच्छेद हैं। भारत का संविधान दुनिया के सर्वोत्तम संविधानों में से एक है। परंतु इतना उच्च कोटि का संविधान रहते हुए भी कुछेक घटनाओं को देखकर मन बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर हो जाता है। संविधान के अनुसार भारत का हर नागरिक बराबरी का हक रखता है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है। इस देश में छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं, उसे सदा के लिए मिटा दिया गया है। हर नागरिक को मौलिक अधिकारों से सुसज्जित किया गया है। फिर भी हमारे वर्तमान महामहिम राष्ट्रपति के साथ ऐसा तुच्छ भेदभाव क्यों? इसके पूर्व में भी कई दलित नेताओं के साथ ऐसा ही भेदभाव किया गया है। ऐसा क्यों? इसके अलावे भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने पर मनाही क्यों? इस तरह के कई उदाहरण हमारे सामने मौजूद हैं।

अब सवाल उठता है मान लो; संविधान को बदल दिया गया, फिर क्या होगा? क्या होगा? ये जो चुनाव-चुनाव हमलोग खेल रहे हैं, सब खत्म। न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। न तुम्हारे विधायक होंगे और न कोई सांसद। पंचायत चुनाव में भी आपकी कोई भागीदारी नहीं होगी। सरकारी आरक्षण खत्म हो जायगा। राजनैतिक हो अथवा सरकारी नौकरी, सब समाप्त। याद रखना, सदियों से दबाए गए दलित फिर वहीं पहुंच जाएंगे, जहां से वे आये थे। सभी दलित गले में हांड़ी और कमर में झाड़ू टांगते हुए नजर आएंगे। महिलाओं को स्तन ढांकने की आजादी नहीं होगी। जिस दलित को शिक्षा ग्रहण करने का भूत सवार हो, उनके कानों में पिघलते हुए शीशे डाले जाएंगे। दलित गुलामगीरी करने के लिए मजबूर हो जाएंगे। पक्का सबूत के तौर पर अभी देख लेना। लोकसभा सामान्य सीट से उम्मीदवारी करके देख लेना। वहां से बाहरी जीत सकता है, पर आपकी पूछ नहीं के बराबर होगी। 

सवाल यह नहीं है कि जब संविधान बदलने की घड़ी आएगी, फिर देखा जाएगा। आग लगने पर कुआँ खोदना कहां की बुद्धिमानी होगी? आदिवासी विरोधी मानसिकता वाले को कौन नहीं जानता है? 1977 से पहले वे ”दीया“ दिखाया करते थे। इसके बाद उनके हाथ में "कमल फूल" उग आया। तब से वे धीरे-धीरे सत्तासीन होते गए। और अब तो वे 10 वर्षों से हमारे सिर पर सवार हो गये हैं। उनके काले करतूतों के बारे में इतना ही काफी है कि वे आपको "वनवासी" के नाम से पुकारते हैं एवं धर्म की घूंट पिलाते हैं।

एसपीटी एक्ट इतना सख्त कानून रहते हुए भी किसने मनुवादियों को अपने इलाके में प्रवेश करने की अनुमति दी? उन्हें किसने आमंत्रण दिया? सिर्फ राजनीतिज्ञों को दोष देने मात्र से आपकी समस्या नहीं सुलझ सकती है। इसके जिम्मेवार आप स्वयं हो। यहां "मियां बीबी राजी, तो क्या करेगा काजी" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। आपके इलाके में इतने सारे पत्थर एवं कोयला खदान के स्वामी कौन लोग हैं। सारे के सारे मालिक मनुवादी हैं। 

चालू लोकसभा चुनाव में वे किस तरह की चाल चल रहे हैं, आप पूर्णतः अनभिज्ञ मालूम पड़ते हो। पूरे देश में एक ओर संविधान बचाने वाले खड़े हैं, तो दूसरी ओर इसको बदलने वाले 400 पार का नारा दे रहे हैं। साफ शब्दों में कहा जाय, तो राजमहल की सीट किसकी झोली में जाती है, देखना बड़ा दिलचस्प होगा।  आपकी सावधानी हटी, तो दुर्घटना घट सकती है। पछताने से कोई लाभ नहीं, जब चिड़िया चुग गई खेत।

Saturday, 4 May 2024

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता

यह लेख लिखने तक लोकसभा-2024 चुनाव के चौथे चरण का मतदान हो रहा है। आपका यह मंगरु कोई चुनाव विश्लेषक नहीं। वह सिर्फ इतना जानता है कि देश में चुनाव दो दलों के बीच हो रहा है - इण्डिया गठबंधन तथा एनडीए। इन गठबंधनों से मंगरु को क्या लेना-देना? आग लग जाए ऐसे गठबंधनों को। इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? कोई राजा बने या रंक? हमें इससे क्या मतलब? देश में तानाशाही आए या प्रजाशाही? रोजगार-नौकरी मिले या पकौड़ा तलना पड़े? महंगाई आसमान भी छू ले। हमें तो बस अपने हाल ही में जीना है। संविधान मरे-जीये, आरक्षण खत्म हो जाए। हमारा क्या जाता है? जिसका जाता है, वो लड़े। हमें किसी से कोई मतलब नहीं। हमें न उधो का देना और न ही माधो का लेना। इन 75 सालों में बहुत देख लिया। देखो न, मुर्गे ने बांग दी और हम उधर हो लिए। जोड़ा पत्ता आया। हमने उसपर खूब खाना खाया। अब तीर-कमान का जमाना आ गया है। हम आदिवासी जो ठहरे। एकलव्य हमारा आईकॉन है। और हम तीर-कमान के शिकार हो गए। उजड़े वन-जंगलों में शिकार करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।

चुनाव का मौसम है। सड़क किनारे गांव है। और उस गांव के सड़क किनारे मंगरु की छोटी-सी झोपड़ी है। रोज कोई न कोई किसी पार्टी के चुनाव प्रचारकों से भेंट-मुलाकात हो ही जाती है। कल की ही तो बात है। गोधूलि का बेला था। कोई नेता जी अपने लव-लश्कर के साथ आपके इस गरीब मंगरु की झोपड़ी में दर्शन दे गए। "बैठिए-बैठिए। बैठिए नेताजी।" यह सुनते ही नेताजी के सभी छोटे-बड़े चमचे अपने आंगने में घुस आए। उनलोगों को बिठाने की बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई। खैर, झोपड़ी में आदम जमाने की कुर्सी पड़ी थी। उसे नेताजी की तरफ खिस्का दी गई। बाकी लोग ईश प्रदत्त कुर्सी पर तशरीफ रख दिए। देखते ही देखते गांव के तमाम लोग इस झोपड़ी की ओर दौड़े चले आए। अच्छी-खासी भीड़ एकट्ठी हो गई। नेताजी को बिन मांगे मोती मिल गई। उम्र का लिहाज रखते हुए सभी समाज सुधारकों ने "डो़बो़क्" किया। दुआ-सलाम के बाद नेताजी ने बात बढ़ाते हुए कहा - "भाईयो तथा बहनो! इधर से गुजर रहा था। याद आई आपकी मंगरु बाबा की। इनकी उम्र बढ़ चली है। सोचा, क्यों न इनसे आशीर्वाद लिया जाय? देखिए, मैं इस राजमहल सीट से एक आजाद उम्मीदवार के रूप में आपकी खिदमत में पेश हूं। विगत दस वर्षों में आपके लिए कुछ भी नहीं हुआ है। मैं आपके लिए टेण्डेण्सी एक्ट, पेसा एक्ट, खतियान एक्ट सब लागू करके रहुंगा। मैं गुरुजी का पक्का चेला हूं। अतः आप हमें गुरुजी के नाम पर भारी से भारी मतों से विजयी बनावें ...।

यह छोटी-सी मुलाकत यहीं समाप्त हो गई। मंगरु ने मेहमानों को अंतःमन से लाल चाय पिलाई। नेताजी बहुत खुश थे। अतः जाते-जाते उसने प्रधान के हाथ में एक मोटा-सा लिफाफा थमाते हुए कहा - "मेरी तरफ से यह एक छोटी-सी भेंट है। ध्यान दीजिएगा।"

गांव वाले समझ गए थे कि नेताजी गुरुजी के चेले हैं। अतः उन्हें गुरुजी के चुनाव चिन्ह पर वोट देकर उनका हाथ मजबूत करना है। पर मंगरु यह पूछना तो भूल ही गया कि आपके पच्चीस वर्षों की विधायकी/मंत्री पद का हिसाब-किताब कौन देगा? आपकी मांगें तब क्यों नहीं पूर्ण हुई? आप अकेले इतनी बड़ी लोकसभा में कुछ कर पाओगे? या यह भी कोई जुमला ही साबित होगा? और तो और इतने मोटे-मोटे लिफाफे का स्त्रोत कहां है? कुबेर का हाथ कहां लग गया? वाह री माया!

Friday, 3 May 2024

 अब कौन होगा दलितों का तारणहार?

जिन्हें हम भगवान मानते हैं, जब वे अपने आपको बचा न पाये, तो हम किस खेत की मूली हैं। कोई मानव प्राणी इस दुनिया में सदा रहने के लिए नहीं आया है। इस धरा पर आने का कुछ पता नहीं, पर जाना निश्चित है। हम-तुम बस इस लेख पर विचार-मंथन करते रहेंगे। और एक दिन हम भी चल बसेंगे। बापू नहीं रहे, बाबा नहीं रहे, सिदो-कान्हू भी नहीं रहे। बाबा साहब जिन्होंने इतना अच्छा संविधान दिया, सब चले गए। पर उनकी कृति हमें बहुत कुछ बता रही है। 

जिन अंग्रेजों ने दलितों को जीवनदान दिया, उन अंग्रेजों को मनुवादियों द्वारा जी भरकर गाली देना कहाँ की इंसानियत है? यह समझने वाली बात है। मनुवादी अंग्रेजों को गाली क्यों दे रहे हैं? वे इसलिए गाली दे रहे हैं क्योंकि अंग्रेजों ने मनुवादियों के गुलामों को मुक्ति दिलाई है। इसके सिवा और कोई कारण ही नहीं है। इस मसले को आप इस तरह भी समझ सकते हैं। कानून की भाषा में या यों कहें उचित निर्णय देने हेतु जज को निष्पक्ष होना अति आवश्यक है। यह सौ फीसदी सच है कि निष्पक्ष हुए बगैर कहीं भी और किसी भी मामले में उचित फैसला हो ही नहीं सकता है। जिस देश में सदियों से दलितों को सताया जा रहा हो, उन्हें गुलाम बनाया जा रहा हो, उनपर बेतहाशा अत्याचार किये जा रहे हों और तो और उन्हें तमाम तरह के मानवाधिकार के अंतर्गत मिलने वाली सुविधाओं से भी वंचित किये जा रहे हों, तो इनका न्यायाधीश किसे नियुक्त किया जाय, ताकि पीड़ितों को प्राकृतिक न्याय मिल सके? इस भारत देश के साथ यही हुआ है। यहाँ मनुवादियों का साम्राज्य था। ये सदियों से शूद्रों को प्रताड़ित करते आ रहे थे। भगवान ने शूद्रों की सुनी। और उसने अपने प्रतिनिधि के रूप में अंग्रेजों को भारत भेजा। अंग्रेजी काल में भारत में क्या हुआ? इसे आप अच्छी तरह परिचित हैं। सार यही है कि अंग्रेजों ने मनुवादी साम्राज्य को ध्वंस कर दिया। जज बनकर शूद्रों को उचित निर्णय दिया। अंतोगत्वा भगवान द्वारा आवंटित काम को अंजाम देने के पश्चात् वे सन् 1947 को अपना घर वापस लौट चले। साथ ही वे अपने होनहार छात्र डॉ भीम राव अम्बेडकर को भारत का संविधान लिखने के लिए तमाम तरह के नोट्स देकर इस देश से बिदा हो लिए।

भगवान द्वारा प्रेषित निष्पक्ष जज अंग्रेज पुनः मनुवादी को भारत की सत्ता सौंपकर अपने वतन को लौट चले। अब शूद्रों का क्या होगा? शूद्रों का वही होगा जो मंजूरे खुदा। यही सच है कि भारत के हर नागरिक को संविधान के अनुसार चलना चाहिए। लेकिन बड़े अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि इस वक्त मनुवादियों के फन उठने लगे हैं। मनुवादियों द्वारा गाहे-बगाहे इसकी आलोचना करना एक बहुत बड़ा अशुभ संदेश है। जिस तरह संविधान की धज्जियां उड़ रही हैं, वह आपके सामने है। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। अब यहाँ के सत्ताधीश किसी एक धर्म विशेष को ही बढ़ावे दे, यह कहीं से भी शोभा नहीं देता है। पूरी सरकारी मशीनरी प्राण प्रतिष्ठा में लग जाय, तो इसे क्या धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है? इसी तरह आरक्षण को समाप्त करने हेतु सभी सरकारी संस्थाओं को ही बेच देना, कहाँ तक उचित है? ईडी, चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट जैसी स्वतंत्र निकाय, अब सरकार के दिशा निर्देश पर काम करे, तो दाल में कुछ काला जरुर नजर आता है। इस हालात में अब कौन होगा दलितों का तारणहार? मामला सोचनीय है।

संघर्ष करना आसान है पर उसके द्वारा प्राप्त  होने वाले फल को संभाल पाना कठिन है यह जगजाहिर है कि कोई भी चीज हाथ में आने के बाद उसकी कीमत शून्...